प्राण शक्ति समुच्चय से मुक्ति

गीता शास्त्र का आरम्भिक छ: अध्याय कर्मयोग के नाम से विख्यात है। इसके चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने अपने अवतरित होने के रहस्य का वर्णन किया है।व्याख्या करनेवाले लोगों ने इस अध्याय को ज्ञान-कर्म-सन्यास-योग कहा है।
भगवान् कहते हैं कि मैंने इस अविनाशी योग को अपने पूर्व अवतार में,सूर्य के लिये प्रदान किया था।सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को और मनु ने सूर्य वंश के प्रवर्तक अयोध्या नरेश इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परम्परा प्राप्त यह योग राजर्षियों ने जाना, किन्तु काल क्रम से पृथ्वी पर यह लुप्तप्राय हो गया-
इमं विवस्वते योगं
प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह
मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं
राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता
योगो नष्ट:परन्तप।।4/1,2।।
पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र में कहा-तप:स्वाध्याय ईश्वरप्रणि-
धानानि क्रियायोग:।मतलब कि शारीरक तप ,मनोनिग्रह तथा ओम् का ध्यान सम्मिलित रूप में क्रियात्मक योग है(तस्य वाचक: प्रणव:)।
आचार्य ने आगे यह भी कहा कि ध्यान योग के क्रमिक उच्चतर अवस्था में योगी प्राण गति के श्वास-प्रश्वास में विच्छेद करके मुक्ति पा सकता है-
तस्मिन् सति श्वास-प्रश्वासयो:
गतिच्छेद: प्राणायाम:
योगसूत्र-2:9
योगी जनों ने ध्यान में अपनी प्राणशक्ति को षट्चक्रों में ऊर्ध्व-अध: प्रवाहित करते हुए
आधे मिनट के काल में ही , स्वाभाविक रूप से एक वर्ष की आध्यात्मिक उन्नति पाई है।
भगवान् ने गीता के चौथे अध्याय में कहा-
अपाने जुह्वति प्राणं
प्राणेपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुध्वा
प्राणायामपरायणाः।
अपरे नियताहाराः
प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।।29।।
अपान वायु में प्राण वायु के हवन द्वारा और प्राण वायु में अपानवायु के हवन द्वारा योगी प्राण और अपान दोनों की गति को रोक कर प्राणों पर नियंत्रण पा लेता है।
आगे पाँचवें अध्याय में श्लोक27एवं 28में इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि वह ध्यान परायण योगी मुनिवत्
मुक्ति के चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में स्थित करके नासिका तथा फेफड़ों में विचरने वाले प्राण और अपान को सम करते हुए वाह्यविषय भोगों से अपने ध्यान को हटाने में तथा इच्छा, भय,क्रोध को निकाल बाहर करने में समर्थ हो जाते हैं।ऐसे लोग सर्वदा बन्धनरहित हैं।
वाग्वैखरी -शब्दझरी …भुक्तये न तु मुक्तये- इत्यादि वचनों से आचार्य शंङ्कर ने सिद्ध किया है कि वाह्यकर्मकाण्ड अज्ञान का विनाश नहीं कर सकता।अपने
“अपरोक्षानुभूति” में वे कहते हैं एकमात्र अनुभूत ज्ञान ही अज्ञान को नष्ट करेगा।
इस प्रकार योग मार्गी अपने प्राणों की गति पर नियमन करके शब्द,स्पर्श, रूप,रस और गन्ध के पाँच वाह्यप्रवाहों को अन्त:प्रवाही बना कर इन्द्रियों से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, जिससे इच्छानुकूल दिव्यपराचेतना से अपने मन को जोड़ लेता है।
ऐसी आत्मस्थ जीवन की श्रेष्ठ पद्धति योगी को अपने अहं की कारा से निकाल कर समष्टि और सर्व व्यापकता की गहनता में प्रविष्ट करा देती है और मुक्ति के समुन्नत विशालकाय प्रासाद में प्रवेश मिलता है।
यही मुक्ति की चरमावस्था है।
भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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कर्मयोग से बन्धमुक्ति

श्रीमद्भगवद्गीता का ,आरंभ से लेकर छ:अध्याय तक का तत्व विवेचन “कर्मयोग” के नाम से व्याख्यायित है।
इममें भगवान् ने कर्मयोग की सम्यक् मीमांसा की है।दूसरे अध्याय के चालीसवें मन्त्र में इस कर्मयोग की विशेषता बताई गई है।

वे कहते हैं कि इस कर्मयोग में आरम्भ अर्थात् बीज का नाश नहीं होता-नेहाभिक्रमनाशोस्ति

अभिक्रम शब्द का अर्थ है -आरम्भ।आरम्भ के नाश न होने से तात्पर्य है, बीजारोपण किये गए कर्मों से।
कर्मयोग से तात्पर्य है निर्लिप्त भाव से ,फलाकांक्ष न होकर कर्मों का सम्पादन करना।कठिन तो बहुत है कि कर्म करें, और फल कामना ,न करें।किन्तु अभ्यास से ऐसा सम्भव है ,तब जब कि, हम निश्चित कर लें कि “मा फलेषु कदाचन” का अर्थ ही फलकामना से विरत करने वाला है।

अतः सुनिश्चित है कि हम आसानी से इस बात पर दृढ हो जायें कि, फल हमारे हाथ में नहीं, वह तो प्रारब्ध एवं ईश्वर के आधीन है। जब फलप्राप्ति में स्वाधीनता नहीं है, तब फलों की चाहत में पड़े रहकर, द्वन्द्वों और राग-द्वेष के कारण अन्य जन्मों /शरीरों को क्यों निमन्त्रित करें।

इस प्रकार भगवान ने कहा कि कर्मयोग(निष्काम कर्मयोग)के मार्ग पर एक बार चल पड़ने पर, आरम्भ का नाश नहीं होगा अर्थात् वह व्यर्थ नहीं जायेगा, बल्कि अगले जन्म में (प्रारब्ध शेष रहने पर )पुनः इस कर्मयोग की यात्रा आरम्भ हो जायेगी, जहाँ से यह टूटी थी।

इसके अलावा, कर्मयोग के क्षेत्र में-प्रत्यवायो न विद्यते-मतलब कि प्रयासों का उल्टा फल भी नहीं होगा, क्योंकि उल्टा -पुल्टा फल तो तब होगा, जब वह फलाकांक्ष कर्म करेगा।
स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य,
त्रायते महतो भयात्।।2/40।।

दूसरी और तीसरी अर्धाली में भगवान् इस कर्मयोग के आचरण से स्वत:प्राप्तव्य फल का निर्देश करते हुए कहते हैं कि, इस योग की साधना का अल्प प्रयास ही महान् ” भय ” से रक्षा करेगा।
इसके पहले उन्तालीसवें मन्त्र में कह आए हैं कि, ” बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ, कर्मबन्धं प्रहास्यसि ”
अर्थात् इस कर्मयोग पर चल कर तुम कर्मबन्धन को काट डालोगे।मतलब कि जन्मबन्ध से विनिर्मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार गीता गीत यह कर्मयोग का मार्ग ,जन्म-मृत्यु रूपी महान् भय से छुटकारा दिला देगा,मोक्ष प्राप्त होगा अथवा जीवात्मा को परमात्मा से मिला देगा।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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नाम जप से भव बन्ध-मुक्ति

ईश्वर के स्त्री रूप अथवा पुरुष रुप में से किसी रूप का ध्यान और उनके नाम का स्मरण कलि काल में ,मुक्ति का साधन कहा गया है। निर्विवाद रूप से प्रमाणित है कि इस कलियुग में नर शरीर धारण का लक्ष्य ही भवबन्धन से मुक्ति है।इसके इतर धर्मार्थकाम की उपलब्धि पूर्वतः प्राप्त होने पर भी क्या विचित्रता है कि, मनुष्य मानव जीवन के चरम प्राप्तव्य मोक्ष को भूलकर कामादि के लिये ही सतत प्रयास रत रहता है।
बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़ी चतुराई से इस पर अपने विचार दिये हैं।देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र में शङ्कराचार्य ने कहा-
मुझे मोक्ष की आकांक्षा नहीं और न ही लोकवैभव अपेक्षित है।और किसी ज्ञान विज्ञान की आवश्यकता नहीं है, जिससे लेशमात्र सुख की कामना की जाये। अपेक्षित एकमात्र यही है कि, मेरा जन्म जब भी हो तो मृडानी -रुद्राणी -शिव-शिव भवानी नाम-जप होता रहे।
इस प्रकार की कामना में शुद्ध रूप से नामजप के फलस्वरूप पुनः जन्म को निवारित करने का भाव ही व्यक्त होता है।
बाबा तुलसी के शब्दों में तो इस भवबन्ध से मुक्ति का उपाय मात्र भगवन्नाम स्मरण ही है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।
एक जगह कहते हैं-
नहिं कलि करम न भगति विवेकू।
राम नाम अवलम्बन एकू।।
अर्थात् कलिकाल में किसी अन्य धर्म-व्रत-कर्म की आवश्यकता नहीं है, मात्र नाम का आश्रय लेकर मुक्ति मिल सकती है।
भगवान् शिव ,पार्वती के साथ निरन्तर राम नाम जपते हैं।कृष्णं, जो मंगलकारी और अमंगलकारी है-
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहिं जपत पुरारी।।

कहाँ तक कहें, जिस नाम जप के कारण भगवान् गणेश को आदि पूज्यता प्राप्त हो गई-
महिमा जासु जानि गनराउ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

एक बात सर्वविदित है कि, नाम और नामी में अभेद होता है।
ज्योंही नामस्मरण होता ,त्यों ही नामी के रूप,लीला, गुण,धाम की स्मृति उपस्थित हो जाती है और नामजापक अलौकिक रसमाधुरी में खोकर आत्म विस्मृति को प्राप्त हो जाता है।
यहाँ तक कि भगवत् स्मरण में निरत भक्त के कामक्रोधादि विनष्ट हो जाते हैं, और ऐसा व्यक्ति सभी में अपने प्रभु का दर्शन करने के कारण प्राणी मात्र से वैर-विरोध भूल जाता है-
उमा जे रामचरनरत,
विगत काममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत,
केहिं सन करहिं विरोध।।

नाम जापक व्यक्ति की ,निरन्तर नामजप निरति के कारण,”सर्वं
खलु इदं ब्रह्म ” कीअवधारणा स्थिर होती जाती है।और लगता है भगवान् ने गीता में इसीलिए अनन्यभाव से स्मरण करनेवाले साधु को वचन भी दे डाला है कि, उसके अप्राप्त की प्राप्ति(योग)और प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा (क्षेम) की गारंटी मैं लेता हूँ-

अनन्या: चिन्तयन्तो मां,
ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अन्त में आदिकवि वाल्मीकि को सन्दर्भित कर गोस्वामी जी ने तो यहाँ तक कह डाला कि उलटा ही नाम का जप करके ,वे महाकवि ब्रह्मवत् पूजनीय हो गये-
उलटा नाम जपत जग जाना।
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।

तब इस कलिकाल में क्या कहें, नाम जप ही मुक्ति का उत्तम साधन सिद्ध होता है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा।।

इत्यादि पुराणवचनों से इस नाम संकीर्तन प्रकरण को भगवदर्पण
किया जा रहा है। भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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मोक्ष साधन हेतु मानव शरीर की स्वतंत्रता

मनुष्य शरीर के लिये धर्म, अर्थ, काम (भोग)और मोक्ष इन चारों को चार पुरुषार्थ माना गया है।ये चार अर्थ यानी कि चार प्रयोजनों के लिए मानव शरीर की प्राप्ति ,भगवत् कृपा और स्वयं के प्रारब्ध से हुई मानी गई है।
परन्तु यदि इन प्रयोजनों की गहराई में जायें, तो ऐसा लगता है कि प्रारंभ के तीन प्रयोजनों हेतु, मानव परतन्त्र है, जबकि अन्तिम और चरम प्रयोजन हेतु स्वतंत्र।
एक श्लोक पञ्चतन्त्र में आता है, जिसमें शिशु के गर्भस्थ होते ही पाँच चीजों को स्थिर या निश्चित कर दिया जाता है-

आयु:कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते
गर्भस्थस्यैव देहिनः।।

अर्थात् शरीरोत्पत्ति के पूर्व गर्भ में ही पाँच चीजें निश्चित हो जाती हैं-1-आयु,2-कर्म(पेशा)
3-वित्त (चलाचल संपत्ति),4-विद्या(अध्ययन)और 5-निधन।
इस प्रकार उक्त पद्य के आलोक में विचार करें तो चार पुरुषार्थों में ,आचारादि धर्मों का पालन,अर्थादि संपत्ति की प्राप्ति और इसके अनुसार कामोपभोग का निश्चयीकरण यदि पूर्व शरीर द्वारा गर्भ में ही तय हो जाते हैं, तब इनकी प्राप्ति में पूर्वत:परतंत्रता ही मानी जायेगी।
किन्तु मानवीय शरीर मुक्ति(मोक्ष) प्राप्ति में स्वतन्त्र प्रतीत होता है।उत्तर काण्ड में मानसकार ने भगवान् श्री राम के मुख से कहलवाया है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
सो परत्र दुख पावै
सिर धुनि धुनि पछताइ।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं
मिथ्या दोष लगाइ।।
एहि तन कर फल विषय न भाई
स्वर्ग-उ स्वल्प अंत दुखदाई।।

जो न तरै भवसागर।
नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति।
आत्माहन गति जाइ।।

बाबा तुलसीदास की उक्त पंक्तियों से साफ हो जाता है कि नर तन से ही चरमपुरुषार्थ मोक्ष साध्य है।और इसी अन्तिम पुरुषार्थ में पुरूष की अपनी स्वतंत्रता है कि वह जन्मादि बन्धनमुक्त होना चाहता है अथवा नहीं।

इस बात को गीताशास्त्र में भगवान भी बताते हैं, जब उन्होंने कहा-

कर्मणि एव अधिकार:ते

अर्थात् कर्मणि, इस एकवचन के प्रयोग से प्रतीत होता है कि एक मात्र कर्म, मुक्ति कर्म में ही मानव शरीर की स्वतंत्रता है।

दूसरे क्षण अगली पंक्ति है-

मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् अन्य प्राप्तव्य परिणामों(फलों) की प्राप्ति पूर्व शरीर से सुनश्चित होने से उनके लिए परतंत्रता है।

अतः उक्त पर्यालोचन से यह बात उभर कर सामने आई कि मानव शरीर को अर्थ भोगादि ,शरीर संसारादि के लिए नियोजित नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तो पूर्व कर्मों से, मिलना ही है।
इस शरीर का चरम फल तो मोक्ष है।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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मानव शरीर -प्राप्ति

मानव शरीर की उपलब्धि कैसै और किन कारणों से हुई, यह विचारणीय विषय है ।
सर्वप्रथम कैसे पर विचार करें तो मानसकार गोस्वामी तुलसीदास जी के उत्तर काण्ड में दृष्टिपात करने पर दो अलग अलग पंक्तियां आती हैं-
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा।।

कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईश बिनु हेतु सनेही।।

भाग्य कर्मों के कारण देव दुर्लभ मानव देह मिला है। भाग्य को प्रारब्ध भी कहते हैं। यह प्रारब्ध कर्म , पूर्व शरीर से किया गया कर्म होता है।इसी को अदृष्ट या दूसरे शब्दों में ” दैव ” भी कहा गया है। इस प्रकार मानव शरीर का यह एक कारण हुआ।

दूसरी पंक्ति के अनुसार अकारण करुणावरुणालय भगवान् स्वयं ,अंशी होने के नाते अंश भूत जीव को स्नेहपूर्वक, बिना हेतु मानव शरीर दे देते हैं।

इस प्रकार मानसकार की उक्त पंक्तियों में विरोध सा दीखता है।
एक जगह , मानव शरीर का कारण प्रारब्ध है तो दूसरी जगह ईश्वर।परन्तु ऐसा है,नहीं।इन बातों विरोध नहीं, बल्कि विरोधाभास मात्र है।
क्योंकि विरोध एवं विरोधाभास दोनों पृथक्-पृथक् अर्थ वाले हैं।
इस सन्दर्भ में आचार्य शंङ्कर ने विवेकचूडामणि के प्रारंभ में ही एक बात कही है, जिसका उल्लेख आवश्यक हो जाता है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।

अर्थात् इस जगत् में तीन चीजें दुर्लभ हैं ,और उनका कारण देव का अनुग्रह(कृपा)मात्र है।वे हैं- मानव शरीर, मोक्षेच्छा और सत्संग ।
इन शांकरी पंक्तियों से भी मनुष्य देह प्राप्ति में ईश्वर का अनुग्रह ही कारणरुप में परिलक्षित होता है।

इस समग्र विरोधाभास का शमन ,गीताशास्त्र की ईश्वरीय वैखरी वाणी से होता है, जब अठारहवें अध्याय में यह बात आई है-

पञ्चैतानि महाबाहो
कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि
सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।18/13।।

मतलब कि सांख्य शास्त्र में कर्मों का अन्त करने के लिए, सभी कर्मों की सिद्धि(पूर्णता)
हेतु पाँच कारण समूहालम्बीकृत रूप से जानना चाहिए।वे क्या हैं-

अधिष्ठानं तथा कर्ता
करणं च पृथग् विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा:
दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।18/14।।

अधिष्ठान(ईश्वर)एक
कर्ता(स्वयं व्यक्ति)दो
करण(भिन्न उपकरण इन्द्रियादि)तीन
चेष्टाएँ(गमन अंगसंचालनादि)चार
तथा
दैव(प्रारब्ध कर्म) पाँच
इस प्रकार भगवान् ने कर्म की सिद्धि(पूर्णता)में सर्वप्रथम ईश्वर और सबसे अन्त में पाँचवें कारण दैव (भाग्य)को रखा है।
गीतोक्त वाणी के आलोक में मनुष्य शरीर की प्राप्ति के कारणों की मीमांसा करें तो महात्मा तुलसी दास द्वारा परिगणित कारणद्वय में कोई विरोध नहीं दिखाई देता।
विरोध का आभास या प्रतीति होना विरोधाभास है यानी कि विरोध जैसा दीखना, जबकि विरोध कथंचित् नहीं नहीं होता है।
वस्तुत: ईश्वर और भाग्य दोनों ही मानवीय शरीर के कारक सिद्ध होते हैं, क्योंकि मुक्ति की बात इसी शरीर से सोची जा सकती है।
अतः चाहे मानसकार हों ,आचार्य शङ्कर हों अथवा
” गीता माँ ” सभी के कथनों में
मानवीय शरीर मिलने के कारणों में कोई विरोध नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

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ज्योतिष एवं मनुष्य

वेद हमारे ऋषियों की तप:प्राप्त चेतना के ब्रह्माण्डीय ज्ञान के आधार हैं। वैदिक ऋषियों को वेदमंत्रों का द्रष्टा कहा गया है, स्रष्टा नहीं-ऋषियो मन्त्रद्रष्टार:
इन वेदों ने मानव सभ्यता का संवाहक बन भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक सभ्यता को ज्ञान के आलोक से ऐसा मार्ग दिखाया है, जिससे मानव मात्र के समग्र कल्याण का पथ प्रशस्त किया।
वेदों के साथ उनके छ:अंगों का भी बड़ा महत्व है।शास्त्रज्ञ जनों के अनुसार- छन्द:शास्त्र, कल्पशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, निरुक्त, शिक्षाऔर व्याकरण, इन्हीं को क्रमशः वेद के पैर, हाथ, नेत्र, कान ,नासिका तथा मुख कहा गया है।
इस प्रकार देखें तो वेद अर्थात् वेदार्थ जानने के लिये उक्त अंगों का ज्ञान आवश्यक है।
इसके छ:अंगों में से एक अंग ज्योतिष शास्त्र है।इसके द्वारा हम समग्र ब्रह्माण्ड पर पड़ने वाले सूर्यादि ग्रहों और नक्षत्रों के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।
इस शास्त्र के दो पक्षों में से गणितपक्ष सम्पूर्ण जगत् की काल गणना का मौलिक आधार है।पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों पर होनेवाले प्रभावों को इसी के द्वारा आनुमानिक दृष्टि से जाना जाता है।
दूसरे शब्दों में प्रकृति या सृष्टि के सभी अंग-प्रत्यंग परस्पर जुड़े होने से एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।परस्पर आदान-प्रदान ही ब्रह्मांड की संतुलित लयबद्धता का मूलाधार है।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की समस्त क्रिया-प्रक्रिया भी जानी जाती है।हमारी अवधारणा में किसी ग्रहादि में कृपा-कोप का कोई भाव नहीं होता,वे केवल धनात्मक-ऋणात्मक किरणें उत्सर्जित करते हैं।
मानव जाति को ये कोई लाभालाभ नहीं पहुँचाते, बल्कि उसके द्वारा अतीत में किये गये कार्य-कारण का सन्तुलन स्थापित करने के लिए वाह्य स्तर पर एक कार्यप्रणाली का विधिवत् माध्यम प्रस्तुत करते हैं।
जातक ऐसे दिन और समय में पैदा होता है, जब ग्रहनक्षत्रों की किरणें उसके पूर्व शरीर के कर्मों के साथ सम्पूर्ण तालमेल बैठाती हैं।उसकी जन्मकुण्डली उसके अतीत के कारणों के द्वारा संभावित अपरिवर्तनीय परिणामों को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण आलेख होता है।किन्तु जन्मकुण्डली का सही प्रतिफलन केवल अन्त:प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति ही प्रस्तुत कर सकते हैं।और ऐसे लोग नगण्य हैं।
जन्म के क्षण में अन्तरिक्ष में स्पष्ट हो जाने वाले आदेश/प्रत्यादेशों का लक्ष्य, गत कर्मों(प्रारब्ध)के फलों को अति महत्व नहीं देना है।वरन् विश्व नियमोंके इन बन्धनों से मुक्ति हेतु मनुष्य की इच्छा शक्ति को को जगाना है।
ज्योतिष शास्त्र के प्रति अन्धश्रद्धा व्यक्ति को यन्त्र की तरह बना देती है जो अपने हर कार्य के लिए यांत्रिक मार्गदर्शन का दास बन जाता है।
जबकि विवेकवान् व्यक्ति सृष्टि(प्रकृति)के बदले स्रष्टा(प्रकृति के अध्यक्ष परमात्मा)में अपनी निष्ठा रखकर अपने ग्रहों के आगामी फलों को परिवर्तित कर सकता है।शनैः शनैः जितना अधिक परमात्मा के साथ अपनी एकात्मता का उसे बोध होता है, उतना ही अधिक प्रकृति का उस पर प्रभाव कम होता है।
आत्मा सदैव मुक्त है, वह अमर है वह अजन्मा है।
उस पर ग्रहादि शासन नहीं कर सकते।
जब मनुष्य यह जानने में समर्थ हो जाता है कि वह आत्मा है, शरीर नहीं, तब वह ग्रह नक्षत्रों के विवशताकारी योगों कुयोगों को पीछे छोड़ देता है।
जब तक आत्मिक विस्मति की साधारण अवस्था में वह किं कर्तव्य विमूढ बना रहता है, तभी तक प्रकृति के विधि नियम की सूक्ष्म जंजीरों में बँधा रहता है।
ईश्वर तो स्वयं सामंजस्य है, उसके साथ अपना सुर मिलाने पर, मनुष्य कोई अनुचित क्रिया कलाप नहीं करेगा, बल्कि उसके सारे कार्य ही ज्योतिषीय नियमों के अनुकूल सही समय पर होंगे।
गहन प्रार्थना और ध्यान के बाद वह स्वयं की दिव्य चेतना के सम्पर्क में आ जाता है ,और आन्तरिक सुरक्षा के बढ़कर अन्य कोई शक्ति नहीं, जो उसके अन्तस् में विद्यमान है।
” कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूँढ़ै
वन माँहिं ऐसे घट घट राम हैं ,
दुनियाँ देखै नाहिं। ”
नारायण! यदि पूर्व शरीर से ही, सब कुछ अन्तिम रूप से विनिश्चित हो जाता है, तब बाबा को यह कहने की जरूरत क्यों होती, कि –
” भाविउ मेटि सकैं त्रिपुरारी ”

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/30/ज्योतिष-एवं-मनुष्य/

अविनाशी जीव का भ्रम

परमात्मा अविनाशी हैं, अतः उनका अंशभूत जीव भी अविनाशी है- ” अविनाशि तु तद् विद्धि ” गीता-2/17 ।
किन्तु समस्या ये है कि अविनाशी होकर भी नाशवान् शरीर -संसार के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है-
ममैवांशो जीवलोके
जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15/7।।

अर्थात्-इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है।परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है अर्थात् अपना मान लेता है।
इस प्रकार अपनी बुद्धि से आत्मा का तादात्म्य प्राप्त कर चेतन ,अचेतन जड प्रकृति से आकृष्ट हो माया वश शरीरों को धारण करता रहता है ।
सुख प्राप्ति की कामना से स्वयं ” सुखराशी” दुखराशी प्रकृति के गुणों से आकर्षित होकर भटकता रहता है।
दु:खरूप संसार के साथ मैं-मेरे पन का सम्बन्ध मानकर ही जीव दु:खी होता है।शरीर संसार से थक हार कर जब, इन सुखाभासों से सम्बन्ध विच्छेद होता है, तब आत्यंतिक सुखानुभूति होने लगती है-

स ब्रह्मयोग-युक्तात्मा
सुखमक्षय्यमश्नुते।।5/21गीता।।
जैसै घर में पारस होते हुए भी कोई द्वार-द्वार जाकर भीख माँगे,ऐसे ही चेतन अमल सहज सुखराशी सांसारिक भोगसंग्रह में लग कर, फल रुप में दु:ख प्राप्त करता है-‘परिणामे विषमिव’ (गीता18/38)।
सुखाभासी सुख में संलग्न मनुष्य हमेशा भ्रम में रहकर दुखराशी बना रहता है।संसार में विद्यमान अन्यान्य लम्पटों, छद्मवेशी धार्मिकों, और वासना वासित कपटमुनिवेश धारकों के प्रति अन्ध श्रद्धाकृष्ट होकर परिवार ,समाज और स्वयं का नाश करता है।
ऐसे लोगों को पहचान कर उनसे विरत रहने की आवश्यकता है ।गोस्वामी जी ने इस कलिकाल में ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिये ही मानस के उत्तर कांड में कुछ बातें कहीं हैं।उन्हीं का उल्लेख कर इस प्रकरण को विराम दिया जा रहा है-
मिथ्यारंभ दंभरत जोई।
ता कहु सन्त कहै सब कोई।।
सोइ सयान जो पर धनहारी।
जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।
जो कह झूँठ मसखरी नाना।
कलजुग सोइ गुनवन्त बखाना।
निराचार जो श्रुतिपथत्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो विरागी।।
जाके नख अरु जटा विशाला।
सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।
अशुभ वेशभूषन धरे,
भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी ते सिद्ध नर
पूज्य ते कलिजुग माँहिं।।
जे अपकारी चार
तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मनक्रम बचन लबार
तेइ बकता कलिकाल महुँ।।
गुरु सिख बधिर अंधकर लेखा
एक न सुनै एक नहिं देखा।।
हरै शिष्य धन शोक न हर -ई
सो गुरू घोर नरक मह पर-ई।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने।
मोह द्रोहममता लपटाने।।
ते अभेद बादी ग्यानी नर।
मैं देखा चरित्र कलिजुग कर ।

कलिमल ग्रसे धर्म सब,
लुप्त भये सदग्रन्थ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किये बहु पंथ।।

इसलिये ऐसे मिथ्याचारियों से सावधान रहें।

।।हरिश्शरणम्।।

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आशा त्याग करना पड़ेगा

आशा अर्थात् विषयाशा तो विष के समान अवश्य ही त्याज्य है।इसी कारण मन अनेकाग्र रहता है ।क्योंकि एक आशा की पूर्ति हो जाने पर, दूसरी उपजती है और दूसरी के पूरा होते ही, तीसरी आ खड़ी होती है।ऐसे ही यह क्रम निर्बाध चलता रहता है, कहीं भी विश्रांति या विश्राम नहीं है।

” आशा ” शब्द की निष्पत्ति संस्कृत की “आस् ” धातु से है,जिसका अर्थ है बैठना, स्थिर होना।
आस्यते आस्थीयते (संसार-
शरीरादौ मन:)अस्याम् इति आशा ।
जिस(शरीर संसार)में मन ,वचन कर्मादि से स्थिर/स्थित , होता जाये, वह आशा है।

दूसरे शब्दों में मन ,जब जीवनान्त सांसारिक भोग्य पदार्थों में स्थित रहकर, उसकी पूर्ति में सतत प्रयत्नशील हो, तब ऐसी मनोदशा ” आशा ” है।तात्पर्यत: विषयों को आसन देकर बैठा लेना आशा है।
इस ” आशा ” को भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक में एक नदी का नाम दिया है।जिस नदी में मनोरथ का जल भरा हुआ है।उस जल में अप्राप्य तृष्णा की आकुल तरंगें हिलोरें ले रही हैं।अभीष्ट पदार्थ के प्रति प्रेमराग रूप घड़ियाल-मगरमच्छ घूम रहे हैं। अमुक अमुक वस्तु कब मिलेगी, ऐसे तर्क-वितर्क रुप पक्षी-गण उस नदी में विहार कर रहे हैं।यह धैर्य रूपी वृक्ष को अपनी लहरों से उखाड़ फेंकती है।मोह की भयंकर भँवरियाँ, जिसमें बराबर उठ रही हैं तथा उँची-उँची चिन्ताओं के दुस्तर तट के मध्य, जो आशा नदी बह रही है, उससे पार पाना बहुत कठिन है।इसके पार वही जा सकते हैं, जो विशुद्धान्त:करण वाले योगी हों।अतः आशा त्याग श्रेयस्कर है-

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरंगाकुला
रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।
मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना
प्रोत्तुंगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो
नन्दन्ति योगीश्वरा:।।10।।

इसीलिए आचार्य शंङ्करने अपने “अपरोक्षानुभूति” में गुरू देवता की भक्ति से मन की परिपक्वता पर जोर दिया है ,जिससे प्रत्यक्ष परमानुभूति सिद्ध होती-
परिपक्वं मनो येषां
केवलोयं च सिद्धिद:।
गुरुदैवतभक्तानां
सर्वेषां सुलभो जवात् ।।144।।

और मानव तन के लिये तो ऐसी विषयाशा करना, अमृत छोड़ कर विष ग्रहण करने जैसा है।
कलिकलुषनाशनावतार बाबा तुलसी के शब्दों से यह प्रकरण पटाक्षिप्त हो रहा है-

नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।।

।।हरिश्शरणम्।।

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निद्रा समाधि है

संस्कृत लक्षणग्रन्थों के अभिनव व्याख्याकार तन्त्रज्ञ अभिनवगुप्त पादाचार्य ने भगवान शिव की एक स्तुति की है।स्तुति के अनुसार-आत्मा शिव, मति शिवा, सहचारी प्राण, शरीर गृह, विषय सामग्री पूजा, निद्रा समाधि,पदसंचार प्रदक्षिणा, सारे शब्द स्तोत्र यहाँ तक कि जो -जो कर्म सम्पादित हो रहे हैं, वे सभी शिव की स्तुति ही हैं।

आत्मा(शिव)से बुद्धि(शिवा)का तादात्म्य होना अहं ब्रह्मास्मि की अवधारणा का पोषण करने वाला है।शरीर संचार हेतु प्राणादि वायु हैं।शरीर मे आत्मा का अधिष्ठान होने से वह आत्मा का घर है।विषयों से ईश्वरीय पूजा निरन्तर हो रही है ।और निद्रावस्था ही समाधि की अवस्था है।
शरीर की सामान्य रूप से तीन अवस्थायें हैं- 1-जाग्रत्
2-स्वप्न और 3-सुषुप्ति ।

अद्वैत वेदान्त की प्राथमिक पुस्तक ” वेदान्तसार “के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने इस सुषुप्ति की चर्चा करते हुए कहा-” सुखमहम् अस्वापम् ” अर्थात्
जागरण(काल) अवस्था में हम कहते हैं ,मैं सुखपूर्वक सोया ।
यहाँ उक्त ” मैं ” ही आत्मा है।

इस समय शरीर तो अनेक इन्द्रियों सहित सोया रहता है, किन्तु असंगी आत्मा जाग्रत् काल में आभास कराता है, वह त्रिकालाबाधित सर्वसाक्षी था, शरीर के शयन का।
स्वप्नावस्था तो संसार के प्रपंच की तरह असद् ही है।
जाग्रत् काल में भी असत्प्रपंच ही भासता है।
इस प्रकार निद्रा काल में अनुभूत सुखशयन का बोद्धा ही असंगी ” आत्मा ” सिद्ध हुआ।
इस सम्बंध में यह भी ध्यान देने योग्य है कि, वह स्त्री शरीर था अथवा पुरुष शरीर यह भी भान नहीं होता।अतः उस “आत्मा ” का गुणों से परे होना और स्त्री-पुरूष भिन्न नपुंसक लिंगस्थानी ” ब्रह्म “सत्ता मात्र भी स्वत: सिद्ध होता है।

आचार्य शङ्कर ने अपने ग्रन्थ
” अपरोक्षानुभूति ” में उपर्युक्त बिन्दु से हटकर अवस्था त्रय को गुणोद्भूत मानते हुए वर्णन किया है-
यथैव व्योम्नि नीलत्वं
यथा नीरं मरुस्थले।
पुरुषत्वं यथा स्थाणौ
तद्वद् विश्वं चिदात्मनि।।
।।61।।

जिस प्रकार आकाश में नीलता, मरुस्थल में जल और ठूंठ में पुरुष की प्रतीति होती है उसी प्रकार चेतन आत्मा में विश्व भासता है।

।।हरिश्शरणम्।।

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भगवत् प्राप्ति में सभी का अधिकार

गीता के नवम अध्याय में भगवान् ने अर्जुन से एक प्रतिज्ञा कराई है कि ,” हे अर्जुन तुम संकल्प करो कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता”। इसमें आश्चर्य होता है कि उपदेष्टा भगवान् स्वयं प्रतिज्ञा नहीं करते, बल्कि अर्जुन से कराते हैं।फलितार्थ ये है कि भगवान् लोकहित में अपनी प्रतिज्ञा तो अवश्य तोड़ते हैं, किन्तु भक्त के संकल्प की सर्वविध रक्षा करते हैं।
भगवान् अंशी हैं और भक्त उनका अंश(ईश्वर अंश जीव अविनाशी।चेतन अमल सहज सुखराशी।।)अंश अपने अंशी के स्वरुप को प्राप्त हो तो यह उसकी स्वाभाविकता है।
उसे अपने अंशी से अभिन्न होना चाहिए, किन्तु नाना जन्मों के नाना शरीरों के प्रारब्ध वशात् वह भटकता रहता है लेकिन ज्यौं ही उसकी बुद्धि इस निश्चय पर पहुँचती है, कि संसार के भोग्य पदार्थों के भोग करते रहने पर एक के पूर्ण होने बाद दूसरे भोग आपतित हैं और
लिप्सा और अधिक बलवती होती जा रही है अतः मुझे तो कुछ ऐसा चाहिए जिसके बाद कोई कामना ही शेष न रहे।
अन्ततः ऐसी दृढ निष्ठा आती भी इसीलिए है किअंशी परमात्मा, चेतन, अमल और सहजसुखराशि है तो अंश भी तत् स्वभावापन्न ही होगा समय चाहे जो लग जाय।
इसीलिये भगवान् कहते हैं कि कोई पूर्व जन्मों में कितना बड़ा पापकर्मा हो,उसे उतनी ही सहजता से भगवत् प्राप्ति होगी जितनी की एक धर्मात्मा को बशर्ते उसकी धर्म वृत्ति प्रवृत्ति उद्भूत हो जाये।वह देह और आत्मा को पृथक् देखना आरम्भ करता है तो अंशी से उसकी अभिन्नता संकल्पबद्ध होती जाती है और मुक्ति मार्ग प्रशस्त होता जाता है।इसलिए कहते हैं-

अपि चेत् सुदुराचारो
भजते माम् अनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः
सम्यग् व्यवसितो हि स:।।30।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा
शश्वत् शान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि
न मद्भक्तः प्रणश्यति।।31।।

अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव यानी कि क्रमशः अंशी-अंश-परमात्म -जीव के आधाराधेय सम्बन्धत्वेन अभिन्न भाव से मत्परायण होकर मुझे सतत भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है।क्योंकि वह सम्यक् (भलीभाँति)व्यवसित
(यथार्थ निश्चयी)है।
इसीलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शश्वत्(नित्य स्थायी)शान्ति को प्राप्त कर लेता है।तुम संकल्प कर लो कि मेरे भक्त का नाश(पतन) नहीं होता।
मानसकार के शब्दों में-
सनमुख होइ जीव मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
मतलब कि भगवान् के सन्मुख
(शरणागत)होते ही , भक्त के कोटि-कोटि जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है और तत्क्षण भगवत् प्राप्ति भी ध्रुव हो जाती है।
इस प्रकार भगवत् प्राप्ति में
पापात्मा, दुरात्मा, स्त्री-पुरूष
उच्च-नीच कुलादि का कोई भेदभाव नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

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