बिनु बिस्वास भगति नहिं

जब इस मुक्तसाधिनी काया में
श्वास वायु “वि” अर्थात् “विशेष” हो।

वह “विशेष” ओर कोई नहीं है।
वह श्रीसीतारामजी ही हैं।

जिसमें कोई शेष बचता ही नहीं
वही ” विशेष “
इस तरह जब विशेष श्वास होगी तब, यह काया अपनी सार्थकता सिद्ध करेगी ।

सार्थकता क्या है? भक्ति की प्राप्ति । और भक्ति का अर्थ क्या ?

भक्ति शब्द संस्कृत व्याकरण की

दृष्टि से अनेकार्थी है। इस शब्द का
निर्माण दो धातुओं से है।
एक है भंग और दूसरा है सेवा –

1- भञ्ज् ( मर्दन,खण्डन )धातु से
अर्थ मानें तो, इसका अर्थ , है – संसार के प्रति मोह-भंगता

संसार प्रिय न लगना

2- दूसरा है, सेवा भज् सेवायाम् धातु भी संस्कृत

धातु-पाठ में पढ़ी गई है।

अतः भक्ति माने “सेवा-भावना”

अब , इसमें दूसरा “सेवा भावना”
वाला अर्थ प्रायः ज्ञात है ।

तब इसका मतलब है, भगवद्
भागवद् भाव से संसार की सेवा

तात्पर्य कि संसार, तो भगवत् स्वरूप
वाला ही है ।अतः सभी को भगवद्
दृ्ष्टि से देख कर व्यवहार

जड़ चेतन जग जीव जत,
सकल राममय जानि।
बन्दउँ तिनके पदकमल,
सदा जोरि जुग पानि।।

सियाराममय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।

संसार का सेवन सर्वत्र
सब को श्रीराममय मानकर
करो।

और जब यह संसार हमारे “सेव्य”
श्रीराम से ओत-प्रोत है, तब

तब हम इसके सेवक(भक्त) हैं।

पहला वाला अर्थ, संसार के
वस्तु व्यक्ति पदार्थ से मोहभंग तो स्वतः ही सिद्ध हो जायेगा क्योंकि -

“जो मोहिं राम लागते मीठे”
विनयपत्रिका

संसार ही भंग हो जायेगा राम ही संग हो जायेगा। इसलिये कि हमारी श्वास का प्रत्येक अनुक्रम राम ही निकालेगा यह श्वास - प्रश्वास में बहने वाली राम-हवा, तो

नारायण ! सभी पतनों दुःखों

की हवा ही निकाल कर रख देगी ।

राम ही विश्वास, विशिष्ट श्वास हैं ।

इन्ही की भक्ति कल्याण करी है ।
श्वास से प्रश्वास से अन्दर -बाहर
होता यह सतत प्रवहणशील राम तो हनुमान का आकर्षण करके आकर्षक-संसार-लंका अवश्य जलायेगा।

यह राम ही कल्याण करेगा ।

इसलिये कहा – "बिनु बिश्वास भगति नहिं," तेहिं बिनु द्रवै न राम।

रामकृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह विश्राम।।

गुरुः शरणम् ।। हरिः शरणम्

कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम्

नाना नाम रूपारूपात्मक जगद्
के सर्जक पालक और शामक

लसल्लीलाललाम सर्वकामकाम
कोटिकन्दर्प-दर्पदलन
सन्तसाधुसर्वैकप्राण
आरतार्तिभक्ततारण
जगन्मायाविस्तारण
प्रपञ्चपाथोधिदुस्तरोत्तारण
मोह-मद-क्रोध-रिपुमारण
वसुदेव-सुत-स्वयंभव-स्वीकारण
कंस- चाणूर – गर्व – खर्वीकृत -रण
देवकी-परमानन्द-पूर-कारण
जगदन्धकार-प्रकाश-विस्ताण

अर्जुन -मनोमालिन्य -मल -निवारण

एकतान-सन्तानित-भक्ति-विस्तारण

संसार-प्रियत्व-कुंजर-विदारण

मायावश-विवशीभूत-मायापहारण

उन्मुक्त -मन -मीन -स्वकीयचरण –
जल – उत्ताल -जलधि –
विहार -विहारण समस्त -भक्त -सर्वदा -नन्दकारण

गोपिका-शान्ति-कल-कान्ति-सारण छलितगोपि-राधा-रूप-ग्रहण

रस-रास-रसेस-रासेस-सार-सारण

सच्चिदानन्द-सर्वकारण-कारण

नमामि सततं सराधिकम् त्वाम्

गुरुमखण्डा -नन्त -ब्रह्माण्ड -नायकम्

वासुदेव-सुतं देवं,
कंस-चाणूर-मर्दनम् ।

देवकी-परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

जरइ नगर अनाथ कर जैसा

सन्तो साधुओं की अवज्ञा अनर्थ ही
उपस्थित कर देगी।

इसलिये कि इनका आदेश तो
मूर्तिमती मर्यादा है।

छल कपट और अभिमान वश
सन्त आज्ञा की अवहेलना होती है।

और रावण तो इन सभी विग्रह ही है।श्रीहनूमान् जी महाराज तो जैसे साधुसन्त के अपर शरीर हैं।

जगदम्बा जानकी मूर्तिमती बुद्धि हैं।

ऐसी अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका
से अजर अमर गुननिधि सुत होने
का वरदान पा चुके,
वानर रूप धरे सुर कोई,
देवाधिदेव महादेव के अवतार,
परमपरमसन्तरूप इनके वेदानुशासन को ठुकराने

का दुःसाहस करने वाले,
मायावी रावण की लंका
जल कर नष्ट भ्रष्ट हो जाती है।

और जो अपराध भगत कै करई।
राम रोष पावक सों जरई ।।

माँ सीता को सादर श्रीरामजी के
पास नहीं भेजने की अवज्ञा,

करने वाला रावण, तो भक्त नहीं,बल्कि
भक्तराज और ज्ञानिनामग्रगण्य
या कहिये भक्तशिरोमणि हनूमान् जी
के प्रति अपराध का दोषी है।

और नारायण! जलती है लंका तो
अग्निकाण्ड का कोई दोष नहीं
वह श्रीरामजी के रोष(क्रोध)से
जलती है।

जलती है तो जैसे इस बेचारी लंका
का कोई नाथ( स्वामी)नहीं।

इसलिये कि विश्वनाथ इसके
“जलने” और “जलाने” के मूल
में जो हैं।एक ऐसा भी स्थल है जो इस

अग्नि क्रिया से अबाध्य है।

और अबाध्य है तो अबध्य है वह
नाम है, राक्षसकुलभूषण
विभीषण
और उसकी कुटी

पलक झपकने के समय मात्र में
जली लंका।

जारा नगर निमिष एक माहीं।
एक विभीषण कै गृह नाहीं।।

और ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा
जरा सो तेहिं कारन गिरिजा।।

भगवान् उमाशंकर ने कहा कि वह
इसलिये नहीं जरा कि अग्नि के
उत्पत्ति कर्ता नारायण का ही वह
दूत जो है । अब सोचिये सर्वकारणकारण " सर्वशिक्षक" स्वयं "परमात्मा" के लीलावतार श्रीसीताराम की आज्ञा से पहुंचे रघुपति प्रिय भक्त भक्तशिरोमणि

जो इसके पहले सुरसा -लंकिनी
आदि को, शिक्षित करके अभी -अभी आये हैं , उनकी

शिक्षा न मानना दुष्फल ही देगा –

साधु अवज्ञा कर फल ऐसा ।

जरइ नगर अनाथ कर जैसा।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।
शिक्षकः शरणम् ।

सन्त हंस गुन गहहिं

सन्त हंस हैं।
साधना क्षेत्र में यह हंस तो
जीव है। हंस का अन्यार्थ जीव है।

और जीव कैसा कि विशुद्धान्तःकरण।

सन्त का मन, इनकी बुद्धि, चित्त और
अहं, ये चारों निर्मल होते हैं।सन्त स्वयं निर्मल होते हैं।

निर्मलता सर्वप्रथम मन की होती है।क्योंकि "सा विद्या या विमुक्तये"

इनमें प्रविष्ट है।
ये भी भगवान् की तरह करुणा
करके किसी भी योनि में पड़े जीव
को सद्यः मुक्ति दे देते हैं।

अत्यन्त विनय, धैर्य, और प्रेम की
प्रतिमूर्ति हैं सन्त।

ज्ञान विज्ञान सम्पन्न और वह
ज्ञान विज्ञान इनमें प्रविष्ट होने से
मुक्ति दाता हैं सन्त।

भगवान् ने अपने अवतरण का
कारण इन सन्तों को बताया-

विप्र धेनु सुर सन्त हित
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।। सन्तो का स्मरण, प्रभु सभी के अन्त

में करते हैं।
ऐसा लगता है कि, ये अपने पूर्व
के विप्र धेनु और सुर( देवता) सभी
के आधार हैं। सुन्दर काण्ड में प्रभुश्रीराम ने इन

सन्तों को अपना अत्यंत प्रीतिपात्र
कह दिया है।
भगवान् के “प्रेयान्” इन्हीं सन्त
जनों के लिये सविशेष, उनका
अवतार होता है।

विभीषण के लिये प्रभु ने कहा-

तुम सारिखे सन्त प्रिय मोरे।
धरौं देह नहिं आन निहोरे।।बालकाण्ड के प्रारंभ में बाबा इन सन्तों को हंस की उपमा देते हैं। संसार और शरीर तो जड़ प्रकृति का

अंश होने जड़ ही है।

प्रकृति सद् रजः तमः त्रिगुणमयी
होने गुण -दोष का कोष है।

लेकिन भगवान् के प्राणप्रिय ये सन्त
निर्मल हैं।

और बड़ी बात कि ये दूध को दूध और
पानी को पानी करने वाले हैं।
जो गुण “परमगुरु” ने “हंस” पक्षी
को दिया है।वह इनमें भी है।ये सन्त गोस्वामी जी की मति में हंस हैं तो इनके ऊपर विद्या की अधिष्ठात्री " सरस्वती"

तो विराजेगी ही। सरस्वती इन पर
हमेशा सवार है।और सारस्वत कृपातः ये अत्यंत

विनयी, विवेकी, और गुण-दोष का
पार्थक्य करने वाले हैं-

जड़ चेतन गुण दोषमय,
विश्व कीन्ह करतार।
सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्

रूप स्वामि भगवन्त

अरे,नाना शरीरों में अनेक युगों से
मलमूत्र का बर्तन ही तो ढो रहे हैं।

मेरी भवबाधा प्रभु! आप ही हर सकते हैं अथवा आपके प्राणप्यारे सन्त-

मेरी भव बाधा हरो राधानागरि सोय

सन्त इसलिये कि परम करुणा के
विग्रह हैं,वे।

“भक्तमाल” ग्रन्थ के अनुसार
सन्तों ने हाथी,ऊँट,सर्प, श्वान
आदि भोग योनियों में पड़े जीवों
को भी रामनाम सुनाकर मोक्ष दिया ।

तो हम परमार्थी जीवों पर कृपा करुणा
क्यों नहीं करेंगे।

अवश्य किया है करते हैं और करते ही
रहेंगे।

पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाऊ सहज खगराया।।

इन मुक्त सन्तो के अपने जीवन का
कोई स्वार्थ नहीं।

कारुणिक श्रीरामकृष्ण नारायण

की तरह इनमें भी करुणा हैं।

भगवान् करुणा वशीभूत हैं।किसी
अपने को दुखी देख नहीं सकते।

जिसने भी कह दिया मैं आपका हूँ।
आप तो रीझ ही जाते हैं।

आपका ही संकल्प है-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये।

जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न

आपके सेवक सन्त साधु भक्त भी
आपसे अन्य नहीं हैं।

इसीलिये यह सन्त साधु अनन्य
कहे गए हैं।और इसी अनन्यता से
ये मुक्तात्मा आपकी तरह ही मुक्ति भी
बाँटते हैं।
ये मुक्त सन्त तुलसी कबीर
तो भगवदाज्ञा से धरती पर आये थे।
और आकर अपनी अमृत वाणी से
जीवों को अमरता दी।और दे भी रहे।
ये सभी –

बिना कारण कृपा करने वाले हैं-

हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।

हे प्रभु! आपने गीता में गाया है-

सद् असद् च अहम्- 09
न सद् नासद् उच्यते-13

गुत्थी सुलझती नहीं।लेकिन लगता है,

“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”

संसार आपका कार्य है।और,
आप, तो सर्वकारणकारण

यह संसार आपकी भृकुटी के विलास
से जन्मता, विलीन होता है-

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई।

नारायण!

अनन्य भाव से भजने (सेवा जप
स्मरणादि करने)वाले महात्मा
अप्राप्त की प्राप्ति(योग) और
प्राप्त की सुरक्षा(क्षेम) आपके द्वारा
ही सहज पा जाते हैं।

प्रभु! आपका ही उक्त संकल्प है-

अनन्याः चिन्तयन्तो मां,
ये जनाः परि उपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहामि अहम्।।

अपने ही पूर्व श्रीरामावतार में भी आप
ऐसा ही उद्गार व्यक्त करते हैं।

जिसकी बुद्धि निर्मल है और विवेक
पूर्वक,
तस्य निःश्वसिता वेदाः

आपकी श्वास से जन्मे वेदों और
उसके आचारक सन्तों पर विश्वास
करते हुए, सियाराम मय सब जग जानी
का स्वरूप, जिन्हे दिखता है, वही
आपके,
अनन्य सेवक हैं।और
आप सर्वसेव्य।

अतुलितबल धाम श्रीहनूमान् जी
महाराज से आप बोल पड़े थे।

यह सचराचर जगत् मेरा(प्रभु का )
रूप मानने वाले और ऐसा मानकर
तदनुकूल आचरण करनेवाले,

अनन्य सेवक सन्त भक्त हैं,जिनकी

बुद्धि इसी बिचार पर दृढ है-

सो अनन्य असि जाकी,
मति न टरै हनुमन्त।
मैं सेवक सचराचर,

रूप स्वामि भगवन्त।।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम् ।

सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ

आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी और ज्ञानी

ये सभी भगवान् के अनन्य भक्त हैं।

   हम जैसे विषयी मलिन जीव तो 

केवल श्रीहनुमान् जी नारद शुक
सनकादि जैसे अनन्य भक्तों का
ही स्मरण कर कृतार्थ हो सकते हैं।

लेकिन अन्तःकरण तो मलिन है।
भगवान् और उनके
प्राणप्यारे भक्त कैसे हृदय में बसें?

आँखे जगद् को ही देखती हैं।
अँखियाँ हरिदर्शन को प्यासी
कब होंगी?
संसार का रूप बसा है बरबस

 बस,अब बहुत हो चुका प्रभु! 

कानों में संसारी बातें प्रवेश कर
चित्त को मोहती हैं।

हटा दो , मिटा दो ,यह
संसारप्रियता

हे भगवद् भक्त अनन्य शरण!

    किसी और नाम रूप को 

कभी ध्यान में नहीं लाने वाले
रूद्रावतार प्रभु! भक्तराज!
अंजनीगर्भ-अम्भोधि-सम्भूत!
केसरीचारुलोचनचकोर!
चण्डकर-मण्डल- ग्रासकर्ता!

ऐसे अनन्य भक्त और साधु
सन्त के रखवारे
कृपा करो, कराओ अपने ही
हृदेश में राजाराम का दर्शन

किष्किंधा काण्ड में आपने
प्रभुश्रीराम को पहचान कर कहा था
कि आपके बिना आपकी दुस्तर
माया के पार कोई जा नहीं सकता-

नाथ जीव कर माया मोहा।
सो निस्तरै तुम्हारेहि छोहा।।

आप तो भगवान् के प्रियतम हैं।

   ऐसे भक्त कि रामनाम स्मरण 

करते करते “उन्हें” वश में कर लिया-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस करि राखे रामू।।

किष्किंधा पर्वत पर, तो भगवान् को 

पहचान लेने पर आप प्रभुचरणशरण
हो गये थे-

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।।

आप रोमांचित होकर कुछ बोल
नहीं पाए।

जिसकी रचना इतनी सुन्दर
वह कितना सुन्दर होगा।

आप देखते ही रह गये थे ।
“रहेउ ठटुकि एकटक पल रोके”
ऐसे विभीषण की तरह-

पुलकित तनु मुख आव न बचना।
देखत रुचिर बेस कै रचना।।

भगवान् ने आपको लक्ष्मण से भी
अधिक प्रिय कहा था-

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना ।
तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ।।

        भगवती 

जगदम्बा जानकी आशीष जो था-

आसिष दीन्ह रामप्रिय जाना।
होहुँ तात बलशील निधाना ।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू।।

बाबा ने कहा-

सेवक( भक्तसन्त) तो आपके नाम के
भरोसे रामभरोसे ।

जैसे कि माता के भरोसे पुत्र।

माता कभी भी अपने पुत्र को
विष का लड्डू देखकर उससे
छीन कर फेंक ही देती है, क्योंकि

वह पुत्र तो उस माता के भरोसे है।

  आप भी संसारविषयविष को,

विषवत् हटाइये।आखिर मुझे इतनी
प्रीति क्यों?

हम आपके, आप हमारे
आप सेव्य हम सेवक ।

अब बाबा की बानी कुछ काम बनाती
दीखती है। हमारा संसार शोक
आपकी सेवा से मिटेगा-

सेवक सुत पति मातु भरोसे।
रहै असोच बनै प्रभु पोसे।।

मैं किसी अन्य देवादि की शरण
नहीं जाउंगा ।

समदर्शी हैं, सभी शरणागतों पर
अनुग्रह आपका स्वभाव है-

समदरसी मोहि कह सब कोऊ।

सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ।।

हरिः शरणम् ।।   गुरुः  शरणम् ।।

समञ्जस! त्वां विरहय्य काङ्क्षे

हे सर्वसमर्थ! अकारणकरुणावरुणालय
आर्तों के आर्तिहर अज्ञानतिमिरहर
सर्वार्थदाता ज्ञानप्रकाशप्रदाता

आपकी कृपा करुणा बिना
ब्याकुल तो यह जीव रहेगा ही।

करुणाकर करुणानिधि तो
विश्वास रूप ही हैं।

बिनु बिस्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।

बिना विश्वास भक्ति कैसी-

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिश्वासा।
बिनु हरिभजन न भव भय नासा।।
देखिये भक्ति का का अर्थ सेवा भी है।

भगवान् के सर्वश्रेष्ठ सेवक भक्तराज
श्रीहनूमान् जी महाराज –

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई।
जबत तव सुमिरन भजन न होई।।

आशय क्या?
संसार -शरीर सेवन ।अर्थात्-
रूपया पैसा मान बड़ाई पद प्रतिष्ठा
मन में बैठा तो चूके। और पतन।
यानी की कर्मजाल तनेगा ।
अच्छा बुरा भोग ।
इन्द्र यक्ष गन्धर्व शूकर कूकर भोगों
शरीरों का मिलना।

इसलिये वह भक्त आर्त- चातक
जिज्ञासु – कोयल
अर्थार्थी- तोता
ज्ञानी – चक्रवाक
बन कर प्रिया-प्रिय के इस धरती पर
प्रथम मिलन की रूपमाधुरी-रस के
आस्वाद का आतुर है।
और काल है श्रीसीताराम- विवाह
का अनादि -नित्य उपस्करण साधन।

1-आर्त भक्त अत्यन्त अनन्य प्रेमी
है। जैसे चाहहुँ तुमहिं समान
सुत के कामी महाराज मनु।
और अन्यद् जन्म में श्रीदशरथ।
यही चातक पक्षी है। आप सरिस खोजहि कहँ जाऊँ। कहकर स्वयं दशरथ बने मनु को धन्य करने तद् जन्य श्रीराम। और इन्हीं श्रीराम के वन जाने पर परम दुखी श्रीदशरथ जी महाराज की आर्ति अद्भुत है। भगवान् का सबसे बड़ा भक्त यही आर्त है। जिसके प्राण तो सर्वप्राणनाथ प्रभु ही हैं।

व्याकुल हैं विक्षिप्त हैं।
इनके समान है ही कोई नहीं।
व्याकुलता बढ़ती जाती है।
श्रीराम का वियोग असह्य है-

हा रघुनन्दन प्राणपिरीते।
तुम बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

जैसे चातक की अनन्यता स्वाति नक्षत्र
के जल में है, वह इसके समक्ष
गंगा के परमपवित्र जल का तिरस्कार
करता है ।

वैसे ही पुकारते -पुकारते अधीर
हो जाते हैं महाराज-

हा जानकी लखन हा रघुबर।
हा पितु हित चित-चातक जलधर।।

और चातक पक्षी की तरह महाराज
का प्राण ही प्रयाण कर जाता है-राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरह, राउ गयेउ सुर-धाम ।।

2- जिज्ञासु, तो कोकिल पक्षी की तरह
है, जो अपनी कुहू में ऐसा
राग देता कि, कहाँ-कहाँ की ध्वनि का
नाद भगवान् को स्तब्ध कर देता है।

इस भक्त की भी अनन्यता है।
जैसे आर्त की।
इसे भी ऐहलौकिक, पारलौकिक
भोगों से विरति और श्रीरामरति ही है।

वह, तो श्रवणमनननिदिध्यासनादि
द्वारा अज्ञान-तिमिरान्ध संसार
का उच्छेद चाहता है।

अज्ञानसंसार की विस्मृति हुई नहीं कि
ज्ञानस्वरूप तो विद्यमान है-
संसार विस्मृति और प्रभु-स्मृति ही
इस जिज्ञासु जिज्ञासा है-

“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”

इस संसार की हूक(दुख) से व्यथित वह
कोकिल की तरह कुहू-कुहू के
राग में कहाँ -कहाँ हेरता है अपना
आत्म।

3- ज्ञानी भक्त चकोर पक्षी है।
यह भी अनन्य भक्त है।
इसे परम प्रभु, जो ज्ञानस्वरुप हैं,
की अविचल स्मृति चाहिए।

ज्ञानी और भक्त में कोई भेद नहीं।

ग्यानिहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसंभव खेदा।।

जानना(ज्ञान) इसलिये कि जाने बिना
तो प्रेम संभव नहीं। और वह तो
“परमप्रेम” हैं।

जाने बिनु न होइ परतीती ।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।

प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई।
जिमि खगेस जल कै चिकनाई।।

4 – अर्थार्थी भक्त, शुक (कीर) भी
पूर्व -पूर्व भक्तों की तरह ही अनन्य
प्रेमी है। इन प्रेमियों का अर्थ-पुरुषार्थ

सामान्य नहीं है। इन्हें लौकिक या
अलौकिक कुछ भी नहीं चाहिए।

जैसे कि प्रह्लादजी, ध्रुव जी।
और परम भक्त वृत्रासुर।

इन्द्र,ध्रुव आदि लोक की कामना नहीं।

ब्रह्मलोक और ब्रह्मादि पद तुच्छ हैं।

सारी धरती का साम्राज्य नहीं चाहिए।

धरती के नीचे के सुतल तलातल
पाताल का आधिपत्य भी नहीं।

योगसिद्धि भी नहीं। और मोक्ष भी नहीं।

उसे तो मात्र प्रभु चाहिए।

इसलिये परीक्षित् से वृत्रासुरमाध्यम
द्वारा बोलता है शुक(देव)-

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,

समञ्जस! त्वां विरहय्य काङ्क्षे ।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सीता -विहार-विपिनेरमतां मनो मे

सन्त भक्त चरित्रों का मनोरमण
तो भगवती जगदम्बा जानकी
सीता राधा और विन्ध्यविहारिणी
विन्ध्यवासिनी के विहार विपिनों
में ही होता है।इन सन्त-भक्तों की चार कोटियाँ

गीतागायक गाते हैं-

आर्तः जिज्ञासुः अर्थार्थी
ज्ञानी च भरतर्षभ ।
उक्त सभी सन्त तो, भगवान् की
सुमधुर लीला के लोभी हैं।
लोभ संवरण करना भी इनके वश
में नहीं है।
अतः ये सभी , मिथिला में
आकर निवास करने लगते हैं। अब
लीला-धारी क्या लीला करते हैं।
रसिक दृष्टिपात करें। यज्ञ रक्षार्थ भगवान्

श्रीराम ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के साथ
पधारते हैं।
यज्ञ -कार्य निर्विघ्न पूर्ण
कराते हैं। यज्ञ परिसमाप्ति होते
ही मिथिला-नरेश श्रीजनक जी
का आमन्त्रण, श्रीविश्वामित्र जी को
सीतास्वयंवर में सपरिकर
पधारने के लिये प्राप्त होता है।

भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के
साथ , महर्षि, मिथिला पहुँचते हैं। सुन्दर पर्ण -कुटीर में सादर ठहराया

जाता है।
मिथिला वासी भक्तों को दर्शन
देने और उनकी श्रद्धा फलीभूत करने
के लिये जीवाचार्य शेषावतार
लक्ष्मण जी को ब्याज बनाया जाता
है। भगवान् विश्वामित्र जी से कहते हैं-

लखन हृदय लालसा विसेषी।
जाइ जनक पुर आवहुँ देखी ।।

नाथ लखन पुर देखन चहहीं।
प्रभु सकोच डर प्रकट न कहहीं।।

जौं राउर अनुशासन पावौं।
नगर देखाइ तुरत लै आवौं।।

गुरु आज्ञा मिल जाती है ।
भगवान् मिथिला नगरी में जाकर
अपने दर्शन से सभी को कृतार्थ
करते हैं। लगता है कि-
जल्दी -जल्दी नगर दिखा कर
मानों भगवान् भयवश लौट आए।

वस्तुतः भगवान् अपने अत्यन्त
आत्मीय ऋषि मुनि सन्त भक्त
के द्वारा विहित अनन्या भक्ति
का प्रभाव दिखाने के लिए
डर का नाटक करते हैं-

जासु त्रास डर कहुँ डर होई।
भजन प्रभाव देखावत सोई ।।

रात्रि में ” गुरु पद कमल पलोटत प्रीते”
“बार-बार मुनि अग्या दीन्ही”
तब जाकर शयन करते हैं।

सम्पूर्ण प्रातः कृत्य पूरा कर गुरु
आज्ञा से वाटिका में पुष्प चयन
के लिये जाते हैं-

समय जानि गुरु आयसु पाई।
लेन प्रसून चले दोउ भाई।।मिथिला नरेश के बगीचे में

भगवान् का आगमन जान
वसन्त ऋतु भी लुब्ध होकर
आ बसी है-

भूप बाग बर देखेउ जाई।
जहँ बसन्त ऋतु रही लोभाई।।

अब उपयुक्त अवसर जान कर सभी
भक्त सन्त भी चार पक्षियों का रूप
धरे वृक्षों पर आ विराजते हैं।
देखिये –

आर्त( प्रेमी) भक्त तो चातक बने हैं।

जिज्ञासु सन्तभक्त कोकिल रूप धरे हैं।

अर्थार्थी भक्त कीर (शुक) रूप में हैं।

ज्ञानी भक्तों की शोभा चकोर मण्डली
के रूप में मन्त्र मुग्ध है।

चातक कोकिल कीर चकोरा।
कूजत बिहग नटत मन मोरा।।

इन सभी सन्तों का मन – मयूर नाच
रहा है, पक्षी रूप में सभी
आनन्द विभोर हैं।

आखिर दर्शनीय तो भगवान् ही हैं।
इन्ही की रूपमाधुरी का वर्णन
सभी ओर हो रहा है-

जहँ तहँ छवि बरनत सब लोगू ।
अवसि देखिये देखन जोगू।।

भैया! यह सीता-वाटिका अनुपम
है। इसमें विद्यमान पादप-वृक्ष
पत्ते- फूल-फल सभी ने ” मैथिली”
के हाथों का स्पर्श जो पाया है।

जानकी के चरण-कमलों के “चिन्ह”
जहाँ विलास करते हुए आनन्दित हैं।

सीता और वहाँ वर्तमान सीतापति का
यशोगान करती हुई उक्त
1- आर्त(चातक)
2-जिज्ञासु(कोकिल)
3- अर्थार्थी (शुक)
4- ज्ञानी ( चकोर)

सन्तों की विहग-मण्डली विराज रही
है। और सोचिये ऐसी विहार-वाटिका
में ही भगवत्प्रेमी सन्तो का मनोरम
“मन” रमता है।

रमन्ते योगिनः सन्तः भक्ताः
यद्रूपमाधुर्यां रामा-रामयोः
तत् कथं
नाश्रीयताम्? अत एव –

सीता-करावचित-पल्लव-वल्लरीके ,

सीता-पदाङ्क-विलसन्मधुरस्थलीके ।

सीता-यशो-मुखर-मत्त-खगावलीके,

सीता-विहार-विपिने रमतां मनो मे ।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

हरिजन कहिं – कहिं होय

सन्त तो दुर्लभ हैं लेकिन भगवान्
सुलभ।
श्रद्धा भक्ति प्रेम सत्य करुणा से
मिल जाते हैं सर्वत्र-

हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।

सन्त क्या हैं?

सन्त सभा अनुपम अवध ।
सकल सुमंगल मूल।

सन्तों की उपमा या समता किसी से
भी सम्भव नहीं।

हाँ यह सन्त समूह ” अवध ” हो तो हो
सकता है, जो सारे मंगलों का मूल है।वस्तुतः सन्त तो समान चित्त वाले हैं।

इनका अपना कोई हिताभिलाष नहीं।
किसी प्रकार का उँच-नीच गत भेद-भाव
भी इनमें नहीं है।

एक हाथ से जब फूल तोड़कर
दूसरे हाथ में रखा जाय, तब एक जैसा
सुगन्ध दोनों ही हाथों में होता है।

एक हाथ तो फूल तोड़ने वाला होने से
तोड़ने से अपराधी(भक्षक) है तो
दूसरा उसे अपने में रखकर, सुरक्षा देने
से रक्षक भी ।
लेकिन “पुष्प” तो शरणागत सन्त
भक्त की तरह है, जिसे किसी भी
भक्षक या रक्षक,हाथ से कोई गिला
शिकवा नहीं।

पुष्प की भाँति, सन्त, तो दोनों हाथों
को समान सुगन्ध से सुवासित
करते हैं। अतः हमारे लिये सभी सन्त
वन्दनीय हैं-

बन्दउँ सन्त समान चित,
हित अनहित नहिं कोउ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि,
सम सुगन्ध कर दोउ।।

अब इसीलिये “भक्तमाल” ग्रन्थ का
प्रतिपाद्य ही भगवद् भागवत् या
भगवान् भक्त का भजन है-

“भजिबे को दोऊ सुघर कै हरि कै
हरिदास।”

ये हरिदास तो भगवान् के भक्त
निष्कामी साधु ही हैं।

भगवान् की चरण शरण ही इनकी
एक कामना है।
वे जैसे रखना चाहें रखें उनकी मर्जी।

“भागवत” के एकादश स्कन्ध के
चौदहवें अध्याय में भगवान् ने इन
साधु भक्तों को अत्यन्त निष्कामी
कहा है- इन सन्तों के लिये ब्रह्मा और इन्द्र

का साम्राज्य व्यर्थ है।
धरती का एकच्छत्र राजत्व
इन्हें नहीं चाहिए।
योग की सिद्घियाँ और मोक्ष भी
इन्हें तुच्छ प्रतीत होती हैं।
ये सन्त स्वयं को भगदर्पित कर
देते हैं, और इन्हें भगवान् और उनकी
आज्ञाकारिता के सिवा कुछ भी
अपेक्षित नहीं है-

न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं ,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं ।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,
मयि अर्पितात् मेच्छति मद बिनान्यद् ।

इसलिये भगवान् का अर्चावतार उनकी
मूर्ति के रूप में तो सर्वत्र है।
हम श्रद्धा विश्वास से पूजते ही हैं।
लेकिन साधु सन्त तो हरिकृपा और
पुण्यसमूह के इकट्ठा होने पर,
बड़ी कठिनाई से मिलते हैं-

हरि दुर्लभ नहिं जगत् में,
हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेर् याँ सब जग मिलै,

हरिजन कहिं-कहिं होय।।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

कहत साधु महिमा सकुचानी

बड़े-बड़े पतितों के कल्मष का काल ,
बनी कल कल निनादिनी गंगा ।

उस गंगा का पाप धो देते हैं,
साधु।

इसलिये साधु महिमा कहना
कठिन है । साधु और गंगा की प्रकृति एक है, वह है पाप प्रक्षालनता ।

“दर्शनादेव साधवः” और

गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः । दर्शन मात्र से जीवन-मुक्त करनेवाले दोनों

लेकिन गंगा का भी पापताप
सन्ताप धोने वाले होने से
साधु/ सन्त श्रेष्ठ हैं। क्यों नहीं हों? एक अर्थ तो साधु का यह कि

पर- कार्य को साधने वाले होते हैं। इन साधुओं का स्वयं का अपना

अपना कोई स्वकार्य ही नहीं है।

नदी,वृक्ष ,पर्वत धरती की तरह सन्त
भी परहित पूरा करने के लिये
भगवान् की आज्ञा से जन्म लेते हैं-

सन्त विटप सरिता गिरि धरनी ।
पर हित हेतु सबन्हि कै करनी ।।

यह तो अपना परम (चरम) और
अन्तिम हित,पहले ही सिद्ध
कर चुके होते हैं। नारायण!
वह है परम परात्पर परब्रह्म
परमात्मा की प्राप्ति ।

इसलिये दूसरों (पर) के कार्य का सिद्ध करना ही इनका अशेष शेष
कार्य है।

साध्नोति परकार्यम् परकार्याणि वा
इति साधुः । मतलब कि – 1- पर अर्थात् दूसरों का कार्य साध

देना।
इस तरह एक अर्थ इस शब्द
से ही प्रतीत होता है।

2- अब दूसरा अर्थ है पर यानी कि
परमात्मा से ही मिला कर दूसरों का
भी अन्तिम लक्ष्य पूर्ण कर देना-

साध्नोति परं परमात्मानम् इति साधुः परोपकाराय सतां विभूतयः

परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर

“अजामिल” को सन्त मिले और उसके
द्वारा पुत्र के बहाने से ” नारायण “
नाम लेने पर, उसका पापक्षय हुआ।
और परमात्मप्राप्ति भी हो गई।

परमहंस श्रीरामकृष्ण देव ने
विवेकानन्द स्वामी को
माँ काली का दर्शन करा कर
उनका परम लक्ष्य दे दिया। "नाम सप्रेम जपत अनयासा।

भगत होहिं मुद-मंगल-वासा ।।” नामजापक विभीषण को

भक्तराज श्रीहनूमान् जी दर्शन क्या
हुआ, उसको श्रीराम जी की ही
प्राप्ति हो गई। लंका का राज्य
भोग कर रमावैकुण्ठ मिला।

भैया! क्या कहें, चन्द्र और सूर्य
अलग -अलग समय में उगते हैं,
सन्त तो एक समय में, एक साथ
दोनों बन जाते हैं।
सूर्य बनकर पापराशि जलाते हैं।

तो, चन्द्रमा बनकर शीतलता से
“परमशान्ति” रूप “परममात्मा”
की प्राप्ति कराते हैं-

“सन्त उदय सन्तत सुखकारी।
विश्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।।”

इसलिये पर (दूसरों) के दोनों
हित – संसारलोक/ परलोक
रमावैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कराने
साधु सन्तों की महिमा कौन कहे?चाहे वह कोई भी -

“विधि-हरि-हर कवि कोविद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।”

संकोच लगता है भगवान् को भी
अपने प्राणप्यारे साधुसन्तों का
यश कहने में।
क्योंकि कि ये सन्त तो भगवन्त
से भी एक कदम आगे हैं।आत्मरूप परमात्मरूप होने

लगता है, भगवान् को इन सन्तों
का यशोगान अपना स्वयं का
यशोगान लगता है।
आपन मुँह आपन करनी
बखानना तो धृष्टता है।

इसलिये बाबा का सिंहनाद
जोर-जोर से जोरदार कई बार

बिधि हरि हर कवि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।

हरिः शरणम् । गुरः शरणम् ।