विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि।।

टिकट तो कन्फर्म
लेकिन दुर्भाग्य हमारा
क्योंकि यह ” मानवशरीर ” ट्रेन ?
लक्ष्य क्या है इसका?
शुक्रिया करुणानिधान भगवान् का
भोग ही जीवन नहीं।
मजा क्या लोगे ?
सजा की सेज भी बिछी है।
उम्र तो सहज शरीर धर्म है।
जलवत् बहती जा रही
” समुद्र ” मेरा गन्तव्य।
इसे उम्र भर जान नहीं पाया
वही उनकी माया किए है बेचैन
तरसता,तड़पता हूँ बना नहीं “मैन”
अब सोचना तो पड़ेगा।
कब तक नवीन यात्राओं के लिए
नया -नया टिकट लेना पड़ेगा?
जब गन्तव्य पता नहीं
तब नाना शरीर धारण ही
एक नियति होती है।
हमारी “प्रज्ञा ” तो सोती है।
” स्थितप्रज्ञ ” गुरु भगवान् ही
जगाते हैं,गाते हैं, गुनगुनाते हैं।
भगवान् का भगवती का
पावन नाम जब सुनाते हैं,
तब ” जीव ” बेचारा नहीं रहता।
मिल जाता है हारे को हरिनाम
हारा जीत की ओर बढ़ता रहता।
तब
और वह “जीव ” मीरा कबीर सूर तुलसी
रैदास नाभादास प्रियादास बन जाता है।

और ” पायो जी पायो मैंने रामरतनधन
पायो ” की टेर शुरु हो जाती है।
कर्मों की फेर फिर जाती है।
अगाध संसार सागर में
नाम का तिनका जीवन नैया
बन ही जाती है।

और मिल जाता है
” वेदवेदान्तवेद्य तत्व “
व्रजरज में लीलापुरुषोत्तम कहाता है।
“जीव” उजास में नहाता, “तम”नसाता है।
प्रेम की प्रतिमा”अजन्मा” जन्म लेकर
भक्तों को रिझाता ” कृष्ण “कहलाता है।

और इसीलिये अनुभूति बोलती है-

विगतविषयतृष्णः
कृष्णमाराधयामि।।

।।हरिः शरणम्।

जेहि सरीर रति राम, सोइ आदरहिं सुजान। रुद्र देह तजि नेह बस, बानर भे हनुमान।।

जिस शरीर में प्रभु श्रीराम से प्रेम हो जाय, वही शरीर सज्जनों ,सुजनों के आदर का पात्र बन जाता है।
भगवान् ही “प्रेम” स्वरूप सभी चराचर में व्यापक हैं।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।
अब ,उसी प्रेमास्पद, प्रेममूर्ति भगवान्, का प्रेमानुराग, जगत् को अनुभव कराने के लिए, भगवान् शिव
” रुद्र ” देह छोड़कर, भक्तराज श्रीहनुमान् जी महाराज के रूप में अवतरित होते हैं।
कम से कम दोहावली के इस दोहे का आशय तो ऐसा ही लगता है।

जगदम्बा पार्वतीजी भी भगवान् से कहती हैं, कि आप तो दिन-रात प्रतिक्षण ही
श्रीरामनाम जपते रहते हैं। और विशेषता यह कि, आप ही कहते हैं कि, इसी नाम के प्रभाव से मैं(शिव)औरों की बात क्या,
कीट-पतिंगों तक को मुक्ति का अधिकारी बना देता हूँ।
भगवती ने कहा-

तुम पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग अराती।।

भैया! करोड़ों प्रकार की योगसाधना करके, योगीजन जिस मुक्ति मार्ग के अधिकारी बन पाते हैं, वह मुक्ति हे प्रभु!
आप सभी कीट पतिंग तक को दे देते हैं।यह आपके नाम के जप का ही तो परिणाम है-

बेद बिदित तेहि पद पुरारि पुर,
कीट पतंग समाहीं।।
जोग कोटि करि जो गति हरि सों
मुनि माँगत सकुचाहीं।।

भगवान् राम की भक्ति और सकल सुख संपदा शिवभक्ति से मिल जाती है-
सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।
बिनु तव कृपा राम पदपंकज।
सपनेहु भगति न होई।।

और इसीलिये भगवान् राम ने अपने भक्त शिव से द्रोह करने वाले “सेवक” की निन्दा की है।और ऐसे दुष्ट को नारकी तथा दुर्बुद्धि कहा-

शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहिं न भावा।।
संकरबिमुख भगति चह मोरी।
सो नारकी मूढ़मति थोरी।।

कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरे।

लिंग थापि विधिवत करि पूजा।
शिव समान प्रिय मोहिं न दूजा।।

उत्तर काण्ड में तो श्रीराम की शिवभक्ति
पराकाष्ठा पर है,जिसे विनय पूर्वक कहा जा रहा है-

औरौ एक गुपुत मत सबहिं
कहहुँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर
भगति न पावै मोरि।।

इस प्रकार शिवद्रोह,भक्त द्रोह है।
और श्रीरामद्रोह, भगवद् द्रोह।

इसीलिये प्रेमस्वरूप प्रभु श्रीराम की प्रेमा भक्ति की प्राप्ति और जगत् को भक्ति की शिक्षा देने के लिए भगवान् उमामहेश्वर ने
अपना रुद्र रूप छोड़कर, अद्वितीय भक्त के मूर्तिमन्त सन्त श्रीहनुमन्त के रूप में
अवतार ग्रहण किया-

रूद्र रूप तजि नेह बस।
बानर भे हनुमान।।

हरिगुरू शरणम्।

आप हमारे अंशी प्रभु! मैं सर्वांश आपका विभु!

वेदवेदान्तवेदनाय,
वेदना न वर्तते।
किन्तु स्वानुभूतिकाय
प्राणवर्तना प्रवर्तते।

वेद वेदान्त जाने की अभिलाषा नहीं है।
लेकिन अपने आत्मा में ही,
जो सारे संसार का नाम -रूप
अनुभव करा रहा है,
उसे देखना चाहता हूँ।

वह निर्गुण भी निराकार भी।
सगुण वही है सदाकार भी।
नहीं हो रहा अनुभव उसका,
माया देती पहरा जिसका।।

माया के चट्टों बट्टों ने
किया हमारा बेड़ा गर्क।
मनुज शरीर निरर्थक होता,
नाहीं चलेगा कोई तर्क।

माया का परिवार बड़ा है।
” सुत” ” वित” “लोक”मनसि चढ़ा है।
नहीं पार इस परीवार से,
करता वार पै वार खड़ा है।।

हे! माया के सर्व अधीश्वर!
हमने किया सरेण्डर है।
आप सँभालो तो हम सँभलें
अब प्रचण्ड इसका डर है।

एक बार शरणागत होकर
तेरा मैं हूँ प्रभु! कह दे।
उसे “अभय” तत्काल “मुक्ति” दे,
यह संकल्प व्यक्त करते।।

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत् व्रतं मम।।
वाल्मीकि रामायण।
इसलिये-

दया करो हे देव! हारता,
मन माया में सदा रता।
आप हमारे अंशी प्रभु!
मैं सर्वांश आपका विभु!

।।हरिगुरू शरणम्।।

जो है वो दीखता नहीं। जो नहीं है वह दीखता है।

धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्।

अभ्युदय और निःश्रेयस
की सिद्धि कराने वाला धर्म

हम मनुष्य हैं इस स्वरूप
को धारण कराने वाला धर्म

और मनुष्यता आ जाने पर
सर्वत्र ” प्रेम” रूप दृश्य “वह”

प्रेम प्रकट घट-घट में बोले।
बिना प्रेम कोई नहिं डोले।
प्रेम बहे विश्वास श्वास है।
गुरु दिखलाए कटे फास है।

संसार में जो ” प्रेम ” है वह दीखता नहीं।
जो “संसार”नहीं है वह दीखता है।

गुरु तत्व (शास्त्र सन्त) “प्रेम” द्रष्टा है।
शरणागत अनुगत को दर्शयिता भी” वही”

सो जानै जेहि देहु जनाई।
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।।

।।हरिः शरणम्। गुरुः शरणम्।।

संसृति मूल सूलप्रद नाना। सकल सोकदायक अभिमाना।।

इस संसृति(सृष्टि) भूत जगत् में मैं यह
शरीर धारण करके क्यों आया? क्योंकि
” मैं ” पन बना ही रहा।
वस्तुतः अपने अभिमान के कारण।
यह संसार नाना सूल(चुभने वाले) दुःखों को देनेवाला और शोकप्रद है।
हम ऐसे दुर्भागी कि, अपना अभिमान दूर नहीं कर सके।बार -बार यह शरीर धारण का कारण बन रहा है।
मित्रों! सन्तों ने वेदादि शास्त्र मथ कर जो मक्खन निकाला है,उसका सार सर्वस्व ” घृत” यही ” अभिमान” है, जिसकी चिकनाई में हम जैसे जीव फिसल – फिसल कर गिर रहे हैं और बार -बार जन्म ले रहे हैं।
इस अभिमान का आयात कहाँ से?
विचारने पर एक सूक्ष्म “बीज” दीख
पड़ता है, जहाँ से निकल कर यह आ गया है। वह सूक्ष्म “बीज” है , “मद”।
यह “मद” ही अभिमान का कारण है।
मद का अर्थ ” नशा ” है।
इस नशे से हम मदमत्त(मतवाले)बने
रहते हैं। मजा देखिये, इसका ज्ञान हमें होता ही नहीं।
यह “मद”(नशा) कभी-कभी ज्यादा हो जाता है, तब मतवाला पन या उन्माद में
हम अति कर जाते हैं।
यही “मद” तो अभिमान का जनक है।

अब देखिये- इस ” मद ” का कारण
कौन ?
तो इस ” मद” को पैदा करने वाले अनेक हैं।सूची लम्बी है। कुछ इस तरह-
जातिमद, विद्या मद, पदमद,रूपमद,
यौवनमद,बलपौरुषमद,चातुर्य मद,
वचनमद, कर्ममद, बुद्धि मद,कौटिल्यमद

इत्यादि।
अब ये ” मद “के अनेक कारण हैं।
लेकिन एक और बड़ा ” मद ” है।
इसका नाम है ” श्री मद “। देखिये-
” रामचरितमानस ” के उत्तरकाण्ड में
” श्रीरामकथा” के अद्वितीय व्यास
” कागभुशुण्डि ” जी महाराज हैं।
सुमेरु की सर्वोच्च चोटी नीलगिरि पर्वत पर वह कथा कहते नहीं अघाते हैं।
इनकी कथा में ” हंस ” बनकर भगवान्
उमामहेश्वर भी जा चुके हैं।रास्ते में आते समय शिवजी की भेंट पक्षिराज गरुड़ जी से होती है। शंका करने पर भगवान् इन्हें
नीलगिरि पर श्रीकागभुशुण्डि जी जैसे परम भागवत से श्रीरामकथा सुनने भेज देते हैं।
सामान्य शिष्टाचार के बाद गरुड जी
वहीं श्रीरामकथा सुनते हैं।
इसी प्रसंग में माया मोह की निवृत्ति और पुनः शरीर न मिले ,इसके लिए
” श्रीमद ” और तज्जन्य अभिमान की चर्चा होती है।कागभुशुण्डिजी ने कहा कि
यह धनमद सभी को नशे में टेढ़ा कर देता है। राजा आदि के पद का मद तो बहरा ही बना देता है।स्त्री के प्रति आसक्ति भी तो पुनः जन्म का बड़ा कारण है।
क्योंकि इनके रूपयौवनमद से बड़े -बड़े महर्षि नहीं बचे-

श्रीमद वक्र न कीन्ह केहि,
प्रभुता बधिर न काहि।
मृमलोचनि के नैन सर,
को अस लागि न जाहि।।

 यह नाना तरह का मद(नशा) अपना नाश करने के लिए काफी है। यही अनेक प्रकार का मद " अभिमान " को जन्म देकर बनाए रखता है।

सोचिये, माँ के गर्भ से बाहर आए तो माँ मिली,छाती से लगाया।बड़े होने पर पिता भी मिले,और उनकी पैतृक सम्पत्ति भी।
शरीर छोड़ने पर सब यहीं छूटा। अरे !
हमारा शरीर भी हमारा नहीं।

जब ना कुछ मेरा ना कुछ तेरा ।
तब मद और अभिमान क्यों?

इसीलिये श्रीरामचरित्र को देखने वाले और श्रीरामकथा सुनाने वाले धन्यातिधन्य
आचार्य श्रीकागभुशुण्डि जी महाराज ने
गरुड जी को कथा सुनाने के प्रसंग में
इस मद और उसके जनक अभिमान
को नर तन पाकर छोड़ने के लिए कहा है,
जो पुनः चौरासी के चक्कर में ढकेल देता ही है –
संसृति मूल शूलप्रद नाना
सकल सोकदायक अभिमाना।।

यह झूँठा अभिमान हरिगुरुसन्तों की कृपा से दूर हो, प्रत्याशित जन्म भोग के लिए न होकर, भगवदीय आदेश पर “उनकी”
” लीला” दर्शन के लिए हो।

गुरुः शरणम्

।। हरिः शरणम् ।।

योग और भोग

साधारण विचार करें तो, यह माटी,पानी,
आग, हवा और खुला आकाश हम जैसे ऋषि संस्कृति वाले भारतीयों के लिये,
साधारण भोग के पदार्थ नहीं हैं।
यह माटी हमारी धरती माँ है।
पानी हमारी पवित्र गंगा है।
आग तो साक्षात् अग्निदेव ही।
हवा हमारे श्वास-प्रश्वास प्राणदेव।

खुला आकाश प्राणों के माध्यम से यहाँ से वहाँ ,नाना लोकों में ले जाने वाला
आक्सीजन का रक्षक, निर्गुण,निर्विकार,
परमात्मा, परमब्रह्म, जिस आकाश देव
के बिना जीवन की कोई कल्पना नहीं।

नारायण! यही है हमारी सर्वत्र भगवद् दृष्टि। यह मान्यता पवित्र भारत की धरती से परे नहीं मिलने वाली, यही भारत का योग है। यह रामकृष्ण के अवतार की धरती है। जहाँ भक्तों के आनन्दहेतु “वह” अजन्मा ,जन्मता है।
हम “उनकी” करुणा से मानव तन पाकर
” भोग”के लिये नहीं जन्मे हैं।
कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।

अब हमें अपने ” परमयोग ” (परमात्मा)
का वियोग सहन नहीं। हम सदा -सदा के लिये “उसका” योग ही पाना चाहते हैं।
सद्गुरु वाणियों का भी “योग” और
योग ही नहीं ” प्रयोग ” भी यही है।
तुलसी, सूर,कबीर, रैदास, मीरा जैसे भगवत् प्राप्त सन्त कृपा करें।
और जहाँ से हम(जीव) बिछुड़े थे “उनकी” प्राप्ति हो जाय।
हम कृतकृत्य हों ,जीवन धन्य हो जाय।

जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राम मय जानि ।
बन्दौं सबके पदकमल
सदा जोरि जुग पानि।

हम सबमें भगवद् दृष्टि ही रखते हैं, इसलिये कि ,उस भगवत् स्वरूप को ही पा लें,जिसके लिये” यह शरीर”
मिला,जो योगभाव है।
नहीं तो, भोगभाव तो शूकर कूकर शरीरों में ढकेल देगा।

।। हरिः शरणम् ।।

उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।।

संसार-शरीर का आकर्षण बड़ा ही चित्र
विचित्र है।
यह शरीर और संसार दो नहीं हैं।
दोनों एक ही हैं।
युगों -युगों का शास्त्र पालन और समाधि इत्यादि द्वारा तपश्चर्या, क्षण मात्र में नष्ट होते देर नहीं लगती।
सन्त समाज ,भगवान् के परशुरामादि को लेकर कुल चौबीस अवतार मानता है।
भगवत् चरित्र श्रीमद्भागवत” और
भागवत् (भक्त) चरित्र “भक्तमाल” में इन चौबीस अवतारों की चर्चा है।
भागवत् पुराण में वर्णन है-
भगवान् “ऋषभदेव” के पुत्र थे, श्रीभरत।
इन्हें ” जड़ भरत ” की संज्ञा दी गई थी।
इसलिये कि ये ,इतने वीतरागी महात्मा
थे ,कि ध्यान में बैठते,तो सहस्र वर्षों तक उनकी “समाधि”लग जाती थी।
अनेक वर्षों तक समाधि दशा में पद्मासन में बैठे रहने से इनका शरीर, वृक्षादि की भाँति “स्थिर”रहता, और इसी कारण इन्हें
जड़ भरत” कह जाने लगा।
स्वाभाविक है कि इस अवस्था के कारण यह समाधि दशा में परम तत्व का
दर्शन भी करते थे। अतः-
“प्रकृत्या” ये महात्मा “जड़ भरत” अत्यन्त अपरिग्रही और त्यागी थे।

एक समय की बात है, कि वे प्रातः नदी में स्नान कर रहे थे।
एक सिंह एक हरिणी का पीछा करते हुए ,उसे दौड़ाये हुए आ रहा था।
दौड़ने कीआवाज हुई और श्रीभरत जी
ने पलट कर देखा, तो किनारे आते-आते
आगे हरिणी और पीछे सिंह दीखा।
ऋषि की अहिंसक दृष्टि दोनों पर एक साथ पड़ी, तो थोड़ी दूर पर स्थित बेचारे सिंह की हिंसा ही नष्ट हो गई।
वह दुम दबाकर विपरीत दिशा की ओर भाग चला।
हरिणी वेगवशात् नदी में कूद पड़ी।
प्रसवासन्ना ,उसका प्रसव नदी के जल में
ही हो गया।और उसने तत्काल प्राण भी त्याग दिये। सद्योजात प्रसूत हिरण को
उन्होंने उठा लिया ।
दयालु महात्मा उसे अपने आश्रम में ले
आये। उसका लालन-पालन करने लगे।
पालितपोषित वह शनैः-शनैः बड़ा होने लगा। करुणा पूरित हृदय महात्मा का स्वाभाविक स्नेह उसमें आबद्ध हो गया।
अब ऐसे वीतरागी, तपोधनी,परम
ब्रह्म दर्शी श्रीजड़ भरत जी जब अपना देह-त्याग करने लगे,तब उस “हिरण” की अकस्मात् थोड़ी देर के लिये स्मृति उनकी “वृत्ति” में आ गई, और उसी क्षण उनकी देहावधि पूरी हो गई। उन्हें मृगयोनि में जाना पड़ा।
भैया! अन्ते मतिः सा गतिः।
भगवान् ने गीता में कहा-

यं यं वापि स्मरन् भावं
त्यजन्ति अन्ते कलेवरम्।
तं तम् एव एति कौन्तेय!
सदा तद् भावभावितः।।

जिस-जिस वस्तु-व्यक्ति-पद-पदार्थ-स्थान
रुपादि का स्मरण करते हुए ,यह जीवात्मा
शरीर छोड़ता है, उसी भाव में अनुरक्ति होने से उन्ही-उन्हीं शरीरों को प्राप्त करता है।
हम जैसे मलिन वासनावासित जीव,यदि शास्त्र और सन्त निर्दिष्ट हरि नाम का निरन्तर प्रतिक्षण स्मरण करते हुए, अपना काल नहीं बितायेंगे, तो इस शरीर का अन्तिम काल कब हो ?
कौन जाने?

हमारी चित्तवृत्ति नानात्मक जगत् में लगी है। ऐसे वीतरागी” जड़भरत”जी एकमात्र हरिण में चित्त जाने से हरिण शरीर पा गये-

एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह।
उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।।

।। हरिः शरणम् ।।

ध्रुव मृत्यु का निवारण

मातापिता और गुरु से लेकर सभी समन्धों में वर्तमान भगवत् स्वरूप जन
यदि आगमिष्माण “मृत्यु” का निवारण नहीं करते हैं, तो मातृत्व,पितृत्व और शिष्यत्व आदि सम्बन्ध व्यर्थ हैं।
और वे सभी तत् -तत् सम्बन्धों का अपलाप कर रहे हैं। सच्चे मातापिता आदि वे हैं ही नहीं,जो अपना और अपने पुत्रादिकों को संसार-राग से बचाकर, इस शरीर का प्रयोजन सफल न सकें।

इसीलिये सती “मदालसा” ने पुत्र को पालने में ही लोरी गा-गाकर उसके वास्तविक स्वरूप (परमात्मांश) का बोध कराया-
शुद्धोसि बुद्धोसि निरञ्जनोसि
संसारमाया परिवर्जितोसि।।

परमात्मा “ईश्वर” हमारा अंशी है।
हम जीवात्मा उसी अविनाशी के अंश हैं।
जैसे वह परमात्मा चेतन,निर्मल और
सहज रूप से सुख की ही राशि है।
वैसे हम भी चेतन, संसार वासना के मल से विहीन और मौलिक रूप से सुख स्वरूप ही हैं।
अब प्रश्न है कि चेतन अमल सहज सुख की राशि यह जीव दुखी क्यों?
दुखी इसलिये कि दुःखालयम् और अशाश्वतम् शरीर संसार से इसने अपना सम्बन्ध जोड़ लिया।
और अपनी स्वाभाविक प्रकृति आनन्द रूप परमात्मा से अपना सम्बन्ध
तोड़ लिया। जिससे मायाबश होकर तोते और बन्दर जैसा अपने स्वामी के आदेश का पालन करते हुए बद्ध हो गया।
यह शरीर संसार ही इसका “स्वामी” बन बैठा है-
सो मायाबस भयौ गोसाईं।
बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।

अब देखिए, इस बेचारे जीव की स्थिति, जो अपने मूल स्वामी परमात्मा से सम्बन्ध
भुला कर, अस्थिर शरीर संसार से सम्बन्ध मान बैठा।
संसारी होने से युगों-युगों से भटकता, इसी जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा है।
आखिर उपाय क्या है, इसका दुख दूर करने का?
एकमेव अपने मूल जनक और तत् स्वरूप सुखरूप परमात्मा की ओर लौट आना-
तत् सुखसुखित्वम्-नारद भक्ति सूत्र।

बिना संसार शरीर की भोगवृत्ति त्यागेऔर
और अपने मूल से जुड़े, नाना जन्मों और शरीरों का प्रारब्ध नष्ट नहीं होगा-
सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं।।

और इस जन्मचक्र से छूटने और सहज वास्तविक आत्मकल्याण की उपलब्धि, बिना भगवद् दर्शन के असम्भव है।
अतः मानव शरीर का लक्ष्य, एकमेव भगवद् दर्शन ही है, जिससे हम सभी जीव ,अपने युग-युगान्तर का भटकाव
दूर कर पायेंगे।
भगवद् दर्शन और उसकी प्राप्ति में जीव को उस मार्ग पर चलने में सहयोगी न बननेवाले “गुरु” गुरु नहीं हैं।
स्वजन( सगे सम्बन्धी) भी स्वजन अर्थात् अपने आत्मीय नहीं हैं।
“पिता” वस्तुतः पिता नहीं और ” माता “
भी वास्तविक माता नहीं जिन्होंने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं किया।
वह” दैव” दैव भी नहीं और “पति” पति भी नहीं, जो आने वाली “मृत्यु” से मुक्त न करा सके।
अतः जीव का एकमेव लक्ष्य
” एकमेवाद्वितीयम्” की प्राप्ति है, जिसके लिए करुणासिन्धु भगवान् ने यह” मानव”
शरीर दिया।
वस्तुतः भगवान् ने “अपनी प्राप्ति” के लिये ही यह शरीर सौंपा है। इसलिये सभी को इसमें सहयोग करना चाहिए।
इसीलिये शुकवाणी ने चेत
कराया-

गुरुः न स स्यात्, स्वजनो न स स्यात्।
पिता न स स्यात् जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत् स्यात् न पतिः च स स्यात्।
न मोचयेद् यः समुपेत मृत्युम्।।

।। हरिः शरणम् ।।

सरल स्वभाव न मन कुटिलाई यथा लाभ सन्तोष सदाई।।

नाना तीर्थों में विराजे देवी,देवताओं की तत् तत् स्थानों में जाकर ,उपासना करना।

अष्टांग योग से वैराग्यसाधन।

अनेक कर्तव्य कर्म धर्म व्रतोपवास जप
तप यज्ञ का सम्पादन और दान।

शम दम दया पूर्वक द्विजगुरु की सेवा।

विद्या ग्रहणजन्य विनय विवेक को आत्मसात् करना। इस प्रकार-

जहाँ तक वेदशास्त्र सन्त सम्मत ये सभी भक्ति- साधन हैं, जिन सभी का एकमात्र फल, भगवद्-भक्ति ही है –

 इसलिये बाबा ने कहा-

तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ज्ञान निपुनाई।।
नाना कर्म धर्म व्रत दाना।
संजम दम जप तप मख नाना।
भूत दया गुरु द्विज सेवकाई।
बिद्या बिनय बिवेक बड़ाई।।
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरिभगतिहि मानी।

अब जब उक्त साधनों का फल हरि भक्ति है, तो शबरी को प्रदत्त सभी नौ साधन भी पृथक् – पृथक् हरि भक्ति फल वाले ही हैं।यह देखने योग्य और विचारणीय प्रसंग है।

ये सभी मानवाचरणीय क्रियायें, भगवान् द्वारा प्रदत्त साधन भक्ति में अलग-अलग
नौ सूत्रों में कही गई हैं।

प्रथम भगति सन्तन कर संगा से लेकर
अन्तिम “साधनभक्ति” के रूप में
भगवान् श्रीराम ने-

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हिय हरष न दीना।।
कह कर वि राम लिया।
मतलब कि, सरलता-साधुता,निश्छलता,

विश्वास मूर्ति भगवान् पर दृढ़ विश्वास,
हृदय में विराजे आनन्दमूर्ति आनन्दकन्द भगवान् के कारण दीनता छोड़ केवल हर्ष में रहना।
ये सभी बातें “साधन भक्ति” के नवम कारण में आई हैं। विमर्शणीय है कि-
यही भक्ति का साधन बननेवाली
सरलता इत्यादि,”साध्या भक्ति” भी बन जाती है।
श्रीमद्रामचरित्रमानस के उत्तर काण्ड में ,राज्याभिषेक के अनन्तर, भगवान् ने समक्ष बैठी प्रजा को उपदेश दिया है।
इस उपदेश प्रकरण में वे, भक्ति की परिभाषा या स्वरूप लक्षण कह देते हैं।
यही “साध्या भक्ति “है। यहाँ उन्होंने भक्ति को नाना योग,यज्ञ,जपतप,दान उपवासों से परिश्रम और प्रयत्न से प्राप्य नहीं कहा, बल्कि चार समन्वित गुणों के कारण भूत इस-
“भक्ति” को सिद्ध-साद्ध्या रूप में
इसकी परिभाषा ही दे डाली। यह गुणों
का रुचिर ” चतुष्पथ ” है, जिसमें-
सरल स्वभाव, निष्कपटता, यथालाभ सन्तुष्टि और दयापूर्णता इन चारों का समन्वय है।

    यही  "साध्या भक्ति" है,शरणागति 

और प्रपत्ति भी।
अब देखिये, इन्ही गुणों का समावेश
पूर्व में उक्त –
“साधन – भक्ति” में है,तो इनका प्रवेश
“स्वरूप -लक्षणा” साध्या में भी ।
भक्त के लिये यह चार गुण
भगवान् की चार भुजायें हैं,जिसकी परिधि में वह सदा ही निश्चिन्त है। अतः
भगवान् ने कहा-

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न जप तप मख उपवासा।।
सरल स्वभाव न मन कुटिलाई।
यथालाभ सन्तोष सदाई।।

।। हरिः शरणम् ।।

नारायण जपते रहें इसमें ही आराम है

तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः।।

मात्रतुलसी दल और जल को ही श्रद्धा विश्वास, भाववश अर्पण करने से भगवान् स्वयं को आत्मसदृश भक्त के हाथों बेंच देते हैं।क्यों?

भगवान् भक्तवत्सल हैं।
अत्यन्त वात्सल्य के वशीभूत होकर
भक्त की रक्षा के लिए नरसिंह स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं।
और वह भी खम्भे से

खम्भा जड़ है, और ” हिरण्यकशिपु” भी
आत्माभिमान वश होकर जड़ ही है।
हिरण्य अर्थात् स्वर्ण के कशिपु अर्थात्
वस्त्र में लिपटा होने से वह,हिरण्यकशिपु भी स्वर्ण वस्त्रवत् जड़ है।
अब जब जो जड़ वृत्ति है, उसे चेतन के बिना प्रकाश कैसे हो सकता है।
बिना प्रकाश के आकाशशरीर निर्गुण और सीतारामादिसगुण को देखेंगे कैसे।
” देखे बिनु रघुनाथ के जिय की जरनि
न जाय। “

हाँ यह अवश्य है कि, जिन भाग्यशाली मनुष्यों की नाम जप से वाह्य वृत्ति शान्त हो गई है। और नाम जप भी श्वास प्रश्वास की गति से चलने का अभ्यास हो जाय।
वृत्तियाँ अन्दर प्रवेश कर लेंगी।
आत्मानुभूति का रस मिलने लगेगा।
और यह स्वप्नवद् जगद् आनन्द मय ही दिखेगा।
बाहर तो तुलसी दल,जल आदि से श्रीरामकृष्ण नारायण की पूजा ही बनेगी।
जिससे भक्त और भगवान् का मिलन होगा। प्रभु की करुणा की धारा से भक्त अभिसिंचित हो जायेगा। मूर्तिमती करुणा
स्वाभाविक वात्सल्य को जन्म देगी।
और ” पिता”-“पुत्र” का चिर प्रतीक्षित
संयोग, “नरसिंह”-“प्रह्लाद” हो जायेगा।
यही भगवान् का भक्त के हाथों बिकना है, जैसे भगवत्कामी प्रह्लाद का हुआ।

नारद जैसे गुरू मिलें एक यही तो काम है।
नारायण जपते रहें इसमें ही आराम है।।

।। हरिः शरणम् ।।