दक्षिण में लक्ष्मण बसत वाम भाग सिय साथ।सम्मुख हनुमत बैठि जहँ मध्य रहें रघुनाथ।।
लिये अजन्मा जनम शुभ चैत्र शुक्ल मधु मास।नवमी तिथि मध्याह्न पल सुन्दर अवध अकास।।
राक्षस अति आचार सुनि जनम लीन्हि रघुश्रेष्ठ।दुष्ट दलन कर काज हरि सन्त जनन के प्रेष्ठ।।
मर्यादा स्थापित करी भे मर्यादाग्रज प्रभु। मर्यादा उत्तम पुरुष तबहिं प्रसिद्ध विभु।।
राम नाम उच्चरत जे चतुर सुजान कहात।भूरि नाम के दान करि दानी परमसुहात।।
चैत्री तिथि नवमी सुखद शुक्ल पक्ष प्रति काल।गावत सुमिरत राम कहु गये अकाल दुकाल।।
विन्ध्येश्वरि को दास येहिं श्रीगुरुकृपा प्रभाव।नाम राम को सुमरि कहि अति आनन्दहिं पाव।।
अति आनन्दहिं पाइ राम को नाम मोद मय।धन्य धन्य मुख गात हरष महिं डूबत जय जय।।
जय जय श्रीभगवान् हरी नारायण नरजनि। नारद शुक सनकादि उमंगहि भरे मोद मनि।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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गुरु चरनन धरि
जाति, विद्या, पद, रूप और युवावस्था का अभिमान, ये पाँचों भक्तिमार्ग के प्रबलतम काँटे हैं,नारायण!
जातिर्विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः एते वै भक्तिकङ्टकाः।।
अरे नारायण!
इनमें से कोई भी एक रहेगा, तो वह भक्ति नहीं मिलेगी,जो जीव के आत्म कल्याण को साध सके।और वस्तुतः किसी के भी रहने पर,निश्चित रूप से भक्ति सधेगी ही नहीं।
इनमें से कोई कारण रहने पर, उसका कार्यभूत अभिमान आ जाता है, जो भक्ति को बाधित कर देता है। किसी के भी रहने पर कोई एक भी अभिमान ऐसा कर देगा कि भक्ति की प्राप्ति होगी नहीं, ऊपर से यह मानव जन्म ही निरर्थक हो जायगा।
वस्तुतः अभिमान तो किसी का भी नहीं होना चाहिए। इस अभिमान को तो मात्र निरभिमान सन्त सद्गुरु ही एकमेव दूर कर सकते हैं, जिनको परम्परा से ऐसा गौरव प्राप्त हो। निश्चित रूप से व्यक्ति के जीवन में ऐसे गुरुतत्व अपरिहार्य हैं।
लेकिन इस गुरु तत्व की प्राप्ति भी अति दुष्कर है। देखिये,नाना जन्मों के भोग से खिन्न जीव में भवसागर से मुक्ति की जब इच्छा होगी तब भगवत्कृपाकरुणा का उत्स फूट पड़ेगा,जिससे सन्त कृपा और सन्त कृपा की सहज शीतल अविरल वारि वात्सल्यधारा का प्राकट्य होने पर वही भक्ति सध जायेगी, जो हमें जन्ममृत्यु चक्र से मुक्त कर देगी।
अनेकानेक जन्मों के मातापिता एकसाथ अथवा पृथक् होकर, वह वात्सल्य नहीं दे सकते जो सन्त सद्गुरु दे देते हैं। अरे नारायण! इसी के द्वारा केवलाभक्ति प्राप्त होगी,जिससे सेव्य भगवान्, सेवक जीव और साधन रूप शरीसंसारसामग्री का बोध होगा, जो चरम परम प्रेम रूपा भक्ति देकर सदा सदा के लिए तार देगा।
अन्यथा नहीं तो नहीं तो काहे की भक्ति?
रूपया
पैसा
मान
बड़ाई
पद
प्रतिष्ठा
इन्हीं सबकी भक्ति। इनके लिये यह दुर्लभ देह नहीं मिली है।बल्कि इनमें वासना त्याग कर पुनः जन्म न पाने के लिए यह दुर्लभ देह भगवान् की कृपा करुणा से मिली है।
अतः भोगों के झंझावात से उबरने की इच्छा होने पर ही गुरु प्राप्ति से जीवन धन्य धन्य होगा,अन्यथा नहीं।
हर एक जन्मों में मिले है यह कांचन कामिनी माया के अवस्थान अधिष्ठान।नहीं करनी इनकी भक्ति।नहीं तो चक्कर छूटना ही नहीं है।
हाँ यदि इन सभी में भगवत् तत्व स्वीकारो।अथवा ये सब भी भगवान्/भगवती के ही हैं तब तो सम्बन्ध बनेगा।और ऐसा सम्बन्ध बनेगा कि इनके कारण होने वाला अहंकार नष्ट हो जायेगा। अब प्रश्न यह है कि ऐसी भगवत् तत्व की परं तात्विक दृष्टि कैसे मिलेगी?
इन सबमें भगवत् तत्व की स्वीकार्यता भी गुरु ही दे सकते हैं।(सर्वं खलु इदं ब्रह्म)(अहं ब्रह्म अस्मि)(तत् त्वमसि) का वास्तविक बोध गुरु के सिवाय और कोई देने में समर्थ नहीं दीखता। निरभिमान गुरु ही अभिमान नष्ट करेगें।
और अहम् नष्टता के दूसरे क्षण तत्व का प्रकाश हो जायेगा। जिसके लिये यह तन मिला है। वस्तुतः यह संसार और माया भी भगवान् की ही है।और हम इसे (अहम्) अपना मान बैठे हैं।
सारी समस्या की जड़ यही है।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो… (विनयपत्रिका)
मोको शिव को नाम कलपतरु..
मोको दुर्गा नाम कलपतरु..
मोको राम को नाम कलपतरु..
मोको गणेश को नाम कलपतरु..
मोको सूरज नाम कलपतरु..
मोको तो राम को नाम कलपतरु..
नारायण श्रीराम कृष्ण हरि
उच्च स्वरहिं या मानस करि करि।
भक्तभागवत चरित श्रवण करि
कर्म जाल मुचि गुरु चरनन धरि।।
हरिः शरणम्
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भक्तशिरोमणि हनुमान
अति सनेह का उमड़ा सागर।
भाव दशा में रघुवर नागर।।
सेवा धारि सेव्य की मनहीं।
बानर जन्म लिये शिव तबहीं।।
हनु सविशेष जानि माता ने।
हनूमान नामा तनु ताने।।
राम काज लीन्हे अवतार।
सीता खोजि आय एहिं पार।।
रामकमल-पद भये भ्रमर।
सीताशीष बने अजरामर।।
भगत शिरोमणि हे हनुमान।
राम-भक्ति दो रहें अमान।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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जीवन-फल
नान्देड़ श्रीमहाराष्ट्र में शिव की कथा हुई सुन लें।
अपने सद्गुरु कहे आज ही यह प्रसंग निश्चित गुन लें।।
अग्र-मलूक-श्री-पीठाधीश्वरपद परितिष्ठित गुरु अपने।
“समरथ” गुरुद्वय छत्र छाँव में आत्म ग्यान गुन गने बने।।
क्या वैराग्यपूर्ण जीवनी उनकी कथन करन अन्तर नाहीं।
जहाँ रहें तहँ सन्त बिराजें तीरथ प्रकटै तहँ ताहीं।।
हरि हर दुर्गा श्रीगणेश की नारायण की कथा शुभा।
भवबन्धन से काट जीव को हरती सारी शुभाशुभा।।
श्रीभगवान् भागवत चर्चा करती चमत्कार भारी।
हरि चरणों में धरै भगत को हरै व्यथा जग की सारी।।
शिवपुराण की कथा मध्य इक तथ्य सुना मुझको भावै।
जो जन सुनत न कथा निरन्तर, बाँधि डोर तेहि कथा सुनावै।।
जोर जबरदस्ती उस जन को कथा सुनाना शुभ फल है।
कथा सुने औ सदा सुनावै अथवा जीवन निष्फल है।।
श्रीभागवत माहात्म्य कथन में कहें यही “गोकर्ण” कृती।
सेवा करे कथारस पीवै वही यती संकल्प व्रती।
अतः कथा सुन सुनें सुनायें जन्म कर्म का बन्ध छुटै।
इह संसार मनुज तन का जो चरम लक्ष्य तेहि पन्थ डटै।।
चरमलक्ष्य आना न कभी इस संसृतिसागर धरो अकल।
नाम राम को गाय कथा, पाये हैं पायें जीवन-फल।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
कलुषित कलजुग्ग गयो
जेहिं पर कृपा करहिं जनु जानी,कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।
जानै वही जान जानो,कृपा केवल हरी और हरी के दासन की मानो।।
नातो नारायण सों जो मनै वहै मानो,करते स्वीकार वह सच्चे से हृदय जानो।।
हरि हरिदास हरैं प्रेमियों के चित्त सदा,होवै समरपन से हरषन प्रवर्ष मुदा।।
ऐसे दास दासन के प्रणते सन्तोष मिले, मिटै काम,पूर्ण होवै चाहै कुछ भी न ले।।
निकसै तबै बानी भूलिजगद्व्यवहार हार, मान लो तब नष्ट हुआ सदातना कर्म जार।।।
सन्तों ने कही सही बालमीकि भये मान,तुलसिदास नाम सिद्ध काटैं कलि के वितान।।
गुरू पाय “नरहरि” सुनी कथा राम की सुजान, गाई तबै रामकथा रामायन महि महान।।
कठिन कलि काल जबै सबै बेहाल भये,राम के चरित्र छन्द बद्ध द्वादश काव्य नये।।
काल के कुचाल कुचले हैं सदा तुलसि- बानि,जीवजन्मजगतबन्ध तोरि फेंके तानि तानि।।
अशरण को शरण सदा “तुलसी” रामायन भयो ,राम भक्ति भक्तश्रद्धा कलुषित कलजुग्ग गयो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं
चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं। तमोगुणी हैं। संसार ही चाहिए दोनों को।
संसार में चित्त वृत्ति अथवा प्रवृत्ति अथवा संसार लोभ अथवा अविद्या अथवा माया सभी एक ही बातें हैं।हमी चण्डमुण्ड हैं।नाना जन्म बीते शरीर बदला हम नहीं बदले,हमें संसार चाहिए।और चाहिए तो हम रावण कंस चण्डमुण्ड शुम्भनिशुम्भ महिषासुर नहीं तो और क्या हैं?
मोक्ष का मतलब है सब कुछ त्यागना या छोड़ना।
भक्त को जब भगवान्/भगवती से और कुछ नहीं चाहिए।चाहिए केवल और केवल एकमात्र वे भगवान् और भगवती ही,तब जाकर मानो कि मोक्ष हुआ।ध्यान से समझ लीजिए नारायण!
रूपया पैसा मान बड़ाई पद पदार्थ प्रतिष्ठा ही मुझे चाहिए अगर तो हम – रूपयादास,पैसादास,मानदास,बड़ाईदास,पददास, पदार्थदास,प्रतिष्ठादास ही तो हैं। इसीलिये संसार और संसार की चीजें पाने की ललक हमें बार बार आवागमन जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझाये हुए हैं।
नारायण! जब हम हार मान लेते हैं, और संसार की हर वस्तु से दुःख का अनुभव शुरु होता है, तब इनसे निवृत्ति पाने या छूटने के लिए तड़प होने लगती है तब अकारण करुणामयी माँ अपना वात्सल्य उड़ेलने के लिए कोई सन्त/सद्गुरु से मिलाती है।
सन्त सद्गुरु और कोई नहीं वह कृपामयी करुणामयी माँ ही हैं।संसार से लड़ते लड़ते हथियार डालने पर,और शरणागत होने पर,या यों कहें सरेण्डर कर देने पर सन्त सद्गुरु निवृत्ति(मोक्ष) देकर तार देते हैं।
उतार देते हैं, ऐसी धरती पर जहाँ हम संसार पाने की भीख नहीं चाहते।
अतः प्रवृत्ति चण्डमुण्ड है।
चामुण्डा वह सन्त सद्गुरु हैं इन्ही से निवृत्ति(छुटकारा) वाला मार्ग मिलता है।
श्रीमद्भागवत शास्त्र में स्वयं श्रीभगवान् ने – आचार्यं मां व्यजानीयात् नावमन्येत कर्हिचित्।न मर्त्यबुध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः।
मतलब कि आचार्य सन्त सद्गुरु ही भगवान्/भगवती के रूप हैं। समस्त देवी देवता ये सन्त सद्गुरु हैं।
तब इस चमड़े के शरीर धरे ये सन्त सद्गुरु हमें तारने और जन्मो के संसार नशे को उतारने के लिए बैठे हैं।
आवश्यकता है, सरेण्डर शरणागत होने की।
शरणागति वह सार है देती नशा उतार। गुरु शरणागति के बिना कोउ ना उतरा पार।।
हरिः गुरुसन्तः शरणम्
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नाम कहे नामी बोले
अपने गुरु भगवान् देहातीत अवस्था के स्वामी हैं। सभी सन्तों और शास्त्रों सहित अपने प्रभु भी नाम को ही सविशेष अशेष पाप का विनाशक नाम को ही माने हैं।
सन्त भगवत् भागवत गुरु मत यही कि जब साधक नाम अथवा कोई मन्त्र विशेष जपे तब उस मन्त्र के अक्षर पर सतत ध्यान रहे।
समय जरूर लगता है, ऐसे जप में।
लेकिन इसी नाम जप से नामी का स्वरूप दृष्ट होता है-“नाम कहे नामी बोले”
दृष्टस्वरूप से स्वस्वरूप मिल जाता है।
यही बात नाम लेखन के अक्षर से भी है।क्षरण/ नाश नहीं होने वाला अवस्थान ही स्वस्वरूपाधिष्ठान है।
इसीलिये मानव शरीर है, स्त्री पुरुष जाति इस प्रस्थान में बाधक नहीं। मीरा रैदास तुलसी तो परम प्रमाण ही हैं।
अविद्या माया जगद्भ्रम के नाश तथा विद्या अमाया और जगत् स्थैर्य का परम परम साधन एकमात्र नाम है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जीवन सफल करौंगो
काहू सौं कछु न चहौंगो,अविगत गतिहि लहौंगो।
गुरुकृपया गहि छाप तिलक मन्त्रहिं मन मनन करौंगो।
अहंकार अति विषम वारि लहि गुरुपदकमल तरौंगो।
देइ कोउ कछु कहै भलो,एहिं तृष्णा उर न धरौंगो।
दास विचारत सब सन हारत भगतहि आस करौंगो।
श्रीगुरुपद रज भव भय भंजन माथे धरै फिरौंगो।
भक्ति भगत भागवत गुरू करुणहि श्रीपतिहिं लहौंगो।
और न बूझत कोउ मारग पचि पचि अब नाहिं मरौंगो।
हरि-गुरु-सन्त-पाद-पदमन लहि जीवन सफल करौंगो।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते
शरीरं मृद्भाण्डं तद् यदा रामो न धार्यते।
रामे मनस् तदा जातं चिन् मयं तत्कलेवरम्।।
कस्तूरिका नाभिदेशे राजते गन्धमादिनी।
मृगेणान्विष्यते सैव बहिर्वनवनान्तरे।।
एवम् अनन्तं च सत्यं च ज्ञानसत्वं ध्रुवं स्थितम्।सच्चिदानन्दात्मके ह्यात्मनि गुरुकृपयानुभूयते।।
कोहं कस्मादहं जातः कुत्र लक्ष्यं न पश्यति।शास्त्रस्य कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।
आत्मा कः परमात्मा कः तस्यैकत्वं न पश्यति।सतां हि कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।
विहितानां हि कृत्यानां धारणं नैव वारणम्। निषिद्धकर्मणां त्यागः विवेकत्वात् परा गतिः।।
मनुष्याणामात्मकल्याणं स्वात्मनैवावधार्यते।
अतः सन्तः सदा धार्याः मनोवाक्कायकर्मभिः।
सतां यत् सङ्गस्तत् पुण्यैः कृत्यैः फलीयते।
हरेर्गुरोः कृपातो वा रसस्याधिगमो भवेत्।।
अतः सतां च शास्त्राणां प्रीतिः प्रति प्रतीयते।सदात्मकल्याणप्राप्तिः सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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पापपंच
हरिनाम से सारे पाप कटते हैं, लेकिन यह पाँच पाप नहीं कटते। चन्द्रकला सखी के अवतार श्रीअग्रदेवाचार्य के पद में यह बात आई है। अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर अपने महाराज जी ने गोपाष्टमी के दिन सूरश्याम गोशाला के अष्टादशवें महोत्सव में श्रीभद्भागवत श्लोकक्रमचर्चा में दि.09/11/2024को उक्त प्रकरण का उल्लेख किया।
गुरु भगवान् ने पद नहीं कहा था,केवल व्याख्यानम मात्र किया था।”दास”ने जैसा सुना था,उसे “उन्ही”की कृपा ने काव्य का आकार दे दिया-
गुरू विषय नर बुद्धि, भक्त की जाती जाने।
शिलासमान गनै हरिमूरति चरणोदक जल माने।।
महाप्रसादहि अन्न मानि सो बनै पाप दुर्घट आकार।
कटत नहीं हरि नाम जपै यह नहिं इसको कोऊ निस्तार।।
हे गुरु भगवन् भक्त भक्ति करुणा करु।
एहिं प्रपंच ये पापपंच आवै ना हिय तरु।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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