जीवोन्मुक्त गति

जो हमें मनुष्य बना दे वही धर्म है।
मनुष्य बनने पर खुले विवेक का मर्म है।।

ऋतु परिवर्तन भौतिक जगत् की क्रान्ति है।
आत्मिकजगत् में अन्तःशुद्धि अन्यथा सब भ्रान्ति है।।

अन्तःकरण है,मन बुध्दि चित्त और अहंकार।
इन सभी में प्रत्येक अग्रिम होता सूक्ष्माकार।।

सद्गुरु प्राप्त होते ही इनकी उत्तरोत्तर शुद्धि।
वाग्देवी करें कृपा हो जाये विशुद्ध बुद्धि।।

इसी विशुद्ध बुद्धि से हम जीव होते हैं सिद्ध।
अन्यथा गमनागमन हो,लक्ष्य रहता असिद्ध।।

अपने गुरुदेव भगवान् मलूकाग्रपीठाधीश्वर।
बोले सुनो,नश्वर शरीर ही मिलाये अविनश्वर।।

इस जीवात्मा को बनना है अकारत्रय युक्त।
नहीं कटे इसके बिन जन्मचक्र ना होंगे मुक्त।।

अकारत्रय है,अनन्यभोग्यत्व अनन्यशेषत्व और अनन्यार्हत्व।
हम सब के जीवन में क्रमशः इसका महामहत्व।।

१- यह जीवात्मा, परमात्मा का भोग्य है।
मतलब किसी और के भोगायोग्य है।।

जैसे संस्कारित धान, चावल, भात बनता है।
तभी वह हम जीवों के खाद्य हो सकता है।।

उसी तरह यह मानव जीव धान्याकार है।
श्रीगुरुकृपादृष्ट्या क्षालित और ही प्रकार है।।

अब यही परिपक्व होकर बनता सिद्ध है।
जैसे कि हम कहते भोजन अब सिद्ध है।।

शुकदेव जी से बोले राजा परीक्षित-
सिद्धोस्मि अनुगृहीतोस्मि
हम संसार के भोग्य आज भी बने पड़े कसे।
इसलिए संसारोन्मुख रह,जन्मचक्र में फंसे।।

२- अनन्यशेषत्व है द्वितीय अकार सम्पन्नता।
जिसकी अनुभूति बिना न जाती है विपन्नता।।

शेष माने हम जीव हैं भगवान् के एक अंश।
इस मान्यता के बिना होता रहता विध्वंश।।

ईश्वर अंश जीव अविनाशी- गोस्वामी जी।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः-गीता

हे राम तवास्मि की द्वितीय है युक्तिसंभावना।
करते कृपा गुरुदेव तभी हो ऐसी दृढ़ भावना।।

३-तृतीय अकारत्रयुक्तत्व होता अनन्यार्हत्व है।
अर्हता है योग्यता और इसका ही महत्व है।।

हम सभी जीव केवल जब हों अनन्यशरण।
श्रीगुरुकरुणया मिले निश्चित श्रीभगवच्चरण।।

इस प्रकार से अकार की होती तीन युति है।
इसी की समष्टि से हो जीवोन्मुक्त गति है।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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मानवता गहें

मेरा यहां संसार में है कुछ नहीं मानूं अटल।
संसार प्रतिपल बदलता है जा रहा यह भी अटल।।

इसलिए बीते समय पर शोक करना मूर्खता।
किस कर्म की है अफलता या सफलता नहिं देखता।।

पूर्व जन्मों के करम वश दुःख सुख सब भोगता।
यह भी न है मद किया हमने या किया हमने खता।।

चलते हुए भोजन क्रिया सब शास्त्र करते हैं निषिध।
हंसते हुए कुछ बोलना संभव नहीं होता विविध।।

है श्रवण हित दो कान इनका है रहस्य यही प्रभो।
जब बोलना अनिवार्य हो तब ही अलप बोलूं विभो।।

ऋषि शास्त्र वेद पुराण पथ का चयन कर बढ़ते रहें।
है पाप क्या है पुण्य न विचार कर मानवता गहें।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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कली ज्योतित खिले

त्याग में अनुभव करो आनन्द की सीमा नहीं।
संसार की सब पद प्रतिष्ठा है हमारी मां नहीं।।

जब छोड़ सब उन्मुक्त हो ऐसी कहीं गरिमा नहीं।
यह आत्म अनुभव भव पराभव करैं गुरु किरपा यहीं।।

यह जीव जीवन चले सत्पथ जब मिले श्रीगुरू वही।
है परम परमानन्द सच्चित् करुण करुणा कण सही।।

हैं “उन्ही” के भेजे हुए सब दिव्य अवतारी पुरुष।
यदि हम करें स्वीकार उनको तुरत जाये सब करुष।।

इस आत्म विस्मृति का स्मरण हम कौन हैं क्या हो गये।
करने कराने यही अनुभव सद्गुरू नूतन नये।।

छूटें असद् व्याहार औ व्यवहार सत् पथ हम चले।
वह एक आलक्षित चरम पाकर विषय वसना जले।।

यह तब हुआ जब मुक्त परमारथ रथी छाया मिले।
कट,बन्ध बन्धन धन धरा,आत्मिक कली ज्योतित खिले।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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हरी की

आत्मा का बोध हो क्या स्वतः प्रमाण्य से।
अथवा यह सम्भव है परतः प्रमाण्य से।

गुरुओं ने कहा यह सम्भव तभी है नाथ।
जब मिल अकिंचन नामदेव ज्ञानदेव का साथ।

इनकी बानी में डूब इनकी कृपा का याचन।
पाते हैं पाये हैं पावेंगे आरत मन।।

यही साधु सन्तजन इनकी चरनों की धूल।
धारण करें जो मन विषय विष जाये भूल।।

कहीं नहीं गये नामा ज्ञान सूर तुलसी कबीर।
मिलते हैं आज भी प्रत्यक्ष होवे हृदय पीर।।

आरत हो चाहे जो चाहना न और की कर।
सब कुछ समरपन सन्तन चरनन में धर।।

ऐसी ही मति बनी दास विन्ध्येश्वरी की।
नष्ट मोह कृपा मोहन गुरु नारायण हरी की।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो

भाई जी, हमारी बड़ी समस्या है।

हम हम करि धन धाम संवारे बचे न काल बली ते।
मन पछितैहैं अवसर बीते-

पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी विनय पत्रिका में।
दास ने सभी पूज्य जनों से सुना है और भगवत्कृपा से पढ़ा भी है कि यह अहं जाता नहीं और बारम्बार भवबन्ध में जकड़े रहता है।
किसी अहंशून्य महत्पुरुष की कृपा बस हो जाय तो काम बन जाय।
मन बुद्धि चित्त और अहं में क्रमशः एक से आगे एक सूक्ष्मतर है।
इसी अहं से मम जुड़ा है।
देह भाव वही मेट सकें जिन सन्तन कौ मिट गयो है।
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
अब जब परम प्रिय राम जी हो जायें, हनुमानजी जी कृपा करैं।
सन्त भक्त जन दया का पात्र बना लें।

राम नाम के पटतरे देबे को कछु नाहिं।
क्या लै गुरु सन्तोसिये हौंस रहि मन माहिं।।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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गुरु गोविन्दहिं अनुसर

गुरु गोविन्द कृपा का अनुभव।
काटेगा यह छ्न्द बन्द भव।।
ऐसी कृपा नाथ जन जानहुं।
एहि के बल जग जीवन मानहुं।।
करहिं करावहिं सो सोई होवै।
दास आसरे उनके सोवै।।
जिनको और भरोसो मन में।
करै सोइ हर हर इक छन में।।

दास भरोसे गुरु गोविन्दहिं।
काटत संसारी छल छन्दहिं।।
मेरो मन श्रीगुरुचरनन महिं।
लागै अवसि कृपा उनकै जहिं।।
यदि अन्यथा होत यहिं दासा।
होवत शरणागति कै नासा।।

अतः चरण महिं परा रहै यहिं।
दास बिन्देसरि सुमिरै एहिं कहि।।
अब तौ यह निश्चय जीवन कर।
चलै श्वास गुरु गोविन्दहिं अनुसर।।

श्रीसीताराम
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ब्राह्मणत्वम्

सम्यग् विवेचितं ग्रन्थानुसारं ब्राह्मणत्वम् गौड-द्राविडत्वं पूर्वं तावद् द्विविधत्वम्।
महाभारतेपि ब्राह्मणविषयत्वं विवेचितं द्रष्टव्यं तत्रैव।
तत्र विवेचने कर्माधारत्वं वर्णितम्।वनपर्वणि तत्र    आजगरपर्वणि180तमाध्याये  सर्पयोनौ नहुषस्य राज्ञः युधिष्ठिर-मध्ये वार्ताक्रमः ।
सर्प उवाच
ब्राह्मणः को भवेद् राजन्
वेद्यं किं च युधिष्ठिर।
ब्रवीहि अतिमतिं त्वां हि
वाक्यैः अनुमिमीमहे।।20।।
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं दानं क्षमा शीलम्
आनृशस्यं तपोघृणा।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र
स ब्राह्मण इति स्मृतः।।21।।
वेद्यं सर्वं परं ब्रह्म
निर्दुःखम् असुखं च यत्
यत्र गत्वा न शोचन्ति
भवतः किं विवक्षितम्।।22।।
शूद्रे तु यद् भवेल् लक्ष्यं
द्विजे तच्च न विद्यते।
न वै शूद्रः भवेत् शूद्रः
ब्राह्मणः न च ब्राह्मणः।।25।।
यत्रैतल् लक्ष्यते सर्वं वृत्तं
स ब्राह्मणः स्मृतः।
यत्रैतन् न भवेत् सर्प तं 
शूद्रम् इति निर्दिशेत्।।26।।
यत्रेदानीं महासर्प!
संस्कृतं वृत्तम् इष्यते।
तं ब्राह्मणम् अहं पूर्वम्
उक्तवान् भुजगोत्तम।।37।।
अथ च 
अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्व
तत्र 104तमाध्याये
ये न पूर्वाम् उपासन्ते
द्विजाः सन्ध्यां न पश्चिमाम्।
सर्वांस्तान् धार्मिकः राजा
शूद्रकर्माणि कारयेत्।।19।।

इत्यत्र महाभारम् अवश्यम्
अनुसन्धेयम्, ब्राह्मणविषये।

हरिः शरणम्
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देश को उबारो

पश्चिम का भोग भोगी सर्प जब डंसता है।
भारत का योग आकर यहीं तो फंसता है।।

सहशिक्षा समानता ने कहीं का नहीं छोड़ा है।
भौतिकता की अन्धी दौड़ बड़ा भारी रोड़ा है।।

रही सही कमर तोड़ी मोबाइल का जमाना है।
हर अपराध फैलता है क्या कोई माना है।।

सारे सम्बन्ध टूटे भ्रान्त भोग काम ऊपर।
विषय भोग काम रोग मनुजीवन दूभर।।

कहां गयी सावित्री अनुसूया सीता है।
द्रौपदी न दीखती मेरी भी मति भीता है।।

आकर जगावो राम! देवसंस्कार जगे जागे।
भोग का कुयोग रोग अव्यवहित भागे।।

भेजो कबीर बीर उपनिषद् पुनः गाये।
साखी सबदी में सत्य गाकर सुनाये।।

चित्त प्रकृतिस्थ होवे अन्तर्हित चेतना में।
बुद्धि से विवेक होय राम नाम नामें।।

राजा राम रघुवंशी रावण को मारो।
सूर्पनखा सोनम से देश को उबारो।।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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प्रेमानंद

जब तक संसार के लायक बने रहेगो, भगवान् के लायक नहीं बन सकते।

यह मानवजीवन भगवान् की प्राप्ति हेतु है,संसार की प्राप्ति हेतु नहीं।

संसार में मन बुद्धि चित्त अहं की वृत्ति तो संसार में बारम्बार डालेगी।

जिस क्षण यह सत् चित् आनन्द, शरीर से पृथक् होगा, तब मन आदि की वृत्ति संसार में रहने से कर्मजाल के कारण संसार पुनः मिलना ध्रुव है।

अविलम्ब लौट आ, चल रे मन! अपने शाश्वत प्रेमी की और।

संसार के राग भोग पद प्रतिष्ठा में जो नहीं रमा,
वही कालिदास भारवि भास तुलसी कबीर रैदास बन कर शाश्वत पदवी पाया।

विचारो बुद्ध की मनीषा, मीरा का समर्पण जिसने ज्ञान भक्ति से अनन्त को स्वीकारा।

संसार में मनोरमता बन्धन है,जबकि भगवान् के नामरूपलीलागुणों में मनोरमता मुक्ति है।

शरणागति मुक्ति का उपाय भी है और उपेय भी।

सुमिरो कि प्राक्तन शरीर के संस्कार वश वेदादिक शास्त्र सुनाने सुनने का अवसर मिला। इस अवसर को क्यों गंवायें।

तुलसी बाबा
मति कीरति गति भूति भलाई।जो जेहिं जतन जहां जेहिं पाई।सो जानौ सत्संग प्रभाऊ।लोकहुं वेद न आने उपाऊ।।

कालिदास
व्यतिषजति पदार्थानान्तर: कोपि हेतु:। न खलु वहिरुपाधीन् प्रीतय: संश्रयन्ते।

बाहर की ओढ़ी गई मायिक संसारी उपाधियां, वास्तव प्रेम का कारण नहीं। वह कोई अन्तर तत्व सत्व है जिससे समस्त पद पदार्थ प्रीति प्रेय हैं।

शाश्वत प्रेमी भरपूर कंद।
है जहां रहे वह प्रेमानंद।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल

इतना तो कम नहीं कि मन श्रीअवध विरज रज बसा रहे।
जहं जहं श्रीगुरुचरण चलें तहं तहं की धूली धूसर धूरि गहे।।

सरयू गंगा यमुना पानी पीकर पवित्र होता तन मन।
होवे अभिराम राम सीता श्रीकृष्ण राधिका स्वत: स्मरन।।

इसमें अपनी करनी कहां सज्जनों यह गुरुकृपा प्राप्त फल है।
होती गुरु गोविन्द कृपा, क्या जीवन उसका निष्फल है।।

जिसको पकड़ें, वह धन्य धन्य हो जाय सदा मन वचन काय।
गुन करम काल अवगुन छूटें परसे कैसे पापी अपाय।।

मन बुद्धि अहंकृत चित्त शुद्धि होकर प्रबुद्ध बोधित यह जन।
पृथ्वी जल आकाश वायु वैश्वानर स्थूल शुद्ध कन कन।।

पावन गुरुपादपद्म पाकर होगा कैसे कोई अशुद्ध।
अब स्थूल सूक्ष्म भागवत् प्रकृति सद्य: जाता परि शुद्ध बुद्ध।।

चाहे जैसे “दास” कामना, पड़ती रह पदनख प्रकास।
यह दीन अनन्य भाव भावित अब कहां अन्य अभिलाष आस।।

हर हर अकाश दीखे प्रकाश श्रीविन्ध्यजननि मात: स्वरूप।
क्या देखि रूप विन्ध्येश्वरीदास शोभा अनन्त विस्तृत अनूप।।

पाकर विन्ध्याचल जनम जात यह कृपा हुई अविगत अविचल।
कहती गंगा की विमल धार अविकल करती कल कल कल कल।।

श्री गुरु शास्त्र निष्ठ नाना विध विधि हरि हर हारित अविकल।
सबै भगत यहि कृपा करौ गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल।।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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