सम्भवामि युगे युगे

साधु/सज्जनों की समग्र रक्षा
दुष्ट/दानव दैत्याचरण दमन
धर्म संस्थापन आदि के लिए
अजन्मा का भी जन्म सम्भव है।

जब जब होइ धरम कै हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी।।
तब-तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

भगवती उमा के प्रश्न पर उमापति ने उत्तर देना प्रारंभ किया था।उन्होंने कहा था कि भगवान् के धरा धाम पर आने के कारणों को इदमित्थं नहीं कहा जा सकता, फिर भी कह रहा हूँ-

हरि अवतार हेतु जेहिं होई।
इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोहीं।
समुझि परै जस कारन मोहीं।।

महादेव ने आगे कहा,जिसका अर्थ स्पष्ट है-
असुर मारि थापहिं सुरन,
राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस,
राम जनम कर हेतु।।
इसीतरह –

मार्कण्डेयपुराण में ऋषि ने भी महिषासुर मर्दिनी के भी अवतरण को ऐसा ही बताया था। यहाँ तो स्वयं भगवती ही अपने मुख से अपने अवतरण का हेतु,
असुर -वध बताती हैं-

इत्थं यदा यदा बाधा,
दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याहं,
करिष्यामि अरिसंक्षयम्।।

अब “मानस” में पुन प्रवेश करें तो –

परवश जीव स्वबस भगवन्ता, होने से
भगवान् को कोई बाध्य कैसे कर सकता है ?संकल्प मात्र से वह असुरसंहार कर सकते हैं।
किन्तु अपने स्वरूप को प्राप्त माया
मुक्त जीवों/सन्तों को अपनी विविध लीला का दर्शन करा कर आनन्द प्रदान करने के लिये,वह अवतार लेते हैं-

विप्र धेनु सुरसन्तहित,
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।।

अपने चूडान्त चरम ग्रन्थ, विनयपत्रिका में भी बाबा जी ने भगवान् केअवतरणकरण को लीलाकरण-कार्य कहा-

सच्चिद् व्यापकानन्द परब्रह्म-पद,
विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,
विमल गुण- गेह नर-देह धारी।।

मध्यदिवस तहँ सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

त्रेता में भगवान् श्रीरामावतार में दिन के मध्य काल को आनन्दित करते हैं, तो
द्वापर में रात्रि के मध्य काल को।

अब गीतागायक परमश्रीगुरु भी इसी तरह
अपने अवतरण को स्वयं कहते हैं, जैसे
कि भगवती दुर्गा ने कहा था।
अर्जुन को भगवान् बताते हैं-

परित्राणाय साधूनां ,
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय,
सम्भवामि युगे युगे।।

इसमें विमर्श का बिन्दु एक ही है, और
वह है – सम्भवामि।

सम्भवामि यह क्रिया पद है।
इसका कर्ता आत्मानम् है।
मतलब कि मैं (परब्रम्ह परमात्मा)
आत्मा को उत्पन्न करता हूँ।
यह आत्मा कौन है?

देखिये, सातवें अध्याय मेंभगवान् ने चार प्रकार के भक्त -आर्त,जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी के रूप में बताये हैं।
अब उनमें एकीभाव(अनन्यभाव) से रहने वाला ज्ञानी-भक्त भगवान् का प्रिय है।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः,
एकभक्तिः विशिष्यते।
प्रियः हि ज्ञानिनः अति अर्थम्,
अहं स च मम प्रियः

ज्ञानी भक्त मेरा और मैं उसका आत्मा हूँ।
और अगले श्लोक में अधिक स्पष्ट कर
देते हैं-
उदराः सर्व एवैते,
ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।।
(07/18)
तो इस विमर्श में स्पष्ट होता है कि भगवान् स्वयं अपने(आत्मा) को अर्थात्
ज्ञानी भक्तजनों को भी जन्माते/जन्मते
हैं।
भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव -सम्भव खेदा।
अब इस तरह भगवान् और उनके सन्त
भक्त दोनों उतरते हैं, इस धरा धाम पर-

इसीलिये गीतोक्त वाणी विमर्श करती है-

सम्भवामि युगे युगे

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

सम्मानं कलयातिघोरगरलम्

सम्मान को अत्यंत घोर विषवत् मान कर त्यागना चाहिए। नारायण!

अपने वन गमन के अवसर पर,भगवान्
श्रीसीताराचन्द्र शबरी के निकट पहुँचते हैं। शबरी,वह शबरी है, जो भगवान् की
हजारों वर्ष से प्रतीक्षा में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी है।
भगवान् चित्रकूट पधारते हैं, और
शबरी की मनःकामना मूर्तिमती होती है।
भगवान् ,एकमात्र भक्ति का ही सम्बन्ध
स्वीकारते हैं –

कह रघुपति सुनु भामिनि! बाता।
मानहुँ एक भगति कर नाता।।

भगवान् तो भक्ति का ही नाता मानते हैं।

भक्ति पाने के लिए प्रभु ने एक से एक साधन बताए हैं।
कुल नौ साधनों में सन्तसंग,भगवत् कथारति के बाद तीसरी भक्ति के रूप में
अमानिता और गुरुसेवा का उपदेश करते हैं।

गुरुपद पंकज सेवा,
तीसरि भगति अमानि।

मतलब कि गुरुचरणाश्रय मिलने के बाद,
किसी भी तरह के मान की इच्छा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि मान सम्मान में चित्त चले जाने से, मनुष्यता ही आहत हो
जाती है।
और महाभारत के अनुशासन पर्व में तो स्वयं नारायण को ही सबसे बड़ा ” अमानी ” बताया गया। भगवान् अमानी होकर ,
” मानद” हैं। मान देने वाले हैं।
अमानी मानदो मान्यः,
लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।
सुमेधा मेधजो धन्यः,
सत्यमेधा धराधरः।।

              पन्द्रहवीं शताब्दी में जन्म लेकर बंगाल की धरती को पवित्र करनेवाले, युगल श्यामाश्याम के अवतार 

श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने,अपनी लीला से
भक्तिरसार्णव में डुबाकर नाना जीवों का उद्धार किया।
आपने अपने लीलाकाल में,किसी भी
ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया। तथापि केवल आठ पद्य संस्कृत भाषा में लिखे ।
इन आठ पद्यों को भक्तिजगत् में बड़ा आदर प्राप्त है।इन्हें ” शिक्षाष्टक ” के
नाम से जाना जाता है।बाद में इनके जीवन और इन पद्यों पर भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये, जिनमें झूँसी(प्रयागराज) के
भगवत् प्राप्त महात्मा सन्त प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का संस्कृत पद्यात्मक ग्रन्थ
श्रीचैतन्यचरितावली ” प्रमुख है।

अब देखिये, ऊपर उक्त महाभारत के श्लोक की छाया” महाप्रभु ” के तृतीय पद्य में अनुभूत होती है-

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।

विचारने पर एक बड़ा विमर्श उपस्थित होता कि, मनुष्य अमानी क्यों बने?
  इसलिये कि भगवान् अंशी हैं और जीव उनका अंश।
    जब भगवान् में अमानिता है तब जीव में भी अंशत्वेन होना चाहिये। 

देखिये-

योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने ईश्वर को
पंचक्लेश से विहीन कहा है।
ये हैं, अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष
और अभिनिवेश।
अब जब ये सभी ईश्वर में नहीं हैं, तब माना जाय कि, ये सभी जीव में नानात्मक, त्रिगुणात्मक जगत् से ही
” अन्तरित ” हुए हैं।
यह सभी वस्तुतः जीव के हैं नहीं।
बल्कि माने हुए हैं।
इनको त्यागे बिना ईश्वर का साक्षात् नहीं होगा, नहीं होगा, नहीं होगा।

मानव जन्म की सार्थकता ईश्वर दर्शन ही है। पचक्लेश को त्यागे बिना दर्शन नहीं
सम्भव है।
और यह “अस्मिता ” आदि का त्याग तब तक सम्भव नहीं होगा,जब तक कि , तुलसी,सूर,कबीर,मीरा,नानक,दादू,मलूक,रैदास को गुरुवत् मान इनके सन्देशों पर
चला नहीं जायेगा।
अथवा इनको आचरण में ढालने वाले
विरल- विरले सन्तसद्गुरु का पादाश्रय
लेकर आगे उन्मेष के मार्ग पर नहीं चला जायेगा।
नहीं तो पतन होगा, और मानव जीवन का उद्देश्य विखंडित हो जायेगा।

और इसीलिये प्रभु के नौ साधन भक्ति के आदेश,महाभारत के वाक्य और
चैतन्य महाप्रभु के लीलावचनों में सारग्राही वाणी प्रवाहित हो उठी है।

इन सभी वाणियों की छाया लेकर एक तात्विक-सात्विक वाणी भी विलसी है।
यह वाणी उन्ही अमानिता आदि को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करने वाली व्रज के महान् सन्त प्रबोधानन्द सरस्वती की वाणी है।
वे कहते हैं कि किसी,वृक्ष के नीचे बैठकर शान्त एकान्त में भजन करना श्रेष्ठ है।पवित्र यमुनादि नदियों का जल और साधारण वस्त्र भी धारण करना ठीक है।
राधामाधव का निरंतर स्मरण करते हुए
धाम तो त्यागना कथमपि उचित नहीं।
और सबसे बड़ी बात तो ये है कि,
सम्मान का विषवत् त्याग तथा किसी नीच से नीच व्यक्ति द्वारा अपमान को अमृतवत् ग्रहण करना होगा।
तभी हम वस्तुतः मनुष्य बन पायेंगे। नहीं तो पद प्रतिष्ठा और सम्मान तो
माया के चट्टे-बट्टे हैं। ये सब काग भुशुण्डिजी के शब्दों में –
सकल माया कर परिवारा।
कौन हैं माया के दुर्दान्त सगे सम्बन्धी?
सुत ,वित्त और लोक की प्रतिष्ठा पाने की लालसा।

सुत बित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।

हमें आत्म स्वरूप पाने नहीं देंगे। मनुष्य
बनने नहीं देंगे।
अपने को और जगत् को जाने बिना करुणानिधान की कृपाकरुणा
से मिला मानवजन्म निरर्थक होगा।
इसीलिये व्रज के रसिक की रसमयी वाणी का आश्रय लें-

भ्रातः तिष्ठ तले तले विटपिनां,
ग्रामेषु भिक्षामट।
स्वच्छन्दं पिब यामुनं जलमलं,
चीराणि कन्थां कुरु।

सम्मानं कलय अतिघोरगरलं,
नीचापमानं सुधा।
श्रीराधामुरलीधरं भज सखे,
वृन्दावनं मा त्यज ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

साधो निन्दक मित्र हमारा

व्रज के किसी सिद्ध सन्त ने कहा था,कि जो,सह लेते हैं अपमान को,पा लेते हैं,
भगवान् को।
किसी का भी सम्मान हो, तो वह सब झूठा ही है।
पहला तो यह कि, सम्मान पद के कारण है, तो वह “पद” का है, न कि व्यक्ति विशेष का।
क्षमा,दया, करुणा, सत्य, प्रेम, धैर्य,
पराक्रम, वात्सल्य, औदार्यआदि गुणों के
कारण है, तो भी वह, व्यक्ति विशेष में
तो घटित होगा नहीं। क्योंकि उक्त गुणगण
भगवान् के हैं, भगवदीय हैं-
गुण तुम्हार समुझै निज दोसा।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं।
तेहिं उर बसहु सहित बैदेही।।

इसलिये प्रशंसा होने पर साधु/सज्जन सजग होकर, सिर झुका कर,भगवान् का ध्यान करने लग जाते हैं।
लेकिन कोई दुष्ट जन निन्दा करें, तो उन्हें हमें अपना मित्र बना कर अपने पास रखना चाहिए।वे हमें दुर्गुणों से सचेत करते हैं। यदि दुर्गुण हममें है तो उसे हटाने का यत्न करना होगा और नहीं हैं तो वह मुझमें प्रवेश न करे,सजग रहना होगा-

सन्त कबीर ने कहा-

निन्दक निअरे राखिये,
आँगन कुटी छवाय।
साबुन औ पानी बिना,
निर्मल करे सुभाय।।

देखिये –
शूकरः निन्दकश्चैव विशिष्टौ जगति ध्रुवौ।

सूअर और निन्दक लोग इस जगत् के अत्यंत विशेष प्राणी हैं।
एक हमारे वाह्य मल को जिह्वा से साफ करता है, तो एक हमारे अवगुणों का बखान कर अन्तर के मल को पचा कर अन्त में तो उपकार ही करता है और
अवगुण रूप मल को साफ कर डालता है।
इसीलिये-
तुलसी बाबा ने भी ऐसे निन्दकों की प्रशंसा कर डाली है।सन्त वन्दना के बाद, उन्होंने खलों की वन्दना अनेक दोहे चौपाइयों में की-
बहुरि बन्दि खलगन सतिभाएँ।
जे बिनु काज दाहिने बाएँ।।
सद्भाव पूर्वक, दुष्ट भी बारम्बार प्रमम्य हैं।
जो अकारण अगल-बगल दुष्टता के आचरण में लगे रहते हैं।
परहित हानि लाभ जिन केरे।
उजरें हरष विषाद बसेरे।।
दूसरों की हानि जिन्हें लाभ लगता है।
किसी के उजड़ने पर,हर्ष और बसने पर, जिन्हें विषाद होता है।

बन्दौ खल जस सेष सरोषा।
सहस बदन बरनै पर दोषा।।
दूसरों की निन्दा, रोष पूर्वक करते हुए जिन्हें सुखानुभूति होती है।
शेषनागजी जैसे हजार मुखों से नाम
जप करते हैं वैसे हजार मुखों वाले दुर्जन
दूसरों की निन्दा हजारों मुखों से करते हैं।
अतः वे दुर्जन अभिनन्दनीय हैं।
भैया! प्रशंसा करने वालों से दूर रहना।

एक कथा प्रसिद्ध है-
प्रायः सभी जानते हैं। उल्लेखनीय है कि
वर्तमान मीरजापुर मेंं चुनार तहसील है।
प्राचीन भारत के काशी राज्य के अन्तर्गत आता था।

 प्राचीन काल में यहाँ का राजा मूर्ख "पौन्ड्रक" था। इसके अगल -बगल इसे  प्रशंसक( चापलूस) घेरे रहते थे। इसके पिता का नाम वसुदेव था।

प्रशंसकों ने इसकी प्रशंसा करनी शुरू की और इसे वसुदेव पुत्र वासुदेव कृष्ण कहने लगे। चिकित्सकों को बुला कर इसे शल्य क्रिया से और अधिक दो हाँथ लगवा दिये।वह द्विभुज से चतुर्भुज भी हो गया ।
विमानशास्त्र प्रवीणों को बुलाकर, एक गरुड पक्षी के आकार का विमान बनवाया।और शंख चक्र गदा आदि उसके चारों हाथों में थमा दिया गया।
वह चक्रधारी वासुदेव कृष्ण की तरह नकली गरुड़ पर सवार होकर आकाश में विचरने लगा। अपने को भगवान् कहने लगा।
इसे प्रशंसकों ने असली कृष्ण ही घोषित कर दिया।
द्वारिकाधीश भगवान् को चिट्ठी भेजी गई। कहा गया कि आप नकली कृष्ण हैं।
असली कृष्ण तो महाराज पौण्ड्रक हैं।
और फिर द्वारिकाधीश को आकर इस पौण्ड्रक का वध करना पड़ा।
अब सोचिये प्रशंसकों ने क्या दुर्गति करा दी,उस बेचारे पौण्ड्रक की।

इसीलिये शुक सम्प्रदाय के आचार्य और सिद्ध सन्त बाबा “श्यामचरण दास” ने निन्दकों को बाबा तुलसी और कबीर की ही तरह ही मित्र कह डाला।
भैया! ये बेचारे निन्दक हमें दुर्गुणों और उससे होने वाले पतन से बचा लेते हैं।

प्रशंसकों को अपने पास फटकने मत दीजिये। निन्दकों को सादर रखिये।
इसीलिये कि वे प्रशस्य और
प्रणम्य हैं, सन्मार्ग पर ले जाते हैं।

बाबा श्यामचरण दास को लोग चरणदास भी कहते थे। इन्होंने कबीर तुलसी का अनुवर्तन करते हुए निन्दक को मित्र कहा-
साधो निन्दक मित्र हमारा।
पाछे निन्दा करि अघ धोवै,
सुनि मन मिटै बिकारा।
जैसे सोना तापि अगिनि में,
निर्मल करै सोनारा।
बिन करनी मम करम कठिन सब,
मेटै निन्दक प्यारा।
सुखी रहो निन्दक जग माहीं,
रोग न हो तन सारा।
हमरी निन्दा करनेवाला,
उतरै भवनिधि पारा ।
निन्दक के चरणों की अस्तुति,
बरनौं बारम्बारा।

चरनदास कह सुनिये साधो,
निन्दक मित्र हमारा।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

मानस पुन्य होहिं नहिं पापा

वाह रे प्रभु! आपने ऐसी कृपा क्या कर दी है, कलह युग कलि युग पर।
पतन से बचाने वाले हे पतितपावन!
हे जगदम्बा जानकी! हे राधे!
हे विन्ध्याचलाधीश्वरी!
हे शक्तिमति! मातः! हे भवानि!
हे मृडानि! हे शिवानि! हे रुद्राणि!

गुरु पितु मातु महेश भवानी

सबके माता पिता तो, कलियुग के भी।

हे बाबा कलियुग!

भगवत्कृपा हुईआप पर।
बन बैठे राजा सब जुग कर।

प्रेमियों! जब जिसकी बारी आती है, उसे राजगद्दी तो मिलती है।

शपथ ग्रहण समारोह कलियुग का है।
ऊपर से पूर्व के राजागण सतयुग
त्रेता और द्वापर विस्मय से देख रहे हैं।

भगवत्कृपा से समारोह प्रारंभ हुआ।
न्यौता नहीं था , भूतपूर्व तीनों राजाओं को। सककुचाते ,लजाते, बलखाते,और
ईर्ष्याते भी तीन पूर्व के राजाओं ने अपने
सेवकों से सन्देश भेजा कलियुग के पास।
कहवाया कि आपके तीन मित्र समारोह में शामिल हो कर,निकट से आपको बधाई देना चाहते हैं।
कलियुग ने हामी भरी।
तीनों ने साथ-साथ आकर कलियुग का
शपथग्रहण समारोह देखा।
बधाई दी और गमगीन चले गये।

आखिर इन तीन भूतपूर्व शासकों की समस्या क्या थी? गमगीन क्यों?
कोई जाना नहीं। देखिये-

सतयुग में तप करते-करते थकते जाते हैं।
बड़ी सात्विकता भी थी।बड़े प्रयास से कोई मोक्ष पाता था। क्या कहें माया तो प्रचण्ड है।
त्रेता में ज्ञान -प्राधान्य था। ज्ञान प्राप्ति के लिये कठिन साधना से सिद्धि और मुक्ति मिलती थी।
द्वापर में यज्ञ की श्रेष्ठता रही। विधि पूर्वक
यज्ञादि क्रिया से मानवजीवन का लक्ष्य पूर्ण हो पाता था। लेकिन-

 कलि केवल मल मूल मलीना।
 पापपयोनिधि जल मन मीना।।

लोगों के चित्त को मलिन दूषित किये रहनेवाला कलह( झगड़े)का युग, दान और भगवन् नाम के स्मरण-जप से जीवों को स्पर्श नहीं कर पाता। सद्यः
मुक्ति भी होती ही है।

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुः दानमेकं कलौ युगे।।

बाबा ने कहा-

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव -थाहा।।

कलिजुग सम नहिं आन जुग,
जौ नर करबिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल,
भव तर बिनहिं प्रयास।।

ऐसा यह कलियुग है प्रेमियों!
बड़े -बड़े ऋषि-महर्षि महात्मा गण
तरसते हैं इस युग में जन्मने के लिए।
बड़ी सरलता से भवसागर पार।
क्यों न हो यह सब युगों का सम्राट।

नारायण! सभी युगों में तो ,

कायिक,वाचिक, मानसिक पाप और
पुण्य दोनों होते हैं।
मनवचनकर्म, तीनों से पाप -पुण्य, ये
दोनों बनते हैं, लेकिन यह कलियुग एक बात में सतयुगत्रेताद्वापर से श्रेष्ठ है।
वह श्रेष्ठता इस कलियुग पर भगवत्कृपा बन बरसती है,और इसे सभी युगों का राजा बना देती है।

वह विशेषता है कि, इस युग में मन में हरिस्मरण आदि से पुण्य तो बनेंगे।

लेकिन कि मन से किसी का अहित सोचने पर भी पाप नहीं होगा।

इसीलिये कागभुशुण्डि महाराज ने कहा-

कलि काल का एक पवित्र- प्रताप है,कि इसमें मानस -पुण्य तो होगा,लेकिन पाप नहीं । यही इसके युगराजा होने का कारण है-

कलि कर एक पुनीत प्रतापा।
होहिं पुन्य मानस, नहिं पापा।।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

जग बूझत बूझत बूझै

संसार माया तुम हरो,
करो माँ तुम कुछ करो।
अब मनुशरीर सफल बने,
ममता अहन्ता हैं तने।

जाये न अब तेरे बिना,
यह मोह छाये है घना।
तव चरणपंकजप्रीति हो,
सोऊँ तुम्हारी स्मृति सना।

मोह का है तम घना
दीखे न पथ जाऊँ कहाँ।
विवश बरबस स्थिर खड़ा,
तेरे चरण अब गिर पड़ा।।

यह जगत बहुत विचित्र है,
सपनों सरीखा चित्र है।।
मधु-मधुरता आभासती,
है भ्रान्त माँ मेरी मती।।

मन है विकल चंचल सदा,
क्या यही है मुझको बदा।।
अपने चरण में रती दो,
हे सती! सुन्दरि! गती दो।।

मन का विकार न रह सके,
तव मधुर-गुण-गण कह सके।
भागे अविद्या-जनित भ्रम,
हो प्रीति का ही सतत क्रम।।

जब कृपा माता आपकी,
करुणा मिले शिव-बाप की।
हे भक्ति-मूर्ति-मयी शुभा,
छाँटो तमस दे दो प्रभा।।

तूँ राम हो तूँ कृष्ण हो,
राधे तुहीं तूँ वितृष्ण हो।
तूँ सती सीता राम की,
आधार हो सुख-धाम की।।

तब इसलिये भक्ती-निरत,
कवी अग्रणी तुलसी फिरत
तव भगति-वारि पवित्र चित,
परमात्म जाने जगत-हित।।

रघुपति-भगति-बारि छालित चित,
बिनु प्रयास ही सूझै।
तुलसिदास यह चिद-बिलास ,
जग बूझत बूझत बूझै।।

हरिः शरणम्। गुरः शरणम्।

आजादी का अमृत महोत्सव

अपने प्राण किये जो अर्पण,
उनको शीश नवाते हैं।
आजादी का अमृत महोत्सव,
हम समवेत मनाते हैं।।

रामकृष्ण की पावन धरती,
पराधीनता में जकड़ी।
घायल मेरी धरती माता,
जब रोती थी दीख पड़ी।।

राक्षस मलिनमूर्ति दुष्टों ने,
तोड़े थे जब हरिमन्दिर।
भोगवासना-दृष्टि कलंकित,
हुई नारियाँ जब फिर-फिर।।

हीरा-सोना औ मणि-माणिक,
जब उन म्लेच्छों ने लूटे थे।
लक्ष्मीबाई-शिव-राणा- बल,
छद्मी-छक्के तब छूटे थे।।

धर्म और पथ-भ्रष्ट विधर्मी,
लोग किये जब अनाचरण।
वृद्ध-युवा आ- बाल चेतना,
जगी हुआ संकल्पित रण।।

खाओ-पीओ मौज मनाओ,
की आई जब विकृति यहाँ।
गान्धी-बिस्मिल-मंगल पाण्डे,
किये विरोध सुभाष जहाँ।।

अंग्रेजों की भोगी-संस्कृति,
छाई छाया तमस घना।
आजादी-बलि-वेदी पर ,
“आजाद ” दिखा तब रक्तसना।।

भगत-वीर -सावरकर जैसे,
वीर बने ” नरसिंह ” यहाँ।
ऐसे वीरों की धरती सोचो,
रहती परतन्त्र कहाँ ।।

पन्द्रह अगस्त सैंतालिस की,
शुभ मंगल वेला जब आई।
हुई स्वतन्त्र भारती- माँ,
सम्पूर्ण -देश खुशियाँ छाई।।

भगवत् -स्वरूप उन वीरों का,
यश झूम-झूम कर गाते हैं।
आजादी के पहत्तरवें बरष,
हरष हरषाते हैं ।।

अपने प्राण किये जो अर्पण,
उनको शीश नवाते हैं ।
आजादी का अमृत-महोत्सव,
हम समवेत मनाते हैं ।।

हरिः शरणम्। गुरुः शरणम्

पर दुख दुखी सन्त सुपुनीता

बिना कारण के सबका उपकार करने वाले इस जगत में केवल भगवान् और उनके भक्त ही हैं,क्योंकि कौन नहीं जानता-

हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।

कबहुँक करि करुना नर देही ।
देत ईश बिनु हेतु सनेही।।

करुणासिन्धु भगवान् ने तो अत्यंत कृपा करुणा करके बार-बार के नाना देहों में पतन से मुक्त करने के लिए यह मनुज तन हमें प्रदान किया है।यह उनकी अहैतुकी कृपा है।यह उनकी अपने ” अंश ” जीव पर प्रकट ममता और वात्सल्य गुण है।
उन्हें सब से ममता है-

सब मम प्रिय सब मम उपजाए।
वह- वात्सल्यगुणसागर हैं।

और सन्त/भक्त नारद जी ब्रह्मलोक तक की परिक्रमा करके निराश जयन्त को
देखकर करुणा द्रवित हो जाते हैं।
और भगवान् की शरणागति देकर उसके प्राण बचाते हैं-

नारद देखेउ बिकल जयन्ता।
दया लागि कोमल चित सन्ता।।

अरे नारायण! प्रकृति से तमोगुणी राक्षसी लंकिनी भी सन्त समागम को अतुलनीय कहकर, श्रीहनूमान् जी जैसे सन्त/भक्त का सम्मान करती है,और वह भी पिटने पर।
लगता है रुद्रावतार के हाथों का स्पर्श पाकर ,वह धन्य -धन्य हो गई है-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख,
धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि,
जो सुख लव सतसंग।।

भगवान् भोलेनाथ भगवती उमा से सन्तसमागम की प्रशंसा करते हैं।
किन्तु यह सन्त/भक्त सन्निधि भी श्रीहरि – हाथों में ही है-

गिरिजा सन्त समागम,
सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरिकृपा न होइ सो,
गावहिं वेद पुरान।।
रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्ह कै सतसंगति अति प्यारी।।

कागभुशुण्डि जी भी सन्तमिलन को दुर्लभ बताते हैं।हरिकृपा से यदि पल भर के लिए, क्षणमात्र के लिए, हो जाय तो मनुष्यता आ जाय और जीवन सार्थक हो जाय-

सतसंगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।

और क्या कहें , कागभुशुण्डि जी जैसे भगवल्लीन वक्ता, और पक्षिराज गरुड जी जैसे भक्त श्रोता के मध्य जब श्रीराम
जी की कथासुधासरिता बहती है, तब जीव, धन्य होने का मार्ग,बरबस पा ही जाता है। श्रीरामकथा केवल कथा नहीं है भैया!
यह अमृत है, यह जीव को अमृत कर डालती है, फिर कोई डाली नहीं पकड़नी होती।
श्रीगरुड जी, श्रीकागभुशुण्डि जी को श्रीराम चरणों का अनुरागी, और बड़भागी
मानते हैं। सन्त,वृक्ष,सरिता, पर्वत और और धरती जैसा कोई पर उपकारी नहीं।
वे गा उठते हैं-
पूरन काम राम अनुरागी।
तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।

और सन्तो/भक्तों का कोमल हृदय तो
मक्खन के समान सुकोमल है, ऐसी उपमा देकर कविगणों ने सही तुलना नहीं की है।
वस्तुतः मक्खन तो स्वयं के ताप से पिघलने वाला है, किन्तु सन्त, दूसरों के सन्ताप,विषाद के परिताप से पिघल कर दुखी जनों को उनका खोया हुआ ” राम “
देकर संसार- ताप को सदा -सदा के लिए
नष्ट ही कर देते हैं। और जीव कृतकृत्य हो जाता है-

सन्त हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह पर कहै न जाना।।

निज परिताप द्रवइ नवनीता।
परदुख दुखी सन्त सुपुनीता।।

हरिः शरणम्। गुरः शरणम्।

को कृपालु संकर सरिस

अरे भाई माँगना हो तो काशीश मसान निवासी शिव से माँगना चाहिए।
इनसे बड़ा दयालु कौन?
रावण भस्मासुरादि तक को क्या-क्या नहीं दे दिया।
अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति,प्राकाम्या,ईशित्व, वशित्व आदि
आठों ,आपकी दासी हैं।
जाँचिए गिरिजापति कासी।
जासु भवन अनिमादिक दासी।।

हनुमदावतार में भी आप जगदम्बा श्रीजानकी जी की कृपा से अष्टसिद्धियों, नवनिधियों को बाँट रहे हैं-

अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।

आपकी कृपालुता ऐसी,आप ऐसे अवढरदानी हैं कि थोड़ी सी सेवा से पिघल जाते हैं।दीनानाथ ऐसे कि, किसी दीन हीन याचक को हाथ जोड़े देखना,
आपको बर्दाश्त नहीं-

सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।

औढरदानि द्रवत पुनि थोरे।
सकत न देखि दीन कर जोरे।।

ऐसे उदार उमापति!
तुम पुनि राम राम दिनराती।
सादर जपहु अनंग अराती।।

आप तो राम राम जपते हुए याचकों को सब कुछ बाँट रहे हैं। याचक जैसा परम प्रिय आपको दूसरि नहीं-

दानी कहुँ संकर सम नाहीं।
जाचक सदा सोहाहीं।।

आपको छोड़ अन्य जगह जो माँगने जाय, तो उसका पेट कभी नहीं भरेगा।

ईस उदार उमापति परिहरि।
अनत जे जाचन जाहीं।।
तुलसिदास ते मूढ़ माँगते।
कबहुँ न पेट अघाहीं।।

और क्या कहें, जब समुद्रमन्थन होने पर
उसमें से निकले ” कालकूट ” विष की विषमज्वाला से सभी देवता राक्षस जलने लगे, तब आप अत्यन्त कृपालु होकर सभी की प्राणरक्षा के लिये क्षणमात्र में उस गरल को पी गये-

कालकूट-जुर जरत सुरासुर।
निजपन लागि किये बिषपान।।
(श्रीविनय पत्रिका)
जरत सकल सुर वृन्द,
विषम गरल जेहि पान किय।
तेहि न भजसि मतिमन्द,
को कृपालु संकर सरिस।।

( किष्किन्धा-श्रीमद्रामचरितमानस)

।।हरिः शरणम् ।।
।।गुरुः शरणम् ।।

सनमान निरादर आदरहीं।सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।

” मानस ” के उत्तर काण्ड में प्रभु श्रीराम
जब अयोध्या पधारते हैं। तब उनके आगमन की सूचना सर्वप्रथम श्रीहनूमान् जी महाराज विप्रवेश में आकर श्रीभरत जी को देते हैं।सूचना देकर हनुमानजी चले जाते हैं।
भगवान् पुष्पक पर आरूढ़ होकर अयोध्या में उतरते हैं। पुष्पक को वापस श्रीकुबेर जी के पास जाने का आदेश देते हैं। पहले ” वेद ” मूर्तिमन्त होकर उनकी
स्तुति करते हैं।
नाना देवगण भी इस अवसर पर पधारे हैं।आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है।
यहाँ अयोध्या में ” माया ” का कोई साम्राज्य नहीं है। मायापति भगवान् की नगरी जो ठहरी। ब्रह्मा जी भी आकाश से
फूल बरसा रहे हैं।
आनन्दमग्न देवाधिदेव भगवान् शिव भी आकर भगवद् स्तुति करते हैं।और

इधर –
माया को देखें तो, इन्द्रिय दृश्य नहीं।
विचारने पर यह बात समझी जा सकती है, कि है वह बड़ी प्रचण्ड।
मायाधीश जिसकी माया हर लें,वही कृतकृत्य हो सकता है और मान अपमान से परे वास्तविक आनन्द में रह सकता है।हाँ सन्त तो ,
माया से परे हैं।लेकिन वस्तुतः विरागी और भगवदुन्मुख हों।
महाभारत में भगवान् की माया के सम्बन्ध एक कथा आती है-

एक महर्षि थे नाम था ” बट तालव्य “
अनादि काल से बैठे वे तपश्चर्या लीन थे
शिरोभाग पर एक बट का पत्ता रखकर
उसे ढँके हुए थे। जंघाओं के मध्यऔर अगल बगल भी अनेक वृक्ष उग आए थे।
सहसा मायापति लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण इनके सामने प्रकट हुए।
लीलाधारी जो ठहरे ,लीला करनी चाही।

महर्षि बटतालव्य की समाधि खण्डित हुई। जब नेत्र खोले तो सामने भगवान्। वे
समझ गए कोई लीला होगी।
भगवान् ने अपनी माया छोड़ दी।ऋषि मोहित,भ्रमित हुए।
भगवान् ने पूछा आप कब से तपोलीन हैं। ऋषि ने कहा काल ने सब विस्मृत करा दिया है। आप कालों के काल हैं, पूछते क्यों हैं। सैकड़ों ब्रह्मा और सहस्रों लोमश ऋषि अपना काल हमारे सामने पूरा करके जा चुके हैं। कब से मैं इस समाधि में हूँ, नहीं मालुम।अब देखिये। माया का प्रभाव बड़ा ही चित्र-विचित्र है।
अब आगे क्या होता है?
आश्चर्य चकित ऋषि इतने में ही ब्रह्मलोक में पहुंच गए।चतुर्मुख ब्रह्मा से वेदसम्बन्धी वार्ता चलने लगी। थोडी देर में
ब्रह्मा जी भी मायावशत्वेन उन महर्षि बटतालव्य से वादविवाद करने लगे।
माया कृत अभिमान चढ़ बैठा। एक बवण्डर आया दोनों चतुर्मुख ब्रह्मा और
वे ऋषि उड़ने लगे।
हवा का प्रचण्ड वेग रुका और दोनो लोग एक दूसरे ब्रह्माण्ड के द्वार पर जा
पहुँचे। द्वारपालों से पूछा तो पता चला कि यह भी अलग ब्रह्माण्ड है।
चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने कहा यहाँ कौन रहता है। उत्तर मिला अष्टमुख ब्रह्मा।
अनुमति पूर्वक ऋषि के साथ दरबार में गए।वहाँ अष्टमुख – चतुर्मुख ब्रह्मा और ऋषि की वेद चर्चा चली। पुनः विवाद हो गया। फिर तूफान आया,और तीनों भँवर में घूमने लगे।
शान्त होने पर तीनों ,तीसरे ब्रह्मलोक के द्वार पर खड़े थे। पूछने पर पता चला यहाँ षोडश मुख ब्रह्मा विराजते हैं।
द्वरपालों की आज्ञा से भीतर प्रवेश मिला। षोडश मुख वाले ब्रह्मा जी के साथ
सत्संग प्रारंभ हुआ।और धीरे-धीरे कहासुनी होने लगी। पुनः शान्ति भंग हुई।
तूफान में चार, आठ ,सोलह मुख वाले ब्रह्मा और बटतालव्य उड़ने लगे।
तूफान कम होता है और चारों एक चौथै ब्रह्मलोक के दरवाजे पर खड़े हैं।
पूछने पर पता चला यह बत्तीस मुखी ब्रह्मा जी का दरबार है।
चार ,आठ ,सोलह,बत्तीस और बटतालव्य ऋषि की परस्पर वार्ता में विवाद होता है। और वे सभी चौसठ मुखी ब्रह्मा के लोक में पहुंच चुके होते हैं।
इस तरह शतमुख ब्रह्मा ,सहस्र मुख ब्रह्मा के लोक तक जाने और विवाद की निरन्तर परम्परा चलती जाती है।
भगवान् अपनी माया को खींच लेते हैं। क्रमशः सभी ब्रह्मा गण अपने -अपने
लोक में और बटतालव्य ऋषि धरती पर पद्मासन में विराजे दीखते हैं।
भगवान् के आगे ऋषि विनत हुए।
माया खतम ,अभिमान खतम।

माया कृत गुन दोष सब।

हे प्रभु हरहु आपनी माया।

बालि बध के उपरान्त, माया की वशीभूता
तारा अत्यंत व्याकुल हो जाती है।
भगवान् कृपालु हैं। माया को खींच लेते हैं। तारा आनन्दमूर्ति बन जाती है।
वैकुण्ठ की अधिकारिणी हो जाती है।

तारा बिकल देखि रघुराया ।
दीन्ह ज्ञान हरि लीन्ही माया।।

     अब बात ये है कि, मायापति अपने प्राणप्यारे सन्तो/भक्तों की माया हरते हैं।

बिना हरिगुरुसन्त अनुग्रह के यह जीवन कृतकृत्य नहीं होगा।
हम मानापमान के परे उन्हीं की कृपा से हो पाते हैं।

मानापमानयोः तुल्यः
तो हरिः ओ3म् तत् सत् कृपा पर आधारित है। इसीलिये हमारा सनातन
तो हरिहरात्मक है।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।

भक्त/सन्त इससे परे हैं।
इसीलिये मंगल भवन अमंगल हारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, भगवान्
उममहेश्वर, वन्दनीय श्रीराम जी की वन्दना में भक्तोचित भाव से गाते हैं-

सनमान निरादर आदरहीं।
सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।।

।। हरिः शरणम् ।।
।। गुरुः शरणम् ।।

दर्शनादेव साधवः

भगवान् के प्राणप्यारे सन्त/भक्त अपने दर्शन से ” जीव “को कृतार्थ कर देते हैं।
अप्(जल) मय अर्थात् नदी तीर्थों में जाकर, सविधि स्नान करने पर पाप नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है।
मृत्(मिट्टी) पत्थर आदि शिलाओं से निर्मित ,प्रतिष्ठित प्रतिमाओं का भी श्रद्धा भक्ति पूर्वक अर्चन करके, अभीष्ट सिद्धि होती है।
किन्तु इन दोनों विधियों में स्वयं तत्पर होना पड़ेगा। समय भी लगेगा, तब जाकर
नाना ऐन्द्रिक शुद्धि पूर्वक,मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होगी।
लेकिन ” अजामिल ” आदि का प्रसंग ऐसा है, जहाँ सन्त/भक्त स्वयं दर्शन देकर
पतित अजामिल को ” पतितपावन ” का
” वैकुण्ठ लोक ” अकुण्ठित गति से
प्राप्त करा देते हैं। और मानो सन्त दर्शन से , ” मनुष्यता ” ही कृतार्थ हो जाती है।
उस अजामिल को अपना कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
इससे भी आगे बढ़कर एक विलक्षण बात होती है, जब नाना लोकों और यहाँ तक कि ” ब्रह्मलोक ” तक जाकर वह
बैचारा थका हारा ” जयन्त ” लौट आता है। भगवान् श्रीराम द्वारा छोड़ा गयी वह
” सींक ” काल बन कर पीछे से दौड़ाती हुई पीछा नहीं छोड़ती। वह निराश हो जाता है।जीवन संकटापन्न हो जाता है।
तभी नारद जैसे सन्त उस जयन्त की विकट संकट अवस्था देख कर द्रवित हो जाते हैं।

नारद देखेउ बिकल जयन्ता।
लागि दया कोमलचित सन्ता।।
विलक्षणता क्या कि जयन्त, नारदजी को नहीं देखता, स्वयं दयार्द्र नारद उसे देख लेते हैं।और कोमल चित्त महात्मा उसके उद्धार का मार्ग उसे बता देते हैं।
वह जयन्त आत्मोद्धार कर लेता है।
यहाँ भी साधु, स्वयं दर्शन देकर ही
जीव को कृतार्थ कर जाते हैं।
अजामिल और जयन्त ,इन दोनों की उक्त घटनाओं में अद्भुत साम्य है, जहाँ
साधु/ सन्त स्वयं अपना दर्शन देकर
जीव को धन्य-धन्य कर देते हैं।और
इसीलिये भागवत पुराण में भक्त और भगवान् के तादात्म्य से उद्धारक्रिया शब्दों बह जाती है-

नह्यम्मयानि ( न हि अप् मयानि)तीर्थानि,
न देवा न मृच्छिलामयाः ।
ते पुनन्ति उरुकालेन,
दर्शानादेव साधवः।।

।। हरिः शरणम् ।।

।। गुरुः शरणम् ।।