अनन्त बलवन्त विद्यावन्त गुणवन्त भक्तिमन्त हनुमन्त कृपा करें, इस जीव की श्रीराम चरणारविन्दों में प्रीति हो। संसार के नामरूपलीला की विस्मृति और भगवान् के नामरूपलीला की स्मृति बने।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन विगत अभिमाना।।
गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति,अमान।
बार-बार प्रभु चहहिं उठावा।
प्रेम मगन तेहिं उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा।सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
निरभिमानी ही निरभिमानिता को दे सके। निष्कामी ही निष्काम कर सके।
मैं खुदी हम हम निकालो।
थक गया हूँ हे!कृपालो।
आरत के चित रहै न चेतू।
फिर फिर कहै आपने हेतू।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
सादरं वन्दे भूषणपन्नगम् इन्दुभूषणम्। श्रीराम जय राम जय जय जय राम।
राम काज लगि तव अवतारा।सुनतहिं भयउ पर्वताकारा। काम लगा दो राम से।रहूँ सदा आराम से।बार बार है वान्त जगत।कृपा करो हे अविगत गत। छूटे माया का बन्धन।विनसे विषयवास इन्धन।अहमाकार वृत्ति विनसे।रामाकार चित्त विहसे।लक्ष्य पूर्ण हो इस शरीर का।
अतिरस्कृत हो कृपावीर का।
बदलो दृष्टि विचार आचरण।
जीत सकूँ जीवन का रण।।
गुरुहरी शरणम्।
Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay
गई माया
जो शक्ति के अनन्त स्रोत मेरे मन आदि अन्तःकरण में प्रवेश करके, मेरे पिण्ड शरीर को अपना निवास(धाम)बनाकर मेरी प्रसुप्त वाणी को जीवन देते हैं।और अन्य,हाथ पैर कान त्वचा आदि इन्द्रियों में भी प्राण के रूप में रहते हुए, क्रियाशील रखते हैं, ऐसे समस्त जड-चेतन के आधार परमपुरुष परात्पर परमात्मा को ,प्रणाम करता हूँ।
योन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयति अखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यान् च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् , प्राणान् नमः भगवते पुरुषाय तुभ्यम्।।
(भगवद् दर्शनकाले भक्तध्रुवः)
सब कुछ जो दीख निरन्तर,
बाहर भीतर सर्वाभ्यन्तर।
क्या है वह कौतूहल आया,
पहले मातृ अंक हरषाया।
भूख तृषा निद्रातुर रहकर,
उसे मिटाते माँ को पाया।
हुई प्रथम पहचान जननि से,
पिता यही पहचान कराया।
पुनः हुआ साक्षर गुरु माँ से,
तब,भाषाज्ञान सरस्वतिमन्दिर।
पूर्वशिष्ट अनुशासन पाया,
गुरु शिक् षक आचरण सिखाया।
मातृपितृ गुरुभक्ति बढ़ी तब,
कारणकार्य जगत दीखा।
जो अनुकूल मिला सुख पाया,
जो प्रतिकूल न दुख भाया।
हुई कृपा परमेश परम जब,
सद्गुरु करुणामूर्ति मिले।
जगी मनुजता उनकी दाया,
हुई सफल मानव काया।
वाह्य दृष्टि अन्तर में फेरी,
वही गुरू परमेश दिखे।
वही बोलता प्रेरक पाया,
सुनता “वही” गई माया।
श्रीगुरुहरी शरणम्।
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होगा महाबीर का
गो गोचर मन जहँ लगि जाई।
सो सब जानहुँ माया भाई।
अभिमान ही अज्ञान है।
वाणी और वर्ण साधन भर हैं।
लेकिन निरभिमान तुलसी जैसों की। परं प्राप्त की परा वाणी,आश्रय लेने पर अपरा अविद्या को तिरोहित करेगी।
इस भयंकर कलिकाल में मायातीत जगत् के सन्तजनों की तदर्थानुभूतिमय वाणी
वाणवत् क्षणमात्र में कर देती है,अनुग्रह। और मिट जाता है,सभी असद् विग्रह। मिटता क्षण भर में ही जगत् का समस्त
अन्तर्द्वन्द्व।ध्वस्त नष्ट होते ही माया के, हो जाता निर्द्वन्द्व। संसार की मायिक सत्ता, काल कर्म नानाजन्म गुण स्वभावविवशीकृत मनुष्य को भी बना देती दास है।अच्छा लगता है जो विषयविष आसपास है। और फिरत दास सदा माया कर फेरा। छोड़ नहीं पाता बना माया का चेरा।एक और पतन की पुष्टि। कहीं जाओ होगी ही नहीं सन्तुष्टि।
इसलिये कि यह शरीर संसार चिरसखा हैं।करते रहते हैं परस्पर की ही पुष्टि।
मैं संसार में सर्वत्र रहता हूँ।
लेकिन दीखता नहीं।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
इसलिये कि यह चर्मचक्षुग्राम शब्द स्पर्शादि तक ही गति करते हैं।ऐन्द्रिक अनुभूतियोजक आत्मा की आत्म दुर्गति करते हैं। दीखता उसे ही जिसका अन्तःकरण हो शुद्ध।
तुलसी सरीखों जैसी बुद्ध या प्रबुद्ध। और यों कहें कि जैसे केवल उसी के लिये उसी
की चाहत करे माया को आहत। सारी कर्मज्ञान इन्द्रियाँ बस बन जायँ प्रेम की। प्रेम भी प्रेम के लिये ही मात्रचित्र। लेकिन ज्ञानियों का चित्त भी हर लेती वही कैसी है विचित्र।
बरबस डालती व्यामोह में।
अजब गजब क्षणिक ऊहापोह में।
मन भी प्रेम तन भी प्रेम।चित्त भी प्रेम बुद्धि भी प्रेम अभिमान भी प्रेम।
जब सब हो जायं विशुद्ध प्रेम। तब मिटती माया क्षण क्षण रूपान्तरिता। क्योंकि शब्द, रामकृष्णहरि हरे माया।
नहीं तो नारायण, बारम्बार पड़े चक्कर में सब को काल खाया। सब कुछ खोया ही खोया कुछ भी न पाया। अतः करना पड़ेगा अनुग्रह अपने पर स्वतः। यह प्रामाण्य उपनिषद्दर्शन नहीं है परतः।
नव नव कर्म की मिली हमें स्वतन्त्रता।दिव्य मनुजन्म नहीं प्रारब्धतन्त्रता। अतः
त्यागो तुच्छ देहाभिमान अभी। व्यापेगी नाविद्या माया बनोगे धन्यातिधन्य तभी।
वाणी का प्रसाद तुलसी या कबीर का।
करेगा लक्ष्य पूर्ण और होगा महाबीर का।
गुरुहरी शरणम्।
जो है जानता न कहता
खटकने का कोई आनन्द नहीं
अटकने का कोई आनन्द नहीं
भटकने का कोई आनन्द नहीं
भोगार्थ भ्रमण आनन्द नहीं
द्वन्द्वातीतानन्द, आनन्द जाने
जो सब हृदयन में बसा सभी में
बस, बास बसाये वही सही
पुनरावृत्ति, भोग ढिंग मत हो
करे कराये ना कराये भी वही।
हुआ है जो हो रहा है होगा भी
तभी जब सद्गुरू चरणन
की ज्योति, शुद्ध नेत्र होंगें।
कृपापारपारावारपूरपरिपूर्णदिव्य कर्म
जन्म उनकी कृपाकरुणाचितक्षेत्र होंगे।
और ना तरीका है सलीका
एकमेव मात्र रामकृष्ण हरि नारायण
कहता ही रहता। नरता तब पाता नाम राम राम कहै फिरे।राम राम कहे गहे दिव्य काय, बनता। वैकुण्ठ विगत कुण्ठ फल फूल फूला रहै, डूबा आकण्ठ और करता भी न करता।
दिव्यता दिव दिव्य दिव्य
सभी शिव होत भव्य भूमि
परम जब मातृभाव जानि कर्म करता।
रहता ना रहा है ना रहेगा कभी अभाव,
गुरुचरन परता बस एक ही है परता।
होती है अविस्मृत स्मृति गुरू की कृपा करूणा।पाई है शरणागति सदैव भाग्यमन्तों ने। रहता अनन्दभाव,कहते क्या कहते हम, जो भी,मिला मिल रहा है, मिलेगा आगे भी,चाहत देख चाही अनचाही दिया सन्तों ने।
ऐसे ही भावपूर्ण बनना है तो बनिये।
समुझि समुझि बूझि कृपाकातर रहिये।
पाकर कृपा की एक बूँद, बन जाता कुछ और ही,न कहते भी बनता जब आनँद ही
गहता। आनँद मध्य रहता तब कहता
क्या न कहता। हरिगुरुकृपा का लेशमात्र अवलम्ब गहि गहन गँभीर गर्व उसी पर करता।
एकमेव गुरुद्वितीय यही आधार है, उस आनँद को जानि,जो है जानता न कहता।
गुरुहरी शरणम्।
हरे राम कृष्ण
यद्यनित्यं जगज्जातं
मलमूत्रकलेवरम्।
तदा रुचिः कथं देव
विनश्यद्भाण्डमध्यगे।
नूनं वयं विभक्तैवं त्वत्तः कर्मविपाकतः। अतः भक्तं मन्यमानं माम् अविभक्तं क्रियात् प्रभो।
मनसस् त्यागः भवेत् कस्य भाग्यवन्तस्य देहिनः। आपातरमणीयस्य संसारानित्यवस्तुनः।
यदि भवति वमनवन् निर्गतष्तृष्णभूत्वा जगति विषयजालं त्याग एवाभिरम्यम्।
कुरु गुरुगुरुता मर्षणीयः जनोयम्। यच्छतु नवनितरां रागरागं पदाब्जे।
मनोबन्धबन्धाय चरणारविन्दे।
हरे राम कृष्ण हरे राम कृष्ण।
कुरु त्वं प्रभो पाहि मां दीनबन्धो। असह्यं विषं वैषयं जातमानम्।
सदानन्दसन्दोहपूर्णं क्रियान् माम्। हरे राम कृष्ण हरे राम कृष्ण।
गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्
अब हो न पतन
होगा कोई मुनि ज्ञान प्रबल। जो तपःपूत निर्मल अविकल। जिसका अन्तस गंगाजल बन।धो देता मायिक सब अनबन।
जब जलती अग्निशिखा भाषी। जब जलकण बनें अगम राशी।।तब छः मन्वन्तर मार्कण्डे देखते न समझे हरिमाया।यह कैसी अद्भुत है माया। श्रीव्यासपुत्र शुकदेव प्रभू।सब जान योगमाया प्रमान। रह छिपे मातृगर्भान्तर में।बारह बा रह वर्षान्तर में।
अब रही कामना शेष नहीं।
हम शुक मार्कण्डे नहीं सही।
पर उनकी ही सन्तानें हैं।
हम सब हरिमाया जानें हैं।
अब शीघ्र हटा सब तमस दूर।
दो शीतल चरणाश्रय अक्रूर।
अब हो न पतन।
अब हो न पतन।
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
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उतरो और तरो
बुद्ध श्रीरामकृष्ण की बातें करने वाले,बुद्ध और राम कृष्ण न हो जायें, यह उनका दुर्भाग्य है।
” मैं अपनी योगमाया से आच्छन्न होने के कारण सबके लिए प्रकाशित नहीं होता।”
नाहं प्रकाशः सर्वस्य,
योगमायासमावृतः।
डूब मरो बार बार नाचो नाना शरीरों और योनियों में,देहवादियों।
यह दुर्लभ मानव देह,उन्ही का सार्थक है,जिन्हे बुद्ध ईशा और राम कृष्ण चिन्मय और अमायिक दिखाई दिये।
शरीर एक ही है।उसी में मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय,उदर वैश्य और चरण शूद्र हैं।
शरीर मानव शरीर, किसी जाति कुल वर्ण में जन्मे,जबतक तुलसी रैदास कबीर जैसे तदाकाराकारित चित्तवृत्तिमहात्माओं में उसका मन नहीं जायेगा,ऐसे ही “माया”
की फाँस में फँसे रहना पड़ेगा।
वर्णाश्रमव्यवस्था पूर्ण विज्ञान सम्मत है। ऋषियों और उनकी इन्द्रियों के पार दर्शनक्षमत्व का परिणाम है।पागलों!
पल-पल दैहिक/ऐन्द्रिक सुख के लिए बेचैन मानवतन धारियों।पागल हो जाओ और पागलपन की पराकाष्ठा पार कर जाओ,उस “आत्मिक”आनन्द के लिए।
करो करो जल्दी करो,कूपहिं में यहाँ भाँग परी है, एक ही मानव शरीर में चारों वर्णों की अनुभूति करो।
आदर करो “सनातन”का जिसने वेदादिशास्त्र दिये,जिन्होंने,एक विशुद्ध
पूर्ण वैज्ञानिक वर्णाश्रमव्यवस्था निर्दिष्ट की। यही एकमात्र वह सर्वकारणकारण
आत्मा ही आत्मा की अनुभूति कर सकती है। “आत्मनि एवात्मना तुष्टः” हो जाओ।
अन्तः में विराजित उस निराकार निर्गुण को जान लो,जो ब्राह्मण क्षत्रियादि नहीं।
किसी का भी मानव देह इस ईश्वर का साक्षात् कर सकता है।लेकिन मैं देह नहीं, मैं इन्द्रिय नहीं।ऐसे परानुभूत रैदासजी तुलसीदास जी कबीर दास जी की परावाणी का आश्रय लो।
धन्य धन्य कर लो, देख लो इन्हीं आँखों से,जिस नित्य लीलाललाम राम को सन्तों ने देखा था।
यह परमहंस रामकृष्णदेव की वह धरती है, जिसे ऋषियों ने “माता” कहा था।
सभी जड़ चेतन मात्र इसी धरती माँ से जन्मे और इसी में मिल जाने वाले हैं।
बुद्ध ईशा वही।रामकृष्ण वही। तुलसीसूरकबीररैदास और मीरा भी वही।
जाओ इनके आत्म अनुभूत अक्षरों में खो जाओ अपना मायिक स्वरूप नष्ट कर दो।
वर्ना चक्कर में पड़े रहो “जातियों”के चक्कर में।गँवाते रहो अमूल्य मानव-जीवन।
राम ते अधिक राम कर दासा।
मोरे मन प्रभु अस विश्वासा।।
इसलिये राम और उनके दासों की भक्ति करो,तर जाओ।उतर जाओ, जहाँ तक वे उतरे थे। उतरो और तरो।
गुरुहरी शरणम्।
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त्रिकालस्मरणकारक
अकलकरुणाकलाकलित कालकृपाकार
कारकपल-पल-पालक सर्वकारणकारण
हारकहरहरक्षणकणकणरणितायमान
सर्वप्रिय प्रेरकसमस्तकरण-कारण
सर्वजिद्रण चिदानन्दसन्दोह
अपाकृतमहामोह चित्तहारक हरहर मनोहरहरि दृष्टदर्शनभक्तजन
-हेतुग्रहणमायातीतगुणाकार
चिन्मयामायामायातीतदेहाकार
दिव्यजन्मकर्म धारितजगजीवमर्म
अनघ अघओघसमुत्सारित
कृपापारावारवारितभव भवानीश
अजोपियोगमायाकर्षितप्रकाशित
अधर्मधारणधुरीणधराशायीकृत
परित्राणसाधुसन्तसज्जनजीवन
धर्मधौरेयाधारधाराधारिततनु
भक्तजनपार-पारावार-वश्यपराकृष्ट
अक्लिष्टसाधननाम-नमनीय
कलिकालक्लान्तजन-नामरूपाकार
ध्यानरूपनाम-मनन-मथित-मानस-मन
सर्वसेवकध्यानसातत्याचिरचरचरण
नष्टभ्रष्टागणितजन्मकर्मजालज्वालक
पालकशरणागतसततदीनबन्धु
दयासिन्धुमहामहनीय सन्तहृन्निवास
पूज्यमानभक्तसन्तसन्तानतानित
स्वतःपूजायमानतद्हृदयवर्तमान
अमानमानद सर्वार्तिसमुत्सारित
सर्वानुग्रहकारक नवग्रहविपरीतफलहारक
मारकविदारक-कामादिषड्रिपु
स्वयमेवासनधर्ताभक्तभावभावनासीन
गुणगण प्रभु! त्रिकालस्मरणकारको भव।
गुरुहरी शरणम्
धर्मसारत्व
धर्म से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर में “एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतं” के अनन्य “गीतकार” महाभारतोक्त श्रीमद्भगवद्गीता की अत्यन्त प्रसिद्ध पंक्तियों का आश्रय लेकर चलना होगा।
ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
धर्म नहीं धर्म का निचोड़
“सारतत्व” क्या है, सुनो।
सुनकर धारण करो क्योंकि
” धारणात् धर्मः”जो धारण करके विवेक पूर्वक आचरण किया जाय,वही धर्म है।
“आचारः परमो धर्मः श्रुति उक्तः स्मार्त एव च” भगवद्वाणी भी इसी आचरण मूलक धर्म का प्रकाश करती है।
” आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
यही धर्म का तत्व है।
हम मनुष्य का कर्तव्य कर्म
(धर्म)पालन करें यही धर्म है।
जो हमारे(मनुष्य) लिये आचरण योग्य (रागद्वेष,हिंसा क्रूरता) नहीं है, उसे हम कदापि धारण न करे।
” हमारे वास्तविक मनुष्य स्वरूप के लिए उदारता करुणा दया क्षमा त्याग धैर्य आदि गुण आवश्यक हैं, इन्हें हम अवश्य धारण करें।”
यही ईश्वरीय गुण चेतना है।
हम निश्चित रूप से अविनाशी ईश्वर के अंश हैं।तो हम अपने विस्मृत ईशस्वरुप को स्मृत करके,अपनी स्मृति को जागृत रखने के लिए, समस्त जड़ चेतन जीव जगत्,यानी कि पशुपक्षीकीटपतंग और नदीपर्वतवृक्षादि सभी के प्रति भगवद् भाव से कर्तव्यकर्म करते हैं, तभी धर्म है, अन्यथा,अधर्म।
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” की अतुलसी तुलसी सरस्वती इसी भाव का विस्तार और प्रकाश करती है।
इसलिये हम सभी ईश्वर की सन्तान, ईश्वरीय और दैवी गुणों के अनुकूल ही व्यवहार करें,यही धर्म है।
” हम अन्यों के साथ इन्ही मानवीय अनुकूल व्यवहार करने के कारण मनुष्य कहलाने के पात्र हैं”
“यदि कोई इन मानवधारणीय पालनीय कर्मो का आचरण नहीं करे,तो वह मनुष्य नहीं।”
“यदि कोई मेरे साथ उक्त मानवधारणीय करणीय कर्मों के विपरीत व्यवहार करे,तो वह मुझे स्वयं अच्छा नहीं लगेगा।”
यही “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
का श्रीकृष्ण परिभाषित धर्म है।
यह धर्म का सारत्व तत्व है।
गुरुहरी शरणम्
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श्रद्धाविश्वासैक्य
संसार में सबकी दवा है किन्तु मूर्खता की कोई भी दवा नहीं।
श्रद्धा और विश्वास को कभी भी पृथक् नहीं किया जा सकता।
किसी मूढ़ की वाणी से कोई भी सनातन मतावलंबी कदापि
सहमत हो नहीं सकता, तो मैं कैसे?
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
मैं ऐसे भवानीशंकर को प्रणाम करता हूँ, जो श्रद्धा और विश्वास स्वरुप हैं।
इन्हे उसी प्रकार अलग नहीं कर सकते,
जैसे कि “बल”और “बलवान्” को।
कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अन्दर निहित बल(शक्ति) को अलग करके अपने शरीर पिण्ड से बाहर नहीं दिखा सकता,जब तक कि वह चरम परम योगी न हो। और कोई योगी,ऐसा करे भी तो भी वह अपनी स्वयं की निःसारित शक्ति को अपने में स्थापित किये बिना पिण्ड(शरीर) में कोई स्पन्दन नहीं ला सकता।
यही मामला विश्वासश्रद्धा का है।
कोई सिरफिरा विषयवासनाविष से अमरत्व और मुक्ति की बेवकूफी भरी बात
इस भारत की सहिष्णु धरती पर कर सकता है, तो करे। भोगप्रवण व्यक्ति की नाना शूकरकूकर योनियों में भटक कर आने के कारण इसमें प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। किन्तु वृत्ति, भोगसंस्कारी होगी तो कौन योग जगेगा? भोग को प्रारम्भिक क्षणों में आपातरमणीय मानने वाला “पश्चिम” इस अन्धविश्वास को सही मान कर एक अनर्थकारी “सिरफिरे” के पीछे चल सकता है। यह वही सिरफिरा है जिसने वेद,गीता,रामायण,उपनिषदादि
शास्त्रों को सद्गुरु परम्परया नहीं पढ़ा।
और विश्वास तथा श्रद्धा को अलग मान कर अर्थ का अनर्थ कर देता है। इसका
नाम बड़ा प्रसिद्ध है।यह सहज भोग प्रवृत्ति वाला केवल और केवल मूर्ख है।
सम्भोग से समाधियोग तक ले जाने की कुतार्किक परिणति वाला , भोगी व्यक्ति इस सनातन को क्या दे सकता है?
हम चूँकि नाना शूकर कूकर और यहां तक कि विभिन्न यक्ष किन्नर नाग गन्धर्व राक्षस लोकपालों की देवविशेष जातियों,
इन्द्रादि की भोग योनियों से भोगसंस्कार ले कर उपजे प्राणी हैं।अतः हम जैसों का किसी मूर्ख के प्रति भोगसंस्कारत्वेन आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं है।
हे भगवान् ऐसे नारकीय प्राणी, जिन्हे श्रद्धा और विश्वास में अलगाव दीखता है, सनातन वेद वेदान्त का अल्प बोध नहीं है, इन्हें भी क्षमा करना।
क्षमा करना इसलिये भी कि कभी न कभी तो भटका हुआ बेचारा भोगबेचैन “वह”
सनातन को सनातनी सद् गुरुओं से समझ कर तर जायेगा।
श्रद्धा-विश्वास शक्तिशक्तिमान् राधाकृष्ण सीताराम उमाशंकर इसे करुणा करके
“गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न”इस श्रद्धाविश्वासैक्य का बोध करा कर इस मूर्ख और इसके भोगमय विचलित अशुद्ध मनबुद्धिचित्ताहंकाररूप अन्तःकरण को शुद्ध कर ही देंगे।
शिवाशिवयोरभेदः का सनातन सम्मत मत
कोई मूर्ख विभाजित नहीं कर सकता।
“वेदान्तसार” में सदानन्द योगीन्द्र का वेद मत “गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः
श्रद्धा ” सदा सर्वदा सर्वथा रूप में अखण्ड है। सद्गुरु द्वारा उपदेश किये गये वेद और वेदान्त वचनों में दृढ़विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
अतः विश्वास और श्रद्धा में भेद दर्शन पूर्ण
अवैदिक है। श्रद्धाविश्वासैक्य वेदसिद्ध है।
गुरुहरी शरणम्