भक्त को सन्त को भगवान् से
कुछ नहीं चाहिए।
उसे केवल और केवल
“हरिभक्ति” ही चाहिए।
भक्त तो “अंश ” है ।और
भगवान् उसके ” अंशी” भगवान् " प्रेम-मूर्ति" हैं। और भक्त तो उस प्रेम प्रसाद का आकांक्षी।
भक्त की आसक्ति,रति, स्पृहा
अपने “प्रेमास्पद” में है।नारद जी ने कहा -
” सा तु अस्मिन् परम-प्रेम-रूपा “यह परम प्रेममयी भक्ति, भक्तों और
साधुओं में है, जिससे ये जगद् वरेण्य
हो चुके हैं। नारायण!
जामवन्त जी और श्रीहनूमान् जी
महाराज को अपने वेश आकृति की
चिन्ता नहीं।
वह तो परमात्मा को साध देने
वाले “साधु” हैं –
कियें कुबेस साधु सनमानू
जिमि जग जामवन्त हनुमानू।।
इन भक्तों की भक्ति “अमर” है। "अमृत-स्वरूपा च"
भगवान् में ही प्रेम वस्तुतः ” अमृत” है।
इस प्रेम की माधुरी मे रचा बसा
ही बस सब कुछ है।
क्योंकि लोक की वासना तो मृत्यु है।
भगवद् वासना मात्र ही ” अमृत “
भगवान् का सयाना भक्त “भोग “
और ” मोक्ष ” का लोभी नहीं।
असि बिचारि हरि भगत सयाने।
मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
वह तो हरि से हरि भक्ति ही माँगता है।
क्योंकि मोक्ष और भोग तो –
“हरि-भक्ति” की दासियाँ हैं –
हरिभक्तिमहादेव्याः सर्वाः
मुक्त्यादि – सिद्धयः।
भुक्तयःच अद्भुताः तस्याः ,
चेटिकावद् अनुव्रताः ।। - श्रीनारद पांचरात्र
भक्त तो भगवान् का प्रेम पाकर
पूर्णकाम और कृतकृत्य है।और यदि प्रेमविवश कृतकृत्य नहीं तो "पतन" निश्चित है।
मोक्ष भी ऐसा कि भगवत्
चरणाश्रय पाकर पृथक् सत्ता
स्वरूप वह भक्त/ साधु भगवान्
की लीला रस माधुरी का पान
करता रहे।
जल की ऐसी बूँद जो समुद्र मेंं
विलीन हो जाये तो उसे क्या कोई
अनुभूति होगी? नहीं होगी क्योंकि उसकी पृथक् सत्ता ही नहीं। इसलिये भगवान् उमाशंकर ने कहा
कि, योग-यज्ञ-दान-तप-व्रत-नियम
आदि का पालन भगवान् की वैसी –कृपा नहीं दे सकते जितना कि " प्रेम "
मतलब कि केवल प्रेम के लिये प्रेम – उमा जोग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम। राम कृपा नहिं करसि तसि, जसि निष्केवलप्रेम ।।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।