तृष्णा क्षय का सुख सर्वोत्तम

सनातन भारतीय परम्परा में त्याग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृध: कस्य स्विद् धनम्” की ईशोपनिषद की अमरवाणी युगों से यही सन्देश दे रही है।
यह त्याग भाव मानव प्राणी के ही मन में उल्लसित होता है, यह भी निर्विवाद है।इस त्याग की प्रथम और अन्तिम भित्ति सारी लोकालोक कामनाओं का ही त्याग माना गया है।कामनाओं के त्याग का अपर नाम तृष्णाओं का क्षय या विनाश है।
तृष्णा क्षय का सुख इह लोक और परलोक के लौकिक-स्वर्गिक सुख के सोलहवें भाग की भी बराबरी नहीं कर सकता।महाभारत में व्यासवाणी है-
यच्च कामसुखं लोके
यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्य एते
नार्हत:षोडशीं कलाम्।।

योगी भर्तृहरि अपने प्रसिद्ध नीतिशतक में ऐसी बातें का उल्लेख करते दीखते हैं-

प्राणघतान् निवृत्ति:(अहिंसा) ,परधनहरणे संयम:(अपरिग्रह),सत्यवाक्यम् (आत्मा में आगत बात का उद्घाटन तद्रूप उद्घाटन),काले शक्त्या प्रदानं( मुक्तहस्त दान),
युवतिजनकथामूकभाव:परेषां(कामिन-कांचन से परहेज),तृष्णास्रोतोविभंग:(ईश्वर प्राप्ति के अतिरिक्त कोई और कामना न होना),गुरुषु च विनय:( बडों का आदर),सर्वभूतानुकम्पा(सभी प्राणियों पर दया),सर्वशास्त्रेषु अनुपहतविधि:(सारे शास्त्रों का ज्ञान)श्रेयषामेष पन्थाः( ये सब परम श्रेयस् मार्ग है)।

इसी नीतिशतक में “तृष्णां छिन्धि”और आगे वैराग्य शतक में तो तृष्णा को पाप-परायण, हमेशा असन्तुष्ट रहने वाली कह कर धिक्कारते हैं-

तृष्णे! जृम्भसि पापकर्मपिशुने!
नाद्यापि सन्तुष्यसि।।02।।

इस प्रकार इस तृष्णा की भर्त्स्ना करने वाले भगवान् व्यासदेव हों या योगी भर्तृहरि सभी लोग इसके त्याग को मानवजीवन का निहितार्थ एक स्वर से स्वीकारते हैं।
स्वनामधन्य कबीर दास इसके त्याग के विना ” पुनि पुनि जननी -जठरे शयनम्” की शंङ्करोक्ति
का प्रबल उद्घोष करते दीखाई देते हैं-
माया मरी न मन मरा,
मर मर गए शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर।।

अस्तु, आज जब देश की आजादी का इकहत्तरवाँ वर्ष, मनाया जा रहा है ,हम पाश्चात्य संस्कृति और भाषा के प्रति अपना राग सँजोए सुखाभास में जी रहे हैं, यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि,” हम क्या से क्या हो गए “।
त्याग और तप की प्रतिमूर्ति हमारे ऋषियों का उद्घोष, जो “तैत्तिरीय उपनिषद्” को माध्यम बना कर अवतरित हुआ है ,की “दैवी वाक्” से इस चर्चा को किंचिद् विराम दिया जा रहा है-

उपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली में आनन्द की मीमांसा की गई है।जिसका आशय यह है, कि मानव से लेकर ब्रह्मा तक के सारे आनन्द “वेदज्ञ और कामनाओं से आहत न होने वाले” व्यक्ति को स्वत:प्राप्त हैं।
इस व्याख्यान में एक से बढ़कर एक बारह आनन्दाप्त व्यक्तियों की चर्चा क्रमशः इस प्रकार की गई है, जोकि कामनाओं से अनाहत मनुष्य के लिये तुच्छ है-

(1)धरती के अधिपति मानव का आनंद(2)मनुष्य गन्धर्व का आनंद(3)धेवगन्धर्व का आनंद(4)दिव्य पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(5)चिरस्थायी पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(6)आजानज देवलोकस्थ देवों का आनंद(7)कर्म देवों का आनंद(8)देवों का आनंद(9)इन्द्र का आनंद(10)बृहस्पति का आनंद(11)प्रजापति का आनंद(12)ब्रह्मा का आनंद।
इन क्रमश:उत्तरोत्तर वर्धमान आनन्दों की हेयता तुच्छता है ,अकामहत व्यक्ति के समक्ष।
अतः” जयदेवोक्ति”- “विगत-विषय-तृष्ण: कृष्णमाराधयामि”
ही श्रेयस्कर है।

।।हरिश्शरणम्।।

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आत्मज्ञान का मूल मनोनिग्रह

इस मानव शरीर में पांच शरीर हैं।मन वाला शरीर सबके मध्य में है।इस मनोमय शरीर के पहले-स्थूलाकृति स्थूल शरीर और सूक्ष्माकृति पंच प्राण शरीर ,ये दो शरीर हैं।मध्यस्थ मनोमय के पश्चाद्वर्ती भी दो शरीर हैं-विज्ञानात्म(जीवात्मा)और आनन्दात्म(परमात्मा)जोकि सूक्ष्मतम हैं।
इस प्रकार एक स्थूल+सूक्ष्म पूर्व में और बाद में सूक्ष्मतम+
सूक्ष्मतम शरीरों का मध्यवर्ती है , मन वाला शरीर, जोकि स्वयं में भी अपने पश्चाद्वर्तियों
की ही तरह सूक्ष्म है।
यही मनोमय सारी भ्रान्ति और समग्र शान्ति का भी कारक होता है। बिना मनोयोग के कोई भी लौकिकालौकिक प्राप्ति सम्भव नहीं है।
एक योगी की बात इसके बारे में इस प्रकार है-
“मन ही मांस पेशियों को नियंत्रित करता है।जैसै हथौड़े के आघात की शक्ति उस पर लगाये गये बल पर निर्भर करती है, वैसे ही मनुष्य की शारीरिक शक्ति की अभिव्यक्ति उसकी आक्रामक इच्छा शक्ति की तीव्रता और साहस पर निर्भर करती है।
मन ही अक्षरशः शरीर का निर्माण करता है और वही उसे जीवित भी रखता है।गत जन्मों(शरीरों)की प्रवृत्तियों की प्रबलता के अनुसार अच्छे या बुरे स्वभाव गुण धीरे-धीरे मानव-चेतना में उतरते हैं।
यही स्वभाव गुण आदतों में ढल जाते हैं और ये आदतें फिर एक वांछनीय या अवांछनीय शरीर के रूप में प्रदर्शित होती हैं।
वाह्य दुर्बलताओं की जड़ में मन होता है और आदतों से लाचार शरीर ,मन अवहेलना भी करता है।इस प्रकार यह कुचक्र चलता रहता है।
समझने की बात है कि, यदि मालिक, नौकर की आज्ञा का पालन करने लगे तो नौकर निरंकुश स्वेच्छाचारी बन जाता है।इसी प्रकार, मन भी शरीर की आज्ञाओं का पालन कर -कर के उसका दास बन जाता है।”
आत्मानुभूत एक सिद्ध योगी की ऐसी बातें, यह भी सिद्ध करती हैं योगीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने” मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:” क्यों कह दिया था।
अतः वायु के समान सुदुष्कर बांधने योग्य मन को उन्हीं भगवदैक-चरण-शरण होकर ही बड़ी सहजता सरलता से अन्यज्जन्म कारण होने और भटकने से बचाया जा सकता है।
सारे पूजा-पाठ,दान-धर्म- कर्म,यम-नियम, शास्त्राध्ययन
तीर्थाटन और उत्तमोत्तम व्रतों का अन्तिम फल मन को भगवत् चिंतन में एकाग्र करना ही है।यह बात उद्धवजी के लिये भगवान् ने श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में कही हैं।
आज उन्हीं लीलापुरुषोत्तम के प्राकट्योत्सव के अवसर पर,
तुभ्यमेव समर्पये की धारणा से, उनकी बात कहकर वाणी को विराम दिया जा रहा है-
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च,
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता:
परं हि योगो मनस:समाधि:।।
-श्रीमद्भागवत: एकादशस्कन्ध।

।।हरिश्शरणम्।।

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परमात्म -दृष्टि

भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म की दृष्टि में इस मानव शरीर को पञ्च कोशों वाला बताया गया है।आदि शङ्कर ने बड़े विस्तार से इसे समझाया है।स्थूल परिदृश्य अन्नशरीर में सूक्ष्म रूप से पंच प्राणात्मक शरीर की स्थिति है और इस प्राण शरीर में तृतीय स्थानीय मनोमय शरीर रहता है, जिसके बाद चतुर्थ स्थानी विज्ञानात्मा(जीवात्मा)और पंचम स्थानी आनन्दात्मा(परमात्मा)विद्यमान है।
पाँचों शरीरों में प्रायः प्राणियों की दृष्टि गत दृढता अन्नशरीर के स्थूल स्वरूप तक ही रह जाती है।लेकिन देवदुर्लभ मनुष्य शरीर में आकर हमें इसके आगे भी सूक्ष्म और सूक्ष्मतर मन-आत्मा-परमात्मा के बारे में भी सोचना चाहिए।यह स्थूल शरीर अहर्निश मृत्यु मुख की ओर अग्रसर है, किन्तु पूर्व शरीरों का प्रारब्ध भोग कहें या अनादि “वासना” हम द्वारस्थ मृत्यु से अचेत,अहमिदं बुद्धि कारणों से
अन्य शरीर की यात्रा पर चले जाते हैं।
अत:आचार्य ने विवेकचूडामणि में मानव जीव को सावधान रहने का निर्देश दिया है-

शवाकारं यावद्भजति
मनुजस्तावदशुचि:
परेभ्य:स्यात् क्लेशो
जननमरणव्याधिनिलय:।
यदात्मानं शुद्धं कलयति
शिवाकारमचलं
तदा तेभ्यो मुक्तो भवति
तदाह श्रुतिरपि।।397।।

अर्थात्-जब तक मनुष्य इस मृतक-तुल्य देह में वासनासक्त रहता है, तब तक तो वह अत्यन्त अपवित्र ही है।
उसे, पर(वस्तु-व्यक्ति-स्थान) से क्लेश और भय प्राप्त होता रहेगा। सुभाषित भी है-
सर्वं परवशं दु:खं
सर्वमात्मवशं सुखम्।
अतः इन कारणों से वह जन्म मरण-जरा-व्याधियों के दुश्चक्र में पड़ा ही रहता है।
लेकिन ज्योंही अपने (आत्म)को शिवाकार ,अचल और शुद्ध ,जान लेता है, उसी क्षण सारे बन्धनों, क्लेशों से मुक्त हो जाता है।
ऐसी स्थिति प्राप्त करने हेतु अनादि शरीर वासना से दूर होना पड़ेगा, जोकि वैराग्य की वैराग्य की चरमावस्था है।
चित्त में अहंशून्यता , बोध की चरमावस्था है तथा लीन हुई वृत्तियों की पुनरुत्पत्ति न होना “उपरामता” की चरम सीमा है।

वासनानुदयो भोग्ये
वैराग्यस्य परोवधि:।
अहंभावोदयाभावो
बोधस्य परमोवधि:।
लीनवृत्तेरनुत्पत्ति:
मर्यादोपरत:तु सा।।425।।

इसके पहले पद्यों में उन्होंने चित्त शान्ति के कारण आत्मानन्द की अनुभूति बताई है, जोकि “उपरति”का फल है।और यह उपरति वैराग्य से फलित बोध के कारण पाई जा सकती है-

वैराग्यस्य फलं बोधो
बोधस्योपरति: फलम्।
स्वानन्दानुभवात् शान्ति:
एषैवोपरते: फलम्।।420।।

अन्त में योगावतार लाहिड़ी महाशय के “क्रियायोग” की स्वात्मानुभूति दायिनी पीयूष वर्षिणी वाणी से इस प्रकरण का समाहार किया जा रहा है-

” यह याद रखो कि तुम किसी के नहीं हो और कोई तुम्हारा नहीं है। इस पर विचार करो कि किसी दिन तुम्हें इस संसार का सब कुछ छोड़कर चल देना होगा, इसलिए अभी से भगवान् को जान लो।
“ईश्वरानुभूति के गुब्बारे में प्रतिदिन उड़कर मृत्यु की भावी सूक्ष्म यात्रा के लिये अपने को तैयार करो।माया के प्रभाव में तुम अपने को हाड़-मांस की गठरी मान रहे हो, जो दु:खों का घर मात्र है।
“अनवरत ध्यान करो ताकि तुम जल्दी से जल्दी अपने को सर्वदु:ख-क्लेशमुक्त अनन्त परमतत्व के रूप में पहचान सको ।क्रियायोग की गुप्त कुंजी के उपयोग द्वारा देह-कारागार से मुक्त होकर परमतत्व में भाग निकलना सीखो।”

।।हरिश्शरणम्।।

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पञ्च कोश का संघात शरीर

विवेकचूडामणि में आचार्य शङ्कर ने भगवान् की माया से निर्मित संसार की चर्चा की है।इस माया से ही संसार के सभी द्वैतों की सृष्टि और विनष्टि प्रतीत होती है।वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तो समष्टि प्रकृति का ही तिरोभाव हो जाता है और एक अद्वैत परमात्मा अवभासित हो जाता है-
माया मात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थत:।इति ब्रूते श्रुति:साक्षात्सुषुप्तावपि
अनुभूयते।।406।।

इसके पूर्व आचार्य ने शरीर को पाँच कोशों- अन्न-प्राण-मन -विज्ञान और आनन्द के द्वारा निर्मित बताया है,जिनसे आवृत हुआ आत्मा अपनी ही शक्ति से उत्पन्न हुए शैवाल-समूह के द्वारा ढँके हुए बावली के जल की भाँति नहीं भासता-

कोशैरन्नमयाद्यै:पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति।
निजशक्तिसमुत्पन्नै:शैवाल-पटलैरिवाम्बु वापीस्थम्।।151।।

1-अन्नमयकोश-
देहेयमन्नभवनोन्नमयस्तु कोश:
चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीन:।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीष-राशि: नायं स्वयं भवितुमर्हति
नित्यशुद्ध:।।156।।

अन्न से उत्पन्न यह दृश्यमान शरीर ही अन्नमय कोश है।यह अन्न से ही जीवित रहता हुआ, उसके बिना, उसी में विलीन हो जाता है।त्वचा, चर्म,मांस, रक्त अस्थि और मलादि संघात वाले शरीर को नित्यशुद्धात्मा नहीं कहा जा सकता।अतः इसमें आत्मबुद्धि त्याग कर सर्वात्मा ब्रह्म(निर्विकल्प)में आत्मत्व जानकर शान्ति पाए-
अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे
त्वङ्मांसमेदोस्थिपुरीषराशौ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे
कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व।।163।।

2- प्राणामयकोश-
कर्मेन्द्रियैः पंचभिरञ्चितोयं
प्राणो भवेत्प्राणमयस्तु कोश:।
येनात्मवानन्नमयोन्नपूर्ण:
प्रवर्ततेसौ सकलक्रियासु।।167।।

चर्मचक्षुओं से दीखने वाले इस अन्नमय शरीर(कोश)में ,सभी जगह व्याप्त रहने वाला प्राणमय शरीर है। यह शरीर पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच प्राणों के संचय से विनिर्मित है।इन्हीं प्राण-अपान-समान-व्यान और उदान की अन्नशरीर में समवस्थिति समग्र शरीर को संचालित करती है। सारी क्रियाओं का जनक यही प्राणमय कोश ही है। इसके विना शरीर का जीवित रहना असंभव है।स्थूलान्नमय शरीर का संचालक होकर भी, यह आत्मा नहीं है,क्योंकि वायुविकार कैसे आत्मा होगा।

3-मनोमयकोश-

ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमय:स्यात्।कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतु:।
संज्ञादिभेदकलनाकलितो
बलीयांस्तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते य:।।169।।

यह अपने पूर्व-पूर्व के कोशों अन्न और प्राण को अभिव्याप्त करके अवस्थित है।पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ और स्वयं मन ही मनोमय कोश है।यह सभी के, मैं-मेरा आदि विकल्पों का हेतु है।यह सूक्ष्म रूप से सम्पूर्ण अन्त:वहि:विराजमान होकर नाना नामरूपात्मक जगत् का कारण है।
यही सारी अविद्या का मूल है।
सुषुप्ति कालमें” मैं सुखपूर्वक सोया” ऐसा जागने पर भान होता है।उस सुषुप्ति में मन का विलीनीकरण होने से कुछ भी भान नहीं रहता।अतः यही कोश या शरीर समस्त संसार का सृजन करता है।सारा संसार इसी की कल्पना मात्र है-
सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने
नैवास्ति किंचित्सकलप्रसिद्धे:।
अतो मन:कल्पित एव पुंस:
संसार एतस्य न वस्तुतोस्ति।।173।।
आचार्य ने इसे भयंकर व्याघ्र भी कह दिया, जो विषयरूपी वन में विचरता है।साधक साधु मुमुक्षु वहाँ निश्चय ही न जायें-
मनो नाम महाव्याघ्रो
विषयारण्यभूमिषु।
चरति अत्र न गच्छन्तु
साधव: ये मुमुक्षव:।।178।।

4-विज्ञानमय कोश

अन्न,प्राण और मनोमय शरीर में अत्यन्त सूक्ष्म भाव से सभी को व्याप्त करके रहनेवाला, विज्ञान मय शरीर(कोश)है।इस शरीर में ज्ञान इन्द्रियों के साथ ,वृत्ति युक्त बुद्धि ही कर्तृत्व भाव से विद्यमान रहती है।यह भी मनुष्य के जननादि बन्ध हेतु है-

बुद्धि: बुद्धीन्द्रियै: सार्धं
सवृत्ति: कर्तृलक्षण:।
विज्ञानमय कोश: स्यात्
पुंस: संसार-कारणम्।।186।।

चेतन की ही प्रतिबिंब शक्ति, एक दूसरे शरीर का आश्रय लेकर इन्द्रियादि का अनु-गमन करने वाली होने से विज्ञानमय कही गई है।
अनुव्रजत्चित् प्रतिविम्बशक्ति:
विज्ञानसंज्ञ: प्रकृतेर्विकार:।।187।।
इसी विज्ञानमय की ही जीवात्म-भाव होने से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि त्रिविध अवस्थायें होती हैं-
अस्यैव विज्ञानमयस्य जाग्रत्-
स्वप्नाद्यवस्था: सुखदु:खभोग:।।189।।
अनादिकालोयमहंस्वभाव:
जीव: समस्तव्यवहारवोढा।।188।।
विज्ञानकोशोयमतिप्रकाश:
यदात्मधी:संसरति भ्रमेण।।190।।
इस प्रकार यह विज्ञानमय ,बुद्धि द्वारा आत्मा का अत्यन्त निकट होने से (अनादिकालोयमहं स्व-भावो)अहंकार स्वभावत्वेन जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है।

4-आनन्द मयकोश-

यह आनन्द मय शरीर अपने पूर्व शरीर विज्ञान में अभिव्याप्त है।आचार्य कहते हैं-आनन्द स्वरूप आत्मा के प्रतिविम्ब से चुम्बित एवं तमोगुण से प्रकाशित वृत्ति आनन्द मय कोश है।यह प्रिय, मोद और प्रमोद इन तीन गुणों से युक्त तथा अपने अभीष्ट पदार्थ के पाने पर प्रकट होती है।पुण्य कर्मों के परिपाक से तदनुकूल सुखानुभूति काल में पुण्यशाली लोगों को इसका स्वयं भान होता है।इससे जीव निष्प्रयास अत्यंत आनन्दित होता है-
आनन्दप्रतीविम्बचुम्बिततनु:
वृत्तिस्तमोज्जृम्भिता
स्यादानन्दमय:प्रियादिगुणक:
स्वेष्टार्थलाभोदय:।
पुण्यस्यानुभवे विभाति
कृतिनामानन्दरूपप:स्वयं
भूत्वा नन्दति यत्र साधु
तनुभृन्मात्र:प्रयत्नं विना।।209।।

इसको स्वयंप्रकाश आत्मा, अन्नमयादि पाँचों कोशों में अद्वितीय, जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं का साक्षी,सत् स्वरूप समस्त शरीरों का आत्मा जानना चाहिए-

योयमात्मा स्वयंज्योति:
पञ्चकोशविलक्षण:।
अवस्थात्रयसाक्षीसन्
विकारो निरंजन:।
सत्स्वरुप:स विज्ञेयः
स्वत्मत्वेन विपश्चितता।।213।।

।।हरिश्शरणम्।।

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माया रचित जगत्

माया शब्द – मा=नहीं , या= जो ,इन्हीं दो वर्णों के योग से विनिर्मित है। इसका शाब्दिक अर्थ हुआ कि, जो नहीं है ,वह माया है।अर्थात् जो जैसी नहीं, किन्तु भ्रम वश वैसी दीखती है,वह ” माया ” है।मतलब कि जो क्षण-क्षण परिवर्तन शील है,वह अस्थिर होने से नामरूप से भी अस्थिर है, अतः एक समय में कुछ और पुनः दूसरे समय दूसरी होने से ही माया नाम से अभिहित की जा रही है।
विवेकचूडामणिकार ने इसे परम पुरुषोत्तम की अव्यक्त शक्ति कहा है। यह अनादि, अविद्या, परा और सत्व-रजस्
तमात्मक है। विवेकीजन इसके कार्यों से ही, इसका अनुमान कर लेते हैं।इसके तीनों गुणों के संघात से ही जगत् का निर्माण हुआ है –

अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति:
अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा।
कार्यानुमेया सुधियैव माया
यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते।।110।।

अग्रिम पद्य में इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह न तो सद् है, न असद् है, और न ही सदसद् अर्थात् उभयरूप।इसी तरह वह न भिन्न है न अभिन्न है और न ही भिन्नाभिन्न अर्थात् उभयरूप।इसी प्रकार वह न तो अंगों के सहित, न ही अंगों से रहित और न ही सांगानंग अर्थात् उभयात्मिका ही है।अन्तिम पंक्ति में निर्णय करते हुए कहते हैं कि, वह माया तो महा अद्भुत और वाणी से नहीं कहने योग्य है-

सन्नाप्यसन्नाप्युभमयात्मिका नो
भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो
सांगाप्यनंगाप्युभयात्मिका नो
महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा।।111।।

अन्त में कहते हैं कि शुद्ध अद्वय ब्रह्म के बोध से ही इसकी निवृत्ति होगी-जैसै कि अज्ञान वश रस्सी में होने वाला सर्प का भ्रम , ज्ञान की उत्पत्ति के बाद ही नष्ट होता है।सुखदुखमोहादि कार्य इसके प्रसिद्ध सद्रजस्तम
के कारण प्रतीत होते हैं-

शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या
सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा।
रजस्तम:सत्वमितिप्रसिद्धा
गुणास्तदीया:प्रथितै:स्वकार्यै:
।।112।।

शरीर के ही धर्म, ये बन्धन और मोक्ष ,माया से ही जनित हैं।वस्तुतः आत्मा में नहीं हैं।
जैसै कि क्रियाहीन”रज्जु” में सर्प की प्रतीति होना तन्निवृत्ति भ्रम मात्र है, वास्तविक नहीं-

मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ
न स्त:स्वात्मनि वस्तुत:।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां
सर्पाभास-विनिर्गमौ।।570।।

।। हरिश्शरणम् ।।

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सूक्ष्म शरीर-गुण एवं कारणशरीर

स्थूल शरीर का विवेचन करने के उपरान्त विवेकचूडामणि-कार ने सूक्ष्म शरीर और उसमें व्याप्त गुणों का वर्णन किया है।
(वाक्-पायू-पस्थ-हस्त-पाद) पाँच कर्मेन्द्रियों, (श्रोत्र-त्वक्-चक्षुषी-जिह्वा-नासिका) इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों ,(प्राणापान-समान-व्यानोदान)पञ्च प्राणों,(क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर) पञ्च महाभूतों, अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या, काम और कर्म का संघात सूक्ष्म शरीर कहा जाता है।

वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च
प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।।98।।
इसे सूक्ष्म या लिंगशरीर भी कहा गया है, जो वासनात्मक कर्मफलों को अनुभव कराने वाला है।अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से, यह आत्मा की अनादि उपाधि है-
इदं शरीरं शृणु सूक्षमसंज्ञितं
लिंगं त्वपंचीकृतभूतसंभवम्।
स-वासनं कर्मफलानुभावकं
स्वज्ञानतोनादिरुपाधिरात्मन:।।।99।।

स्वप्न इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था है।जिसमें यह स्वयं अवशिष्ट मात्र अवभासित होता है।इस स्वप्न में स्वयं प्रकाश परात्मा शुद्ध चेतन ही विभिन्न पदार्थों के रूप में दृश्यमान होता है।इसमें जाग्रत् कालिक नाना अवस्थाओं के कारण, बुद्धि, कर्ता-भोक्ता भावों को प्राप्त होकर स्वयं प्रतीत होती है।

स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था
स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र।
स्वप्ने तु बुद्धि:स्वयमेव जाग्रत्-
कालीननानाविधवासनाभि:।
कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते
यत्र स्वयं ज्योतिरयं परात्मा।।100।।

शरीर के अन्दर इन इन्द्रियों में चिद् के आभास से व्याप्त अन्त:करण अभिमान के रूप में स्थित रहता है।सत्वादि गुणों के योग से यही त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है-

अहङ्कार:स विज्ञेयः
कर्ताभोक्ताभिमान्ययम्।
सत्वादिगुणयोगेन
चावस्थात्रयमश्नुते।।105।।

बन्धन में पड़ा हुआ यह अहंकार
ही तीनों गुणों में आसंग से जनन-मरण क्रम धारण करता है।गुणों का स्वरूप इस प्रकार है-

रजोगुण में काम,क्रोध, लोभ, दम्भ,असूया(गुणों में भी दोषदृष्टि),अभिमान, ईर्ष्या और
मात्सर्य-ये सभी होते हैं।इससे प्रवृत्त”अहंभाव”संसार बन्ध का कारण है-

काम:क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया-
हंकारेर्ष्यामत्सराद्या: तु घोरा:।
धर्मा एते राजसा: पुम्प्रवृत्ति:
यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतु:।।114।।

जन्म-मरण का आदि कारण ,जो विक्षेप शक्ति(नाना विषयों में चित्त को फेंकने वाली)के प्रसार का कारण है, तमोगुण कहा गया है।इसके कारण ही वस्तु कुछ की कुछ दीखने लगती है और यही आवरण शक्ति(आत्मस्वरूप को ढँकने वाली) की भी मूल है।

एषा वृत्तर्नाम तमोगुणस्य
शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेन्यथा।
सैषा निदानं पुरुषस्य संसृते:
विक्षेपशक्ते:प्रसरस्य हेतु:।।115।।

इसमें अज्ञान, आलस्य,जडता, प्रमाद,मूढता, आदि रहते हैं।इससे युक्त मनुष्य कुछ नहीं समझता और निद्रालु या स्तम्भवत् जड बना रहता है-

अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा-
प्रमादमूढत्वमुखा: तमोगुणा:।
एतै:प्रयुक्तो न हि वेत्ति किंचित्
निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति।।118।।

इस प्रकार रजोगुण बद्ध शरीर का वर्णन करने के बाद आचार्य ने सत्वगुण के धर्म बताये हैं।
यह सत्वगुण जल के समान शुद्ध है, किन्तु रज-तम से मिलकर प्रवृति उत्पन्न करता है।
सत्वं विशुद्धं जलवत्तथापि
ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते
मिश्रस्य सत्वस्य भवन्ति धर्मा-
स्त्वमानिताद्या नियमा यमाद्या:।
श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षता च
दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्ति:।।119/120।।
इसके कारण अमानित्व ,यम-नियमादि, श्रद्धा, भक्ति,मुमुक्षता,दैवी सम्पत्ति और असत् के त्याग की स्थिति होती है।किन्तु इसमें रजस्तम का मिश्रण अवश्य रहता है।

इस प्रकार त्रिविध गुणों के संधात से निर्मित शरीर इन्द्रियादि विषयासक्त होकर ,अहंकार वश जन्मता मरता है।
ये सभी प्रकृति के भी गुण हैं, जिसे अव्यक्त की संज्ञा दी गई है।त्रिविध गुणों से युक्त प्रकृति ही आत्मा का “कारण शरीर”है।
इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था”सुषुप्ति’ है, जिसमें बुद्धि की सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं,बीज रूप से स्थिर रहती हैं-

अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं
तत्कारणं नाम शरीरमात्मन:।
सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था
प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्ति:।।122।।

।।हरिश्शरणम्।।

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स्थूल शरीर और इन्द्रियाँ

आचार्य शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मानव के स्थूल शरीर और इन्द्रियों का सम्यग् विवेचन किया है, जिसमें आत्म बुद्धि होकर ,वह भव-बन्ध में जकड़ा रहता है।
ऋषियों ने इस शरीर में आसक्त मानव जीव को सावधान करते हुए कहा-
सर्वोपि वाह्यसंसार:
पुरूषस्य यदाश्रय:।
विद्धि देहमिदं स्थूलं
गृहवद् गृहमेधिन:।।92।।
जिसके आश्रयण से जीवात्मा को समस्त वाह्य जगत् की प्रतीति होती है, वही उस गृहस्थ के घर की तरह, उसकी स्थूल देह है।इसी स्थूल देह के ही जन्म, जरा ,मरण,स्थूलता आदि विक्रियायें हैं।शिशु आदि अवस्थायें हैं ,वर्णाश्रमादि अनेक यम और नियम हैं।इसी की पूजा
मानापमान आदि विषेताएं हैं-
स्थूलस्य सम्भवजरा-
मरणानि धर्मा:।स्थौल्यादयो
बहुविधा:शिशुताद्यवस्था:।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधा
यमा: स्यु: ।पूजावमानबहु-
मानमुखा: विशेषा: ।।93।।
त्वचा, मांस, रूधिर, स्नायु, मेद,मज्जा और अस्थियों के समूह इस शरीर में मलमूत्रादि भरे रहते हैं, जिससे यह शरीर, निन्द्य कहा जाता है-
त्वङ्मांसरूधिरस्नायु-
मेदोमज्जास्थिसंकुलम्।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां
स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः।।89।।
इसी शरीर में पांच ज्ञान इन्द्रियाँ- श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा तथा पांच कर्म इन्द्रियाँ-वाक् ,पाणि,पाद,गुदा और उपस्थ ये सभी होती हैं।इन्हीं से विषयों का ज्ञान होता है।
बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्
वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थ:
कर्मेन्द्रियाणि प्रणवेन कर्मसु।।94।।
इसी में प्राण वृत्ति अपने अन्य विकारों-अपान ,व्यान ,उदान और समान के साथ सूक्ष्म रूप से रहती है, जिससे शरीर का संचालन सम्यग् रूप से होता है।
और भी सूक्ष्यमेन्द्रियाँ वृत्ति रूप में इसी स्थूल शरीर में रहती हैं, जिन्हें अन्तरिन्द्रिय या अन्त:करणचतुष्टय कहा गया है-ये हैं -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।संकल्प-विकल्प के कारण मन, पदार्थ का निर्णय/निश्चय करने के कारण बुद्धि ,अहम्-अहम् ऐसा इस शरीर को ही मान लेने से अहंकार तथा अपने इष्ट अभीष्ट अभिलाष चिन्तन के कारण चित्त कहा जाता है-
निगद्यतेन्त:करणं मनोधी:अहंकृति:चित्तमिति स्ववृत्तिभि:।मन:तु संकल्प-विकल्पनादिभि:बुद्धि:पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मत:।।95।।
अत्राभिमानाद् अहमित्यहं-
कृति:,स्वार्थानुसन्धान-
गुणेन चित्तम् ।।96।।
ऐसे देहेन्द्रिय,विषयों में आसक्त, स्वस्वभावानुसार एक से एक बँधे हुए जीवादि-हरिण,हाथी, पतंग, मछली औरभ्रमरादि सभी प्रतिपल मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं।तब शब्द, स्पर्श, रूप,रस,गन्ध पाँच विषयों में जकड़ा हुआ मनुष्य कैसे बच सकता है-
शब्दादिभि:पञ्च भिरेव पञ्च
पञ्चत्वमापु: स्वगुणेन बद्धा:।
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन-
भृङ्गा नर:पञ्च भिरञ्चित: किम् ।।78 ।।
।।हरिश्शरणम्।।

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मोक्ष(निर्वाण) हेतु विचार

आदि शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मोक्ष के साधनों पर गहन विमर्श किया है। ब्रह्म का सत्यत्व और जगत् का मिथ्यात्व नित्यानित्य वस्तु विवेक कहा गया है और यही प्रथम हेतु है-
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
इति एवं रूपो विनिश्चय:
सोयं नित्यानित्यवस्तुविवेक:
समुदाहृत:।।20।।

इसके बाद “वैराग्य”की उत्पत्ति होती है।दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियों द्वारा देह से लेकर ब्रह्म लोक पर्यन्त अनित्य भोग्य पदार्थों में घृणा बुद्धि होना ही”वैराग्य”है-

तद् वैराग्यं जगुप्सा या
दर्शनश्रवणादिभि:।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते हि
अनित्ये भोगवस्तुनि।।21।

तदनन्तर शम,दम ,उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान पूर्वक आसक्ति युक्त कर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिए।

शम-बारम्बार विषयों में दोषदृष्टि करने से, विषय समूह से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य में स्थिर होना’शम’है।
विरज्य विषयव्रताद्
दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः
स्वलक्ष्ये नियतावस्था
मनस: शम उच्यते।।22।।

इसी तरह पाँचों कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को उनके-उनके विषयों से अलग करके अपने-अपने गोलकों में स्थित करना “दम” कहा गया।और वृत्ति का वाह्य विषयों का आश्रयण न करना ” उपरति “है ।

विषयेभ्य: परावर्त्य
स्थापनं स्व-स्व-गोलके
उभयेषामिन्द्रियाणां स
दम: परिकीर्तित: ।
वाह्यालम्बनं वृत्ते:
एषा उपरति:उत्तमा ।।23/24।।

आगे के क्रम में तितिक्षा है,जिसमें चिन्ता-शोक से रहित होकर विना किसी प्रतीकार के समस्त कष्टों को सहना पड़ता है-
सहनं सर्वदुःखानाम्
अप्रतीकारपूर्वकम्।
चिन्ता-विलापरहितं सा
तितिक्षा निगद्यते।।25।।

गुरवाक्यों और शास्त्र में सत्यत्व बुद्धि रखना, इसी को सज्जनों ने ” श्रद्धा ” कहा है।

शास्त्रस्य गुरूवाक्यस्य
सत्यबुद्ध्यावधारणम्।
सा श्रद्धा कथिता सद्भि:
यया वस्तूपलभ्यते।।26।।
सर्वदा स्थापनं बुद्धे:
शुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा।
तत्ममाधानमित्युक्तं
न तु चित्तस्य लालनम्।।27।।

इस तरह अपनी बुद्धि में सभी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में ही सदा स्थिरावस्थ होना,” समाधान” है।

उपर्युक्त शमदमोपरतितितिक्षा-श्रद्धासमाधान को वेदान्त शास्त्र के विद्वानों ने “षट्कसम्-पत्ति “कहा है।
ऐसे साधनों का अवम्बनकर्ता वास्तव में मुमुक्षु और निर्वाण सुख का अधिकारी है-

तत: श्रुति: तन्मननं सतत्वध्यानं चिरं नित्य-
निरन्तरं मुने: ।
ततोविकल्पं परमेत्य
विद्वान् इहैव निर्वाण-
सुखं समृच्छति।।72।।

।।हरिश्शरणम्।।

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अहंकार

आदि शङ्कर-पाद ने “विवेकचूडामणि”में अहंकार का स्वरूपानुसन्धान किया है।अजन्मा, नित्य, शुद्ध, बुद्ध,चैतन्यात्मा, जो कि परमात्मा अंशी का अंश मात्र है, सदा कूटस्थ, अविचल, आकाश शरीरस्वरुप से अभिन्न ही है।
वे कहते हैं कि वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणों सहित पञ्च प्राण, आकाशादि पञ्च महाभूत, बुद्धि आदि अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या-काम और कर्म ये ही मिलकर”पुर्यष्टक” अथवा सूक्ष्म शरीर कहे जाते हैं।
वागादि पञ्च श्रवणादिपञ्च
प्राणादिपञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।
यह सूक्ष्म या लिंगशरीर अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ है।यही वासनात्मक होकर कर्मफलों का अनुभोक्ता और अनुभावक है।
शरीर के अन्दर चक्षु आदि इन्द्रिय के गोलकों में चिदाभास के तेजसे व्याप्त हुआ अन्त:करण ही “मैं पन ” का आभास करता हुआ स्थित रहता है।
अन्त:करणमेतेषु
चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यभिमानेन
तिष्ठत्याभासतेजसा।।105।।
इसी को अहंकार जाने।यही कर्ता, भोक्ता तथा मैं पन का अभिमान कराने वाला है और सत्वादि गुणों से त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है।
अन्तिम बात इसके लिये आचार्य ने कहा-
विषयाणामानुकूल्ये
सुखी दु:खी विपर्यये ।
सुखं दु:खं च तद्धर्म:
सदानन्दस्य नात्मन।।1०7।।
यही अहंकार विषयों की अनुकूलता-प्रतिकूलता में सुखी-दु:खी होता रहता है।सुख और दुख इसी अहंकार के धर्म हैं।नित्यानन्द स्वरूप आत्मा के कदापि नहीं।
।।हरिश्शरणम्।।
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दुर्लभ-त्रय

भगवत्पाद आदि शङ्कराचार्य ने तीन चीजें को अत्यन्त दुर्लभ कहा है। “विवेकचूडामणि”नामक ग्रन्थ में उन्होंने उक्ति है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद्
देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।3।।

अर्थात् इस संसार में तीन दुर्लभ तत्व हैं-पहला मनुष्य योनि में जन्म, दूसरा संसार बन्ध से मुक्ति की कामना और तीसरा सत्पुरुषों का आश्रयण।
इन तीनों की प्राप्ति भी तभी सम्भव होती है, जब देवता गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो।
आगे आचार्य पुनः इसी की पुष्टि करते हैं-
लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म
दुर्लभं
तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्।
य:स्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधी:
स हि आत्महा स्वं विनिहन्ति
असद्ग्रहात्।।4।।

किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी,जिसमें वेदादि सिद्धान्तों का ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढबुद्धि अपने आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह असद् में आस्था रखने के कारण स्वयं को नष्ट करता है।
यह मुक्ति कामना और सम्यक् तत्वावबोध,आत्मानात्म का विवेक, जो समस्त प्रतीतियों का चरम साक्षी “आत्मा” है, उसका अनुभव तथा आत्मा के विषय होने वाले “अनात्मा”का ज्ञान,देवगुरु कृपया ही प्राप्त होता है।वे कहते हैं-
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान्
संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृह:सन्।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं
तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा।।3।।

इसीलिये मुमुक्षु विद्वान् वाह्य भोगीवृत्ति त्याग कर सन्त शिरोमणि गुरु-देव के शरणागत होकर, उनके उपदेश किये हुए विषयों में समाहित चित्त से मुक्ति हेतु प्रयत्न करे।

।।हरिश्शरणम्।।

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