मेरी हँसी नाहिं तेरी हँसी है

इस शरीर संसार में अहन्ता और ममता ही नाना क्लेशों और पाप ताप सन्ताप की जड़ है।शब्दस्पर्शादि विभिन्न विषयों में जन्म जन्मांतर से आबद्ध मनबुद्धि की शुद्धि जल्दी होती नहीं है। यह संसार या प्रकृति भिन्नाप्रकृतिरष्टधा इत्यादि भगवद् वचनों से आठ संख्या में है। इसमें पाँच स्थूल है, और तीन सूक्ष्म। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश स्थूल प्रकृति है।

जबकि मन,बुद्धि और अहंकार, ये तीन सूक्ष्म के अन्तर्गत आते हैं।

  यह शरीर और संसार इन्हीं से निर्मित है।शरीर और संसार दो नहीं, बल्कि एक ही हैं।जो इस घटाकाश शरीर पिण्ड में है, वही अनन्त अण्ड-ब्रह्माण्ड में भी।

  क्षितिजलपावकगगनशरीरा

  पंचरचित यह अधम शरीरा।

अब इन आठों प्रकृतियों में सबसे पहले विकार की उत्पत्ति मन,बुद्धि, अहंकार में होती है।और पुनः तदनन्तर पृथ्वी आदि में।यदि सद्गुरु सन्त भगवन्त कृपा का आश्रय मिले, तो ही इस सूक्ष्म अहमादि की विकृति दूर हो सकती है।

  हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीवों को पहले स्वयं आगे शास्त्रानुमोदित सन्मार्ग पर चलना होगा, और तब गुरु माध्यम से भगवत् कृपा हो सकती है।

 अहं ममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिः

मलैः। वीतं यदा मनः शुद्धम् अदुःखम् असुखं सुखम्।

श्रीमद्भागवत शास्त्र की उक्त शुकवाणी तो ऐसा ही कहती प्रतीत होती है।

 ऐसी सूक्ष्म शरीर की प्रकृति अहमादि की शुद्धि नहीं होने पर गोस्वामीजी जी अपनी विपत्ति भगवान् से कहते हैं-

मैं केहि कहौं विपति अति भारी।

श्रीरधुबीर धीर हितकारी।

मम हृदय भवन प्रभु तोरा।

तहँ बसे आइ बहु चोरा।

अति कठिन करहिं बरजोरा।

मानहिं नहिं बिनय बहोरा।

तममोहलोभ अहँकारा।

मदक्रोध बोधरिपु मारा।

कह तुलसिदास सुनु रामा।

लूटहिं तस्कर तव धामा।।

चिंता यह मोहिं अपारा।

अपजस नहिं होइ तुम्हारा।।

  अब ऐसी अहमादि सूक्ष्म प्रकृति की शुद्धि में भगवत् कृपा ही एक अवलम्

।। हरिः शरणम् ।।

भजिअ राम सब काम तजि

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ मते।

भूमि परत भा ढाबर पानी 

जिमि जीवहिं माया लिपटानी

आखिर  कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् को नाना ऋषि कल्प साधु महात्माओं की वाणी क्यों निर्दिष्ट करती है।

 बात ये है कि, बिना हरि मनन के मन ,मनमानी करता रहेगा ,इसलिये  हर काम करते हुए हरिनाम लेना चाहिए।

 परम योगीन्द्र अमलात्मा विमलात्मा व्यासनन्दन श्री शुकदेवजी महाराज इसी माया के भयवशात् बारह वर्षों तक गर्भ में ही रह गये,उनकी वे ही जानें।

जब जन्मे तब किसी की ओर देखा भी नहीं और विविक्त एकान्त वास हेतु विपिन प्रस्थान किया।  पीछे-पीछे भगवान् व्यास हा पुत्र! कहते हुए दौड़ पड़े। वृक्षों से भी आवाज आई- शुकोहम्।

तरवो विनेदुः। वृक्षों ने भी सर्वत्र एक परमात्मतत्व का गान किया है। व्यास जी लौट आए, ब्रह्माण्ड के सारे रहस्य को जानने वाले थे।

 राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा डँसे जाने से सप्ताह के अभ्यन्तर मृत्यु होने का शाप मिलता है। और नाना नारदादि ऋषि-मुनियों के समक्ष राजा परीक्षित, तपःपूत शुकदेवजी महाराज से श्रीमद् भागवत की कथा सुनते हैं। प्रारंभ में ही राजा ने प्रश्न किया था कि प्रत्येक मुमूर्षु अर्थात्  मृत्यु की ओर अग्रसर मनुष्य जीव को बचने का क्या उपाय करना चाहिए?

 शुकवाणी होती है-

श्रोतव्यः कीर्तितव्यः च 

स्मर्तव्यः सः सदा  हरिः।।

मतलब कि, जीवात्मा का परम कर्तव्य है कि, वह भगवान् के किसी रामकृष्ण नारायण हरि नामों और उनकी कथाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करे।

  क्योंकि जिन हरि कथा सुनी नहिं काना श्रवण रन्ध्र अह भवन समाना। और कथा सुनने का प्रतिदिन अभ्यास करते रहने पर भी जीव के समुद्र वत् कान कभी कथासुधारस से भरते नहीं ।

 रोज-रोज कथा सुनी जाने पर भी माया से व्यथित जीव की कथामृत पिपासा शान्त नहीं होती।

 भुवनभोहिनी अविद्या माया से और जन्म-मृत्यु से बचने के लिए दूसरा उपाय हरिकीर्तन बताया, जिससे स्वयं के अतिरिक्त अन्य नाना जीवों को भी सुगति मिले।

 तीसरा उपाय भगवद् स्मरण को बताया है, जो हर एक जगत् के कार्य करते हुए सम्भव है।

 यह श्रवण, कीर्तन और स्मरण इसलिये है कि माया तो विस्मरण कराने हेतु सजी धजी बैठी ही है।

कबीर सूर तुलसी की वाणी का आश्रय लेना होगा, जहाँ वेदशास्त्र का मन्थन कर , नवनीत(मक्खन) निकला है।

 रमैया की दुलहन ने लूटल बजार। ब्रह्मा को लूटल औ शिव को भी लूटल। लूटल सकल संसार। कबिरा बच गया साहब कृपा से शब्द(हरिनाम) डोर गहि उतरा पार।

 इसलिये श्रवणकीर्तनस्मरण पूर्वक हर काम करते हुए हरिभजन ही श्रेयस्कर और मृत्यु से बचने का एकमेवोपाय है, और सब अपाय ही। बाबा ने भी यही सम्मति दी-

हरि माया कृत दोषगुन

बिनु हरि भजन न जाहिं।

भजिअ राम सब काम तजि

अस बिचार मन माहिं।।

।। हरिः शरणम् ।।

चितवहिं रामकृपा करि जेहीं

स्वारथ एक जीव कर एहा।

होइ रामपदपंकज  नेहा।।

यह तन कर फल विषय न भाई।स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।।

मनुष्य शरीर धारण करने का का एकमात्र प्रयोजन श्रीरामचरणों में निष्काम प्रीति ही है। पृथ्वी लोक से लेकर ब्रह्म लोक तक के भोग  नियत अवधि वाले और परिणाम में दुःखप्रद हैं।

बड़ी विचित्र बात है, लेकिन सीधी सरल और वास्तविक-

हम शरीर नहीं हैं।

हम संसार नहीं हैं।

यह परिवर्तन शील, परिवर्तन शील को क्या देख सकता है?

मतलब कि  विकारों से उपजा यह शरीर ,बाल्यशैशव,युवा , प्रौढ़ और वृद्धत्व में परिवर्तित हो गया । संसार का प्रत्येक वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ भी ,बड़ी तेजी से बदलता ही जा रहा है।

  तो अब इस शरीरसंसार का परिवर्तन यह शरीर संसार कभी भी देख नहीं सकता।

तब देखता कौन है?

यह अविकारी अविनाशी सदा अपरिवर्तित परमात्मा का एक छोटा पार्टिकिल आत्मा ही। नष्ट होते शरीर और संसार को देख कर भी उनमें अहन्ता-ममता बना रहना, बड़ा आश्चर्य जनक है।

  अरे भाई ! सभी में उस परम तत्व को देखे बिना तात्विक दृष्टि नहीं हो सकती।

 हम पूछते हैं कि इस शरीर से ,जब वह परमात्मतत्व हट जाता है, तब क्या हमारी ममता उस शरीर में रहती है?

 बिलकुल नहीं।

तो हमारे अपने सभी नाते एक उसी परमात्मा के नाते हैं। हम वस्तुतः प्रेम, जो भी परस्पर करते हैं, वह उसी परम आत्मा से ही करते हैं।

केवल हम पहचान नहीं पाते।

और यह भी केवल शरीर संसार में भोग दृष्टि से।

जब सनातन की योग दृष्टि से देखेंगे, तब विचार बुद्धि विवेक उपजेगा और तब सियाराम मय सब जग जानी हो जायेगा।

 भगवान् की प्रचण्ड माया ने हमें मोहित कर सब भुलवा दिया है।

ज्ञानिनाम् अपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलाद् आकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।

 बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा  तो नारायण ! सद्गुरु साधु कृपासाध्य ही है।

 इस मनुष्य शरीर का परम परम सौभाग्य होता है, जब सन्त भगवन्त कृपा से नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा की स्थिति मिल जाती है।और इसीलिये दिनरात ” राम-राम ” रटने वाले भगवान् उमामहेश्वर इस स्वर्ण मय पर्वत रुप संसार में मोहासक्ति के सहज विनाश को कह पड़ते हैं, जो कि श्रीरामकृष्णनारायण सीता राधा दुर्गा काली की कृपा पूर्ण दृष्टि से देख लेने पर अकस्मात् सम्भव है।नहीं तो क्षणभंगुर संसार का वैभवभंग असम्भव है-

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं।

चितवहिं राम कृपा करि जाहीं।।

।। हरिः शरणम् ।।

जानत तुमहिं तुमहिं होइ जाई

मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य भगवद् दर्शन और प्राप्ति ही है।

 बड़ा रहस्य बन जाता है यह कार्य, क्योंकि कि विशुद्ध चित्त वाले श्रीहनूमान् नारद जैसे सन्त ऋषि का दर्शन भी कठिन है, और जो इस प्राप्तव्य की प्राप्ति करा दें।

 चाहे हनुमानजी महाराज हों या देवर्षि नारद, सभी भगवन् नाम के प्रतिवेशक( नाम को परोसने वाले) अद्वितीय हैं।

 स्वयं प्रभु भी राधा पुकारते पुकारते राधा ही हो जाते हैं, जबकि राधा भी कृष्ण-कृष्ण कहते कहते कृष्ण स्वरूप हो ,जाती है

  यह अंशी-अंश( ईश्वर-जीव)

 राधामाधव, सीताराम तथा शिवाशिव एकाकार तदात्म ही हैं।

  अब जीव भूला क्यों?

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

चेतन अमल सहज सुखराशी

सो मायाबस भयौ गोसाईं।

बँन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।

 तोते बन्दर की तरह मोह माया के जाले में जकड़ा है।

  यह जंजीर उन्हीं नाम महाराज के नाम से टूटेगी।

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।

अपने बस करि राखे रामू।।

  इनके माया की विचित्र लीला भी हे।

 यह परब्रह्म परमात्मा असंख्येय कल्याण गुण गण निलय ,सर्वाधार ,सर्वकारण कारण हैं। देवत्रितयी भी नहीं जान पाती, जब तक कि वे स्वयं जनाना न चाहें।

जग पेखन तुम देखन हारे

आप ही सम्पूर्ण जगत् के प्रेक्षणीय, दर्शनीय हैं।

विधिहरिशम्भु नचावन वारे

कोऊ न जानै मरम तुम्हारा।

जानि लेइ सो जानन हारा।।

वही जान सकता है जो, जानने की अन्तिम सीमा पर जाकर भी हार न माने।

  और,तब तो-

साधुसन्तमाध्यम से प्राप्ति प्रतीति होनी ही है।

और जानने के बाद यह अकिंचन जीव भी, तदाकारा आकारित ही बने तो कोई आश्चर्य नहीं।

सो जानहि जेहु देइ जनाई।

जानत तुमहिं-तुमहिं होइ जाई

।। हरिः शरणम् ।।

सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा

बिना भगवत् कृपा के सन्त साधु दर्शन नहीं हो सकता। और कृपा ऐसी कि, रामकाज सब करिहौं तुम बलबुद्धि निधान, की स्वतः स्थिति बन जाती है।

और पहले ही यह भी कह देते हैं कि-

अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।

सार सर्वस्व ये कि भगवदाज्ञप्त, शास्त्रों और सन्तों का आश्रय ,इस मनुष्य जीवन में अत्यंत दुर्लभ है, उसके लिए सतत प्रयास होना चाहिए।

तभी तो श्रीमदाद्य आचार्य शङ्कर ने अपने विवेकचूडामणि के तीसरे पद्य में जिन तीन चीजों को दुर्लभ बताया ,वे हैं-मनुष्यता, मुक्ति की कामना और सद्गुरु पादाश्रय।और वे यह भी कहते हैं कि इन सभी की उपलब्धि भी भगवान् कृपा पर ही निर्भर है।अतः ,सनातन साधन भगवान् के नामों स्मरण हर दशा में होना चाहिए।मनुष्य के चरम लक्ष्य श्रीभगवान् की प्राप्ति कृपा साध्य ही है-

दुर्लभं त्रयमेवेदं देवानुग्रहहेतुकम्।

मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं 

महापुरुषसंश्रयः।

मतलब कि भगवान् की कृपासे सन्त का दर्शन और तत् फलस्वरूप सर्वस्व प्राप्ति,जो श्रीराम कृपा से विभीषण को राज्यादि की प्राप्ति। क्यों? क्योंकि विभीषण भगवत् सम्मुख था और रावण रामविमुख ,तमोगुणी रजोगुणी।इसीलिये-

रामविमुख सम्पति प्रभुताई।

जाइ रही पाई,बिनु पाई।।

अतः

सतत नाम चिन्तन करते रहना चाहिए, जिससे सनातन मार्ग से सनातन सुख मिल जाय-

पर उपकार बचन मन काया।

सन्त सुभाव सहज खगराया।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं

सन्त मिलन सम सुख जग माहीं।।

सभी सन्त सद्गुरु के चरणों में प्रीति हो, ऐसी भगवत् कृपा हो जाय।

।। हरिः शरणम् ।।

कमठ अण्ड की नाईं

भगवान् और भक्त का अविच्छिन्न अविचल और अद्भुत सम्बन्ध होता है।

निरन्तर प्रभु स्मराणादि से यह आधाराधेय और तादात्म्य योग बनता है।

 इष्टदेवतासम्प्रयोगः योगः का तात्पर्य भी यही है।केवल प्राणायाम और आसन मुद्रा ही योग नहीं है, यह तो यमनियम से लेकर समाधि तक और भगवच्चरणाश्रय प्राप्ति तक चलने वाला प्रयोग विशिष्ट योग है, जिसमें मन बुद्धि चित्त और अहंकार की शुद्धि होकर भगवदाकारिता का परम चरम प्राप्त होता है।

  भगवान् और भक्त का तद्वत् सम्बन्ध चाहे तो श्रीसीताराम में ही अनुस्यूत रूप में जल और उसकी लहरों के रूप में द्रष्टव्य है, जिनहिं परम प्रिय खिन्न ।

  और नरलीला में तो सहज रूप से जगदम्बा को कहना पड़ता है- 

बचन न आव नयन भर बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।


यह मानवीय दृष्टिकोण से कही बातें हैं। क्या वे भिन्न हैं।

कदापि नहीं।

जब इस लौकिक जगत् का वासनावासित मलिन चित्त का प्राणी सतत स्मरण से प्रभु से अविच्छिन्नता का अनुभव कर सकता है, तब उनकी कौन जाने?

 इस जीव की प्रार्थना प्रभु से ऐसी होती कि जिसे अद्भुत ही कह सकते हैं।

 वह कहता है-

यह कछुआ स्त्री जैसे अपने अण्डे को बाहर बालुका में रखकर ,केवल उस अण्डे को ध्यान में रखती है और अण्डा उसी ध्यान मात्र से पोषित होकर अपना पूर्ण परिपक्व स्वरूप पा लेता है। नहीं यदि वह दिये हुये अण्डे को भूल   जाय तो वह अण्डा नष्ट हो हो जाता है।ऐसे ही प्रभु अपने प्राणप्यारे भक्तों को कभी भूलें न –

यह बिनती रघुबीर गोसाईं
और आस विश्वास भरोसो
हरो जीव जड़ताई
चहौं न सुगति सुमति संपति
कछु,रिधिसिधि बिपुल बड़ाई
हेतु रहित अनुराग रामपद बढ़ै
अनुदिन अधिकाई।
जहँ तहँ जनि ,छिन,छोह छाड़िहौ, कमठ-अण्ड की नाईं।।

।। हरिः शरणम् ।।

करुणासिन्धु कृपा कीजै

करुणासिन्धु कृपासिन्धु दयासिन्धु दीनबन्धु ही जब  सारे जगत् में भासने लगे,तब इस मानवजीव का जीवन कृतकृत्य हो जाय।

क्यों, क्योंकि प्रभुमूरति कृपामयी है।

होता नहीं, किन्तु होगा अवश्य होगा।

होता इसलिये नहीं कि पूर्व-पूर्व शरीरों की मलिन वासना छूटती नहीं।

यह वासना जिस दिन से ,प्रभु और उनके प्राणप्यारे भक्तों 

नारद, शुक,सनकादि, व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, दादू,मलूक की वाणियों में बस जायेगी, बस मस्ती और ऐसी मस्ती सदा -सदा के लिये आ जायेगी कि जैसे हम शरीर संसार विषयों में रमे हैं , राम में रम जायेंगे। 

और सबसे पहले इस शरीर पिण्ड और तब सारे ब्रह्माण्ड में एक ही दर्शन होगा-

हरिः ओ3म् तत्  सत्।

जगत् का प्रपंच बाधित हो जायेगा ,जीवन का लक्ष्य साधित हो जायेगा।

  ऐसे परम परम सन्तों के हृदय की बजती वीणा और मन का तार  ,सारे अणु परमाणु में उसी ईश्वर के स्वर के नाद का कर रहा है, झंकार  इनकी भगवद् दृष्ट वाणी का आश्रय मिले तो जगत् का सब आश्रम क्रान्त कर परम विश्राम राम में आराम मिले।

जब सब कुछ से हारे
तब केवल प्रभु के सहारे।
और जब तक जगत् से न हारे
तब तक रहेंगे बेसहारे।
जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित पावन जग
केहि अतिदीन पिआरे।
देव दनुज मुनि नाग मनुज 
सब मायाबिबस बेचारे।

हमारे गुरुदेव मलूक पीठ वाले महाराज श्री ,जिन्होंने व्रजधाम में परम साधु, योगी और भगवत् प्राप्त सन्तों की सन्निधि पाई थी, उनमें उनके सद्गुरुद्वय अद्वितीय थे।

 ऐसे ही एक सिद्ध सन्त परम पूज्य श्री हरेराम बाबा थे।

  भगवदुन्मुखी उनकी सारवती,सरस्वती ने अनेक पद भगवद् स्मृति में उच्चरित किया है-

 तव विमुख अनेकों जन्म गये 
स्थावर जंगम रूप धरे 
यह पुनरावृत्ति मिटा दीजै
हे करुणासिन्धु कृपा कीजै।

।। हरिः शरणम् ।।

रघुपतिपदकमल बसैहौं

जिस भगवती की अहैतुकी कृपा से श्रीधामविन्ध्याचल में निवास का निरतिशय सुख मिला हुआ है, और शरीर भी यहीं जन्मा है, उनके प्रति सतत चरणशरण की कामना बनी रहती है।
उनकी ही कृपालेश से वह सुखानुभूति भी होती रहती, जिन्होंने ” सेवक” को रोजीरोटी के लिए अपना चरण नहीं छुड़ाया।
अस्तु, यहाँ धाम में बसने के कारण नाना जागतिक शरीर सम्बन्धसम्बन्धी भी इसी धाम से हैं। अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक सम्बन्धी और मेरे मित्र ,जो प्रायः भारत भर के विभिन्न तीर्थों में जाते रहते हैं, एक यात्रा क्रम में, टिप्पणी की। उन्होंने लिखा ,न किसी भी अभाव में जिओ, ना किसी के प्रभाव में जिओ ,जिओ तो केवल अपने स्वभाव में जिओ।
मिलने पर मैंने पूछा , इस अभाव,प्रभाव और स्वभाव का भाव क्या है?
बहुत देर तक सोचकर उन्होंने कहा – मैं स्वतन्त्र जीवन जीना चाहता हूँ, यही ,उन पंक्तियों का अर्थ है।
मैने कह स्वतन्त्र का आपका आशय स्वछन्दता से है और उन्होंने स्वीकार भी किया।
हमने कहा आप अपने शत्रु हैं या मित्र। यह शरीर तो पूर्व कृत कर्मों के बन्धन के कारण मिला है।और अब किसी माता के गर्भ में न जाना पड़े ,यही इस मानव शरीर का सर्वस्व लक्ष्य है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए भगवान् ,उनके द्वारा निःसृत वेदवाणी, पुराण ,स्मृति, और व्यास,वाल्मीकि, तुलसी आदि के द्वारा निर्धारित नियमों का बन्धन तो मानना ही पड़ेगा। क्योंकि शास्त्र हमारे जैसे मलिन जीवों को मर्यादा सिखाते हैं, जिस मर्यादा के बन्धन में बँध कर ,हम अपने को जान पाते हैं, कि हम हैं कौन?
बिना अपने को जाने इस शरीर संसार क कोई रहस्य नहीं खुलेगा। त्यों त्यों उरझत जात ,की स्थिति आपकी है।
स्वतंत्र केवल और केवल परमात्मा ही हैं-
स्वतन्त्रः कर्ता यदि आप अपने को सन्त शास्त्र के बन्धन में नहीं रखते तो ,आप अपने शत्रु स्वयं हैं।
बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य
येन आत्मैव आत्मना जितः।
अनात्मनः तु शत्रुत्वे ,
वर्तेताम् आत्मैव शत्रुवत्।

अतः लखचौरासी से छूटना है ,तो सन्तशास्त्र और भगवान् के चरणोंकी रज (धूलि) में और उनके बन्धन में रहना होगा, स्वतंत्र स्वच्छंद कभी नहीं। तुलसी का लास्य लेश भी प्रवेश कर गया, तो बिगड़ी बन जायेगी-
अब लौं नसानी अब न नसैहौं
मनमधुकर पनकै तुलसी
रघुपतिपदकमल बसैहौं।

।। हरिः शरणम् ।।

शरणागति से माया मुक्ति

भगवान् की माया अत्यंत दुस्तर है।यह माया त्रिगुणमयी है। सद् रजः तम इसके तीन गुण हैं। इन तीनों से संसार के तीन कार्य क्रमशः सत्व से सुख, रजस् से दुःख और तमस् से मोह ,होते हैं।
इस तरह यह जीव और जगत् इन्हीं से विनिर्मित है।इन्हीं के कारण मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार की शुद्धि नहीं हो पाती है।और हम देह इन्द्रियों को मैं तथा भगवान् की सृष्टि में उत्पन्न वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ को अपना मान बैठे हैं।
फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।

तह संसार नश्वर है, आत्मज्ञ पुरष ही जान पाता है।हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीव इस माया चकित थकित हो रहे हैं-
वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं
पश्यन्ति चाध्यात्मविदः विपश्चितः।तथापि मुह्यन्ति तव अजमायया ,सुविस्मितं कृत्यम् अजं नतः अस्मि तम्।

अब प्रश्न ये है कि, इस श्वान शृगाल भक्ष्य शरीर में ऐसी अहंता क्यों और संसार में ममता क्यों।
तब लगता है कि ये अहंता ममता आदि इस मानव देह के नहीं बल्कि ये पूर्व पूर्व शरीरों से आयातित दुर्गुण हैं।
बिना भगवत् शरण ग्रहण किये, यह माया जायेगी नहीं।
और बात ये भी है कि सब मम प्रिय सब मम उपजाये ,कहने वाले निष्कारण कृपा करनेवाले केवल दो ही लोग हैं, एक स्वयं भगवान् और दूसरे भगवत्प्राप्त सन्त साधु।
हेतु रहित जग जुग उपकारी ।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।

जब हम इनकी कृपा करुणा को पाने का प्रयास करें, तो काम बने-


येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः, सर्वात्मना आश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तराम् अतितरन्ति च देवमायां, नैषां मम अहम् इति धीः श्वशृगालभक्ष्ये।।


भागवतोक्त यह शुकवाणी हो अथवा गीतोक्त भगवद् वाणी-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायाम् एतां तरन्ति ते।।

।। हरिः शरणम्।।

अनुग्रह (कृपा) कातर प्रभु

भगवान् की कृपा की वायु सर्वत्र बह रही है, हम नाम की नाव पर बैठ कर निरन्तर स्मरण की पाल फहरा कर उनके नित्य धाम को जा सकते हैं.
वे अनुग्रह करेंगे ही इसमें रंचमात्र संशय नहीं।
कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी तो सूनी ही रहती अदालत मुरारी/पुरारी।
जो रघुबीर अनुग्रह कीना।
तौ तुम मोहिं दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।


सन्त मिलन की आस है
तो हरिजन गुन गाव।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परितेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक सर्वेश्वर परात्पर परमात्मा अपने अंशभूत जीव की बाट जोह रहे ,कि कब देहेन्द्रिय के प्रति राग त्याग कर वह अपने अंशी की ओर उन्मुख होकर उन्मुक्त होगा?
थोड़े से जप स्मराणादि साधन से उन्मुख हो जाने पर,
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि वे प्रभु किसी हनुमानजी नारदादि सन्तों को भेजकर क्षण मात्र में अनुग्रह कर देते हैं और विभीषण ,ध्रुव आदि भक्त सब कुछ पा जाते हैं।
वे परम आनंद मूर्ति हैं। निष्काम भाव से भजने पर दीनानाथ तो कृपा करने के लिए तैयार ही हैं।
गाय जैसे अपने बछड़े को वात्सल्य भाव दुग्ध पान कराती हुई व्याघ्रादि से बचाती है, वैसे भक्तवत्सल भगवान् भी माया रूपी बाघिन से बचा ही लेते हैं।
और जीव सदा सर्वदा के लिए
भगवद् आश्रय का अधिकारी हो जाता है। शुकवाणी ऐसी ही है-


सत्याशिषो हि भगवन् तव पादपद्मम्। आशीः तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः।
अपि एवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् ।वाश्रेव वत्सकम् अनुग्रहकातरः
अस्मान् ।।

|| हरिः शरणम् ||