भरोसो जाहि दूसरो सो करो

भाई जी, हमारी बड़ी समस्या है।

हम हम करि धन धाम संवारे बचे न काल बली ते।
मन पछितैहैं अवसर बीते-

पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी विनय पत्रिका में।
दास ने सभी पूज्य जनों से सुना है और भगवत्कृपा से पढ़ा भी है कि यह अहं जाता नहीं और बारम्बार भवबन्ध में जकड़े रहता है।
किसी अहंशून्य महत्पुरुष की कृपा बस हो जाय तो काम बन जाय।
मन बुद्धि चित्त और अहं में क्रमशः एक से आगे एक सूक्ष्मतर है।
इसी अहं से मम जुड़ा है।
देह भाव वही मेट सकें जिन सन्तन कौ मिट गयो है।
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
अब जब परम प्रिय राम जी हो जायें, हनुमानजी जी कृपा करैं।
सन्त भक्त जन दया का पात्र बना लें।

राम नाम के पटतरे देबे को कछु नाहिं।
क्या लै गुरु सन्तोसिये हौंस रहि मन माहिं।।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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गुरु गोविन्दहिं अनुसर

गुरु गोविन्द कृपा का अनुभव।
काटेगा यह छ्न्द बन्द भव।।
ऐसी कृपा नाथ जन जानहुं।
एहि के बल जग जीवन मानहुं।।
करहिं करावहिं सो सोई होवै।
दास आसरे उनके सोवै।।
जिनको और भरोसो मन में।
करै सोइ हर हर इक छन में।।

दास भरोसे गुरु गोविन्दहिं।
काटत संसारी छल छन्दहिं।।
मेरो मन श्रीगुरुचरनन महिं।
लागै अवसि कृपा उनकै जहिं।।
यदि अन्यथा होत यहिं दासा।
होवत शरणागति कै नासा।।

अतः चरण महिं परा रहै यहिं।
दास बिन्देसरि सुमिरै एहिं कहि।।
अब तौ यह निश्चय जीवन कर।
चलै श्वास गुरु गोविन्दहिं अनुसर।।

श्रीसीताराम
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ब्राह्मणत्वम्

सम्यग् विवेचितं ग्रन्थानुसारं ब्राह्मणत्वम् गौड-द्राविडत्वं पूर्वं तावद् द्विविधत्वम्।
महाभारतेपि ब्राह्मणविषयत्वं विवेचितं द्रष्टव्यं तत्रैव।
तत्र विवेचने कर्माधारत्वं वर्णितम्।वनपर्वणि तत्र    आजगरपर्वणि180तमाध्याये  सर्पयोनौ नहुषस्य राज्ञः युधिष्ठिर-मध्ये वार्ताक्रमः ।
सर्प उवाच
ब्राह्मणः को भवेद् राजन्
वेद्यं किं च युधिष्ठिर।
ब्रवीहि अतिमतिं त्वां हि
वाक्यैः अनुमिमीमहे।।20।।
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं दानं क्षमा शीलम्
आनृशस्यं तपोघृणा।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र
स ब्राह्मण इति स्मृतः।।21।।
वेद्यं सर्वं परं ब्रह्म
निर्दुःखम् असुखं च यत्
यत्र गत्वा न शोचन्ति
भवतः किं विवक्षितम्।।22।।
शूद्रे तु यद् भवेल् लक्ष्यं
द्विजे तच्च न विद्यते।
न वै शूद्रः भवेत् शूद्रः
ब्राह्मणः न च ब्राह्मणः।।25।।
यत्रैतल् लक्ष्यते सर्वं वृत्तं
स ब्राह्मणः स्मृतः।
यत्रैतन् न भवेत् सर्प तं 
शूद्रम् इति निर्दिशेत्।।26।।
यत्रेदानीं महासर्प!
संस्कृतं वृत्तम् इष्यते।
तं ब्राह्मणम् अहं पूर्वम्
उक्तवान् भुजगोत्तम।।37।।
अथ च 
अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्व
तत्र 104तमाध्याये
ये न पूर्वाम् उपासन्ते
द्विजाः सन्ध्यां न पश्चिमाम्।
सर्वांस्तान् धार्मिकः राजा
शूद्रकर्माणि कारयेत्।।19।।

इत्यत्र महाभारम् अवश्यम्
अनुसन्धेयम्, ब्राह्मणविषये।

हरिः शरणम्
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देश को उबारो

पश्चिम का भोग भोगी सर्प जब डंसता है।
भारत का योग आकर यहीं तो फंसता है।।

सहशिक्षा समानता ने कहीं का नहीं छोड़ा है।
भौतिकता की अन्धी दौड़ बड़ा भारी रोड़ा है।।

रही सही कमर तोड़ी मोबाइल का जमाना है।
हर अपराध फैलता है क्या कोई माना है।।

सारे सम्बन्ध टूटे भ्रान्त भोग काम ऊपर।
विषय भोग काम रोग मनुजीवन दूभर।।

कहां गयी सावित्री अनुसूया सीता है।
द्रौपदी न दीखती मेरी भी मति भीता है।।

आकर जगावो राम! देवसंस्कार जगे जागे।
भोग का कुयोग रोग अव्यवहित भागे।।

भेजो कबीर बीर उपनिषद् पुनः गाये।
साखी सबदी में सत्य गाकर सुनाये।।

चित्त प्रकृतिस्थ होवे अन्तर्हित चेतना में।
बुद्धि से विवेक होय राम नाम नामें।।

राजा राम रघुवंशी रावण को मारो।
सूर्पनखा सोनम से देश को उबारो।।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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प्रेमानंद

जब तक संसार के लायक बने रहेगो, भगवान् के लायक नहीं बन सकते।

यह मानवजीवन भगवान् की प्राप्ति हेतु है,संसार की प्राप्ति हेतु नहीं।

संसार में मन बुद्धि चित्त अहं की वृत्ति तो संसार में बारम्बार डालेगी।

जिस क्षण यह सत् चित् आनन्द, शरीर से पृथक् होगा, तब मन आदि की वृत्ति संसार में रहने से कर्मजाल के कारण संसार पुनः मिलना ध्रुव है।

अविलम्ब लौट आ, चल रे मन! अपने शाश्वत प्रेमी की और।

संसार के राग भोग पद प्रतिष्ठा में जो नहीं रमा,
वही कालिदास भारवि भास तुलसी कबीर रैदास बन कर शाश्वत पदवी पाया।

विचारो बुद्ध की मनीषा, मीरा का समर्पण जिसने ज्ञान भक्ति से अनन्त को स्वीकारा।

संसार में मनोरमता बन्धन है,जबकि भगवान् के नामरूपलीलागुणों में मनोरमता मुक्ति है।

शरणागति मुक्ति का उपाय भी है और उपेय भी।

सुमिरो कि प्राक्तन शरीर के संस्कार वश वेदादिक शास्त्र सुनाने सुनने का अवसर मिला। इस अवसर को क्यों गंवायें।

तुलसी बाबा
मति कीरति गति भूति भलाई।जो जेहिं जतन जहां जेहिं पाई।सो जानौ सत्संग प्रभाऊ।लोकहुं वेद न आने उपाऊ।।

कालिदास
व्यतिषजति पदार्थानान्तर: कोपि हेतु:। न खलु वहिरुपाधीन् प्रीतय: संश्रयन्ते।

बाहर की ओढ़ी गई मायिक संसारी उपाधियां, वास्तव प्रेम का कारण नहीं। वह कोई अन्तर तत्व सत्व है जिससे समस्त पद पदार्थ प्रीति प्रेय हैं।

शाश्वत प्रेमी भरपूर कंद।
है जहां रहे वह प्रेमानंद।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल

इतना तो कम नहीं कि मन श्रीअवध विरज रज बसा रहे।
जहं जहं श्रीगुरुचरण चलें तहं तहं की धूली धूसर धूरि गहे।।

सरयू गंगा यमुना पानी पीकर पवित्र होता तन मन।
होवे अभिराम राम सीता श्रीकृष्ण राधिका स्वत: स्मरन।।

इसमें अपनी करनी कहां सज्जनों यह गुरुकृपा प्राप्त फल है।
होती गुरु गोविन्द कृपा, क्या जीवन उसका निष्फल है।।

जिसको पकड़ें, वह धन्य धन्य हो जाय सदा मन वचन काय।
गुन करम काल अवगुन छूटें परसे कैसे पापी अपाय।।

मन बुद्धि अहंकृत चित्त शुद्धि होकर प्रबुद्ध बोधित यह जन।
पृथ्वी जल आकाश वायु वैश्वानर स्थूल शुद्ध कन कन।।

पावन गुरुपादपद्म पाकर होगा कैसे कोई अशुद्ध।
अब स्थूल सूक्ष्म भागवत् प्रकृति सद्य: जाता परि शुद्ध बुद्ध।।

चाहे जैसे “दास” कामना, पड़ती रह पदनख प्रकास।
यह दीन अनन्य भाव भावित अब कहां अन्य अभिलाष आस।।

हर हर अकाश दीखे प्रकाश श्रीविन्ध्यजननि मात: स्वरूप।
क्या देखि रूप विन्ध्येश्वरीदास शोभा अनन्त विस्तृत अनूप।।

पाकर विन्ध्याचल जनम जात यह कृपा हुई अविगत अविचल।
कहती गंगा की विमल धार अविकल करती कल कल कल कल।।

श्री गुरु शास्त्र निष्ठ नाना विध विधि हरि हर हारित अविकल।
सबै भगत यहि कृपा करौ गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल।।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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श्रीराम तारक मन्त्र प्राप्ति क्रम

त्रिपाद् विभूति नित्य साकेत में भगवती जानकी की सेवा से प्रसन्न होकर भगवान् श्रीराम ने षडक्षर श्रीरामतारक मन्त्र माता जी को प्रदान किया था।
श्रीअग्रदेवाचार्य ने इसका उल्लेख किया-

परव्योम्नि स्थितो रामः,पुण्डरीकायतेक्षणः
सेवया परया जुष्टं जानक्यै तारकं ददौ।।

1-अतः श्रीरामतारक की प्रथमाचार्या
श्रीजानकी जी हैं। यही श्रीजी हैं, और हमारा वैष्णव सम्प्रदाय श्रीवैष्णव सम्प्रदाय है।
2-इसके बाद जगदम्बा जानकी जी ने यह मन्त्र श्रीहनुमानजी महाराज को दिया था इसलिए द्वितीय आचार्य हनुमानजी हैं।
3-हनुमानजी ने यह मन्त्र कृपापूर्वक ब्रह्मा जी को दिया,और ब्रह्मा जी तृतीय आचार्य हुए।
4-श्रीब्रह्माजी ने यह मन्त्र श्रीवशिष्ठजी को प्रदान किया।अतः चतुर्थ आचार्य महर्षि वशिष्ठ जी हैं।
5- श्रीवशिष्ठजी ने यह रामतारक अपने पौत्र महर्षि पराशर को प्रदान किया, जिससे महर्षि पराशर पंचम आचार्य हुए।
6-महर्षि पराशर ने उक्त मन्त्र अपने पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजी को दे दिया, और व्यास जी षष्ठ आचार्य रूप में परिगणित हुए।
7- व्यासदेव ने यही रामतारक मन्त्र अपने पुत्र श्रीशुकदेवजी को प्रदान कर दिया,यह महामुनीन्द्र अमलात्मा विमलात्मा परमहंस चक्रचूडामणि श्रीशुकदेवजी मन्त्र के सप्तम आचार्य हैं।
8-श्रीशुक भगवान् ने यही मन्त्र महर्षि बोधायनाचार्य को दिया, जिनका एक नाम पुरुषोत्तमाचार्य भी है।इसलिये महर्षि बोधायन, षडक्षर श्रीरामतारक के अष्टम आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्ही महर्षि बोधायन ने ब्रह्मसूत्र पर विशिष्टाद्वैत परक बोधायनवृत्ति लिखी।
9-इन्ही बोधायनाचार्य से चलकर यह श्रीरामतारक “षडक्षर” श्रीराघवानन्दाचार्य
को प्राप्त हुआ।और ज्ञातव्य तथ्य है कि एक अंश से साक्षात् वशिष्ठजी ही राघवानन्दाचार्य के रूप में प्रकट हुए थे।
10-यही मूल मन्त्र राघवानन्दाचार्य जी से यतिराज श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् को प्राप्त हुआ।वैष्णव जगत् की मान्यता है कि ये रामानन्दाचार्य भगवान् तो स्वयं श्रीरामजी ही प्रकटे हैं।
आगे चलती हुई यह “श्रीरामतारक” मन्त्र की परम्परा अनन्त विस्तरण के कारण आज भी अनेकानेक पूजनीय गुरुओं के माध्यम से जीवों का उद्धार कर रही है।

ध्यातव्य है कि भगवान् के नित्य साकेत में श्रीरामजी द्वारा श्रीजी जानकी जी को प्रदत्त यह “श्रीरामतारक” षडक्षर मन्त्र पारम्परिक रूप से आदि रामानन्दाचार्य भगवान् को प्राप्त होता है।

प्रचलित तथ्य है कि यह आदि श्रीरामानन्दाचार्य भगवान् श्रीभरतभाव काअतिशय प्रेमरसास्वाद करने हेतु स्वयं श्रीरामजी ही प्रकट हुए थे। आपने प्रयागक्षेत्र में माता श्रीमतीसुशीला और श्रीपुण्यसदन वाजपेयी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया। और लगभग दो सौ साठ वर्ष तक धरती पर विराज कर सभी प्रणत जनों को रामतारक मन्त्रराज देकर तार दिया।

रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले।।

यही रामानन्दीय श्रीवैष्णवों की अति श्रेष्ठ सुदीर्घा परम्परा है। यहाँ कोई सम्प्रदाय भेद नहीं है।सभी जाति वर्ग के प्रणत जनों के परम कल्याण हेतु सभी को यह षडक्षर श्रीरामतारक प्राप्त हुआ।
श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् का महत्तर उद्घोष था कि सभी जीव भगवत् शरणागति के अधिकारी हैं-
“सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणः सदा”

हरि:शरणम्
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उमंगहि भरे मोद मनि 

दक्षिण में लक्ष्मण बसत वाम भाग सिय साथ।सम्मुख हनुमत बैठि जहँ मध्य रहें रघुनाथ।।
लिये अजन्मा जनम शुभ चैत्र शुक्ल मधु मास।नवमी तिथि मध्याह्न पल सुन्दर अवध अकास।।

राक्षस अति आचार सुनि जनम लीन्हि  रघुश्रेष्ठ।दुष्ट दलन कर काज हरि सन्त जनन के प्रेष्ठ।।

मर्यादा स्थापित करी भे मर्यादाग्रज प्रभु। मर्यादा उत्तम पुरुष तबहिं प्रसिद्ध विभु।।

राम नाम उच्चरत जे चतुर सुजान कहात।भूरि नाम के दान करि दानी परमसुहात।।

चैत्री तिथि नवमी सुखद शुक्ल पक्ष प्रति काल।गावत सुमिरत राम कहु गये अकाल दुकाल।।

विन्ध्येश्वरि को दास येहिं श्रीगुरुकृपा प्रभाव।नाम राम को सुमरि कहि अति आनन्दहिं पाव।।

अति आनन्दहिं पाइ राम को नाम मोद मय।धन्य धन्य मुख गात हरष महिं डूबत जय जय।।

जय जय श्रीभगवान् हरी नारायण नरजनि। नारद शुक सनकादि उमंगहि भरे मोद मनि।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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गुरु चरनन धरि  

जाति, विद्या, पद, रूप और युवावस्था का अभिमान, ये पाँचों भक्तिमार्ग के प्रबलतम काँटे हैं,नारायण!

जातिर्विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः एते वै भक्तिकङ्टकाः।।
अरे नारायण!
इनमें से कोई भी एक रहेगा, तो वह भक्ति नहीं मिलेगी,जो जीव के आत्म कल्याण को साध सके।और वस्तुतः किसी के भी रहने पर,निश्चित रूप से भक्ति सधेगी ही  नहीं।
इनमें से कोई कारण रहने पर, उसका कार्यभूत अभिमान आ जाता है, जो भक्ति को बाधित कर देता है। किसी के भी रहने पर कोई एक भी अभिमान ऐसा कर देगा कि भक्ति की प्राप्ति होगी नहीं, ऊपर से यह मानव जन्म ही निरर्थक हो जायगा।

वस्तुतः अभिमान तो किसी का भी नहीं होना चाहिए। इस अभिमान को तो मात्र  निरभिमान सन्त सद्गुरु ही एकमेव दूर कर सकते हैं, जिनको  परम्परा से ऐसा गौरव  प्राप्त हो। निश्चित रूप से व्यक्ति के जीवन में ऐसे गुरुतत्व अपरिहार्य हैं।

लेकिन इस गुरु तत्व की प्राप्ति भी अति दुष्कर है। देखिये,नाना जन्मों के भोग से खिन्न  जीव में भवसागर से मुक्ति की जब इच्छा  होगी तब भगवत्कृपाकरुणा का उत्स फूट पड़ेगा,जिससे सन्त कृपा और सन्त कृपा की सहज शीतल अविरल वारि वात्सल्यधारा  का  प्राकट्य होने पर वही भक्ति सध जायेगी, जो हमें जन्ममृत्यु चक्र से मुक्त कर देगी।

अनेकानेक जन्मों के मातापिता एकसाथ अथवा पृथक् होकर, वह वात्सल्य नहीं दे सकते जो सन्त सद्गुरु दे देते हैं। अरे नारायण! इसी के द्वारा केवलाभक्ति प्राप्त होगी,जिससे सेव्य भगवान्, सेवक जीव और साधन रूप शरीसंसारसामग्री का बोध होगा, जो चरम परम प्रेम रूपा भक्ति  देकर सदा सदा के लिए तार देगा।

अन्यथा नहीं तो नहीं तो काहे की भक्ति?
रूपया
पैसा
मान
बड़ाई
पद
प्रतिष्ठा
इन्हीं सबकी भक्ति। इनके लिये यह दुर्लभ देह नहीं मिली है।बल्कि इनमें वासना त्याग कर पुनः जन्म न पाने के लिए यह दुर्लभ देह  भगवान् की कृपा करुणा से मिली है।

अतः भोगों के झंझावात से उबरने की  इच्छा होने पर ही गुरु प्राप्ति से जीवन धन्य धन्य होगा,अन्यथा नहीं।

हर एक जन्मों  में मिले है यह कांचन कामिनी माया के अवस्थान अधिष्ठान।नहीं करनी इनकी भक्ति।नहीं तो चक्कर छूटना ही नहीं है।
हाँ यदि इन सभी में भगवत् तत्व स्वीकारो।अथवा ये सब भी भगवान्/भगवती के ही हैं तब तो सम्बन्ध बनेगा।और ऐसा सम्बन्ध बनेगा कि इनके कारण होने वाला अहंकार नष्ट हो जायेगा। अब प्रश्न यह है कि ऐसी भगवत् तत्व की परं  तात्विक दृष्टि कैसे मिलेगी?

इन सबमें भगवत् तत्व की स्वीकार्यता भी गुरु ही दे सकते हैं।(सर्वं खलु इदं ब्रह्म)(अहं ब्रह्म अस्मि)(तत् त्वमसि) का वास्तविक बोध गुरु के सिवाय और कोई देने में समर्थ नहीं दीखता। निरभिमान गुरु ही अभिमान नष्ट करेगें।
और अहम् नष्टता के दूसरे क्षण तत्व का प्रकाश हो जायेगा। जिसके लिये यह तन मिला है। वस्तुतः यह संसार और माया भी भगवान् की ही है।और हम इसे (अहम्) अपना मान बैठे हैं।

सारी समस्या की जड़ यही है।

भरोसो जाहि दूसरो सो करो।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो… (विनयपत्रिका)

मोको शिव को नाम कलपतरु..
मोको दुर्गा नाम कलपतरु..
मोको राम को नाम कलपतरु..
मोको गणेश को नाम कलपतरु..
मोको सूरज नाम कलपतरु..
मोको तो राम को नाम कलपतरु..

नारायण श्रीराम कृष्ण हरि
उच्च स्वरहिं या मानस करि करि।
भक्तभागवत चरित श्रवण करि
कर्म जाल मुचि गुरु चरनन धरि।।

हरिः शरणम्
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भक्तशिरोमणि हनुमान

अति सनेह का उमड़ा सागर।
भाव दशा में रघुवर नागर।।

सेवा धारि सेव्य की मनहीं।
बानर जन्म लिये शिव तबहीं।।

हनु सविशेष जानि माता ने।
हनूमान नामा तनु ताने।।

राम काज लीन्हे अवतार।
सीता खोजि आय एहिं पार।।


रामकमल-पद भये भ्रमर।
सीताशीष बने अजरामर।।


भगत शिरोमणि हे हनुमान।
राम-भक्ति दो रहें अमान।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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