धर्म से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर में “एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतं” के अनन्य “गीतकार” महाभारतोक्त श्रीमद्भगवद्गीता की अत्यन्त प्रसिद्ध पंक्तियों का आश्रय लेकर चलना होगा।
ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
धर्म नहीं धर्म का निचोड़
“सारतत्व” क्या है, सुनो।
सुनकर धारण करो क्योंकि
” धारणात् धर्मः”जो धारण करके विवेक पूर्वक आचरण किया जाय,वही धर्म है।
“आचारः परमो धर्मः श्रुति उक्तः स्मार्त एव च” भगवद्वाणी भी इसी आचरण मूलक धर्म का प्रकाश करती है।
” आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
यही धर्म का तत्व है।
हम मनुष्य का कर्तव्य कर्म
(धर्म)पालन करें यही धर्म है।
जो हमारे(मनुष्य) लिये आचरण योग्य (रागद्वेष,हिंसा क्रूरता) नहीं है, उसे हम कदापि धारण न करे।
” हमारे वास्तविक मनुष्य स्वरूप के लिए उदारता करुणा दया क्षमा त्याग धैर्य आदि गुण आवश्यक हैं, इन्हें हम अवश्य धारण करें।”
यही ईश्वरीय गुण चेतना है।
हम निश्चित रूप से अविनाशी ईश्वर के अंश हैं।तो हम अपने विस्मृत ईशस्वरुप को स्मृत करके,अपनी स्मृति को जागृत रखने के लिए, समस्त जड़ चेतन जीव जगत्,यानी कि पशुपक्षीकीटपतंग और नदीपर्वतवृक्षादि सभी के प्रति भगवद् भाव से कर्तव्यकर्म करते हैं, तभी धर्म है, अन्यथा,अधर्म।
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” की अतुलसी तुलसी सरस्वती इसी भाव का विस्तार और प्रकाश करती है।
इसलिये हम सभी ईश्वर की सन्तान, ईश्वरीय और दैवी गुणों के अनुकूल ही व्यवहार करें,यही धर्म है।
” हम अन्यों के साथ इन्ही मानवीय अनुकूल व्यवहार करने के कारण मनुष्य कहलाने के पात्र हैं”
“यदि कोई इन मानवधारणीय पालनीय कर्मो का आचरण नहीं करे,तो वह मनुष्य नहीं।”
“यदि कोई मेरे साथ उक्त मानवधारणीय करणीय कर्मों के विपरीत व्यवहार करे,तो वह मुझे स्वयं अच्छा नहीं लगेगा।”
यही “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
का श्रीकृष्ण परिभाषित धर्म है।
यह धर्म का सारत्व तत्व है।
गुरुहरी शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay
श्रद्धाविश्वासैक्य
संसार में सबकी दवा है किन्तु मूर्खता की कोई भी दवा नहीं।
श्रद्धा और विश्वास को कभी भी पृथक् नहीं किया जा सकता।
किसी मूढ़ की वाणी से कोई भी सनातन मतावलंबी कदापि
सहमत हो नहीं सकता, तो मैं कैसे?
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
मैं ऐसे भवानीशंकर को प्रणाम करता हूँ, जो श्रद्धा और विश्वास स्वरुप हैं।
इन्हे उसी प्रकार अलग नहीं कर सकते,
जैसे कि “बल”और “बलवान्” को।
कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अन्दर निहित बल(शक्ति) को अलग करके अपने शरीर पिण्ड से बाहर नहीं दिखा सकता,जब तक कि वह चरम परम योगी न हो। और कोई योगी,ऐसा करे भी तो भी वह अपनी स्वयं की निःसारित शक्ति को अपने में स्थापित किये बिना पिण्ड(शरीर) में कोई स्पन्दन नहीं ला सकता।
यही मामला विश्वासश्रद्धा का है।
कोई सिरफिरा विषयवासनाविष से अमरत्व और मुक्ति की बेवकूफी भरी बात
इस भारत की सहिष्णु धरती पर कर सकता है, तो करे। भोगप्रवण व्यक्ति की नाना शूकरकूकर योनियों में भटक कर आने के कारण इसमें प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। किन्तु वृत्ति, भोगसंस्कारी होगी तो कौन योग जगेगा? भोग को प्रारम्भिक क्षणों में आपातरमणीय मानने वाला “पश्चिम” इस अन्धविश्वास को सही मान कर एक अनर्थकारी “सिरफिरे” के पीछे चल सकता है। यह वही सिरफिरा है जिसने वेद,गीता,रामायण,उपनिषदादि
शास्त्रों को सद्गुरु परम्परया नहीं पढ़ा।
और विश्वास तथा श्रद्धा को अलग मान कर अर्थ का अनर्थ कर देता है। इसका
नाम बड़ा प्रसिद्ध है।यह सहज भोग प्रवृत्ति वाला केवल और केवल मूर्ख है।
सम्भोग से समाधियोग तक ले जाने की कुतार्किक परिणति वाला , भोगी व्यक्ति इस सनातन को क्या दे सकता है?
हम चूँकि नाना शूकर कूकर और यहां तक कि विभिन्न यक्ष किन्नर नाग गन्धर्व राक्षस लोकपालों की देवविशेष जातियों,
इन्द्रादि की भोग योनियों से भोगसंस्कार ले कर उपजे प्राणी हैं।अतः हम जैसों का किसी मूर्ख के प्रति भोगसंस्कारत्वेन आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं है।
हे भगवान् ऐसे नारकीय प्राणी, जिन्हे श्रद्धा और विश्वास में अलगाव दीखता है, सनातन वेद वेदान्त का अल्प बोध नहीं है, इन्हें भी क्षमा करना।
क्षमा करना इसलिये भी कि कभी न कभी तो भटका हुआ बेचारा भोगबेचैन “वह”
सनातन को सनातनी सद् गुरुओं से समझ कर तर जायेगा।
श्रद्धा-विश्वास शक्तिशक्तिमान् राधाकृष्ण सीताराम उमाशंकर इसे करुणा करके
“गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न”इस श्रद्धाविश्वासैक्य का बोध करा कर इस मूर्ख और इसके भोगमय विचलित अशुद्ध मनबुद्धिचित्ताहंकाररूप अन्तःकरण को शुद्ध कर ही देंगे।
शिवाशिवयोरभेदः का सनातन सम्मत मत
कोई मूर्ख विभाजित नहीं कर सकता।
“वेदान्तसार” में सदानन्द योगीन्द्र का वेद मत “गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः
श्रद्धा ” सदा सर्वदा सर्वथा रूप में अखण्ड है। सद्गुरु द्वारा उपदेश किये गये वेद और वेदान्त वचनों में दृढ़विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
अतः विश्वास और श्रद्धा में भेद दर्शन पूर्ण
अवैदिक है। श्रद्धाविश्वासैक्य वेदसिद्ध है।
गुरुहरी शरणम्
शालग्रामराम
जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।
सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।
गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।
गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।
हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।
💐💐💐💐💐
सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।
शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।
अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।
हरिगुरू शरणम्
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शालग्रामराम
जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।
सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।
गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।
गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।
हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।
💐💐💐💐💐
सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।
शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।
अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।
हरिगुरू शरणम्
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अध्यात्म तले
अध्यात्म नदी का जल बन कर
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
यह हृदयदेश सुन्दर प्रदेश।
जहँ राजमान श्रीशक्तिमान।
जिनकी है चार भुजा शोभित।
है चार पुरुष का अर्थ कथित।
मनसा वचसा नारायण भज।
कर्मणा कुसंस्कार अब तज।
अज्ञान तमस तब दूर भगे।
जब ज्योतित आत्मप्रकाश जगे।
वह आत्मप्रकाश स्वयं ज्योतित।
अनुभवकारयिता कर्तासित।
हम वही दिव्यचेतनायुक्त।
गुणयुक्त भवार्णव सदामुक्त।
सद्गुरु नारायण करुणाकर।
कर कृपादृष्टि अब अपना कर।
यह कामक्लेश ना रहें शेष।
शरणागति दो हे भाववेश।
अब मुझे और ना कहना है।
तव अविरल स्मृति में रहना है।
अध्यात्म नदी का जल बन कर।
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
गुरुहरी शरणम्।
इन्द्रियों से इन्द्रियातीत
लम्बेलम्बे श्वास प्रश्वास में चलते प्राणवायु स्वरूप परमात्मा का अनुभव करो जो
सारी चेतना का मूल है।पंचवायु, पंचभूत पंचविषयप्रपंच,पंचदेवों की उपासना
ज्ञान और भक्ति है।
श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा नासिका इन्ही
प्राण अपान उदान समान व्यान से ही चलितचालित है । वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ आदि पंच कर्मेन्द्रियसंघात भी इन्ही पंचवायु द्वारा संचरित हैं।
मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्भुज भगवान् हैं जिनके कारण दशेन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों में समुचितचेष्टाशील हैं।
और सारी चेष्टा के अनन्त मूल
श्वासप्रश्वासप्राण को मत भूल।
इसी में चराचरजगत् स्पन्दित है
इन्द्रियातीतवृत्ति भी आक्रन्दित है।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।
जब नाम चले
सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।
कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।
पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।
कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।
श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।
नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।
हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।
नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।
जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।
विरत मति दो
नारायण ! मैं अपनी अपनी कोई बात नहीं थोप रहा । मेरा मनगढ़न्त विचार नहीं।
श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने व्रजभू में एक महत्वपूर्ण बात कही थी।विचारणीय है विषय।विवेच्य है आशय।
विचरती मेरी मति ने कही।
मेरा विचार तो है प्रभु यही।
क्या सही क्या न सही।
हमें क्या बार बार किसी
भोग के लिए मिलेगी मही।
नहीं नहीं नहीं नहीं।
राधामाधव युगल भाव को लेकर इसी कलिकाल में बंगाल की धरती पर पन्द्रह सौ ईसवी में अवतीर्ण हुए चैतन्य महाप्रभु जी ने आठ पद्य मुमुक्षुओं के मंगल हेतु रचे थे।
किसी भी स्वतन्त्र ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया था। महाप्रभु जी के आठ श्लोक सभी प्रणयी भक्तों में “शिक्षाष्टक” नाम से
प्रसिद्ध हैं।उन्होंने भगवन्नाम संकीर्तन से नाना प्रकार के हमारे सदृश अनेक विमुख
विषयी जीवों का उद्धार किया।नारायण !
यह समस्त संसार भगवद् विमुख प्राणियों
के लिए बार-बार आवागमन का कारण बनता है। महाप्रभु जी इस संसार में किसी वस्तुव्यक्तिपदपदार्थ में कोई राग स्वीकारते नहीं।
राग का कारक और कारण कौन है? कौन है जो नाना इन्द्रियों में चेतनासंचरण करते हुए अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों का अनुभव कराता है?
वह तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् परमात्म सत्ता भगवन्नामधारिणी ही तो है, जिससे यह पिण्ड शरीर सबको ज्ञान का विषय बनाता है। वही प्रज्ञानं ब्रह्म है।
सगुण साकार व्यावहारिकी और नित्य लीलाललाम दृश्यमान भगवान् अवध और व्रज में भक्तों हेतु उतर कर अजस्र आनन्दरस में उन्हें सरस कर दे रहे हैं।
यही रसधार बहाई महाप्रभु ने और अनुभूति भी कराई।और भगवद्विरह में व्याकुल होकर नाम ही रटने की शिक्षा आचरित करके मानव में आनन्द ही मानो रचित कर दिया।अपने शिक्षाष्टक में प्रभु ने कहा- भगवद् विरह मे एक पल भी युगों जैसा हो गया है । नेत्र वर्षा ऋतु की अवतारणा करते हैं। इस गोविन्दविरह में मुझे सारा संसार सूना-सूना दीखता है।
“शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे”
इन्हीं महाप्रभु जी के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में एक बड़ी बात कही थी।
जो आज भी व्रजरज के कण-अण में भक्तों द्वारा अनुभूयमान है।इसी तरह की
ऐसी ही दृष्टि दी थी कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में अनित्यसम्बन्धों के चक्कर में चकराने वाले अर्जुन को भगवान् ने।उन्होंने मान और अपमान को तिरोहित करने का आदेश किया था-“मानापमानयोस्तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः” कहकर।
यही भक्त की दृष्टि विचारधारा, संसार से मुक्ति का सूत्रवत् सूत्रपात करती है-अब मूल बातयह कि श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में क्या कहा –
“सम्मानं कलयातिघोरगरलं
नीचापमानं सुधा।”
सम्मान को घोर विष और अपमान को विषवत् समझो।
पूज्य गोस्वामी जी ने भी सूत्र दिये थे-
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।
लोकेषणा सम्मान का प्रतिस्फुटन है।ये सब बाध्यकारी भोग के लिए स्वस्वरूप
से विच्युत करके जीव को नाना प्रकार के नरकस्वर्गादि लोकों में ढकेलने वाले हैं।
मानापमान माना कि द्वन्द्व हैं।
लेकिन दोनों ही अन्तर्द्वन्द्व हैं।
मन की “मथनी” रूपिका है।
नाना शरीरों की भूमिका है।
दोहावली में बाबा ने कहा।
एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह। उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।
यह दशा ब्रह्मर्षि की देखी।
तब अपनी क्या कहें लेखी।
अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।सकल जीव जग दीन दुखारी।
वही स्मरण करायें कृपा मनुहार यहीं। अपने साधन का कोई अहंकार नहीं।
ऐसे प्रभु का अपने में गुरुकृपया जब होगा दर्शन।
तब कटे हमारे जैसे विषयी जीवों का विषयस्पर्शन।
अतः सर्वत्र दीखे वही।
चाहिए न और कुछ सही।
हे अचाह मुझे बनाओ अचाही।
कराओ अपने में रमण सदा ही।
पाकर तुम्हें शान्त अक्षय होंगे हम सदा ही
हम तुम्हारे रहें त्रिकाल सत्य सदा ही।
अपनी स्मृति में अक्षुण्ण अविरत रति दो।
आपात रमणीय संसार से विरत मति दो।
हरिः गुरुः शरणम्।
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।
सुन्दरी शूर्पणखा, स्वर्णमृग मारीच और भिक्षुक रावण इन सभी का अपना मूल “असुरत्व” है।ये सभी अपने असुरत्व के विपरीत,क्रमशः सुन्दरता, स्वर्णाकारता और साधुता को धारण करते हैं।
जगदम्बा जानकी ने किसी पर अविश्वास नहीं किया था।वह वास्तविकता भी जानती थी।किन्तु “परात्पर ब्रह्म” की परा “शक्ति” सगुण साकार मानव लीला कर रही थीं। मानवीय स्वभाव के अनुरूप सहज विश्वास और “कबीर की साखी” “कबिरा आप ठगाइए और न ठगिये कोय।आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय” के मानवीय-वैचारिक आदर्श को जो प्रदर्शित कर रही थीं।इसीलिये संकट का नाटक कर रही थीं। अब देखिये
“जीति को सकै अजय रघुराई।माया ते असि रचि नहिं जाई।”कह कर “जननी” अपनी सगुण साकार लीला विलास में पूरा विश्वास दिखाते हुए उसे युक्तिसंगत भी सिद्ध करती हैं।
लेकिन “भगवत्ता” और सृष्टि की “सूत्रधारिता” इसी से खुल जाती है। क्योंकि “माया ते असि रचि नहिं जाई” कहकर “विद्यामाया”और भगवान् की “चिरसंगिनी” “अवियुक्त” माया ने संसारी माया को प्रकट प्रत्यक्ष कर दिया। नि:सन्देह “अजय” “रघुराई” कहते ही “परात्पर ब्रह्म” के अपरस्वरूप “सगुण साकार” दशरथ नन्दन”श्रीराम”की भी “मानवाकारता” पर से पड़ा पर्दा “माँ” ने एक झटके से हटा कर “उन्हे” सर्वकारण कारण जतला दिया।
संसार रचयिनी “अविद्यामाया” को भी
रचने और संचालित करने वाली “यह” “विद्यामाया” जो ठहरीं।
इसलिये मानव लीलावश “माता”ने तो शूर्पणखामारीचरावण की अनभिज्ञता का “नाटक” ही किया।नारायण!यह तो वस्तुतः”रामरामा” सबको नचावनवारी हैं।
सबहिं नाचावत राम गोसाईं। अरे नारायण
जिसकी भृकुटि विलास से सृजन पालन संहार कर्त्री अविद्या माया क्षणार्ध में तत्पर हो जाती है।और सृजनादि कार्यों में लग जाती है,उसे क्या स्वप्न में भी कोई संकट विपत्ति अथवा विपरीत मति हो सकती है?
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई ।
सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।
गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।
द्वितीयाद् वै भयं भवति
द्वितीयाद् वै भयं भवति ।
(बृहदारण्यक,उ.1/4/2)
जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, सब कुछ आत्मीय है।तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,
इस संसार की रचना करके,वह परमात्मा सभी जड-चेतन प्राणियों में प्रवेश कर गया। इसका मतलब है कि,इस हमारे पिण्डभूत शरीर में और इसके बाहर भी सब दृश्यमान जगत् परमात्मा में परमात्मा का और परममात्मभाव से विद्यमान है।
हमें अपने से भिन्न किसी को नहीं मानना चाहिए। यदि हम अपने से भिन्न दृष्टि रखते हैं, तब नाना सांसारिक भयों में रहेंगे ही। अतः अपने इस मनुष्य शरीर के पहले के नाना शरीरों का चिन्तन करते हुए, सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र अनुभव में लाना चाहिए। और ऐसा अभ्यास करते-करते सभी में हरिः ओ३म् तत् सत् दीखने लग जायेगा। सारी समस्या का निदान हो गया। जब सभी में वही है, तब भय कैसा?और क्यों?
वस्तुतः सबका सबसे भागवत सम्बन्ध ही है। तह सम्बन्ध तो स्वाभाविक/प्राकृतिक/स्वतः सिद्ध है। यही भगवान् की अर्जुनोपदिष्ट वाणी में “योग” कहा गया।जीवपरमात्मनित्ययोग ही योग है।
अन्य संसार के गृहस्थादि आश्रमों के विभिन्न सम्बन्ध माने हुए,अनित्य और कल्पित हैं।
निश्चित रूप से बाकी सब सम्बन्ध माने हुए अस्वाभाविक/अप्राकृतिक/थोपे हुए सम्बन्ध हैं। अतः यदि सबमेंभगवान् मान कर सभी से भागवत्सम्बन्ध स्वीकार कर लें, जो कभी न कभी किसी जन्म में और मानव जन्म में ही ,प्रायः आभासित होते हैं, समझो मानवजीवन सफल है ।
नहीं तो भेद दृष्टि से कुछ नहीं मिलेगा। पुनः एक बार यह ईश्वरीयकृपाकरुणा को,हम ठुकरा देंगे।
सब छोटे बड़े को,पेड़ पौधे तक कोभी भगवत् स्वरूप में प्रणाम करो।
भेद देखना मनुष्य की दुर्बलता और सारी समस्या,की जड़ है।
तत्र को मोहः को शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः(ईशोपनिषद् -7)
सभी में अपना आत्मस्वरूप वह एक ही परमात्मा देख लेने पर कोई अज्ञान नहीं,कोई दुःख नहीं और कोई भय नहीं।
इसीलिये परमात्मद्रष्टा ऋषियों ने इस मन्त्र का दर्शन किया-
“द्वितीयाद् वै भयं भवति”
इस देववाणी और वेदवाणी का सार समझो।
जीवन धन्यधन्य होगा।
अन्यथा ईर्ष्या राग द्वेष तो पूर्व शरीरों की कमाई, सब गुड़ गोबर कर देगी।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।