गावत गुन सुर मुनि नर बानी । राजा राम अवध रजधानी।।

जहाँ राजा राम बसते हैं,वही उनकी राजधानी है। नाम है, अवध । अवध क्या है? जहाँ किसी के वध का भाव ही नहीं आये।

आचरण की बात तो कहीं नहीं है।

वध शब्द, हिंसा का अर्थ देता है।

तब अवध का अर्थ है ,अहिंसा।

अब देखिये , हिंसा शब्द के दो अर्थ हैं।

हन् हिंसागत्योः, के विमर्श में हिंसा के दो अर्थ हो गये।

एक , हिंसा का अर्थ वध है।

दूसरा गति अर्थवाला है।

दूसरे अर्थ की ओर दृष्टिपात करें, तो

गति न होना ।
मतलब कि , अयोध्या -अवध ,वह क्षेत्र है, जहाँ मानव शरीर मिला तो , तो वह अक्षत-अव्यय स्वरूप हो गया।
तात्पर्य यह कि, वह दूसरे शरीरों में गति नहीं करेगा। अन्यत् जन्म ही नहीं होगा।

और फलतः मानव शरीर मिलना सार्थक
हो गया ।
और मानव शरीर ही क्यों, यह अवध क्षेत्र ऐसा है ,जहाँ विराजे भगवान् श्रीराम
का नाम -जप -स्मरणादि करने से ,इस
नाम को सुनने वाले मानवेतर प्राणी भी
तर गए ।

भगवान् ने नीच से नीच हिंसक प्राणियों
को भी रामावतार में तार दिया।

शबरी ,गीध सुसेवकन्हि सुगति दीन्हि
रघुनाथ ।

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं ।
सुजन विचार करहुँ मन माहीं ।।

नारायण! श्रीरामकृष्ण नारायण नाम के
स्मरणोच्चारण से यह, दुःखालयम् अशाश्वतम्, संसार-समुद्र ही सूख कर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

क्योंकि –

सो सुखधाम राम अस नामा ।
अखिल-लोक दायक विश्रामा

सुखनिधान भगवान् ही हैं।
वे ही समस्त प्राणी के आश्रयदाता हैं।
सुख के धाम हैं।

इसीलिये नाम का आश्रयी तो
वस्तुतः रामाश्रयी है ।

अतः ऐसा रामनामाश्रयी उस स्नेह मूर्ति में डूबने वाला तो, डूबकर तरेगा ही।

वह रामनाम के प्रसाद से ,प्रसन्नता से
आनन्द में मग्न होकर मुक्त विचरता है-

फिरत सनेह मगन-सुख अपने।
नाम-प्रसाद सोच नहिं सपने।।

स्वप्न मेंं भी स्वप्नवत् संसार की सोच यानी
कि शोक नहीं होगा।

इसलिये कहा कि सुर-नर-मुनि की वाणी
रामनाम और इनके गुणगणों को गा रही है –

गावत गुन सुर मुनि नर बानी।

राजा राम अवध रजधानी ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल!

ब्रज के महान् सिद्ध सन्त सूरदास रहे।
नानायोनि-नर्तन शरीर के उन्होंने कहे।

काम क्रोध वस्त्र बने ग्रस्त किया मोह ने।
शब्दस्पर्श विषयों की माला कण्ठ पहने।

मोह की पायल पाँव पहने भ्रमे हैं सदा।
निन्दा-रस-रसाल में हम मग्न भये सर्वदा।

जगत् में भ्रमित मन बन कर मृदंग सजा।
दुःसंगी जनों संग बना बेताल बजा।

तृष्णा का नाद वाद्य अन्तरगत ध्वनित हुआ। बजता बेढंगा स्वर लोगों को भ्रम हुआ।

माया की रस्सी कटि बाँधे बेहाल रहा।
लोभ का तिलक देता सुन्दर सा भाल रहा

जल थल अकास मध्य पाई अनेक काया।
कोटि कला दिखलाई माया की माया।।

कौन करै दूरि यह अविद्या आप जानिये।
आप के भगाये जाय नन्दलाल मानिये।।

इसीलिये सूरदास-वचनों का मर्म भाव।
समझे,तब बही बानी अपने ही गुणस्वभाव।

तब अपनी अनुभूति जगी।
जगद् भाव मति रही लगी।।

यह अनेक जन्मों के कर्म का गणित
याकि गणित का कर्म ध्वनि दुःखों का रणित।

खुलता ना रहस्य वस्य जगत् के रहता मैं
बना रहता भेद ना सुलझता मर्म एकता

समझ नहीं आती यदि तुलसी
नहीं मिलते।
तुलसी नहीं मिलते हनूमान से मिलाते नहीं ।
कहूँ क्या पीड़ा प्रभू राम भी न मिलते।

राम यदि मिले उन्हे रसनासनासीन कीजै ।
राम नाम लीजै चाहे कृष्ण
नाम लीजै।
श्रीगणेश शंकर शिवा सूर्य नाम लीजै सब
कृष्णानुजा विन्ध्याचल रानी नाम की जै।

अतः

दुर्गा नाम गाइये और राधा नाम
गाइये।
सीता नाम गाते हुए जगद् बिसराइये
जगत् को बिसारे भगवन् नाम
के पुकारे बिना।
कौन तारे जग में,शिव-शिवा ही
सहारे हैं।
हारे हम जैसे जीव मलिन
और विषय-ग्रस्त।
बार-बार गिरते भवकूप
नाथ!भारे हैं।
तुलसी कबीर सूर मीरा औ मलूक गुरू
गौरवपूर्ण वाणी संसार से
उबारे है।

है असीम शक्ति इन भगवत्प्राप्त गुरुजनो में , टारो यह अविद्या हम जगद् के लबारे हैं ।
हम क्या कहें –

व्रज के रस राचे कृष्णराधा भाव सूर रहे।
राधाकृष्णसरिता में डूबे भरपूर रहे।।

इसीलिए दैन्यवश सूरदास जी गा उठे

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल
कामक्रोध कौ पहिरि चोलना,
कंठ बिषय की माल।
महामोह के नूपुर बाजै,
निन्दा सबद-रसाल।
भरम भयौ मन भयौ पखावज
चलत असंगति चाल।
तृष्ना नाद करति घट भीतर ,
नाना विधि दै ताल ।
माया कौ कटि फेंटा बाँधे ,
लोभ तिलक दिये भाल।
कोटिक कला काछि दिखराई,
जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अबिद्या,
दूरि करौ नन्दलाल ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल ।

गुरः शरणम् ।हरिः शरणम्।

सततं श्रीरामनामामृतम्

नारायण! यह कलिकाल मलायतन है।
श्रीकृष्ण और श्रीराम नाम के मनन के
बिना पतन के गर्त में डाल ही देगा-

यह कलिकालमलायतन
मन करि देखु बिचार।
श्रीरघुनाथ नाम तजि
नाहिन आन अधार ।।

यह युग, यज्ञ-योग-ज्ञान का नहीं, आधार
तो केवल राम नाम ही है-

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम- गुन गाना।।

सब भरोस तजि जो भज रामहिं।
प्रेम समेत गाव गुन- ग्रामहिं।।

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं।
नाम प्रताप प्रकट कलि माहीं।।

हे प्रभु! आप ही केवल-

शान्त, शाश्वत, अतुलनीय, अव्यर्थ, निर्वाण और शान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शिव, शेष जी के सेव्य,वेदवेदान्तवेदद्य तत्व,
सर्वव्यापी, ब्रह्मांड गुरु, माया-पुरुष,
और करुणानिधान हैं।

राम भजो राम भजो राम भजो बावरेइसके बिना इस युग में कोई भक्ति ज्ञान और वैराग्य का अपर साधन नहीं।

कलि ना बिराग जोग संजम समाधि रे।
राम नाम ही सो अन्त सबही को काम रे।

ए मेरी रसने! संसार रस में रची रसी पगी
जगी सगी होना इसलिये सुहाता है कि,
इस मलमूत्र के पात्र(बर्तन) में वह, सर्व
कारण कारण सुखानुभूति का अनुभावक , परमरम्य राम जो बैठा है।

उसके अन्तः में बसने से ही सारी कान्ति
अशान्ति शान्ति भ्रान्ति भासती है।

अतः सर्वानुभव कारण की अनुभूति कर धन्य है ,वह पुण्यशाली, गुरुपदानुरागी,

जो सतत श्रीकृष्णराम नाम अमृत का पान करता रहता है।
यह,अमृत तो ब्रह्म(वेद) सिन्धु से निकला हुआ है। सज्जनों की जिह्वा पर विराजता है।
कलिमल को निर्मूल कर नष्ट ही कर डालता है ।
अनंगअराति त्रिलोचन के मुखचन्द्र में सदा सर्वदा विराजित यह श्रीरामनाम,
भक्तों को मुक्ति बाँटता है ।
संसार- रोग का शमन करने वाला
संसृति – चक्र से छुडा़ने वाला और समस्त सुखों का मूल भी है ।

अतः हम जनकसुता जगजननि
जानकी वैष्णवी विन्ध्यवासिनी के जीवन श्रीराम को जिह्वा पर रखें ।
पतन(नवनवशरीरधारण) से बचने का
एकमेवोपाय है ।

सन्त सद् गुरु कृपा हो जाय
यह “जग”जाय ।
हम निद्रा से जग जायँ

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं
कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे
संशोभितं सर्वदा ।

संसारामयभेषजं सुखकरं
श्रीजानकीजीवनं
धन्याः ते कृतिनः
पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्

कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव-थाहा।।

उत्तरकाण्ड में कलिपावनावतार परम पूज्य गोस्वामी जी का विवेक, नामजप
की सुदृढ सम्मति व्यक्त करता है।

गुरु वन्दना और सज्जन-दुर्जन वन्दना के
उपरान्त बालकाण्ड में बाबा, इक्यानबे
चौपाइयों में नाम वन्दना करते हैं।
प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
बन्दउँ राम नाम रघुबर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
बिधि हरि हर मय बेद प्रान सो।
अगुन अनूपम गुन निधान सो।
राम नाम तो महाराज हैं।
अग्नि, और सूर्य चन्द्र के कारण हैं।
अतः उनसे बढ़कर हैं।

अग्नि जैसे सबको भस्मसात् कर देता है
वैसे ही नाम महाराज भी सभी दुष्कृतों
दैत्यों को जला डालते हैं। नामजप, वह सूर्य का प्रकाश है,जो

ममता-मोह की घनीअँधेरी रात में विचरने
वाले राग-द्वेष जैसे उलूकों को अपने प्रताप से भगा देता है- ममता तरुण तमी अँधियारी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ।। तब लगि बसत जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु-प्रताप-रवि नाहीं।।

यह नाममहाराज, चन्द्रमा की शीतल चन्द्रिका की तरह चकोरवद् भक्तों को आनन्द प्रदान करते हैं।

बिधि(ब्रह्मा), हरि और शम्भु मय यह नाम तो सबका सर्वस्व मानो प्राण ही है। और देखिये, बाबा तुलसी के ही समकालिक भगवदाप्त महात्मा बाबा

मलूकदास,एकमात्र नाम- जप को जीव की सद्यः मुक्ति का कारण कहते हैं।
क्योंकि , नाम-जप तो अद्वितीय है।

यह कर्म – क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध
तीन प्रकार के स्वरूपों में क्रमशः बँटा है।
और नारायण! क्या कहें-
नाम-जप इतना शक्तिशाली है कि, यह
कर्मों की इस त्रिवेणी से निर्मित पुण्य और पाप के पर्वतको जला करके मानव जीवन को कृतकृत्य ही कर देता है।
पुनर्जन्म की जंजीर टूट जाती है-

राम नाम एकै रती, पाप कै कोटि पहार।
ऐसी महिमा नाम की,जारि करै सब छार।
क्या कहें-
एक से एक पद, सिद्ध सन्त बाबा मलूक
दास ने नाम महिमा के गाये हैं।

एक पद में बाबा, नाम को इस मलमूत्र के
पुतले(कीड़े) मानव शरीर को निर्मल करने में सर्वविध समर्थ और अमूल्य हीरा कहते हैं-

नाम तुम्हारा निरमला निरमोलक हीरा।तुम साहिब समरत्थ हम मलमूत्र के कीरा।

नारायण!पद तो बड़ा है लेकिन अर्थ बिलकुल स्पष्ट।
क्या महिमा है नाम की-

पाप न राखै देय इसे जब सुमरिन करिये।
इक अक्षर के कहत ही भवसागर तरिये।

अधम उद्धारन सब कहें प्रभु बिरद तुम्हारा। सुनि सरनागत आइया तब पार उतारा।

तुझसा गरुआ औ धनी जामें बड़ै समाई।
जरत उबारे पांडवा ताकी बार न लाई।

कोटिक अवगुन जन करै प्रभु मनहिं न मानै। कहत मलूका ” दास ” को अपना
करि जानै।

मानसकार बाबा ने भी यही भाव व्यक्त करते हुए कहा था-

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ ।
दीनबन्धु अति मृदुल सुभाऊ।।

साधक नाम जपहिं लव लाये।
होहिं सिद्ध अणिमादिक पाये।।

नारायण! राम कृष्ण हरि नाम कोई भी नाम हो , हमारी इस स्वाद लोलुप
जिह्वा को स्वाद आवे न आवे, जपकर
ही इसके लौकिक-अलौकिक प्रभाव को
जाना जा सकता है। और –

इसीलिये इस कलिकाल में भारत के पूर्व में अवस्थित , बंगाल की धरती के अपूर्व राधामाधव के अद्भुत अप्रतिम दिव्य
युगल अवतार श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने
अपने ” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य में
श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन को ऐसा कहा है,
वैसा कोई क्या कहेगा, यह कृष्णनाम – 1- चेतो दर्पणमार्जनम् है।

संसार के चाकचिक्य से मलिनातिमलिन
अन्तःकरण के चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ कर देने वाला है, जो मुक्ति का कारण बन जाता है- 2- भवमहादावाग्नि-निर्वापणम् है।

भवसागर रूपी दावानल की आग बुझा
कर शान्ति देने वाला है।3- श्रेयःकैरव-चन्द्रिका-वितरणम् है।

श्रेय और प्रेय दो मार्ग हैं। प्रेय, संसार की
प्राप्ति वाला और श्रेय, भगवत् प्राप्ति करा देने वाला है। इसलिये इस कृष्णनाम का जप, श्रेय रूपी चन्द्रमा की चाँदनी दे देता है। और जीवन सार्थक हो उठता है।

4- विद्यावधू- जीवनम् है ।

अनेकानेक शरीरों से हमने नाना प्रकार की विद्याओं का जो अर्जन किया है, वह
समस्त विद्याएँ वधू-स्वरूपा हैं। यह नाम
तो इन विद्याओं का जीवन अर्थात् पति है। इस श्रीकृष्ण नाम जप- कीर्तन रूपी
स्वामी(पति) के बिना विद्या-वधू तो
विधवा है।
इसके अभाव में यह उच्छृंखल हो जायेगी और सारी विद्यायें अपना स्वत्व खोकर, मानव जन्म को ही व्यर्थ कर देंगी।

5- आनन्दाम्बुधि – वर्धनम् है।

यह नाम जप, आनन्द -समुद्र में
वृद्धि करने वाला है।6- प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् है। एक- एक नाम जप/कीर्तन से हमारी मलिन जिह्वा, सम्पूर्ण अमृत का स्वाद लेने वाली बन जाती है। 7- सर्वात्मस्नपनम् परम् है।

शरीर तो गंगादि नदियों में स्नान कर
पवित्र हो जाता है, लेकिन आत्मा का स्नान, तो नारायण! इसी राम-कृष्ण नाम
से ही हो सकता है।

इसलिये गौरांग महाप्रभु, अपर नाम श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने अपने इस
” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य की पूर्णता पर कहा-
यह श्रीरामकृष्ण संकीर्तन तो नाना जीव जीवनान्तर के अभीष्ट सायुज्य,
सामीप्यादि मुक्ति रूपी परम विजय को दिलाने वाला अमोध अस्त्र है-विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्।

तदात्मानं सृजामि अहम्

जब -जब धर्म क्षीण होगा
उपजेगा अधर्म भीषण।
गो सन्त साधु संरक्षण हित,
आऊँगा तब लेता मैं प्रण।।कारागृह संसार समझ कर आया मैं कारागृह में।

सन्त भक्त आनन्दित करने,
जन्म लिया कारागृह में।।

ऋषी मुनी जन गोप गोपियाँ,
आये आत्म स्वरूप हुए।
उत्कट इच्छा जान समझ,
सह जन्मे थे सब गोप हुए।।

प्रेरित हुई “योगमाया” तब
नारी रूप धरे आई।
जसुदा-नन्द गर्भ-गत माता
माँ उसको न समझ पाई।।आधी रात भाद्र कृष्णा में देव-देवकी अष्टम सुत । गाढ़ी निद्रा निद्रित था जग, अवतरित "कृष्ण" कोई अद्भुत।।

भगवत्प्रेरित वसुदेव हुए,
तब कृष्ण -सूर्प-सज्जित करके।
ले गए यशोदा ढिंग रक्खा,
सबको निद्रा से जित करके।।

वसुदेव मस्तकारूढ चली,
कन्या कैसी युग माया हर,
आई कारागार मध्य ,
देवकी गोद बैठी चढ़कर।।

आया कंस जान अष्टम सुत,
कन्या देख हुआ सस्मित।
कन्या नहीं योगमाया थी,
छूटी हाथ हुआ विस्मित।।

आकर विन्ध्याचल पर बैठी,
कृष्ण योगमाया रानी।
सरस्वती वह अष्टभुजा माँ,
विन्ध्यवासिनी जग-दानी।।

योगमातृका विन्ध्य अधीश्वरि,
जगद् वन्दिता श्रीमाता।
चरणकमलरज मधु आकर्षित,
भगत-जगत है सुख पाता।।

लिये अजन्मा जन्म कृष्ण बन,
आत्मा रूप सन्त ज्ञानी।
उपजे उनकी कृपा प्राप्त करके,
मन प्रमुदित हुआ कृपा जानी।।

हे भारत जब हो धर्म ग्लानि,
धरती पर हो अधर्म नर्तन।
तब मानव देह धरे लीला,
करता मैं करता परिवर्तन।।

यदा यदा हि धर्मस्य,
ग्लानिः भवति भारत।
अभि उत्थानम् अधर्मस्य,
तदा आत्मानं सृजामि अहम्।।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सम्भवामि युगे युगे

साधु/सज्जनों की समग्र रक्षा
दुष्ट/दानव दैत्याचरण दमन
धर्म संस्थापन आदि के लिए
अजन्मा का भी जन्म सम्भव है।

जब जब होइ धरम कै हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी।।
तब-तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

भगवती उमा के प्रश्न पर उमापति ने उत्तर देना प्रारंभ किया था।उन्होंने कहा था कि भगवान् के धरा धाम पर आने के कारणों को इदमित्थं नहीं कहा जा सकता, फिर भी कह रहा हूँ-

हरि अवतार हेतु जेहिं होई।
इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोहीं।
समुझि परै जस कारन मोहीं।।

महादेव ने आगे कहा,जिसका अर्थ स्पष्ट है-
असुर मारि थापहिं सुरन,
राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस,
राम जनम कर हेतु।।
इसीतरह –

मार्कण्डेयपुराण में ऋषि ने भी महिषासुर मर्दिनी के भी अवतरण को ऐसा ही बताया था। यहाँ तो स्वयं भगवती ही अपने मुख से अपने अवतरण का हेतु,
असुर -वध बताती हैं-

इत्थं यदा यदा बाधा,
दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याहं,
करिष्यामि अरिसंक्षयम्।।

अब “मानस” में पुन प्रवेश करें तो –

परवश जीव स्वबस भगवन्ता, होने से
भगवान् को कोई बाध्य कैसे कर सकता है ?संकल्प मात्र से वह असुरसंहार कर सकते हैं।
किन्तु अपने स्वरूप को प्राप्त माया
मुक्त जीवों/सन्तों को अपनी विविध लीला का दर्शन करा कर आनन्द प्रदान करने के लिये,वह अवतार लेते हैं-

विप्र धेनु सुरसन्तहित,
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।।

अपने चूडान्त चरम ग्रन्थ, विनयपत्रिका में भी बाबा जी ने भगवान् केअवतरणकरण को लीलाकरण-कार्य कहा-

सच्चिद् व्यापकानन्द परब्रह्म-पद,
विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,
विमल गुण- गेह नर-देह धारी।।

मध्यदिवस तहँ सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

त्रेता में भगवान् श्रीरामावतार में दिन के मध्य काल को आनन्दित करते हैं, तो
द्वापर में रात्रि के मध्य काल को।

अब गीतागायक परमश्रीगुरु भी इसी तरह
अपने अवतरण को स्वयं कहते हैं, जैसे
कि भगवती दुर्गा ने कहा था।
अर्जुन को भगवान् बताते हैं-

परित्राणाय साधूनां ,
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय,
सम्भवामि युगे युगे।।

इसमें विमर्श का बिन्दु एक ही है, और
वह है – सम्भवामि।

सम्भवामि यह क्रिया पद है।
इसका कर्ता आत्मानम् है।
मतलब कि मैं (परब्रम्ह परमात्मा)
आत्मा को उत्पन्न करता हूँ।
यह आत्मा कौन है?

देखिये, सातवें अध्याय मेंभगवान् ने चार प्रकार के भक्त -आर्त,जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी के रूप में बताये हैं।
अब उनमें एकीभाव(अनन्यभाव) से रहने वाला ज्ञानी-भक्त भगवान् का प्रिय है।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः,
एकभक्तिः विशिष्यते।
प्रियः हि ज्ञानिनः अति अर्थम्,
अहं स च मम प्रियः

ज्ञानी भक्त मेरा और मैं उसका आत्मा हूँ।
और अगले श्लोक में अधिक स्पष्ट कर
देते हैं-
उदराः सर्व एवैते,
ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।।
(07/18)
तो इस विमर्श में स्पष्ट होता है कि भगवान् स्वयं अपने(आत्मा) को अर्थात्
ज्ञानी भक्तजनों को भी जन्माते/जन्मते
हैं।
भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव -सम्भव खेदा।
अब इस तरह भगवान् और उनके सन्त
भक्त दोनों उतरते हैं, इस धरा धाम पर-

इसीलिये गीतोक्त वाणी विमर्श करती है-

सम्भवामि युगे युगे

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

सम्मानं कलयातिघोरगरलम्

सम्मान को अत्यंत घोर विषवत् मान कर त्यागना चाहिए। नारायण!

अपने वन गमन के अवसर पर,भगवान्
श्रीसीताराचन्द्र शबरी के निकट पहुँचते हैं। शबरी,वह शबरी है, जो भगवान् की
हजारों वर्ष से प्रतीक्षा में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी है।
भगवान् चित्रकूट पधारते हैं, और
शबरी की मनःकामना मूर्तिमती होती है।
भगवान् ,एकमात्र भक्ति का ही सम्बन्ध
स्वीकारते हैं –

कह रघुपति सुनु भामिनि! बाता।
मानहुँ एक भगति कर नाता।।

भगवान् तो भक्ति का ही नाता मानते हैं।

भक्ति पाने के लिए प्रभु ने एक से एक साधन बताए हैं।
कुल नौ साधनों में सन्तसंग,भगवत् कथारति के बाद तीसरी भक्ति के रूप में
अमानिता और गुरुसेवा का उपदेश करते हैं।

गुरुपद पंकज सेवा,
तीसरि भगति अमानि।

मतलब कि गुरुचरणाश्रय मिलने के बाद,
किसी भी तरह के मान की इच्छा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि मान सम्मान में चित्त चले जाने से, मनुष्यता ही आहत हो
जाती है।
और महाभारत के अनुशासन पर्व में तो स्वयं नारायण को ही सबसे बड़ा ” अमानी ” बताया गया। भगवान् अमानी होकर ,
” मानद” हैं। मान देने वाले हैं।
अमानी मानदो मान्यः,
लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।
सुमेधा मेधजो धन्यः,
सत्यमेधा धराधरः।।

              पन्द्रहवीं शताब्दी में जन्म लेकर बंगाल की धरती को पवित्र करनेवाले, युगल श्यामाश्याम के अवतार 

श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने,अपनी लीला से
भक्तिरसार्णव में डुबाकर नाना जीवों का उद्धार किया।
आपने अपने लीलाकाल में,किसी भी
ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया। तथापि केवल आठ पद्य संस्कृत भाषा में लिखे ।
इन आठ पद्यों को भक्तिजगत् में बड़ा आदर प्राप्त है।इन्हें ” शिक्षाष्टक ” के
नाम से जाना जाता है।बाद में इनके जीवन और इन पद्यों पर भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये, जिनमें झूँसी(प्रयागराज) के
भगवत् प्राप्त महात्मा सन्त प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का संस्कृत पद्यात्मक ग्रन्थ
” श्रीचैतन्यचरितावली ” प्रमुख है।

अब देखिये, ऊपर उक्त महाभारत के श्लोक की छाया” महाप्रभु ” के तृतीय पद्य में अनुभूत होती है-

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।

विचारने पर एक बड़ा विमर्श उपस्थित होता कि, मनुष्य अमानी क्यों बने?
  इसलिये कि भगवान् अंशी हैं और जीव उनका अंश।
    जब भगवान् में अमानिता है तब जीव में भी अंशत्वेन होना चाहिये। 

देखिये-

योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने ईश्वर को
पंचक्लेश से विहीन कहा है।
ये हैं, अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष
और अभिनिवेश।
अब जब ये सभी ईश्वर में नहीं हैं, तब माना जाय कि, ये सभी जीव में नानात्मक, त्रिगुणात्मक जगत् से ही
” अन्तरित ” हुए हैं।
यह सभी वस्तुतः जीव के हैं नहीं।
बल्कि माने हुए हैं।
इनको त्यागे बिना ईश्वर का साक्षात् नहीं होगा, नहीं होगा, नहीं होगा।

मानव जन्म की सार्थकता ईश्वर दर्शन ही है। पचक्लेश को त्यागे बिना दर्शन नहीं
सम्भव है।
और यह “अस्मिता ” आदि का त्याग तब तक सम्भव नहीं होगा,जब तक कि , तुलसी,सूर,कबीर,मीरा,नानक,दादू,मलूक,रैदास को गुरुवत् मान इनके सन्देशों पर
चला नहीं जायेगा।
अथवा इनको आचरण में ढालने वाले
विरल- विरले सन्तसद्गुरु का पादाश्रय
लेकर आगे उन्मेष के मार्ग पर नहीं चला जायेगा।
नहीं तो पतन होगा, और मानव जीवन का उद्देश्य विखंडित हो जायेगा।

और इसीलिये प्रभु के नौ साधन भक्ति के आदेश,महाभारत के वाक्य और
चैतन्य महाप्रभु के लीलावचनों में सारग्राही वाणी प्रवाहित हो उठी है।

इन सभी वाणियों की छाया लेकर एक तात्विक-सात्विक वाणी भी विलसी है।
यह वाणी उन्ही अमानिता आदि को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करने वाली व्रज के महान् सन्त प्रबोधानन्द सरस्वती की वाणी है।
वे कहते हैं कि किसी,वृक्ष के नीचे बैठकर शान्त एकान्त में भजन करना श्रेष्ठ है।पवित्र यमुनादि नदियों का जल और साधारण वस्त्र भी धारण करना ठीक है।
राधामाधव का निरंतर स्मरण करते हुए
धाम तो त्यागना कथमपि उचित नहीं।
और सबसे बड़ी बात तो ये है कि,
सम्मान का विषवत् त्याग तथा किसी नीच से नीच व्यक्ति द्वारा अपमान को अमृतवत् ग्रहण करना होगा।
तभी हम वस्तुतः मनुष्य बन पायेंगे। नहीं तो पद प्रतिष्ठा और सम्मान तो
माया के चट्टे-बट्टे हैं। ये सब काग भुशुण्डिजी के शब्दों में –
सकल माया कर परिवारा।
कौन हैं माया के दुर्दान्त सगे सम्बन्धी?
सुत ,वित्त और लोक की प्रतिष्ठा पाने की लालसा।

सुत बित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।

हमें आत्म स्वरूप पाने नहीं देंगे। मनुष्य
बनने नहीं देंगे।
अपने को और जगत् को जाने बिना करुणानिधान की कृपाकरुणा
से मिला मानवजन्म निरर्थक होगा।
इसीलिये व्रज के रसिक की रसमयी वाणी का आश्रय लें-

भ्रातः तिष्ठ तले तले विटपिनां,
ग्रामेषु भिक्षामट।
स्वच्छन्दं पिब यामुनं जलमलं,
चीराणि कन्थां कुरु।

सम्मानं कलय अतिघोरगरलं,
नीचापमानं सुधा।
श्रीराधामुरलीधरं भज सखे,
वृन्दावनं मा त्यज ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

साधो निन्दक मित्र हमारा

व्रज के किसी सिद्ध सन्त ने कहा था,कि जो,सह लेते हैं अपमान को,पा लेते हैं,
भगवान् को।
किसी का भी सम्मान हो, तो वह सब झूठा ही है।
पहला तो यह कि, सम्मान पद के कारण है, तो वह “पद” का है, न कि व्यक्ति विशेष का।
क्षमा,दया, करुणा, सत्य, प्रेम, धैर्य,
पराक्रम, वात्सल्य, औदार्यआदि गुणों के
कारण है, तो भी वह, व्यक्ति विशेष में
तो घटित होगा नहीं। क्योंकि उक्त गुणगण
भगवान् के हैं, भगवदीय हैं-
गुण तुम्हार समुझै निज दोसा।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं।
तेहिं उर बसहु सहित बैदेही।।

इसलिये प्रशंसा होने पर साधु/सज्जन सजग होकर, सिर झुका कर,भगवान् का ध्यान करने लग जाते हैं।
लेकिन कोई दुष्ट जन निन्दा करें, तो उन्हें हमें अपना मित्र बना कर अपने पास रखना चाहिए।वे हमें दुर्गुणों से सचेत करते हैं। यदि दुर्गुण हममें है तो उसे हटाने का यत्न करना होगा और नहीं हैं तो वह मुझमें प्रवेश न करे,सजग रहना होगा-

सन्त कबीर ने कहा-

निन्दक निअरे राखिये,
आँगन कुटी छवाय।
साबुन औ पानी बिना,
निर्मल करे सुभाय।।

देखिये –
शूकरः निन्दकश्चैव विशिष्टौ जगति ध्रुवौ।

सूअर और निन्दक लोग इस जगत् के अत्यंत विशेष प्राणी हैं।
एक हमारे वाह्य मल को जिह्वा से साफ करता है, तो एक हमारे अवगुणों का बखान कर अन्तर के मल को पचा कर अन्त में तो उपकार ही करता है और
अवगुण रूप मल को साफ कर डालता है।
इसीलिये-
तुलसी बाबा ने भी ऐसे निन्दकों की प्रशंसा कर डाली है।सन्त वन्दना के बाद, उन्होंने खलों की वन्दना अनेक दोहे चौपाइयों में की-
बहुरि बन्दि खलगन सतिभाएँ।
जे बिनु काज दाहिने बाएँ।।
सद्भाव पूर्वक, दुष्ट भी बारम्बार प्रमम्य हैं।
जो अकारण अगल-बगल दुष्टता के आचरण में लगे रहते हैं।
परहित हानि लाभ जिन केरे।
उजरें हरष विषाद बसेरे।।
दूसरों की हानि जिन्हें लाभ लगता है।
किसी के उजड़ने पर,हर्ष और बसने पर, जिन्हें विषाद होता है।

बन्दौ खल जस सेष सरोषा।
सहस बदन बरनै पर दोषा।।
दूसरों की निन्दा, रोष पूर्वक करते हुए जिन्हें सुखानुभूति होती है।
शेषनागजी जैसे हजार मुखों से नाम
जप करते हैं वैसे हजार मुखों वाले दुर्जन
दूसरों की निन्दा हजारों मुखों से करते हैं।
अतः वे दुर्जन अभिनन्दनीय हैं।
भैया! प्रशंसा करने वालों से दूर रहना।

एक कथा प्रसिद्ध है-
प्रायः सभी जानते हैं। उल्लेखनीय है कि
वर्तमान मीरजापुर मेंं चुनार तहसील है।
प्राचीन भारत के काशी राज्य के अन्तर्गत आता था।

 प्राचीन काल में यहाँ का राजा मूर्ख "पौन्ड्रक" था। इसके अगल -बगल इसे  प्रशंसक( चापलूस) घेरे रहते थे। इसके पिता का नाम वसुदेव था।

प्रशंसकों ने इसकी प्रशंसा करनी शुरू की और इसे वसुदेव पुत्र वासुदेव कृष्ण कहने लगे। चिकित्सकों को बुला कर इसे शल्य क्रिया से और अधिक दो हाँथ लगवा दिये।वह द्विभुज से चतुर्भुज भी हो गया ।
विमानशास्त्र प्रवीणों को बुलाकर, एक गरुड पक्षी के आकार का विमान बनवाया।और शंख चक्र गदा आदि उसके चारों हाथों में थमा दिया गया।
वह चक्रधारी वासुदेव कृष्ण की तरह नकली गरुड़ पर सवार होकर आकाश में विचरने लगा। अपने को भगवान् कहने लगा।
इसे प्रशंसकों ने असली कृष्ण ही घोषित कर दिया।
द्वारिकाधीश भगवान् को चिट्ठी भेजी गई। कहा गया कि आप नकली कृष्ण हैं।
असली कृष्ण तो महाराज पौण्ड्रक हैं।
और फिर द्वारिकाधीश को आकर इस पौण्ड्रक का वध करना पड़ा।
अब सोचिये प्रशंसकों ने क्या दुर्गति करा दी,उस बेचारे पौण्ड्रक की।

इसीलिये शुक सम्प्रदाय के आचार्य और सिद्ध सन्त बाबा “श्यामचरण दास” ने निन्दकों को बाबा तुलसी और कबीर की ही तरह ही मित्र कह डाला।
भैया! ये बेचारे निन्दक हमें दुर्गुणों और उससे होने वाले पतन से बचा लेते हैं।

प्रशंसकों को अपने पास फटकने मत दीजिये। निन्दकों को सादर रखिये।
इसीलिये कि वे प्रशस्य और
प्रणम्य हैं, सन्मार्ग पर ले जाते हैं।

बाबा श्यामचरण दास को लोग चरणदास भी कहते थे। इन्होंने कबीर तुलसी का अनुवर्तन करते हुए निन्दक को मित्र कहा-
साधो निन्दक मित्र हमारा।
पाछे निन्दा करि अघ धोवै,
सुनि मन मिटै बिकारा।
जैसे सोना तापि अगिनि में,
निर्मल करै सोनारा।
बिन करनी मम करम कठिन सब,
मेटै निन्दक प्यारा।
सुखी रहो निन्दक जग माहीं,
रोग न हो तन सारा।
हमरी निन्दा करनेवाला,
उतरै भवनिधि पारा ।
निन्दक के चरणों की अस्तुति,
बरनौं बारम्बारा।

चरनदास कह सुनिये साधो,
निन्दक मित्र हमारा।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

मानस पुन्य होहिं नहिं पापा

वाह रे प्रभु! आपने ऐसी कृपा क्या कर दी है, कलह युग कलि युग पर।
पतन से बचाने वाले हे पतितपावन!
हे जगदम्बा जानकी! हे राधे!
हे विन्ध्याचलाधीश्वरी!
हे शक्तिमति! मातः! हे भवानि!
हे मृडानि! हे शिवानि! हे रुद्राणि!

गुरु पितु मातु महेश भवानी

सबके माता पिता तो, कलियुग के भी।

हे बाबा कलियुग!

भगवत्कृपा हुईआप पर।
बन बैठे राजा सब जुग कर।

प्रेमियों! जब जिसकी बारी आती है, उसे राजगद्दी तो मिलती है।

शपथ ग्रहण समारोह कलियुग का है।
ऊपर से पूर्व के राजागण सतयुग
त्रेता और द्वापर विस्मय से देख रहे हैं।

भगवत्कृपा से समारोह प्रारंभ हुआ।
न्यौता नहीं था , भूतपूर्व तीनों राजाओं को। सककुचाते ,लजाते, बलखाते,और
ईर्ष्याते भी तीन पूर्व के राजाओं ने अपने
सेवकों से सन्देश भेजा कलियुग के पास।
कहवाया कि आपके तीन मित्र समारोह में शामिल हो कर,निकट से आपको बधाई देना चाहते हैं।
कलियुग ने हामी भरी।
तीनों ने साथ-साथ आकर कलियुग का
शपथग्रहण समारोह देखा।
बधाई दी और गमगीन चले गये।

आखिर इन तीन भूतपूर्व शासकों की समस्या क्या थी? गमगीन क्यों?
कोई जाना नहीं। देखिये-

सतयुग में तप करते-करते थकते जाते हैं।
बड़ी सात्विकता भी थी।बड़े प्रयास से कोई मोक्ष पाता था। क्या कहें माया तो प्रचण्ड है।
त्रेता में ज्ञान -प्राधान्य था। ज्ञान प्राप्ति के लिये कठिन साधना से सिद्धि और मुक्ति मिलती थी।
द्वापर में यज्ञ की श्रेष्ठता रही। विधि पूर्वक
यज्ञादि क्रिया से मानवजीवन का लक्ष्य पूर्ण हो पाता था। लेकिन-

 कलि केवल मल मूल मलीना।
 पापपयोनिधि जल मन मीना।।

लोगों के चित्त को मलिन दूषित किये रहनेवाला कलह( झगड़े)का युग, दान और भगवन् नाम के स्मरण-जप से जीवों को स्पर्श नहीं कर पाता। सद्यः
मुक्ति भी होती ही है।

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुः दानमेकं कलौ युगे।।

बाबा ने कहा-

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव -थाहा।।

कलिजुग सम नहिं आन जुग,
जौ नर करबिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल,
भव तर बिनहिं प्रयास।।

ऐसा यह कलियुग है प्रेमियों!
बड़े -बड़े ऋषि-महर्षि महात्मा गण
तरसते हैं इस युग में जन्मने के लिए।
बड़ी सरलता से भवसागर पार।
क्यों न हो यह सब युगों का सम्राट।

नारायण! सभी युगों में तो ,

कायिक,वाचिक, मानसिक पाप और
पुण्य दोनों होते हैं।
मनवचनकर्म, तीनों से पाप -पुण्य, ये
दोनों बनते हैं, लेकिन यह कलियुग एक बात में सतयुगत्रेताद्वापर से श्रेष्ठ है।
वह श्रेष्ठता इस कलियुग पर भगवत्कृपा बन बरसती है,और इसे सभी युगों का राजा बना देती है।

वह विशेषता है कि, इस युग में मन में हरिस्मरण आदि से पुण्य तो बनेंगे।

लेकिन कि मन से किसी का अहित सोचने पर भी पाप नहीं होगा।

इसीलिये कागभुशुण्डि महाराज ने कहा-

कलि काल का एक पवित्र- प्रताप है,कि इसमें मानस -पुण्य तो होगा,लेकिन पाप नहीं । यही इसके युगराजा होने का कारण है-

कलि कर एक पुनीत प्रतापा।
होहिं पुन्य मानस, नहिं पापा।।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

जग बूझत बूझत बूझै

संसार माया तुम हरो,
करो माँ तुम कुछ करो।
अब मनुशरीर सफल बने,
ममता अहन्ता हैं तने।

जाये न अब तेरे बिना,
यह मोह छाये है घना।
तव चरणपंकजप्रीति हो,
सोऊँ तुम्हारी स्मृति सना।

मोह का है तम घना
दीखे न पथ जाऊँ कहाँ।
विवश बरबस स्थिर खड़ा,
तेरे चरण अब गिर पड़ा।।

यह जगत बहुत विचित्र है,
सपनों सरीखा चित्र है।।
मधु-मधुरता आभासती,
है भ्रान्त माँ मेरी मती।।

मन है विकल चंचल सदा,
क्या यही है मुझको बदा।।
अपने चरण में रती दो,
हे सती! सुन्दरि! गती दो।।

मन का विकार न रह सके,
तव मधुर-गुण-गण कह सके।
भागे अविद्या-जनित भ्रम,
हो प्रीति का ही सतत क्रम।।

जब कृपा माता आपकी,
करुणा मिले शिव-बाप की।
हे भक्ति-मूर्ति-मयी शुभा,
छाँटो तमस दे दो प्रभा।।

तूँ राम हो तूँ कृष्ण हो,
राधे तुहीं तूँ वितृष्ण हो।
तूँ सती सीता राम की,
आधार हो सुख-धाम की।।

तब इसलिये भक्ती-निरत,
कवी अग्रणी तुलसी फिरत
तव भगति-वारि पवित्र चित,
परमात्म जाने जगत-हित।।

रघुपति-भगति-बारि छालित चित,
बिनु प्रयास ही सूझै।
तुलसिदास यह चिद-बिलास ,
जग बूझत बूझत बूझै।।

हरिः शरणम्। गुरः शरणम्।