सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं

आखिर सन्तों के पक्ष में क्यों ऐसा
पतन,कि इनके मिलन के समान
लोक/अलोक का कोई सुख नहीं। बाबा की बात है। कौन अकड़ेगा ।

सोचना तो पड़ेगा ।

वस्तुतः गंगा जब पापियों के पाप से
सपाप होती है, तब सन्त इसे,
निष्पाप बनाते हैं ।

श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध के नवें
अध्याय में एक प्रसंग है-
गंगा-भगीरथ का संवाद ।

अपने पितरों के सन्तरण हेतु भगीरथ
कठोर तपश्चरण रत होते हैं ।

श्रीविष्णु-पादाब्ज-जाता , भगवती
गंगा धरती पर आकर सगर-पुत्रों को
तारने के लिए उद्यत होती हैं। किन्तु एक बड़ा प्रश्न हो गया खड़ा । गंगा ने भगीरथ से कहा- मैं आपके

पितरों को तारने को तैयार हूँ।

लेकिन, अनेक पापिष्ठ लोगों के मल से
जब मैं भी मलिन हो जाउंगी तब
हमारा मालिन्य कौन धोयेगा ?

भगीरथ ने माँ गंगा से कहा – साधवः न्यासिनः शान्ताः , ब्रह्मिष्ठाः लोकपावनाः । हरन्ति अघं तेङ्गसङ्गात् , तेषु आस्ते हि अघभिद् हरिः।।

साधु/सन्त
मतलब कि – साधु सन्त जो
परहित हेतु भगवदाज्ञा से आते हैं, वे
आपका मालिन्य धोयेंगे।
साध्नोति परकार्यम् इति साधुः ।

न्यासी, यानी कि एषणा त्रय,
सुत-वित-लोक की अभिलाषा
का न्यास “सत्” में करनेवाले सन्यासी
अपने दण्डादि सहित स्वयं आपके
जल में उतर कर आपके पाप
का प्रक्षालन सर्वहित में करेंगें।

जिनका संसार-समुद्र किसी चन्द्र को
देखकर कभी हिलोरें नहीं मारता, ऐसे
शान्त, मन-बुद्धि-चित्ताहंकार वाले
महात्मा आपको निर्मल करेंगे ।

ब्रह्म के दो अर्थ हैं- वेद और परब्रह्म।ब्रह्मिष्ठ अर्थात् अमृतवद् वेद और ब्रह्मवेत्ता " ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"

जैसे ब्रह्मपरायण आपका पापसन्ताप
पराजित करेंगे। लोक को अपने मनवचनकर्म से

पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु आपकी –
पाप राशि को जीर्ण-शीर्ण (विनष्ट) कर
डालेंगे।
इसलिये कि हे गंगे! उनका
अंग-संग आपको मिलेगा ।

अब सबसे बड़ी तो ये है कि करेंगे कैसे
ऐसा दुःसाहसिक कार्य?

करेंगे अवश्य क्योंकि इनके हृदय में
“अघासुर” जैसे मूर्तिमान् अघियों
का घात करने वाले
भगवान् श्रीहरि जो विराजे हैं।

श्रीहरि जिन सन्तों के हृदय में
प्रतिष्ठित हो गये हैं, ऐसे-
हनुमत् शुकसनकादि
नारद, व्यास-वाल्मीकि, तुलसी,
ही ऐसा करने में समर्थ हैं।

इनका समाज तो मुदमंगलमय है।
ये सन्त तो चलते फिरते तीर्थराज
प्रयाग हैं।
ये साधु सभी स्थानों पर, सदैव
सभी को आसानी से मिल जाते हैं।
और इनका सेवन सभी का क्लेश- हर्ता
बन कर भवसिंधु से तार देता है-

सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा।
सादर सेवत समन कलेसा।।

सन्त-त्रिवेणी में सानुराग स्नान करने
वाले लोग, धर्मार्थकाममोक्ष भी इसी
शरीर के रहते पा जाते हैं-

सुनि समुझहिं जन मुदित मन,
मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु,
साधु- समाज प्रयाग ।।

इसीलिये, असहज को सहज, मलिन
को निर्मल बना कर भगवान् को ही दे
देने वाले परोपकारमूर्ति सन्त,

पतितपावनी गंगा को निर्मल बनायेंगे
ऐसा भगवद्- भागवद् वचनों पर
विश्वास करना चाहिए-

पर उपकार वचन मन काया।
सन्त सहज सुभाव खगराया।।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

भवसिन्धु बिना जलजान

इस भवाब्धि के पार जाने के लिये
गुरु कृपा अनिवार्य है।और

वस्तुतः गुरु तत्व तो भगवत् तत्व
ही है।

गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः गुरुः देवः महेश्वरः अब देखिये, शास्त्र और सन्त वचनों

पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
भगवान् के परम पावन नाम ही
ही इस युग में परम कल्याण कर्ता हैं।राम सकल नामन ते अधिका । होहु नाथ अघ खग गन बधिका।।

नीलोत्पल तन श्याम ,
काम कोटि सोभा अधिक ।
सुनिअ तासु गुन ग्राम ,
जासु नाम अघ खग बधिक ।।

नीलाम्बुज श्यामल कोमलांग प्रभु हैं ।
क्योंकि जगत् के प्रमुख रंग तमस को
रजस में और रजस् को सत्व गुण में
अन्तरित करके, उससे ऊपर की
गुणातीत अवस्था में पहुँचा देते हैं।इसलिये कि प्रभु भी स्वयं गुणातीत ही

हैं। और गुणातीत हुए बिना संसारातीत
स्थिति की कल्पना स्वप्न है।

संसार का मोह ,अविद्या, माया तो
पंच क्लेश की परधि है।
नाना शरीरों से एकत्रित ये
अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष और
अभिनिवेश तो नामादि जप से
गुरु/भगवत् तत्व की प्राप्ति से ही
जायेगें ।

अज्ञानपूरिता माया अविद्या है। यह जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनायित्री है।

भगवान् अपनी चिरसंगिनी और सदैव
उनसे अभिन्न (कहियत भिन्न न भिन्न)
” विद्या माया ” के संकल्प से सृजन
आदि कराते हैं –

वह विद्या माया जगदम्बा जानकी हैं-

यही सृजनादि कराती हैं। करती नहीं।

पंचक्लेश को हरती, प्रेयमार्ग से विरत
करके श्रेयमार्ग दात्री हैं। हम शरणागत
हैं। अन्यदुपाय नहीं-

उद्भव- स्थिति-संहार-कारिणीम्
क्लेश – हारिणीम् ,

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं,
रामवल्लभाम् ।

नारायण! क्या कहें, यह – अहं ही अस्मिता। और अभिमान, अहन्ता है।

ममता,मेरा शरीर संसार, और उसमें
किसी वस्तु-व्यक्ति-पद-पदार्थ के
लिए काम /राग बुद्धि ” राग” है। और
किसी संसारी वस्तु आदि के लिए
राग न रहने रुप शत्रु भाव ही
द्वेष है।
अथवा संसार मैत्री और शत्रु भाव को “राग” और ” द्वेष ” कहेंगे।

किसी संसारी वस्तु आदि को स्वयं
अपने रुचि के अनुकूल होने से
उसे भ्रमवश मनोनुकूल मानना
“अभिनिवेश” है। अब उपर्युक्त दोषों को दूर करने

वाले भगवान् ,तद्भिन्न भगवती वैष्णवी
शक्ति विन्ध्यवासिनी हैं।

मार्कण्डेय ऋषि ने कहा –

त्वं वैष्णवी शक्तिः अनन्तवीर्या ,
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतद् ,
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः । गुरु रुप में उपजे "कृपासिंधु नर रूप हरि" कृपालु और तच्छक्ति की चरण शरणग्रहण से

से ही पंचक्लेश नाश होगा

यह, भगवन् नाम रूप गुण लीला धाम
ही है जो व्यपाश्रित जीव को आश्रय
प्रदान कर पुनः शरीर के आदान
से बचा लेगा ।

कम से कम बाबा तुलसी की बुध्दि तो
यही निर्धारित करती है-

सकल सुमंगल दायक,
रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं
भवसिंधु बिना जल जान ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावै कोइ।

भगवान् की कथा का कोई पारावार नहीं।
“चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्”
रामायण शत कोटि अपारा

अनन्त ब्रह्माण्डों में विचरते हुए
श्रीकागभुशुण्डि जी कई कल्पों तक
उन ब्रह्माण्डों में रहकर श्रीरामलीलाकथा
रस का पान करके लौटते हैं।भाव विभोर हैं।

इधर बालकाण्ड में बाबा तुलसी ने इस रामकथा की उत्पत्ति सुनाई है।
यह कथा देवाधिदेव,भगवती उमा को सुनाते हैं। और वे ही इस कथा को, योग्य
अधिकारी श्रीकागभुशुण्डि जी को देते हैं।
इनसे यही कथा पाकर याज्ञवल्क्य जी
भरद्वाज ऋषि को सुनाते हैं –

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा।।

सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा।
रामभगत अधिकारी चीन्हा।।

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा।
तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।

और देखिये, यह रामलीला कथा पुनः
उत्तरकाण्ड में श्रीगरुड जी ने, इन्ही
कागभुशुण्डि जी से सुनी है।

यह कथा, इस कलिकाल में अभीष्ट सिद्धि देने वाली, सज्जनों की संजीवनी बूटी,और इस धरती पर तो मानो
अमृत की नदी है।
संसृति से मुक्त करने वाली तथा समस्त
अविद्या माया के भ्रम -संशय को दूर
करती है।यह तो भ्रम रूपी मेंढक को
लीलने वाली लीलाकथा है।
क्योंकि “संशयात्मा विनष्यति”
भगवद् वचनों से जीव का आपातपतन
तो संसारानुरक्ति से सुनिश्चित है। अतः

रामकथा कलि कामद गाई।
सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।

सोइ वसुधा तल सुधा तरंगिनि।
भवभंजिनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।

यहाँ उत्तरकाण्ड में गरुड जी इस कथा
को सुन कर वैसे ही धन्य हैं, जैसे कि
जगदम्बा पार्वती जी।
कागभुशुण्डि जैसे रामभक्त/ सन्त को
पाकर गरुड विह्वल हैं, तो ऐसे ही अपूर्व
रामानुरागी भगवान् शिव को पाकर
अपर्णा पार्वती –

धन्य धन्य गिरिराज कुमारी।
नहि कोउ तुम्ह समान उपकारी ।।

गरुड जी ने कहा-

आजु धन्य मैं धन्य अति,
यद्यपि सब विधि हीन।

निज जन जानि राम मोहिं,
सन्त समागम दीन्ह ।।

तब कागभुशुण्डि जी बोले –

जिन भगवान् की महिमा वेद, नेति-नेति
(इतना ही नहीं, इतना ही नहीं बल्कि
इससे भी आगे और ) कहकर गाते हैं,
उनका अतुलनीय बलप्रतापप्रभुत्व ,
कोई कह नहीं सकता-

महिमा निगम नेति करि गाई।
अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।

इनके स्वभाव जैसा कोई देखा सुना नहीं
गया है। इनके समान कोई नहीं।

अस सुभाव कहुँ सुनहुँ न देखहुँ।
केहि खगेस रघुपति सम लेखहुँ।।

अधमाधम प्राणी को भी तारना इनकी
प्रकृति है। अभिमान तो स्पर्श करता
नहीं। अपने किये कामों का श्रेय औरों
को देते हैं।
राक्षस -वध का श्रेय गुरुश्रेष्ठ
वशिष्ठ और वानरों को देते हैं।

क्योंकि श्रीराम जी ने कहा था –

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।
भये समर सागर कहुं बेरे।।

गुरु बसिष्ठ कुल पूज्य हमारे।
इनकी कृपा दनुज रन मारे।।

ऐसे प्रभु की लीलाकथा रस का सेवन
किये बिना – साधक, सिद्ध, विमुक्त,
उदासीन, कवि, विद्वान्, परोपकारी,
सन्यासी, योगी,बलिष्ट, तपस्वी, ज्ञानी,
धर्मशील पण्डित और विशिष्ट ज्ञान से
परिपूर्ण कोई भी प्राणी सृष्टि चक्र से
पार नहीं पा सकता-

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी।
कवि कोबिद कृतग्य सन्यासी।।

जोगी सूर सुतापस ग्यानी।
धर्म निरत पंडित विग्यानी।।

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी।
राम नमामि नमामि नमामी।।

इसलिये इनके नाना रूप लीला धाम
का आश्रय लेना ही पड़ेगा।

कबीर ने कहा था कि इस माया और
इसके संसार ने ब्रह्मा,शिव आदि को भी
आकृष्ट कर लूट लिया था। औरों की
बात क्या?
गुरु कृपातः प्राप्त वह रामशब्द ही था
जिसने रूपलीलाधाम की अविचल
स्मृति कराते हुए तार दिया, पार दिया-

रमैया की दुलहन ने लूटल बजार
ब्रह्मा को लूटल, शिव को भी लूटल,
लूटल सकल संसार।
कबिरा बच गया साहब कृपा से
सबद डोर गहि उतरा पार ।।

कबीर ने नाम जप से लीला की
अविस्मृत स्मृति में विमुग्ध कुष्ठीकाया
की प्रसंशा की। और सुन्दर शरीरों
की निन्दा भी,जिनके मुखों में राम नहीं
रमता-

नाना जपत कुष्ठी भलो,
चुइ चुइ गिरै जो चाम ।
कंचन देह न काम की,
जिन मुख नाहीं राम ।।

इसलिये कागभुशुण्डि जी महाराज ने
अपने लीलाकथामृत प्रसंग में भगवान्
के नाम चरित्र को अपार-अथाह कह
डाला, जिसके सेवन से ही
संसार में थाह पाया जा सकता है-नाम यथामति भाषेउँ, राखिउँ नहीं कछु गोइ। चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावै कोइ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सेव्या सेव्या सदा सेव्या श्रीभद्भागवती कथा। यस्याः स्मरणमात्रेण, हरिः चित्तं समाश्रयेत्।

भगवान् की जिस कथा के निरन्तर श्रवण करते-करते,हमारा कलुषित चित शुद्ध
हो जाता है।
अपवित्र वाह्य आभ्यन्तर काया को, जो भगवान् स्मरण मात्र कर लेने से पवित्र कर देते हैं।
और स्वयं बारम्बार नामरूप स्मरण
तथा कथा-श्रवण से जो भक्त हृदयों में
विराजते हुए अपनी साक्षाद् अनुभूति
ही करा देते हैं, ऐसे आनन्दकन्द भगवान्
और उनकी कथा को सतत प्रणाम ।

भगवान् की ऐसी जनमनरंजिनी कथा, जिसे –
रचि महेस निज मानस राखा
पाइ सुसमउ शिवा सन भाषा।।

जैसे भक्त-हृदय तुलसी के हृदय में क्यों
न विराजे और श्रीरामचरितमानस के
रूप में कल्याणकरिणी हो जाय ।

सन्त संगति वश सुनी जाती हुई वह कथा
स्वयं के प्रति ,प्रीति जगा देगी ही । क्योंकि यह विद्वानों को शान्तिदात्री, समस्त रसिकों को मोदप्रदात्री और कलियुग के कालुष्य की नाशकर्त्री है। सर्प को काट खाने वाली मोरनी है।

विवेकशक्ति रूपी अग्नि को जलाने वाली
अरणि( लकड़ी) है-

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि ।
राम कथा कलि कलुष विभंजनि।।
राम – कथा कलिपन्नग भरनी।
पुनि बिवेक पावक महुँ अरनी ।।

यह तो चन्द्रमा की चन्द्रिका है, जिसका
सन्त/भक्त चकोर बन कर पान करते हैं
यह कामधेनु है ,जो सेवन करने पर सब सुखों को देने वाली है।
सज्जन-समाज और देववृन्द ऐसी कथा अवश्य ही सुनते हैं-

रामकथा ससि किरन समाना।
सन्त चकोर करहिं जेहिं पाना।।

राम कथा सुर धेनु सम,
सेवत सब सुख दानि।
सत समाज सुर लोक सब,
को न सुनै अस जानि ।।

और क्या -क्या कहें , मन ही नहीं भरता

मोह सकल ब्याधिन कर मूला ।
ताते उपजहिं बहु बिध सूला।। जैसे इस कलि काल में शस्त्रसज्ज

महामोह रूपी महिषासुर के लिए यह
साक्षाद् महिषासुर मर्दिनी दुर्गा है-

महा मोह महिषेस विसाला।
राम – कथा कालिका कराला । और

हाथ की ताली की तरह सुन्दर यह
कथा तो, संशय – पक्षी को उड़ा कर
भगा देती और सारा भ्रम नष्ट –

रामकथा सुन्दर करतारी।
संशय बिहग उड़ावन हारी।।

इसे सुनकर जिनका मन भर गया, तो
यह समझिये कि ऐसे लोगों ने –
” रसो वै सः। रसं हि एव अयं लब्ध्वा
आनन्दी भवति । “
जैसे रस/आनन्द विशेष परमात्मा को जाना ही नहीं –

रामकथा/रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेस जाना तिन नाहीं ।।

तो इसलिये जिन रसिकों के कर्णेन्द्रिय
समुद्र के समान हैं,उनके लिए कथा तो
ऐसे सुन्दर सरोवर के समान है ,जो
निरन्तर कथाजल से भरते हुए भी
कभी भरने का नाम नहीं लेती।
और ऐसे श्रेष्ठ भक्तों के हृदय में
परमात्मा विराजते हैं-

जिनके श्रवण समुद्र समाना ।
कथा तुम्हारि सुभग – सर नाना।।

भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे ।
तिनके हियँ तुम्ह कहुँ गुह रूरे ।।

इसलिये भगवान् की कथा सदैव
आश्रयणीय है। जिसके श्रवण मात्र
से भगवान् स्वयं आकृष्ट होकर , राम(रमने वाले) कृष्ण (आकृष्ट होने/होवाने वाले) नाम को सार्थक करते हुए
आकर भक्त हृद्देश को प्रतिष्ठित करते हैं-

अतः भगवत् भागवत् माहात्म्य है-

सेव्या सेव्या सदा सेव्या
श्रीमद्भागवती कथा ।
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिः
चित्तं समाश्रयेत् ।।

गुरूः शरणम् । हरिः शरणम् ।

गावत गुन सुर मुनि नर बानी । राजा राम अवध रजधानी।।

जहाँ राजा राम बसते हैं,वही उनकी राजधानी है। नाम है, अवध । अवध क्या है? जहाँ किसी के वध का भाव ही नहीं आये।

आचरण की बात तो कहीं नहीं है।

वध शब्द, हिंसा का अर्थ देता है।

तब अवध का अर्थ है ,अहिंसा।

अब देखिये , हिंसा शब्द के दो अर्थ हैं।

हन् हिंसागत्योः, के विमर्श में हिंसा के दो अर्थ हो गये।

एक , हिंसा का अर्थ वध है।

दूसरा गति अर्थवाला है।

दूसरे अर्थ की ओर दृष्टिपात करें, तो

गति न होना ।
मतलब कि , अयोध्या -अवध ,वह क्षेत्र है, जहाँ मानव शरीर मिला तो , तो वह अक्षत-अव्यय स्वरूप हो गया।
तात्पर्य यह कि, वह दूसरे शरीरों में गति नहीं करेगा। अन्यत् जन्म ही नहीं होगा।

और फलतः मानव शरीर मिलना सार्थक
हो गया ।
और मानव शरीर ही क्यों, यह अवध क्षेत्र ऐसा है ,जहाँ विराजे भगवान् श्रीराम
का नाम -जप -स्मरणादि करने से ,इस
नाम को सुनने वाले मानवेतर प्राणी भी
तर गए ।

भगवान् ने नीच से नीच हिंसक प्राणियों
को भी रामावतार में तार दिया।

शबरी ,गीध सुसेवकन्हि सुगति दीन्हि
रघुनाथ ।

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं ।
सुजन विचार करहुँ मन माहीं ।।

नारायण! श्रीरामकृष्ण नारायण नाम के
स्मरणोच्चारण से यह, दुःखालयम् अशाश्वतम्, संसार-समुद्र ही सूख कर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

क्योंकि –

सो सुखधाम राम अस नामा ।
अखिल-लोक दायक विश्रामा

सुखनिधान भगवान् ही हैं।
वे ही समस्त प्राणी के आश्रयदाता हैं।
सुख के धाम हैं।

इसीलिये नाम का आश्रयी तो
वस्तुतः रामाश्रयी है ।

अतः ऐसा रामनामाश्रयी उस स्नेह मूर्ति में डूबने वाला तो, डूबकर तरेगा ही।

वह रामनाम के प्रसाद से ,प्रसन्नता से
आनन्द में मग्न होकर मुक्त विचरता है-

फिरत सनेह मगन-सुख अपने।
नाम-प्रसाद सोच नहिं सपने।।

स्वप्न मेंं भी स्वप्नवत् संसार की सोच यानी
कि शोक नहीं होगा।

इसलिये कहा कि सुर-नर-मुनि की वाणी
रामनाम और इनके गुणगणों को गा रही है –

गावत गुन सुर मुनि नर बानी।

राजा राम अवध रजधानी ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल!

ब्रज के महान् सिद्ध सन्त सूरदास रहे।
नानायोनि-नर्तन शरीर के उन्होंने कहे।

काम क्रोध वस्त्र बने ग्रस्त किया मोह ने।
शब्दस्पर्श विषयों की माला कण्ठ पहने।

मोह की पायल पाँव पहने भ्रमे हैं सदा।
निन्दा-रस-रसाल में हम मग्न भये सर्वदा।

जगत् में भ्रमित मन बन कर मृदंग सजा।
दुःसंगी जनों संग बना बेताल बजा।

तृष्णा का नाद वाद्य अन्तरगत ध्वनित हुआ। बजता बेढंगा स्वर लोगों को भ्रम हुआ।

माया की रस्सी कटि बाँधे बेहाल रहा।
लोभ का तिलक देता सुन्दर सा भाल रहा

जल थल अकास मध्य पाई अनेक काया।
कोटि कला दिखलाई माया की माया।।

कौन करै दूरि यह अविद्या आप जानिये।
आप के भगाये जाय नन्दलाल मानिये।।

इसीलिये सूरदास-वचनों का मर्म भाव।
समझे,तब बही बानी अपने ही गुणस्वभाव।

तब अपनी अनुभूति जगी।
जगद् भाव मति रही लगी।।

यह अनेक जन्मों के कर्म का गणित
याकि गणित का कर्म ध्वनि दुःखों का रणित।

खुलता ना रहस्य वस्य जगत् के रहता मैं
बना रहता भेद ना सुलझता मर्म एकता

समझ नहीं आती यदि तुलसी
नहीं मिलते।
तुलसी नहीं मिलते हनूमान से मिलाते नहीं ।
कहूँ क्या पीड़ा प्रभू राम भी न मिलते।

राम यदि मिले उन्हे रसनासनासीन कीजै ।
राम नाम लीजै चाहे कृष्ण
नाम लीजै।
श्रीगणेश शंकर शिवा सूर्य नाम लीजै सब
कृष्णानुजा विन्ध्याचल रानी नाम की जै।

अतः

दुर्गा नाम गाइये और राधा नाम
गाइये।
सीता नाम गाते हुए जगद् बिसराइये
जगत् को बिसारे भगवन् नाम
के पुकारे बिना।
कौन तारे जग में,शिव-शिवा ही
सहारे हैं।
हारे हम जैसे जीव मलिन
और विषय-ग्रस्त।
बार-बार गिरते भवकूप
नाथ!भारे हैं।
तुलसी कबीर सूर मीरा औ मलूक गुरू
गौरवपूर्ण वाणी संसार से
उबारे है।

है असीम शक्ति इन भगवत्प्राप्त गुरुजनो में , टारो यह अविद्या हम जगद् के लबारे हैं ।
हम क्या कहें –

व्रज के रस राचे कृष्णराधा भाव सूर रहे।
राधाकृष्णसरिता में डूबे भरपूर रहे।।

इसीलिए दैन्यवश सूरदास जी गा उठे

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल
कामक्रोध कौ पहिरि चोलना,
कंठ बिषय की माल।
महामोह के नूपुर बाजै,
निन्दा सबद-रसाल।
भरम भयौ मन भयौ पखावज
चलत असंगति चाल।
तृष्ना नाद करति घट भीतर ,
नाना विधि दै ताल ।
माया कौ कटि फेंटा बाँधे ,
लोभ तिलक दिये भाल।
कोटिक कला काछि दिखराई,
जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अबिद्या,
दूरि करौ नन्दलाल ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल ।

गुरः शरणम् ।हरिः शरणम्।

सततं श्रीरामनामामृतम्

नारायण! यह कलिकाल मलायतन है।
श्रीकृष्ण और श्रीराम नाम के मनन के
बिना पतन के गर्त में डाल ही देगा-

यह कलिकालमलायतन
मन करि देखु बिचार।
श्रीरघुनाथ नाम तजि
नाहिन आन अधार ।।

यह युग, यज्ञ-योग-ज्ञान का नहीं, आधार
तो केवल राम नाम ही है-

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम- गुन गाना।।

सब भरोस तजि जो भज रामहिं।
प्रेम समेत गाव गुन- ग्रामहिं।।

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं।
नाम प्रताप प्रकट कलि माहीं।।

हे प्रभु! आप ही केवल-

शान्त, शाश्वत, अतुलनीय, अव्यर्थ, निर्वाण और शान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शिव, शेष जी के सेव्य,वेदवेदान्तवेदद्य तत्व,
सर्वव्यापी, ब्रह्मांड गुरु, माया-पुरुष,
और करुणानिधान हैं।

राम भजो राम भजो राम भजो बावरेइसके बिना इस युग में कोई भक्ति ज्ञान और वैराग्य का अपर साधन नहीं।

कलि ना बिराग जोग संजम समाधि रे।
राम नाम ही सो अन्त सबही को काम रे।

ए मेरी रसने! संसार रस में रची रसी पगी
जगी सगी होना इसलिये सुहाता है कि,
इस मलमूत्र के पात्र(बर्तन) में वह, सर्व
कारण कारण सुखानुभूति का अनुभावक , परमरम्य राम जो बैठा है।

उसके अन्तः में बसने से ही सारी कान्ति
अशान्ति शान्ति भ्रान्ति भासती है।

अतः सर्वानुभव कारण की अनुभूति कर धन्य है ,वह पुण्यशाली, गुरुपदानुरागी,

जो सतत श्रीकृष्णराम नाम अमृत का पान करता रहता है।
यह,अमृत तो ब्रह्म(वेद) सिन्धु से निकला हुआ है। सज्जनों की जिह्वा पर विराजता है।
कलिमल को निर्मूल कर नष्ट ही कर डालता है ।
अनंगअराति त्रिलोचन के मुखचन्द्र में सदा सर्वदा विराजित यह श्रीरामनाम,
भक्तों को मुक्ति बाँटता है ।
संसार- रोग का शमन करने वाला
संसृति – चक्र से छुडा़ने वाला और समस्त सुखों का मूल भी है ।

अतः हम जनकसुता जगजननि
जानकी वैष्णवी विन्ध्यवासिनी के जीवन श्रीराम को जिह्वा पर रखें ।
पतन(नवनवशरीरधारण) से बचने का
एकमेवोपाय है ।

सन्त सद् गुरु कृपा हो जाय
यह “जग”जाय ।
हम निद्रा से जग जायँ

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं
कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे
संशोभितं सर्वदा ।

संसारामयभेषजं सुखकरं
श्रीजानकीजीवनं
धन्याः ते कृतिनः
पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्

कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव-थाहा।।

उत्तरकाण्ड में कलिपावनावतार परम पूज्य गोस्वामी जी का विवेक, नामजप
की सुदृढ सम्मति व्यक्त करता है।

गुरु वन्दना और सज्जन-दुर्जन वन्दना के
उपरान्त बालकाण्ड में बाबा, इक्यानबे
चौपाइयों में नाम वन्दना करते हैं।
प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
बन्दउँ राम नाम रघुबर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
बिधि हरि हर मय बेद प्रान सो।
अगुन अनूपम गुन निधान सो।
राम नाम तो महाराज हैं।
अग्नि, और सूर्य चन्द्र के कारण हैं।
अतः उनसे बढ़कर हैं।

अग्नि जैसे सबको भस्मसात् कर देता है
वैसे ही नाम महाराज भी सभी दुष्कृतों
दैत्यों को जला डालते हैं। नामजप, वह सूर्य का प्रकाश है,जो

ममता-मोह की घनीअँधेरी रात में विचरने
वाले राग-द्वेष जैसे उलूकों को अपने प्रताप से भगा देता है- ममता तरुण तमी अँधियारी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ।। तब लगि बसत जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु-प्रताप-रवि नाहीं।।

यह नाममहाराज, चन्द्रमा की शीतल चन्द्रिका की तरह चकोरवद् भक्तों को आनन्द प्रदान करते हैं।

बिधि(ब्रह्मा), हरि और शम्भु मय यह नाम तो सबका सर्वस्व मानो प्राण ही है। और देखिये, बाबा तुलसी के ही समकालिक भगवदाप्त महात्मा बाबा

मलूकदास,एकमात्र नाम- जप को जीव की सद्यः मुक्ति का कारण कहते हैं।
क्योंकि , नाम-जप तो अद्वितीय है।

यह कर्म – क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध
तीन प्रकार के स्वरूपों में क्रमशः बँटा है।
और नारायण! क्या कहें-
नाम-जप इतना शक्तिशाली है कि, यह
कर्मों की इस त्रिवेणी से निर्मित पुण्य और पाप के पर्वतको जला करके मानव जीवन को कृतकृत्य ही कर देता है।
पुनर्जन्म की जंजीर टूट जाती है-

राम नाम एकै रती, पाप कै कोटि पहार।
ऐसी महिमा नाम की,जारि करै सब छार।
क्या कहें-
एक से एक पद, सिद्ध सन्त बाबा मलूक
दास ने नाम महिमा के गाये हैं।

एक पद में बाबा, नाम को इस मलमूत्र के
पुतले(कीड़े) मानव शरीर को निर्मल करने में सर्वविध समर्थ और अमूल्य हीरा कहते हैं-

नाम तुम्हारा निरमला निरमोलक हीरा।तुम साहिब समरत्थ हम मलमूत्र के कीरा।

नारायण!पद तो बड़ा है लेकिन अर्थ बिलकुल स्पष्ट।
क्या महिमा है नाम की-

पाप न राखै देय इसे जब सुमरिन करिये।
इक अक्षर के कहत ही भवसागर तरिये।

अधम उद्धारन सब कहें प्रभु बिरद तुम्हारा। सुनि सरनागत आइया तब पार उतारा।

तुझसा गरुआ औ धनी जामें बड़ै समाई।
जरत उबारे पांडवा ताकी बार न लाई।

कोटिक अवगुन जन करै प्रभु मनहिं न मानै। कहत मलूका ” दास ” को अपना
करि जानै।

मानसकार बाबा ने भी यही भाव व्यक्त करते हुए कहा था-

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ ।
दीनबन्धु अति मृदुल सुभाऊ।।

साधक नाम जपहिं लव लाये।
होहिं सिद्ध अणिमादिक पाये।।

नारायण! राम कृष्ण हरि नाम कोई भी नाम हो , हमारी इस स्वाद लोलुप
जिह्वा को स्वाद आवे न आवे, जपकर
ही इसके लौकिक-अलौकिक प्रभाव को
जाना जा सकता है। और –

इसीलिये इस कलिकाल में भारत के पूर्व में अवस्थित , बंगाल की धरती के अपूर्व राधामाधव के अद्भुत अप्रतिम दिव्य
युगल अवतार श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने
अपने ” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य में
श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन को ऐसा कहा है,
वैसा कोई क्या कहेगा, यह कृष्णनाम – 1- चेतो दर्पणमार्जनम् है।

संसार के चाकचिक्य से मलिनातिमलिन
अन्तःकरण के चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ कर देने वाला है, जो मुक्ति का कारण बन जाता है- 2- भवमहादावाग्नि-निर्वापणम् है।

भवसागर रूपी दावानल की आग बुझा
कर शान्ति देने वाला है।3- श्रेयःकैरव-चन्द्रिका-वितरणम् है।

श्रेय और प्रेय दो मार्ग हैं। प्रेय, संसार की
प्राप्ति वाला और श्रेय, भगवत् प्राप्ति करा देने वाला है। इसलिये इस कृष्णनाम का जप, श्रेय रूपी चन्द्रमा की चाँदनी दे देता है। और जीवन सार्थक हो उठता है।

4- विद्यावधू- जीवनम् है ।

अनेकानेक शरीरों से हमने नाना प्रकार की विद्याओं का जो अर्जन किया है, वह
समस्त विद्याएँ वधू-स्वरूपा हैं। यह नाम
तो इन विद्याओं का जीवन अर्थात् पति है। इस श्रीकृष्ण नाम जप- कीर्तन रूपी
स्वामी(पति) के बिना विद्या-वधू तो
विधवा है।
इसके अभाव में यह उच्छृंखल हो जायेगी और सारी विद्यायें अपना स्वत्व खोकर, मानव जन्म को ही व्यर्थ कर देंगी।

5- आनन्दाम्बुधि – वर्धनम् है।

यह नाम जप, आनन्द -समुद्र में
वृद्धि करने वाला है।6- प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् है। एक- एक नाम जप/कीर्तन से हमारी मलिन जिह्वा, सम्पूर्ण अमृत का स्वाद लेने वाली बन जाती है। 7- सर्वात्मस्नपनम् परम् है।

शरीर तो गंगादि नदियों में स्नान कर
पवित्र हो जाता है, लेकिन आत्मा का स्नान, तो नारायण! इसी राम-कृष्ण नाम
से ही हो सकता है।

इसलिये गौरांग महाप्रभु, अपर नाम श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने अपने इस
” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य की पूर्णता पर कहा-
यह श्रीरामकृष्ण संकीर्तन तो नाना जीव जीवनान्तर के अभीष्ट सायुज्य,
सामीप्यादि मुक्ति रूपी परम विजय को दिलाने वाला अमोध अस्त्र है-विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्।

तदात्मानं सृजामि अहम्

जब -जब धर्म क्षीण होगा
उपजेगा अधर्म भीषण।
गो सन्त साधु संरक्षण हित,
आऊँगा तब लेता मैं प्रण।।कारागृह संसार समझ कर आया मैं कारागृह में।

सन्त भक्त आनन्दित करने,
जन्म लिया कारागृह में।।

ऋषी मुनी जन गोप गोपियाँ,
आये आत्म स्वरूप हुए।
उत्कट इच्छा जान समझ,
सह जन्मे थे सब गोप हुए।।

प्रेरित हुई “योगमाया” तब
नारी रूप धरे आई।
जसुदा-नन्द गर्भ-गत माता
माँ उसको न समझ पाई।।आधी रात भाद्र कृष्णा में देव-देवकी अष्टम सुत । गाढ़ी निद्रा निद्रित था जग, अवतरित "कृष्ण" कोई अद्भुत।।

भगवत्प्रेरित वसुदेव हुए,
तब कृष्ण -सूर्प-सज्जित करके।
ले गए यशोदा ढिंग रक्खा,
सबको निद्रा से जित करके।।

वसुदेव मस्तकारूढ चली,
कन्या कैसी युग माया हर,
आई कारागार मध्य ,
देवकी गोद बैठी चढ़कर।।

आया कंस जान अष्टम सुत,
कन्या देख हुआ सस्मित।
कन्या नहीं योगमाया थी,
छूटी हाथ हुआ विस्मित।।

आकर विन्ध्याचल पर बैठी,
कृष्ण योगमाया रानी।
सरस्वती वह अष्टभुजा माँ,
विन्ध्यवासिनी जग-दानी।।

योगमातृका विन्ध्य अधीश्वरि,
जगद् वन्दिता श्रीमाता।
चरणकमलरज मधु आकर्षित,
भगत-जगत है सुख पाता।।

लिये अजन्मा जन्म कृष्ण बन,
आत्मा रूप सन्त ज्ञानी।
उपजे उनकी कृपा प्राप्त करके,
मन प्रमुदित हुआ कृपा जानी।।

हे भारत जब हो धर्म ग्लानि,
धरती पर हो अधर्म नर्तन।
तब मानव देह धरे लीला,
करता मैं करता परिवर्तन।।

यदा यदा हि धर्मस्य,
ग्लानिः भवति भारत।
अभि उत्थानम् अधर्मस्य,
तदा आत्मानं सृजामि अहम्।।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सम्भवामि युगे युगे

साधु/सज्जनों की समग्र रक्षा
दुष्ट/दानव दैत्याचरण दमन
धर्म संस्थापन आदि के लिए
अजन्मा का भी जन्म सम्भव है।

जब जब होइ धरम कै हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी।।
तब-तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

भगवती उमा के प्रश्न पर उमापति ने उत्तर देना प्रारंभ किया था।उन्होंने कहा था कि भगवान् के धरा धाम पर आने के कारणों को इदमित्थं नहीं कहा जा सकता, फिर भी कह रहा हूँ-

हरि अवतार हेतु जेहिं होई।
इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोहीं।
समुझि परै जस कारन मोहीं।।

महादेव ने आगे कहा,जिसका अर्थ स्पष्ट है-
असुर मारि थापहिं सुरन,
राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस,
राम जनम कर हेतु।।
इसीतरह –

मार्कण्डेयपुराण में ऋषि ने भी महिषासुर मर्दिनी के भी अवतरण को ऐसा ही बताया था। यहाँ तो स्वयं भगवती ही अपने मुख से अपने अवतरण का हेतु,
असुर -वध बताती हैं-

इत्थं यदा यदा बाधा,
दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याहं,
करिष्यामि अरिसंक्षयम्।।

अब “मानस” में पुन प्रवेश करें तो –

परवश जीव स्वबस भगवन्ता, होने से
भगवान् को कोई बाध्य कैसे कर सकता है ?संकल्प मात्र से वह असुरसंहार कर सकते हैं।
किन्तु अपने स्वरूप को प्राप्त माया
मुक्त जीवों/सन्तों को अपनी विविध लीला का दर्शन करा कर आनन्द प्रदान करने के लिये,वह अवतार लेते हैं-

विप्र धेनु सुरसन्तहित,
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।।

अपने चूडान्त चरम ग्रन्थ, विनयपत्रिका में भी बाबा जी ने भगवान् केअवतरणकरण को लीलाकरण-कार्य कहा-

सच्चिद् व्यापकानन्द परब्रह्म-पद,
विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,
विमल गुण- गेह नर-देह धारी।।

मध्यदिवस तहँ सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

त्रेता में भगवान् श्रीरामावतार में दिन के मध्य काल को आनन्दित करते हैं, तो
द्वापर में रात्रि के मध्य काल को।

अब गीतागायक परमश्रीगुरु भी इसी तरह
अपने अवतरण को स्वयं कहते हैं, जैसे
कि भगवती दुर्गा ने कहा था।
अर्जुन को भगवान् बताते हैं-

परित्राणाय साधूनां ,
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय,
सम्भवामि युगे युगे।।

इसमें विमर्श का बिन्दु एक ही है, और
वह है – सम्भवामि।

सम्भवामि यह क्रिया पद है।
इसका कर्ता आत्मानम् है।
मतलब कि मैं (परब्रम्ह परमात्मा)
आत्मा को उत्पन्न करता हूँ।
यह आत्मा कौन है?

देखिये, सातवें अध्याय मेंभगवान् ने चार प्रकार के भक्त -आर्त,जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी के रूप में बताये हैं।
अब उनमें एकीभाव(अनन्यभाव) से रहने वाला ज्ञानी-भक्त भगवान् का प्रिय है।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः,
एकभक्तिः विशिष्यते।
प्रियः हि ज्ञानिनः अति अर्थम्,
अहं स च मम प्रियः

ज्ञानी भक्त मेरा और मैं उसका आत्मा हूँ।
और अगले श्लोक में अधिक स्पष्ट कर
देते हैं-
उदराः सर्व एवैते,
ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।।
(07/18)
तो इस विमर्श में स्पष्ट होता है कि भगवान् स्वयं अपने(आत्मा) को अर्थात्
ज्ञानी भक्तजनों को भी जन्माते/जन्मते
हैं।
भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव -सम्भव खेदा।
अब इस तरह भगवान् और उनके सन्त
भक्त दोनों उतरते हैं, इस धरा धाम पर-

इसीलिये गीतोक्त वाणी विमर्श करती है-

सम्भवामि युगे युगे

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्