भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

सबसे सेवक धरम कठोरा

सेव्य भगवान्
सेवक यह पंचभूत पिण्ड शरीर
और तद् गत “जीवात्मा”।

शरीर भगवान् द्वारा निर्मित है
और मिला है कर्म शेष यानी कि
प्रारब्ध( पूर्व शरीर कृतकर्म) के कारण

“प्रारब्ध कारण और शरीर कार्य”

प्रारब्धवश मिले शरीर को
सुखदुःखादि भोगना ही पड़ता है

मतलब कि भोग भोगने के लिए परतन्त्र
है यह शरीर और शरीर को मिली
संसार की सारी सामग्री

भोगने के लिये मिला शरीर
शरीर से जुड़े पद पदार्थ
वस्तु व्यक्ति । तब सोचिये

स्वयं में स्वतन्त्र नहीं है यह
शरीर और इससे जुड़ा संसार
क्योंकि
जब शरीर भगवान् का है तब
नाना वस्तु पद पदार्थ भी “उनका”

अब यह सेवा के लिये मिला है
किसकी सेवा के लिए ?

तो “जिसका” है “उसी” की सेवा हेतु

यही यथार्थ सत्य है

श्रीरामकथा के असाधारण पात्र
श्री भरत जी उपर्युक्त
वास्तविकता से अवगत हैं ।

वे अपने स्वयं के शरीर को
श्रीराम जी के सेवार्थ मिला जान कर

जब ननिहाल से लौट कर अयोध्या
आने पर नहीं पाते हैं पिता और भ्राता
दशरथ-राम को तब
हो जाते हैं व्यथित।

व्याकुलता और बढ़ती है जब
पिता का शरीर पूर्ण होने का वृत्त
जानते हैं।

श्री राम का वन गमन सुनकर तो
व्यथा तीव्र हो जाती है।

और निश्चेष्ट जड़वत् हो जाते हैं
जब अयोध्या का सिंहासन देने

की पुरजोर चेष्टा की जाती है

एक ओर पिता के न रहने पर
पितृतुल्य अतुल्य भाई राम की सेवा
से वंचित हैं
और दूसरे सिंहासन पर बैठ
शासन और प्रशासन का गुरुतर
सेवा का कार्य पुनः पतन की ओर
ले जा सकता है , इसलिये भयग्रस्त

जिस-जिस मार्ग से प्रभु राम
वन की ओर प्रस्थान किये
उसी-उसी मार्ग से “उन्हे” लौटा
लाने के लिये सपरिकर चल पड़ते हैं।

निषाद द्वारा उन रास्तों और
सीतारामलक्ष्मण द्वारा सेवित स्थानों
को दिखाये जाने पर दुखी हैं।

पूछत सखहिं सो ठाउँ देखाऊ
नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊँ

जहँ सिय राम लखन निसि सोए
कहत भरे जल लोचन कोए

जिस सिंसुपा वृक्ष के नीचे प्रभु ने
विश्राम किया था, उसे भी सादर
सस्नेह दण्डवत् प्रणाम करते हैं जहँ सिंसुपा पुनीत तरु रघुबर किय विश्रामु अति सनेह सादर भरत कीन्हेउ दण्ड प्रनामु

“अब देखिये “सेवक” का
कर्तव्य कि वह अपने
“सेव्य” की सेवा करने वाले वृक्ष
को भूमि पर लेट कर लोट कर
दण्डवत् प्रणाम करता है “

“नहीं मिलता कोई ऐसा समर्पित
सेवक भरत जैसा जो अपने सेव्य
की सेवा करने वाले के प्रति भी
अतिशय अनुराग व्यक्त करे”

“और नारायण ! वह भी जड़ वृक्ष”

भगवान् के सेवित चरण-रज को
अत्यंत सुकोमल अपने आँखों में
लगाते हैं
कुश का बिछौना बना कर प्रभु
जिस पर सोए थे उसकी प्रेमपूर्वक
परिक्रमा करते हैं

“रज भी जड़ और कुश आसन भी”

कुस साँथरी निहारि सुहाई
कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई
बनै न कहत प्रीति अधिकाई "लेकिन भरत ऐसा प्रेमी कि जड़ रज और कुश में भी चेतना का संचार मानता है" "नारायण ! वृक्ष कुश और धूलि में भी चेतना संचरित है, क्यों कि श्रीमन्नारायण के चरण जो वहाँ संचरित हैं " "ऐसा भरत का आचरित चरित है"

माताओं गुरुजनों को पालकी में
बैठा देते हैं –कियउ निषादनाथु अगुआई मातु पालकी सकल चलाई लघुभ्राता श्रीशत्रुघ्नलाल को बुलाकर सपरिकर गंगा को प्रणाम करते हैं श्रीसीताराम लक्ष्मण के पैदल जाने का स्मरण करके पैदल ही चलते जाते हैं।

“गवने भरत पयादेहिं पाएँ”

अयोध्या से साथ-साथ चलने वाले
सेवक बार-बार घोड़े पर बैठ जाने
आग्रह करते हैं-

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा
होइअ नाथ अस्व असवारा

लेकिन और लेकिन

“अखिल विश्व कारन करन” का
“निरभिमान भक्त सेवक” घोड़े पर
नहीं बैठता।

कहता है सेवक का धर्म तो यह है कि

मेरे “सेव्य प्रभु राम” पैरों से चलकर
इन्हीं रास्तों से चले हैं।

इसलिये मेरे जैसे किसी भी सेवक
का सेव्य के प्रति यह आचरण होना
चाहिए कि
“जहाँ सेव्य का चरण पड़ा हो
वहाँ सेवक का सिर ही पड़े”

इसीलिये सेवक का धर्म अत्यंत
कठोर है कुलिशवत्

और बोल पड़ता है –

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा

“सब तें सेवक धरमु कठोरा”

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

चले भरत दोउ भाइ

कौन होगा भरत जैसा ?अयोध्या आने पर, पिता का परलोक गमन और सीताराम का वनगमन जान करभरत अत्यंत दुखी हैं।

पितृ-कृत्य परिपूर्ण करते हैं।
सभी माताओं श्रीशत्रुघ्नलाल जी
और कुलगुरु वशिष्ठ जी द्वारा राज्य
भार ग्रहण का अनुरोध होता है कहते हैं भरत जी कि

वह तो गुरु ,सचिव, प्रजा और
समस्त माताओं का आदेश पालना
चाहते हैं। यह मेरे लिये शिरोधार्य है

मोहिं उपदेश दीन्ह गुरु नीका
प्रजा सचिव सम्मत सबहीका
मातु उचित धरु आयसु दीन्हा
अवसि सीस धरि चाहउँ नीका किन्तु मेरा मन असन्तुष्ट है। सभी लोग "साधु-स्वभाव" ही हैं। हमारे लिए साध्य कार्य बता रहे हैं

अब देखिये – सब अपराध मेरा है। मुझे क्षमा करें।

दुखी आदमी के दोष गुण पर आप सभी जैसे "साधुजन" विचार कर बतायें - उत्तरु देउँ छमब अपराधू दुखित दोष गुन गनहिं न साधू हम प्रभु राम के सेवक ठहरे हमारी अनुपस्थिति में माता की कुटिल बुद्धि ने मुझसे यह सेवाकार्य छीन लिया है- हित हमार सियपति सेवकाई सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई

“बिनु हरि भगति जायँ जप जोगा”

हरिभक्ति के बिना किसी जीवमात्र
का कष्ट कभी नहीं जा सकता
चाहे कितना हू जग्य जोग कर ले।

“देखे बिनु रघुनाथ के जिय की
जरनि न जाय”

हृदय में भरत के लगी है भयंकर आग
श्रीरघुनाथ चरण जल से जायगी भाग

कहते हैं कि मेरा हित श्रीरामचरण
आज्ञा दें सब करें मेरा दुख निवारण

यदि आप सभी हठ पूर्वक मुझे राज्य
भार सौंपेंगे तो यह धरती मेरे ही

दुःखभार से पाताल चली जायेगी

मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं
रसा रसातल जाइहि तबहीं

अरे! मेरे समान कौन पापग्रस्त
और अतिशय भार भरा है ?

मोहि समान को पापनिवासू
जेहि लगि सीय राम बनबासू

अन्त में सभी लोगों ने भरत के
राज्य नहीं लेने और वन जाकर
श्रीराम को लौटा लाने के निर्णय
की सराहना की है

अवसि चलिअ बन रामु जहँ
भरत मन्त्र भलि कीन्ह
सोक सिन्धु बूड़त सबहिं
तुम अवलम्बन दीन्ह सभी माताओं गुरु वशिष्ठ जी और अन्यान्य लोगों सहित भरत शत्रुघ्न वन के लिए प्रस्थान करते हैं।

भला कौन होगा भरत जी जैसा
त्यागी
जो यह जानता है कि राज्य त्याग
में भला है श्रीसीताराम के चरण ही अशरण के अनन्य शरण हैं- सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ सुमिरि राम सिय चरन तब चले " भरत दोउ भाइ "

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

प्रभु पद प्रेम सकल जग जाना

भरत जी को भगवत् चरणों की
प्रीति है।

श्रीरामवनगमन और दशरथप्राणप्रयाण
के अनन्तर भरत जी ननिहाल से
अयोध्या लौटते हैं ।

पिता के परलोक गमन और
सीतासहित श्रीरामलक्ष्मण के वन
चले जाने से अत्यन्त दुःखी हैं

और ऐसा दुःखद समचार सुन कर
मानो ऐसे सहम उठते हैं कि जैसे
सिंह की दहाड़ सुनकर हाथी
घबड़ा जाये

सुनत भरत भये बिबस बिसादा
जनु सहमेउ करि केहरि नादा

सहमते इसलिये हैं कि उन्हे
“अहम् ” का वहम नहीं और

इसीलिये परम रामभक्त और
विरक्त साधु हैं।भरद्वाज जी ने कहा था

तात भरत तुम सब बिधि साधू
रामचरन अनुराग अगाधू

राम बिना राज्य कैसे चलेगा?
राम बिना यह मार ही डालेगा राज्यभार

सभी परिवार परिकर सहित
अयोध्या को दुर्भाग्यशाली कहते हैं

ऐसे भरत को

श्रीराम जैसे “साधु” मानो सबका “सब “
साधने वाले सर्वगत आत्मा
परमात्मा का वियोग तो ऐसा है कि

सभी का “भाग्य” ही भाग गया हो
दुःखी अवस्था में तत्व उपदेशते हैं

जे नहिं साधु संग अनुरागे
परमारथ पथ बिमुख अभागे

माँ कौशल्या भरत की दशा देख
गोद में बैठा कर सान्त्वना देती हैं भरत के लिए राम तो प्राणों के प्राण हैं। और उधर इसी तरह श्री राम के लिये भी भरत जी प्राणों से अधिक प्रिय हैं - "राम प्रानहु ते प्रान तुम्हारे तुम रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे" इधर श्रीराम के वन में आने पर वाल्मीकि ऋषि ने श्रीराम से

राम बिना कुछ भी नहीं चाहने वाले
भरत सरीखे “साधु” का स्मरण कर

संसार की असारता कही थी और
जैसे कि अयोध्या की धनधरती
तो श्रीराम की है, भरत के लिये
यह विषवत् –जननी सम जानहिं पर नारी धन पराव विष ते विष भारी भरत ऐसे "साधु" हैं जो परसंपत्ति को देख हर्षित तो होते हैं, किन्तु पर ( मानो समस्त अयोध्या की ) की विपत्ति देख विशेष दुखी जे हरषहिं पर संपति देखी दुखी होहिं पर विपति विसेषी

जिन भरत के लिये श्रीराम प्राणो
से भी अधिक प्रिय हैं उनका “मन”
तो “श्रीरामायण ” है

जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे

श्रीराम भक्ति ही जिनका काम
बन जाये। सभी गुणों को राम का
मान कर “मानापमान” से परे हो।

भगवान् के भक्त ( श्रीसीतालक्ष्मणादि)
जिन्हे प्रियप्रतीत हों, ऐसे भाग्यशाली
के हृदय में आपका अचल आसन है

गुन तुम्हार समुझै निज दोसा
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं
तेहि उर बसहु सहित वैदेही

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु
तुम्ह सन सहज सनेह
बसहु निरन्तर तासु मन
सो राउर निज गेह

ऐसे विगताभिमान सत्याचरणचारी
परमविचारी साधुमूर्तशरीरधारी

श्रीभरत जी महाराज सभी से विनय
पूर्वक श्रीरघुनाथ जी के दर्शन विना

हृदय – दाह-दाहकता की शान्ति
असम्भव मानते हैं-

आपनि दारुन दीनता
कहउँ सबहिं सिर नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

और नारायण! यह समझिये कि

श्रीभरत जैसे त्यागी रामानुरागी
का आचरण और चरम धरम
सभी जीव (मनुष्य) मात्र
के लिये तत्वोपदेश है कि

यदि इस देश में आने का लक्ष्य नहीं
तो यह भरताचरण आचरणीय है

वस्तुतः मानव जीवन का यही
एकमात्र उद्देश्य है कि

भगवद् दर्शन के बिना संसार दर्शन
में अटके रहने पर भटकना ही
पड़ेगा

इसलिये परम पुनीत प्रयाग की
धरती पर भरत के राम प्रेम को

देखकर भरद्वाज जी ने ,इसे
अनुकरणीय आचरणीय कहा था

भरत नीतिरत साधु सुजाना

“प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना”

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

तुम सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

त्रिवेणी जल ने भरत जी को
आशीर्वाद में श्रीराम की अनन्यप्रियता
प्रदान की है।

उधर भरत के विषय में जीवाचार्य
लक्ष्मण की लीला द्रष्टव्य है

जब अयोध्या से प्रस्थान किये
सपरिकर श्रीभरत जी का
आगमन जान कर, श्रीरामसीता
सहित लक्ष्मण पर, आक्रमण करने
के लिए वे भरत जी आरहे हैं
ऐसी “विमतिलीला” का नाटक
करते हैं, लक्ष्मण जी

भगवान् श्रीराम श्रीलक्ष्मण जी को
पहले ही समझा चुके हैं कि
अतिभार विस्तार विस्तीर्ण
समेरु तो मच्छर की एक फूँक से
हो सकता है उड़ जाय, किन्तु

भरत जैसा निर्मान निर्मोह
जगद् हितैषी त्यागी साधु सन्तस्वरूप
महात्मा को राज्य सत्ता का मद नहीं
छू सकता

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई

आगे भगवान्, तो भरत को सूर्यवंश
रूपी तालाब का हंस ही कह देते हैं ,

जो जल विकार को दूर कर
दूध का दूध और पानी का पानी
कर डालने के लिये प्रसिद्ध है

भरत हंस रविबंस तड़ागा
जनमि कीन्ह गुनदोष विभागा

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
निज जस कीन्ह जगत उजियारी

भैया! ऐसा भरत और ऐसी दुर्मति
कि वह हम पर आक्रुष्ट हो आक्रमण
करे, यह तो असम्भव है हंस है यदि भरत तो साक्षात् सरस्वती का वाहन है।

सरस्वती स्वयं ज्ञानमूर्ति जिसके
ऊपर विराजे, उसके द्वारा अज्ञान
मूलक -कार्य ?असम्भव असम्भव असम्भव

भैया ! भरत तो ऐसा हंस है कि
वह “जड़जल ” के मायिक गुणों त्रिविध सद् रजस् तमस् के त्रिविध क्रमिक कार्यरूप दुर्गुणों सुख दुःख और मोह से भी सर्वथा परे है और परे कर देने वाला साधु है

नारायण! “जल” तो मायिक है जड़ है

गगन समीर अनल जल धरनी
इन्ह कै नाथ सहज जड़ करनी

भरत के गुणों का स्मरण भी
भगवान् को दुखी कर दे रहा है

शरणागत वत्सल परमकरुणामय
प्रभु श्रीराम तो लक्ष्मण से
श्रीभरत जी के गुण-शील-स्वभाव
का वर्णन करते हुए प्रेम के समुद्र में
डूब ही गये

कहत मगन गुन सील सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

भैया! भरत जैसा निर्लोभी
निरभिमानी तो ब्रह्मा के द्वारा
रचा ही नहीं गया है

सुनहु लखन भल भरत सरीसा
विधि प्रपंच महु सुना न दीसा

और यह सब भरत जी के विषय
में प्रभु श्रीराम इसलिये कह रहे हैं

मानो त्रिवेणी जल ने भरत को
दुःखातीत होने और भगवान्
का अनन्य प्रेमी होने का आशीष

जो दे दिया था

बादि गलानि करौ मन माही

तुम्ह सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

सहित प्रयाग सुभाग हमारा

“भरत” श्रीराम कथा के असाधारण
चरित्र हैं।यह और कोई नहीं वरन् स्नेह-अनुराग-प्रेम का समूहीभूत पुंजीभूत दूसरा शरीर धरे प्रभु राम ही हैं भरद्वाज मुनि ने अपने आश्रम में पधारे श्रीभरत जी से यह बात कही थी

तुम तो भरत मोर मत एहू
धरे देह जनु राम सनेहू हमारे सद्गुरु भगवान् मलूक पीठाधीश्वर महाराज जी ने व्यास-पीठ से एक दिन सन्त परम्परानुमोदित एक रहस्य का अचानक अनावरण कर दिया कि इसी कलिकाल में भरद्वाज ऋषि की वाणी सिद्ध करने के लिए श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य तो श्रीराम जी और श्रीभरत जी का संयुक्त विग्रह धारण करके अवतरित हुए थे "रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतः महीतले" "भरतस्यानुपमं प्रेम ध्यायन् युक्तः समागतः" नारायण! सन्तो की वाणी ऋषियों की वाणी जो निकल जाती है परमपरम चरम स्नेही प्रभु तो उस अर्थ को घटाते ही हैं संस्कृत-कविता-कामिनी-विलास कालिका-कृपा-दृष्टि के आवास महाकवि कालिदास भी इसी बात का अनुमोदन करते हैं - "ऋषीणां पुनः आद्यानां वाचम् अर्थः अनुधावति" त्रिवेणी जल में स्नान करके अत्यंत भावुक होकर जब श्रीभरत जी ने धर्मार्थकाममोक्ष में अरुचि दिखाते हुए श्रीरामचरणों का अनुराग माँगा था तब त्रिवेणी जल के "तथास्तु" कहने पर उन्हें रोमांच हो गया

देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की
भरत को धन्यातिधन्य कहा

तनु पुलकेउ हिय हरषि सुनि
“बेनि-बचन” अनुकूल
भरत धन्य कहि धन्य सुर
हरषित बरसहिं फूल

भरद्वाज जी ने भरत को सुख की
संजीवनी और जड़संसार का
“समस्त यश” कहते हुए
भगवान् का प्रीतिपात्र कहा

तुम पर अस सनेह रघुबर के
सुख संजीवनि जग जस जड़ के ऋषि भरद्वाज ने अपनी तपस्या का फल सियारामलखन का दर्शन बता कर इस भगवद् दर्शन का भी फल श्री भरत जी का दर्शन बता दिया नारायण ! भगवद् दर्शन का फल

साधु सन्त विरक्त भक्त का दर्शन ही है

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं
उदासीन तापस बन रहहीं

सब साधन कर सुफलु सुहावा
लखन राम सिय दरसन पावा

तेहि फल कर फल दरस तुम्हारा

“सहित प्रयाग सुभाग हमारा”

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

भरत तुम सब बिधि साधू

भगवान् श्रीराम ने भरत जी को

नीति रत सज्जन साधु पदवी दी थी

नीयते अनया सुष्ठु रीत्या इति नीतिः

निःशेषः अशेषः समग्रः सम्पूर्णः
“परमात्मैव”प्राप्यते यस्यां सा नीतिः

शास्त्र और सन्त अनुमोदित जिस
सुन्दर मार्ग से चलकर निःशेष
सम्पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति हो
वही वस्तुतः नीति है।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ

जब श्रीरामजी नीति को यथार्थतः
जानते हैं, तो और कौन नीतिज्ञ है?

यह भी जानते हैं।

श्रीरामकथा में भरत जैसा सज्जन
साधु नीतिज्ञ प्रीतिज्ञ प्रभुपदस्नेहज्ञ

निरभिमान त्यागी विरागी धर्मज्ञ
सन्त साधु भक्त दूसरा मिलता नहीं

भगवान् ने कहा यह भरत धर्म की
धुरी हैं

जौ न होत जग जनम भरत को
सकल धरम धुरि धरनि धरत को

चलाचल सम्पत्ति को विपत्ति ही
मानने वाले चरित्र हैं भरत

राजसत्ता का मद दम्भ स्पर्श ही नहीं
कर पाता

मच्छर की एक फूँक से सुमेरु जैसा
पर्वत तो उड़ कर कहीं जा सकता है
किन्तु भरत को राज्यमद नहीं हो
सकता

लक्ष्मण से भगवान् ने कहा

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई

समुद्र का खारापन अत्यंत खट्टे दही
मट्ठे के कण मात्र से मिट सकता है
लेकिन भरत को ब्रह्मादिक पद
मिलने पर भी मद नहीं हो सकता

भरतहिं होइ न राजमद
बिधि हरि हर सन पाइ
कबहुँ की काँजी सीकरनि
छीरसिन्धु बिनसाइ

नारायण! भगवान् के वन गमन के
बाद भरतजी उन्हें लौटाने के लिए
सपरिकर प्रस्थान करते हैं मार्ग में तीर्थराज प्रयाग पड़ता है त्रिवेणी में स्नान करते हैं परमपावन पतितपावन श्रीराम जी के वन गमन से अत्यंत दुखी हैं और इतने आर्त हैं कि त्रिवेणी से भी "भीख" माँग बैठते हैं नारायण! मर्यादा ही तोड़ देते हैं राजा को भीख नहीं माँगनी चाहिए किन्तु श्रीरामवियोग का असह्य दुख उन्हें धर्मविचलित कर देता है

माँगहु भीख त्यागि निज धरमू
आरत काह न करइ कुकरमू

पुरुषार्थ-चतुष्टय में भरतजी को कोई
अभिरुचि नहीं। रुचि है तो
केवल और केवल
प्रभु राम के शुचि-चरणों में

अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहौं निरबान
जनम – जनम रति राम पद
यह बरदान न आन

गंगा यमुना सरस्वती का संगम
भरत को श्रीरामप्रेम-संगम दे देता है

क्योंकि यहाँ भी तीन हैं

श्री ( उभय बीच श्री सोहति कैसे )

राम(सच्चिदानन्द दिनेसा)

प्रेम( सब मम प्रिय सब मम
उपजाए)

इसीलिये आतुर होकर संगम से
अनूठा संगम माँगते हैं

सीताराम चरन रति मोरे
अनुदिन बढ़हु अनुग्रह तोरे

तब त्रिवेणी जल बोल पड़ा
आशीर्वाद के आकांक्षी प्रेममूर्ति

भरत को सब प्रकार से साधु
कहा जैसे रामजी ने कहा था

और आशीष में श्रीराम का
अगाध प्रेम दान मिल गया

“तात भरत तुम सब बिधि साधू

राम चरन अनुराग अगाधू”

हरिगुरू शरणम्।
गुरुहरी शरणम्।

बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

संसार भक्ति छोड़कर हरि भक्ति
ही श्रेयस्कर श्रेष्ठतम "भक्त नचिकेता" के शब्दों में "श्रेयस् मार्ग" है संसार भक्ति तो "प्रेयोमार्ग" है नचिकेता "अन्नादि" की तरह उगने पकने और पुनः पैदा होने वाले संसार मार्ग पर जाना नहीं चाहता

इसीलिये कठोपनिषद् मे नचिकेता ने
“यम” से कहा था

” सस्यमिव आजायते मर्त्यः
सस्यम् इव पच्यते यथा “

“नहीं चाहिए मुझे इन्द्र का सुख
अथवा नाना लोकों का लोकसुख “

“इमा रामाः सरथाः सतूर्याः “"तवैव वाहाः तव नृत्यगीते "

लंकाधिपति की भक्ति भी प्रेयोमार्ग
वाली सहेतुकी भक्ति है।जब हेतु( कारण) पूरा हुआ फल प्राप्ति हुई और भक्ति भी पूरी

नारायण!
विभीषण की भक्ति तो संसारभक्ति
नहीं।

मानशून्य जो है। महामानी रावण
द्वारा ठुकराने पर शरणागत
होकर केवल भगवान् की
“प्रेमा -भक्ति ” का आकांक्षी है

” यद्यपि प्रथम वासना रही
रघुपति प्रीति-सरित सो बही रावण ने निर्मान विभीषण की बात क्या ठुकराई,तत्क्षण सकामी

अभिमानी दशग्रीव का वैभव समाप्त

रावण जबहिं विभीषन त्यागा
भयउ विभव तनु तबहिं अभागा

और समझिये नारायण !

शिवजी ने शिवा से कहा कि
साधुसन्त कि शिक्षा का अनादर
समस्त हानि का कारण बनता है

साधु अवग्या तुरत भवानी
कर कल्यान अखिल कै हानी

विभीषण जी ने माता सीता को
लौटाने और निष्काम निर्मान
भक्ति का उपदेश किया था

यह भक्ति ,सनेही राम की सनेही भक्ति
जो ठहरी

” भजहु राम बिन हेतु सनेही “

लक्ष्मण जी ने चिट्ठी ही भेज दी थी
रावण के पास
अपने को अनुज कहते हुए ,

प्रभु कमल चरण – कमलों का
चंचरीक बन जाने का निवेदन किया
अभिमान छोड़ने का आग्रह किया अन्यथा की स्थिति में प्रभुराम के बाणों की ज्वाला में पतिंगे की तरह जलना पड़ेगा

की तजि मान अनुज इव
प्रभु पद पंकज भृंग
होहि कि रामसरानल
खल कुल सहित पतंग

और तो और
रावण का भेजा उसका अपना दूत
” सुक” लौट कर श्रीलक्ष्मण जी
की चिट्ठी सौंप कर
चिट्ठी में लिखी बातें अक्षरशः सत्य
बताता है
अभिमान त्याग का निवेदन करता है

कह सुक नाथ सत्य सब बानी
समुझहु छाँड़ि प्रकृति अभिमानी

“यह मानापमान अभिमान तो
प्रकृति का प्राकृत अंश है ” अतुलितबलधाम निष्काम श्रीराम-काम हनुमान् जी महाराज भी संसार भ्रम(मान) को छोड़ कर भगवत् शरणागति को ही श्रेष्ठतम श्रेयमार्ग बताते हैं

” भ्रम तजि भजहु भगत भयहारी “

इसीलिये नवधा भक्ति उपदेश- अवसर
पर, भगवान् श्रीराम सकामी और
साभिमानी तथा पद-पदार्थ
वस्तु-देशादि को चाहने वाले
भक्त को
जलहीन बादल की तरह व्यर्थ कहा

भगति हीन नर सोहइ कैसा
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा

अब भगवान् कहें तो भक्त क्यों नहीं

कागभुशुण्डि जी ने संसार भक्ति
त्याग कर,
हरि की निष्काम भक्ति को
संसारोद्धरण का अनुभूत मार्ग कहा

निज अनुभव अब कहहुँ खगेसा

बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

गुरुहरी शरणम्

जब तव सुमिरन भजन न होई

अनन्त बलवन्त रावणमदहन्त
श्रीमन्त हनुमन्त ने भगवान् कोबताया की आपका स्मरण

और भजन सेवन ही संसार-विपत्
का आत्यन्तिक नाश कर सकता है। जपत हृदय रघुपति गुन श्रेनी जैसी जगदम्बा जानकी आनन्दविभोर हैं आपकी स्मृति में सतत नाम जप लीन हैं।

प्राण तो आप में रहन से जाने से रहे

नाम पाहरू दिवस निसि
ध्यान तुम्हार कपाट ,
लोचन निज पद जंत्रित
प्रान जाहिं केहिं बाट

अब ये है कि आपका विरह ही
बड़ी विपत्ति है, जो कहने योग्य नहीं

सीता कै अति बिपति विशाला
बिनहिं कहे प्रभु दीनदयाला भगवती और भगवान् शक्तिमती और शक्तिमान् वस्तुतः अभिन्न हैं यह तो "सीताराम" की नर लीला है

अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के कर्ता
कारयिता प्रेमियों को मान देन वाले

और संसार-प्रेमियों का अभिमान
मान-खण्डन करके उन्हें "निर्मान - मोहा -जित-सङ्ग-दोषाः" करने वाले करुणा वरुणालय भगवान् किसी "भक्त" का अभिमान रहने नहीं देते, चाहे जड़ हो चाहे चेतन समुद्र का मानभंग भगवान् ने इसीलिये किया, भक्ति भी दी।

भगवान् ने विनय प्रार्थना की

सिन्धु समीप गए रघुराई।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिर नाई इसलिये कि समुद्र पार करने का उपाय वह समुद्र स्वयं कहेंगे किन्तु भगवान् के विनय का कोई परिणाम न आने पर

वाण सन्धान किया प्रभु ने

सन्धानेउ प्रभु बिसिख कराला
ऊठी उदधि उर अन्तर ज्वाला

सभीत डरा सहमा जड़ समुद्र त्यक्ताभिमान ब्राह्मण वेश में सोने की थाली में नाना मणियों को सजाये आ गया।

कनक थार भरि मनि गन नाना
बिप्र बेस आयउ तजि “माना” भगवान् का चरण रज लिया क्षमा माँगी सभय सिन्धु गहि प्रभु पद केरे छमहु नाथ सब अवगुन मेरे "नष्टाभिमान हो गया सद्यः समुद्र और प्रगटी स्वतः भक्ति" भगवान् को सागर सन्तरण का उपाय "नल-नील" के रूप में बताया है। बड़ी बात कि जड़ समुद्र तो चेतन हो गया है प्रभुस्पर्श सुख से

और नलनील के स्पर्श से बड़े बड़े पत्थर
पानी में तैरेंगें, जिसके पीछे और
कोई शक्ति नहीं
वह शक्ति तो प्रभु आपकी ही होगी
आपके प्रताप से यह संभव होगा

तिनके परस किये गिरि भारे
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे

ऐसे हमारे प्रभु श्रीराम
जो क्षण भर में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ तथा मूक को बाचाल और बाचाल को मूक बनाने वाले हैं किसी शरणागत पर कृपा करके उसे "विगताभिमान" बना कर अपनी "अनपायनी भक्ति" दे दें तो उनकी "भक्तवत्सलता" ही प्रमाणित होती है।

इसीलिये रुद्रवतार अंजनी-नन्दन ने भगवान् के भक्तवात्सल्य पर सुविचारित निर्णय ही मानो दे दिया कि हे प्रभु आप जिस पर

कृपा करें उसे कौन सी विपत्ति? आप और आपके प्राणप्रिय सन्त जिसे संसार सागर से उबारना चाहें अपने भजन में लगा कर उबार ही लेंगे। उसका बार-बार का चक्कर खतम

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई

जब तव सुमिरन भजन न होई

हरिगुरू शरणम् । गुरुहरी शरणम् ।