तुम सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

त्रिवेणी जल ने भरत जी को
आशीर्वाद में श्रीराम की अनन्यप्रियता
प्रदान की है।

उधर भरत के विषय में जीवाचार्य
लक्ष्मण की लीला द्रष्टव्य है

जब अयोध्या से प्रस्थान किये
सपरिकर श्रीभरत जी का
आगमन जान कर, श्रीरामसीता
सहित लक्ष्मण पर, आक्रमण करने
के लिए वे भरत जी आरहे हैं
ऐसी “विमतिलीला” का नाटक
करते हैं, लक्ष्मण जी

भगवान् श्रीराम श्रीलक्ष्मण जी को
पहले ही समझा चुके हैं कि
अतिभार विस्तार विस्तीर्ण
समेरु तो मच्छर की एक फूँक से
हो सकता है उड़ जाय, किन्तु

भरत जैसा निर्मान निर्मोह
जगद् हितैषी त्यागी साधु सन्तस्वरूप
महात्मा को राज्य सत्ता का मद नहीं
छू सकता

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई

आगे भगवान्, तो भरत को सूर्यवंश
रूपी तालाब का हंस ही कह देते हैं ,

जो जल विकार को दूर कर
दूध का दूध और पानी का पानी
कर डालने के लिये प्रसिद्ध है

भरत हंस रविबंस तड़ागा
जनमि कीन्ह गुनदोष विभागा

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
निज जस कीन्ह जगत उजियारी

भैया! ऐसा भरत और ऐसी दुर्मति
कि वह हम पर आक्रुष्ट हो आक्रमण
करे, यह तो असम्भव है हंस है यदि भरत तो साक्षात् सरस्वती का वाहन है।

सरस्वती स्वयं ज्ञानमूर्ति जिसके
ऊपर विराजे, उसके द्वारा अज्ञान
मूलक -कार्य ?असम्भव असम्भव असम्भव

भैया ! भरत तो ऐसा हंस है कि
वह “जड़जल ” के मायिक गुणों त्रिविध सद् रजस् तमस् के त्रिविध क्रमिक कार्यरूप दुर्गुणों सुख दुःख और मोह से भी सर्वथा परे है और परे कर देने वाला साधु है

नारायण! “जल” तो मायिक है जड़ है

गगन समीर अनल जल धरनी
इन्ह कै नाथ सहज जड़ करनी

भरत के गुणों का स्मरण भी
भगवान् को दुखी कर दे रहा है

शरणागत वत्सल परमकरुणामय
प्रभु श्रीराम तो लक्ष्मण से
श्रीभरत जी के गुण-शील-स्वभाव
का वर्णन करते हुए प्रेम के समुद्र में
डूब ही गये

कहत मगन गुन सील सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

भैया! भरत जैसा निर्लोभी
निरभिमानी तो ब्रह्मा के द्वारा
रचा ही नहीं गया है

सुनहु लखन भल भरत सरीसा
विधि प्रपंच महु सुना न दीसा

और यह सब भरत जी के विषय
में प्रभु श्रीराम इसलिये कह रहे हैं

मानो त्रिवेणी जल ने भरत को
दुःखातीत होने और भगवान्
का अनन्य प्रेमी होने का आशीष

जो दे दिया था

बादि गलानि करौ मन माही

तुम्ह सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

सहित प्रयाग सुभाग हमारा

“भरत” श्रीराम कथा के असाधारण
चरित्र हैं।यह और कोई नहीं वरन् स्नेह-अनुराग-प्रेम का समूहीभूत पुंजीभूत दूसरा शरीर धरे प्रभु राम ही हैं भरद्वाज मुनि ने अपने आश्रम में पधारे श्रीभरत जी से यह बात कही थी

तुम तो भरत मोर मत एहू
धरे देह जनु राम सनेहू हमारे सद्गुरु भगवान् मलूक पीठाधीश्वर महाराज जी ने व्यास-पीठ से एक दिन सन्त परम्परानुमोदित एक रहस्य का अचानक अनावरण कर दिया कि इसी कलिकाल में भरद्वाज ऋषि की वाणी सिद्ध करने के लिए श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य तो श्रीराम जी और श्रीभरत जी का संयुक्त विग्रह धारण करके अवतरित हुए थे "रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतः महीतले" "भरतस्यानुपमं प्रेम ध्यायन् युक्तः समागतः" नारायण! सन्तो की वाणी ऋषियों की वाणी जो निकल जाती है परमपरम चरम स्नेही प्रभु तो उस अर्थ को घटाते ही हैं संस्कृत-कविता-कामिनी-विलास कालिका-कृपा-दृष्टि के आवास महाकवि कालिदास भी इसी बात का अनुमोदन करते हैं - "ऋषीणां पुनः आद्यानां वाचम् अर्थः अनुधावति" त्रिवेणी जल में स्नान करके अत्यंत भावुक होकर जब श्रीभरत जी ने धर्मार्थकाममोक्ष में अरुचि दिखाते हुए श्रीरामचरणों का अनुराग माँगा था तब त्रिवेणी जल के "तथास्तु" कहने पर उन्हें रोमांच हो गया

देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की
भरत को धन्यातिधन्य कहा

तनु पुलकेउ हिय हरषि सुनि
“बेनि-बचन” अनुकूल
भरत धन्य कहि धन्य सुर
हरषित बरसहिं फूल

भरद्वाज जी ने भरत को सुख की
संजीवनी और जड़संसार का
“समस्त यश” कहते हुए
भगवान् का प्रीतिपात्र कहा

तुम पर अस सनेह रघुबर के
सुख संजीवनि जग जस जड़ के ऋषि भरद्वाज ने अपनी तपस्या का फल सियारामलखन का दर्शन बता कर इस भगवद् दर्शन का भी फल श्री भरत जी का दर्शन बता दिया नारायण ! भगवद् दर्शन का फल

साधु सन्त विरक्त भक्त का दर्शन ही है

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं
उदासीन तापस बन रहहीं

सब साधन कर सुफलु सुहावा
लखन राम सिय दरसन पावा

तेहि फल कर फल दरस तुम्हारा

“सहित प्रयाग सुभाग हमारा”

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

भरत तुम सब बिधि साधू

भगवान् श्रीराम ने भरत जी को

नीति रत सज्जन साधु पदवी दी थी

नीयते अनया सुष्ठु रीत्या इति नीतिः

निःशेषः अशेषः समग्रः सम्पूर्णः
“परमात्मैव”प्राप्यते यस्यां सा नीतिः

शास्त्र और सन्त अनुमोदित जिस
सुन्दर मार्ग से चलकर निःशेष
सम्पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति हो
वही वस्तुतः नीति है।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ

जब श्रीरामजी नीति को यथार्थतः
जानते हैं, तो और कौन नीतिज्ञ है?

यह भी जानते हैं।

श्रीरामकथा में भरत जैसा सज्जन
साधु नीतिज्ञ प्रीतिज्ञ प्रभुपदस्नेहज्ञ

निरभिमान त्यागी विरागी धर्मज्ञ
सन्त साधु भक्त दूसरा मिलता नहीं

भगवान् ने कहा यह भरत धर्म की
धुरी हैं

जौ न होत जग जनम भरत को
सकल धरम धुरि धरनि धरत को

चलाचल सम्पत्ति को विपत्ति ही
मानने वाले चरित्र हैं भरत

राजसत्ता का मद दम्भ स्पर्श ही नहीं
कर पाता

मच्छर की एक फूँक से सुमेरु जैसा
पर्वत तो उड़ कर कहीं जा सकता है
किन्तु भरत को राज्यमद नहीं हो
सकता

लक्ष्मण से भगवान् ने कहा

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई

समुद्र का खारापन अत्यंत खट्टे दही
मट्ठे के कण मात्र से मिट सकता है
लेकिन भरत को ब्रह्मादिक पद
मिलने पर भी मद नहीं हो सकता

भरतहिं होइ न राजमद
बिधि हरि हर सन पाइ
कबहुँ की काँजी सीकरनि
छीरसिन्धु बिनसाइ

नारायण! भगवान् के वन गमन के
बाद भरतजी उन्हें लौटाने के लिए
सपरिकर प्रस्थान करते हैं मार्ग में तीर्थराज प्रयाग पड़ता है त्रिवेणी में स्नान करते हैं परमपावन पतितपावन श्रीराम जी के वन गमन से अत्यंत दुखी हैं और इतने आर्त हैं कि त्रिवेणी से भी "भीख" माँग बैठते हैं नारायण! मर्यादा ही तोड़ देते हैं राजा को भीख नहीं माँगनी चाहिए किन्तु श्रीरामवियोग का असह्य दुख उन्हें धर्मविचलित कर देता है

माँगहु भीख त्यागि निज धरमू
आरत काह न करइ कुकरमू

पुरुषार्थ-चतुष्टय में भरतजी को कोई
अभिरुचि नहीं। रुचि है तो
केवल और केवल
प्रभु राम के शुचि-चरणों में

अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहौं निरबान
जनम – जनम रति राम पद
यह बरदान न आन

गंगा यमुना सरस्वती का संगम
भरत को श्रीरामप्रेम-संगम दे देता है

क्योंकि यहाँ भी तीन हैं

श्री ( उभय बीच श्री सोहति कैसे )

राम(सच्चिदानन्द दिनेसा)

प्रेम( सब मम प्रिय सब मम
उपजाए)

इसीलिये आतुर होकर संगम से
अनूठा संगम माँगते हैं

सीताराम चरन रति मोरे
अनुदिन बढ़हु अनुग्रह तोरे

तब त्रिवेणी जल बोल पड़ा
आशीर्वाद के आकांक्षी प्रेममूर्ति

भरत को सब प्रकार से साधु
कहा जैसे रामजी ने कहा था

और आशीष में श्रीराम का
अगाध प्रेम दान मिल गया

“तात भरत तुम सब बिधि साधू

राम चरन अनुराग अगाधू”

हरिगुरू शरणम्।
गुरुहरी शरणम्।

बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

संसार भक्ति छोड़कर हरि भक्ति
ही श्रेयस्कर श्रेष्ठतम "भक्त नचिकेता" के शब्दों में "श्रेयस् मार्ग" है संसार भक्ति तो "प्रेयोमार्ग" है नचिकेता "अन्नादि" की तरह उगने पकने और पुनः पैदा होने वाले संसार मार्ग पर जाना नहीं चाहता

इसीलिये कठोपनिषद् मे नचिकेता ने
“यम” से कहा था

” सस्यमिव आजायते मर्त्यः
सस्यम् इव पच्यते यथा “

“नहीं चाहिए मुझे इन्द्र का सुख
अथवा नाना लोकों का लोकसुख “

“इमा रामाः सरथाः सतूर्याः “"तवैव वाहाः तव नृत्यगीते "

लंकाधिपति की भक्ति भी प्रेयोमार्ग
वाली सहेतुकी भक्ति है।जब हेतु( कारण) पूरा हुआ फल प्राप्ति हुई और भक्ति भी पूरी

नारायण!
विभीषण की भक्ति तो संसारभक्ति
नहीं।

मानशून्य जो है। महामानी रावण
द्वारा ठुकराने पर शरणागत
होकर केवल भगवान् की
“प्रेमा -भक्ति ” का आकांक्षी है

” यद्यपि प्रथम वासना रही
रघुपति प्रीति-सरित सो बही रावण ने निर्मान विभीषण की बात क्या ठुकराई,तत्क्षण सकामी

अभिमानी दशग्रीव का वैभव समाप्त

रावण जबहिं विभीषन त्यागा
भयउ विभव तनु तबहिं अभागा

और समझिये नारायण !

शिवजी ने शिवा से कहा कि
साधुसन्त कि शिक्षा का अनादर
समस्त हानि का कारण बनता है

साधु अवग्या तुरत भवानी
कर कल्यान अखिल कै हानी

विभीषण जी ने माता सीता को
लौटाने और निष्काम निर्मान
भक्ति का उपदेश किया था

यह भक्ति ,सनेही राम की सनेही भक्ति
जो ठहरी

” भजहु राम बिन हेतु सनेही “

लक्ष्मण जी ने चिट्ठी ही भेज दी थी
रावण के पास
अपने को अनुज कहते हुए ,

प्रभु कमल चरण – कमलों का
चंचरीक बन जाने का निवेदन किया
अभिमान छोड़ने का आग्रह किया अन्यथा की स्थिति में प्रभुराम के बाणों की ज्वाला में पतिंगे की तरह जलना पड़ेगा

की तजि मान अनुज इव
प्रभु पद पंकज भृंग
होहि कि रामसरानल
खल कुल सहित पतंग

और तो और
रावण का भेजा उसका अपना दूत
” सुक” लौट कर श्रीलक्ष्मण जी
की चिट्ठी सौंप कर
चिट्ठी में लिखी बातें अक्षरशः सत्य
बताता है
अभिमान त्याग का निवेदन करता है

कह सुक नाथ सत्य सब बानी
समुझहु छाँड़ि प्रकृति अभिमानी

“यह मानापमान अभिमान तो
प्रकृति का प्राकृत अंश है ” अतुलितबलधाम निष्काम श्रीराम-काम हनुमान् जी महाराज भी संसार भ्रम(मान) को छोड़ कर भगवत् शरणागति को ही श्रेष्ठतम श्रेयमार्ग बताते हैं

” भ्रम तजि भजहु भगत भयहारी “

इसीलिये नवधा भक्ति उपदेश- अवसर
पर, भगवान् श्रीराम सकामी और
साभिमानी तथा पद-पदार्थ
वस्तु-देशादि को चाहने वाले
भक्त को
जलहीन बादल की तरह व्यर्थ कहा

भगति हीन नर सोहइ कैसा
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा

अब भगवान् कहें तो भक्त क्यों नहीं

कागभुशुण्डि जी ने संसार भक्ति
त्याग कर,
हरि की निष्काम भक्ति को
संसारोद्धरण का अनुभूत मार्ग कहा

निज अनुभव अब कहहुँ खगेसा

बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

गुरुहरी शरणम्

जब तव सुमिरन भजन न होई

अनन्त बलवन्त रावणमदहन्त
श्रीमन्त हनुमन्त ने भगवान् कोबताया की आपका स्मरण

और भजन सेवन ही संसार-विपत्
का आत्यन्तिक नाश कर सकता है। जपत हृदय रघुपति गुन श्रेनी जैसी जगदम्बा जानकी आनन्दविभोर हैं आपकी स्मृति में सतत नाम जप लीन हैं।

प्राण तो आप में रहन से जाने से रहे

नाम पाहरू दिवस निसि
ध्यान तुम्हार कपाट ,
लोचन निज पद जंत्रित
प्रान जाहिं केहिं बाट

अब ये है कि आपका विरह ही
बड़ी विपत्ति है, जो कहने योग्य नहीं

सीता कै अति बिपति विशाला
बिनहिं कहे प्रभु दीनदयाला भगवती और भगवान् शक्तिमती और शक्तिमान् वस्तुतः अभिन्न हैं यह तो "सीताराम" की नर लीला है

अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के कर्ता
कारयिता प्रेमियों को मान देन वाले

और संसार-प्रेमियों का अभिमान
मान-खण्डन करके उन्हें "निर्मान - मोहा -जित-सङ्ग-दोषाः" करने वाले करुणा वरुणालय भगवान् किसी "भक्त" का अभिमान रहने नहीं देते, चाहे जड़ हो चाहे चेतन समुद्र का मानभंग भगवान् ने इसीलिये किया, भक्ति भी दी।

भगवान् ने विनय प्रार्थना की

सिन्धु समीप गए रघुराई।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिर नाई इसलिये कि समुद्र पार करने का उपाय वह समुद्र स्वयं कहेंगे किन्तु भगवान् के विनय का कोई परिणाम न आने पर

वाण सन्धान किया प्रभु ने

सन्धानेउ प्रभु बिसिख कराला
ऊठी उदधि उर अन्तर ज्वाला

सभीत डरा सहमा जड़ समुद्र त्यक्ताभिमान ब्राह्मण वेश में सोने की थाली में नाना मणियों को सजाये आ गया।

कनक थार भरि मनि गन नाना
बिप्र बेस आयउ तजि “माना” भगवान् का चरण रज लिया क्षमा माँगी सभय सिन्धु गहि प्रभु पद केरे छमहु नाथ सब अवगुन मेरे "नष्टाभिमान हो गया सद्यः समुद्र और प्रगटी स्वतः भक्ति" भगवान् को सागर सन्तरण का उपाय "नल-नील" के रूप में बताया है। बड़ी बात कि जड़ समुद्र तो चेतन हो गया है प्रभुस्पर्श सुख से

और नलनील के स्पर्श से बड़े बड़े पत्थर
पानी में तैरेंगें, जिसके पीछे और
कोई शक्ति नहीं
वह शक्ति तो प्रभु आपकी ही होगी
आपके प्रताप से यह संभव होगा

तिनके परस किये गिरि भारे
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे

ऐसे हमारे प्रभु श्रीराम
जो क्षण भर में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ तथा मूक को बाचाल और बाचाल को मूक बनाने वाले हैं किसी शरणागत पर कृपा करके उसे "विगताभिमान" बना कर अपनी "अनपायनी भक्ति" दे दें तो उनकी "भक्तवत्सलता" ही प्रमाणित होती है।

इसीलिये रुद्रवतार अंजनी-नन्दन ने भगवान् के भक्तवात्सल्य पर सुविचारित निर्णय ही मानो दे दिया कि हे प्रभु आप जिस पर

कृपा करें उसे कौन सी विपत्ति? आप और आपके प्राणप्रिय सन्त जिसे संसार सागर से उबारना चाहें अपने भजन में लगा कर उबार ही लेंगे। उसका बार-बार का चक्कर खतम

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई

जब तव सुमिरन भजन न होई

हरिगुरू शरणम् । गुरुहरी शरणम्

भजु तुलसी तजि मान मद

यह भजन का मार्ग है ।
यह सेवा का मार्ग है ।
यह संसार भंजन का मार्ग है ।
यह राम रंजन का मार्ग है ।

यहाँ अभि मान छोड़ना होगा ।
पकड़ना है यदि भजनसेवा सन्मार्ग

“मान” जो “अभि” अर्थात् अपने चारों
ओर हमने गढ़ रक्खा है।

हमने स्वयं रचा है ।

अच्छा लगता है मुझे मान मिलने से
अच्छा लगता है मुझे सम्मान मिलने से

और किसका है यह ” मान “?

यही है शरीर का मान

हमारे शरीर से जुड़ा संसार का मान

रूपये पैसे सगेसम्बन्धों का मान

कभी नहीं टिकते ये सभी
ले जाते पुनर्जन्म की ओर
मायिक संसार का कोई
नहीं है राम ! ओर और छोर

भरद्वाज मुनि पवित्र प्रयाग की
धरती पर याज्ञवल्क्य को यही बताते हैं

कहहुँ राम गुन ग्राम
भरद्वाज सादर सुनहु
भव भंजन रघुनाथ
भजु तुलसी तजि मान मद

सुन्दर काण्ड में अनन्त बलवन्त
हनुमन्त अपनी भक्ति -मत्ता
सिद्ध करते हैं निरभिमानता लक्षित भक्ति का

उदाहरण देने को तत्पर वे “भक्तराज” भक्तिमूर्ति श्रीसीताजी से आज्ञा

माँगते दिखते हैं फल फूल खाने की

बड़ों की आज्ञप्ति के बिना कुछ करना

“मनमानिता और अभिमानिता है”

सुनहु मातु मोहिं अतिशय भूखा
लागि देखि सुन्दर फल रूखा

मैया मैथिली भी सभी कुछ साफल्य

का मूल भगवद् अनुग्रह ही मानती हैं

और अपनी भी निरभिमानता सिद्ध
करती हैं। प्रभु
श्रीराम को हृदय में
धारण करके सफल होने को
कहती हैं

“स्वयं किसी बात का श्रेय न लेना

निरभिमानता का प्रत्यक्ष लक्षण है”

और “निरभिमानता तो भक्ति की पराकाष्ठा है "

देखि बुद्धि बल निपुन कपि
कहेहु जानकी जाहु
रघुपति चरन हृदय धरि
तात मधुर फल खाहु

रामकाज मर्यादा काज है

हनुमान् निरभिमान अतिभक्तिमान जौं न ब्रह्म सर मानहु महिमा मिटै अपार कहते हुए ब्रह्मबान से मूर्छित होने की लीला करते हैं और नागपास में बँध कर दिखाते हैं कि यह सवाल मेरा नहीं है

यह तो मर्यादापुरुषोत्तम की प्रबल
भक्तिमत्ता का मामला है

मेघनाद से बंध कर अपने दूतकर्म
को भी पराकाष्ठा पर पहुँचाते हैं

तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ
नाग पास बाँधेसि लै गयऊ

जासु नाम जपि सुनहु भवानी
भव बन्धन काटहिं नर ज्ञानी
तासु दूत कि बन्ध तरु आवा
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा

ऐसी है मर्यादा पुरूषोत्तम के दूत
की मर्यादा

अभिमानशून्यता भक्तियुक्तता और
भय -मुक्तता

भक्तिमूर्ति माता सीता भी
निरभिमान हैं
सारा भार भगवान् पर डाल कर
भगवत् चिन्तामग्न होने से
अति निश्चिन्त

इधर लंकाकांड में स्वयं भगवान् भी
मेधनाद के सर्पास्त्र से बँधने
की लीला से राक्षसों को ललचाते हैं

तब शिव ने शिवा से कहा था

गिरिजा जासु नाम जपि
मुनि काटहिं भव पास
सो कि बन्ध तरु आवइ
व्यापक विश्वनिवास

ब्याल पास बरु भयौ खरारी
स्वबस एक अनन्त अविकारी
नट इव कपट चरित कर नाना
सदा स्वतंत्र एक भगवाना

भगवान् ने कथाक्रम में उमा को बताया
कि जिसका नामजप भव पास को
काटता है, वही मेरे प्रभु नरलीला वस
बन्धन स्वीकारते हैं।

मानो उनको तो सभी जीवों को
तारना ही हैऔर आज न सही कल ही सही निरभिमान बनाकर भक्ति पवानी है "उनका" चरित्र बुद्धि तर्क से जाना नहीं जा सकता

राम अतर्क्य बुद्धि बल बानी
मत हमार अस सुनहु भवानी

चरित राम के सगुन भवानी
तर्कि न जाइ बुद्धि बल बानी

अस बिचारि जे तग्य बिरागी
रामहिं भजहिं तर्क सब त्यागीराम भजो राम भजो राम भजो भाई अब देखिये

नरलीला बस श्रीराम का सर्पास्त्र
बन्धन होने पर
व्याकुलित वानर सेना को देख कर

देवर्षि नारद गरुड को प्रेरित
करके भेजते हैं
और माया का बना प्राकृत
सर्प नष्ट हो जाता है।नारायण!मानो मायापति की माया से सबकी माया ही समाप्त

इहाँ देव रिषि गरुड पठायो
राम समीप सपदि सो धायो

खगपति सब धरि खायो
माया नाग बरूथ
माया बिगत भए सब
हरषे बानर जूथ

युद्ध पूरा होने पर श्रीराम जगदम्बा
जानकी, समस्त परिकर, अयोध्या
पधारता है श्रीरामराज्याभिषेक होता है भगवान् स्वयं निरभिमानता दिखाते सिखाते हैं

युद्ध का सारा श्रेय अपने कुलगुरु
वशिष्ठजी को देते हैं।

देखने विचारने और आचारने योग्य
है, इनकी अभिमानशून्यता पुनि रघुपति सब सखा बोलाए मुनि पद लागहु सबहिं सिखाए गुरु बशिष्ठ कुल पूज्य हमारे इनकी कृपा दनुज रन मारे

मानो भगवान् अपने भक्तों के भक्त हैं

अनन्तर लंका युद्ध के अपने सहयोगी
जनो का परिचय गुरु से कराते हैंसभी युद्ध-सहयोगियों से सद्गुरु वशिष्ठजी को प्रणाम करने का आग्रह करते हैं। और अपने नहीं बल्कि अपने हनुमान् जाम्बवान् सदृश वानर - रीछ समुदाय को भी विजय का श्रेय देते दिखते हैं और श्रेय तो यहाँ तक देते हैं कि इन सभी वानर-रीछों को प्रेममूर्ति अत्यंत विगताभिमान श्रीभरत जी महाराज से भी अधिक प्रेमी बता देते हैं ये सब सखा सुनहु मुनि मेरे भये समर सागर कहुँ बेरे मम हित लागि जन्म इन्ह हारे भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे नरलीला करने वाले भगवान् स्वयं भी निरभिमान और जब स्वयं भगवान् ही भक्ति प्राप्ति का मूल निरभिमानता बतायें तब आश्चर्य क्यों ? इसीलिये बालकाण्ड में भगवान् और उनकी भक्ति पाने के लिये अभिमान दम्भ मद को को छोड़ने का संकल्प दिखाया गया है भगवान् की दृढ प्रेमा भक्ति पाने के लिये "भरद्वाज ऋषि बसहिं प्रयागा" का आग्रह अत्यन्त आदरणीय और वरेण्य है कथाक्रम में वे इसी संकल्प को अभिव्यक्त करते हैं। भवभंग और नित्य भगवान् की सेवा सुख की अनुभूति वाली "भक्ति"

” मद -मान” छोड़ने पर ही मिलेगी कहहुँ राम गुन ग्राम भरद्वाज सादर सुनहु भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

करउँ सद्य तेहि साधु समाना

नारायण! भगवान् का स्वस्वभाव ही है
जगत् के दुःखतापसन्ताप से
व्याकुल जनों को दुःख रहित कर देना

और भगवान् का स्वभाव है तो
भक्त भी यही भाव है।

जिस भक्ति और भक्त भाव को लेकर
“शिव” ही रामासक्ति -आसक्त
हनुमान् रूप धरे हैं। और कथाक्रम में
जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-

उमा सन्त कै इहै बड़ाई ।
मन्द करत जो करै भलाई ।

भक्त/सन्त तो भगवन्त प्रकृति होते हैं ।बड़प्पन है इन सन्तों का जो इनको

भला बुरा “चोर-सठ” तक कहने वाले
मन्द-नीच प्राणी की भी भलाई
ही करना चाहते हैं-

“भक्तराज” हनुमान् अभिमान-मूर्तिमान्
रावण और “लंकिनी” दोनों का
भला करने को आतुर हैं।

गीता में भी यही संकल्प दोहराते हैं –

कोई भी कैसा भी कितना भी
दुराचरण-रत हो, यदि सभी पापों
के प्रायश्चित स्वरूप मेरे शरणागत
होकर मेरे ही जैसे जगत् की
स्वार्थ-रहित सेवा(भजन-सेवन)का
संकल्प ले ले,तो मैं तो पहले से ही
” प्राणप्रिय” जीव को आत्मसात्
करने का संकल्प लिये बैठा हूँ-

अपि चेत् सुदुराचारो ,
भजते माम् अनन्यभाक् ।
साधुः एव स मन्तव्यः ,
सम्यग् व्यवसितो हि सः ।।

जो पै दुष्ट हृदय सोइ होई ।
मोरे सनमुख आव कि सोई ।

निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।

जीवात्मा तो परमात्मा का अपर प्राण

यदि संसार से भयग्रस्त होकर
भगवान् के शरणागत हो तो

भैया! प्रभु उस “अपने” को अपनायेंगे

जों सभीत आवा शरनाई ।
रखिहौं ताहि प्रान की नाईं।

जैसे विभीषण को क्या नहीं दिया ?

उस ” अपर” “जीव” की “अपरा”
“माया” का अपहरण करने को साधु
सन्त भगवन्त तत्पर हैं।

लेकिन अनन्य भाव से आना होगा
सब कुछ मद मोह अभिमान त्याग
कर आना होगा भगवान् तो “साधु”
पद साधने की बाट जोह रहे हैं –तजि मद मोह कपट छल नाना । करौं सद्य तेहि साधु समाना ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

त्यागहु तम अभिमान

बिना अभिमान छोड़े भक्ति नहीं।
ज्ञान भी नहीं ।
वैराग्य तो असम्भव है ही।

“भक्तराज” अनन्त बलवन्त
श्रीहनुमन्त में कोई अभिमान नहीं

अतुलितबल के धाम हैं। और बल कैसा,कितना?

दसहजार हाथियों का बल एक
ऐरावत में।

दस हजार ऐरावतों का बल एक
इन्द्र में।

दस हजार इन्द्रों का बल हनुमन्त के
एक रोएँ में।

शरीर के रोओं की गणना संभव नहीं
हनुमान् जी महराज का बल
इसीलिए अतुलनीय।

सुरक्षा में लगी लंकिनी, मसक समान
रूप धरने वाले हनुमान् जी को “चोर”
कह देती है-
मोर अहार जहाँ लगि चोरा। सबसे बड़ा चोर "रावण" इसी लंका का अधिपति है। उसी "चोर " कामदूत की सुरक्षाकर्मी

का “श्रीरामदूत” को चोर कहना
बड़ा भारी दुःसाहस "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" क्रोध में ही सही "भक्तराज " के मुष्टि-प्रहार का स्पर्श पाकर -

रूधिर बमत धरणी ढनमनी

हो जाती है , और सँभल कर उठती है
ब्रह्माजी द्वारा रावण को वरप्राप्ति
का स्मरण करके, समस्त राक्षस कुल
के संहार का उपस्थित काल
सुनाती है-

जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहिं चीन्हा ।।
बिकल होसि जब कपि कै मारे ।
तब जानेहु निसिचर संघारे ।।

अपने पुण्य भाग्य से साधु/सन्त
सज्जन रक्षक ” श्रीरामदूत” को
पाकर एक राक्षसी गद्गद है।
कृतकृत्य है-

तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।

स्वर्ग और मोक्ष का सुख भी तुच्छ है,

“राम ते अधिक राम कर दासा” के
हस्तप्रहार क्षणिकस्पर्श से।
कह उठती है-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख
धरिअ तुला इक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि
जौं सुख लव सतसंग।

आशीर्वाद भी देती है-

प्रविसि नगर कीजै सब काजा
हृदय राखि कोशलपुर-राजा।।

भैया! भगवान् जिनके हृदय में
सर्वदा अधिष्ठित हैं, ऐसे रामदूत
का प्रहार भी तार देता है ।

ऐसे श्री हनुमान् जी महराज ही भक्त कहलाने के सर्वथा योग्य हैं क्योंकि इनमें अभिमान का लेश नहीं लंका विध्वंस कर, राक्षसों का संहार करके जब प्रभु श्रीराम से आकर "भक्तराज" मिलते हैं।

तब भगवान् को प्रसन्न जानकर
लंकादहन के दुर्गम कार्य का श्रेय
“श्रीराम” को ही देतेहैं ।कैसी अभिमान शून्यता है-

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना ।
बोले बिगत बचन अभिमाना।

समुद्र लंघन , लंका – दहन
अक्षकुमारादि-हनन
अशोक-वाटिका-विदारन इत्यादि समग्र कार्य का मूल प्रभु श्रीराम का "प्रताप" संताप "रामरोषपावक सो जरई" बताते हैं

शाखा मृग कै बड़ि मनुसाई ।
शाखा तैं शाखा पर जाई ।।

नाघि सिन्धु हाटकपुर जारा ।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।।

सो सब तव प्रताप रघुराई ।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।

इसीलिये हनुमान् जी महाराज
अतुलितबल बल धाम
और भक्तिधाम ” भक्तराज” हैं

क्योंकि अभिमान – शून्य हैं

और इसीलिये श्रीरामभक्ति पाने
के लिये “अभिमान मूर्ति”
रावण को अभिमान छोड़ने की
“शिक्षा” दी जा रही है।

और शिक्षक कौन? “भक्तराज” ही

अनन्त बलवन्त श्रीमन्त हनुमन्त

मोह मूल बहु सूलप्रद

“त्यागहु तम अभिमान”

“भजहु” राम रघुनायक कृपासिन्धु भगवान्।।

हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।

जसि निष्केवल प्रेम

भक्त को सन्त को भगवान् से
कुछ नहीं चाहिए।
उसे केवल और केवल
“हरिभक्ति” ही चाहिए।

भक्त तो “अंश ” है ।और
भगवान् उसके ” अंशी” भगवान् " प्रेम-मूर्ति" हैं। और भक्त तो उस प्रेम प्रसाद का आकांक्षी।

भक्त की आसक्ति,रति, स्पृहा
अपने “प्रेमास्पद” में है।नारद जी ने कहा -

” सा तु अस्मिन् परम-प्रेम-रूपा “यह परम प्रेममयी भक्ति, भक्तों और

साधुओं में है, जिससे ये जगद् वरेण्य
हो चुके हैं। नारायण!

जामवन्त जी और श्रीहनूमान् जी
महाराज को अपने वेश आकृति की
चिन्ता नहीं।

वह तो परमात्मा को साध देने
वाले “साधु” हैं –

कियें कुबेस साधु सनमानू
जिमि जग जामवन्त हनुमानू।।

इन भक्तों की भक्ति “अमर” है। "अमृत-स्वरूपा च"

भगवान् में ही प्रेम वस्तुतः ” अमृत” है।

इस प्रेम की माधुरी मे रचा बसा
ही बस सब कुछ है।

क्योंकि लोक की वासना तो मृत्यु है।

भगवद् वासना मात्र ही ” अमृत “

भगवान् का सयाना भक्त “भोग “
और ” मोक्ष ” का लोभी नहीं।

असि बिचारि हरि भगत सयाने।
मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।

वह तो हरि से हरि भक्ति ही माँगता है।

क्योंकि मोक्ष और भोग तो –

“हरि-भक्ति” की दासियाँ हैं –

हरिभक्तिमहादेव्याः सर्वाः
मुक्त्यादि – सिद्धयः।
भुक्तयःच अद्भुताः तस्याः ,
चेटिकावद् अनुव्रताः ।। - श्रीनारद पांचरात्र

भक्त तो भगवान् का प्रेम पाकर
पूर्णकाम और कृतकृत्य है।और यदि प्रेमविवश कृतकृत्य नहीं तो "पतन" निश्चित है।

मोक्ष भी ऐसा कि भगवत्
चरणाश्रय पाकर पृथक् सत्ता
स्वरूप वह भक्त/ साधु भगवान्
की लीला रस माधुरी का पान
करता रहे।
जल की ऐसी बूँद जो समुद्र मेंं
विलीन हो जाये तो उसे क्या कोई
अनुभूति होगी? नहीं होगी क्योंकि उसकी पृथक् सत्ता ही नहीं। इसलिये भगवान् उमाशंकर ने कहा

कि, योग-यज्ञ-दान-तप-व्रत-नियम
आदि का पालन भगवान् की वैसी –कृपा नहीं दे सकते जितना कि " प्रेम "

मतलब कि केवल प्रेम के लिये प्रेम – उमा जोग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम। राम कृपा नहिं करसि तसि, जसि निष्केवलप्रेम ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

सो सुख उमा जाइ नहिं बरना

“अचितवत् पारतन्त्र्यम् एव प्रपत्तिः”

जैसे कि संसार की स्वयं न चलने

हिलने डुलने वाली वस्तुएं, पर-तन्त्र हैं।

वैसे ही “भक्त” की दशा हो जाती है।

हमारे प्रयोग आने वाला हमारा “वस्त्र”

सर्वथा हमारे आधीन है।
हम इसे स्वयं प्रयोग करें,दूसरे
को दे दें, इसे कोई आपत्ति नहीं होती।

उसी तरह “भक्त” “साधु” “सन्त”
“प्रेमी” “महात्मा” होते हैं ।अचेतन और "जड़ वस्तु" की तरह। भक्त कहता है- जहाँ भेजो वहीं जायेंगे। किष्किंन्धा पर्वत पर वह निहार रहा है, राह। "रुद्र" रूप छोड़ कर "प्रेममूर्ति" "प्रभु" के वशीभूत है।

विह्वल है व्याकुल है।विरही है आतुर है। सुग्रीव द्वारा भेजा जाता है।

भयग्रस्त है सुग्रीव नहीं पहचानता

प्रभु श्री राम को लेकिन

भेजता है उसी आतुर कातर भक्त को

अचितवत् अचेतन जैसी परतन्त्रता
दीखती है भक्त में यही तो "उत्तमोत्तम" भक्त है ।

नाम है ” हनूमान् “जान लेता है , फिर भी पुष्टि के लिये पूछता है -

की तुम तीनि देव महँ कोऊ।
नर नारायन की तुम्ह दोऊ ।।

जग कारन तारन ,
भव भंजन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल भुवन पति,
लीन्ह मनुज अवतार ।।

भगवान् तत्क्षण परिचय देते हैं –

कोसलेस दशरथ के जाये ।
हम पितु बचन मानि बन आये।

नाम राम लछिमन दोउ भाई।
संग नारि सुकुमारि सुहाई ।। और जिस प्रभुदर्शन के लिये

अतृप्त मन हैं, हनुमान् जी जैसे भक्त

गिर पड़ते हैं,इन्ही भगवान् के
युगल चरणों में, अचेतन वस्तुवत्
और तब –

भगवान् उमाशंकर ने कहा, ऐसे

“अविभक्त” “भक्त-भगवान्” का

मिलन-सुख तो अवर्णनीय और

अविस्मरणीय है-

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना ।।

हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।