आज मन में यह भाव आया कि,यह भाव क्या है। शाब्दिक दृष्टि से इसमें “भू ” धातु है, जिसका अर्थ सत्ता या अस्तित्व है।हमारी समझ में यह मानव प्राणी ही है, जिसमें अस्तित्व बोध होता है। ऐसा भाव मनुष्य में ही आता है, क्योंकि यह केवल भोग योनि नहीं, प्रत्युत कर्म योनि भी है। भू : भवनं भाव: भावनम् इत्यादि अपना(मानव) अस्तित्व विचार करने और तदनुकूल मानवीय गुणों को आत्मसात् करने के लिए झकझोरते हैं ।इसीलिये कहा भी गया-
यादृशी भावना यस्य
सिद्धि: भवति तादृशी।।
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।
न काष्ठे विद्यते देवो
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देवो
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
तात्पर्यत: किसी काष्ठ, पाषाण या स्वर्ण मयी मूर्ति में देवता नहीं हैं, बल्कि हमारी अपनी भावना में ही देवत्व है ,इसलिये भाव का अवलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ है।हम मनुष्य हैं ,हमें मानवता पूर्ण ही व्यवहार करना चाहिए।
वस्तुतः मानव जीवन में भाव या भावना ही है, जो उसे लौकिक/अलौकिक अवस्थान की प्राप्ति कराती है। इसलिए क्रान्तदर्शी कवि का भाव शब्दों की मूर्ति बन गया-
भरा नहीं जो भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं वह पत्थर है
जिसमें स्व-देश से प्यार नहीं।
जिसको स्व – अपने ,अपनी आत्मा से प्यार नहीं वह चेतनात्मा नहीं बल्कि परिवर्तन शील/जड़ प्रकृति मात्र गुणों से प्रेम करनेवाला “पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम् ” की श्रेणी में रहने वाला है।
।।हरिश्शरणम्।।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay
निष्काम कर्म
द्वितीयाध्याय गीता में भगवान् ने निष्काम कर्म का बड़ा सुन्दर सन्देश दिया है।यह श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध है-
कर्मणि एव अधिकार: ते
मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल-हेतुः भू
मा ते संङ्ग: अस्तु अकर्माणि।।
अर्थात् कर्तव्य कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है।फलों में कभी नहीं।कर्मफल का हेतु मत बनो।अकर्म में भी आसक्ति न हो।
“कर्मणि एव अधिकार:” तत्वतः मानवेतर योनियों को नवीन कर्म की स्वतंत्रता नहीं है।मानव योनि कर्मयोनि है और अन्य योनियां भोगयोनि मात्र।देवदुर्लभ मानव शरीर द्वारा पुरातन कर्मों का फलभोग और नवीन कर्मों से पुरुषार्थ होता है।कीट-पतंग, पशु-पक्षी, देवता ब्रह्म लोक तक की योनियां भोग योनियां हैं।उनके लिये-“ऐसा करो ,ऐसा न करो “का विधि-निषेध नहीं है।जब कि मनुष्य विधि निषेध पूर्वक प्रारब्ध फल भोगते हुए, नवीन कर्म करने में स्वतंत्र होने से आत्मोद्धार में में भी स्वतंत्र है।
“मा फलेषु कदाचन” मतलब कि कर्मफलों में किंचित् अधिकार नहीं।तात्पर्य ये कि, फलेच्छ कर्म करने पर जन्म-मृत्यु रूप बन्धन प्राप्त होगा( फले सक्तो निबध्यते-5/12)।फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्व पर कर्तव्य टिका हुआ है और फलेच्छा मिटने से कर्तृत्व मिटेगा,जिससे मनुष्य कर्म करता हुआ भी नहीं बंधेगा।”फल में तेरा अधिकार नहीं” इसका स्वारस्य ये भी है कि, मनुष्य को यह स्वतंत्रता है कि वह फल के साथ अपना सम्बन्ध चाहे जोड़े या नहीं, इसमें वह स्वतंत्र है।
जब कर्म अनित्य हैं, तब उनका फल भी अनित्य है।अनित्य से नित्य मिलेगा नहीं।ऐसा समझ लेने पर निष्काम कर्मता आ जायेगी शनैः शनैः।
“मा कर्मफल-हेतु: भू ”
मतलब कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन ,बुद्धि आदि कर्मसामग्री के साथ ईषन्मात्र ममता न हो,क्योंकि ऐसा होने पर वह कर्म फलों का हेतु बन जायेंगीं।
(केवलैरिन्द्रियैरपि….. संगं त्यक्त्वा आत्मबुद्धये )में यही बात कही गई है।
“मा ते संग:अस्तु अकर्माणि ”
अर्थात् कर्म न करने में आसक्ति होगी नहीं, बल्कि स्वस्वभाव से प्रकृत्या आलस्य-प्रमादादि होंगे ही, जो तमोगुणात्मक भोग सुख की अनुभूति करायेंगे, अतः बन्धन भी होगा।इसलिये परिवर्तन शील वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया,घटना अवस्था, स्थूल-कारण-सूक्ष्म-कारण शरीर के साथ सथ साधक को निर्लिप्त भाव से रहना चाहिए।
श्लोक के प्रथम-तृतीय पाद में समानता है-कर्म करने में ही अधिकार तथा कर्म न करने में अनासक्ति।
इसी प्रकार द्वितीय-चतुर्थ में-क्रमशः फलेच्छा निषेध और फल-हेतु बनने का निषेध।
तात्पर्यत: अकर्म में रूचि होने से प्रमादालस्य(तामस),कर्म तथा कर्मफलों में रूचि से(राजस)एवं इन सभी में रूचि न होने पर विवेक पूर्वक कर्मस्पृहा रहने पर सुखानुभूति के प्रकाश से(सात्त्विक)भावों के साथ सम्बन्ध बनता है।यही गुण-कर्म सम्बन्ध बन्ध कारक है।
अतः साधक को कर्म ,कर्मफल और त्याग सुखों में से किसी भी एक के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए।यही निष्काम कर्म का विवेचन है।
।।हरिश्शरणम्।।
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भक्त लक्षण
गीता के बारहवें अध्याय में 13 से लेकर 19 श्लोकों तक भगवान् ने भक्त का स्वरूप बताया है-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां
मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार:
समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।
सन्तुष्ट: सततं योगी
यतात्मा दृढनिश्चय:।
मयि अर्पितमनोबुद्धि:
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।14।।
जो मनुष्य सभी से घृणा रहित, सभी से नि:स्वार्थ मैत्री करनेवाला, करूणा पूर्ण,अपने पन से रहित, मैं-मेरे की भावना से रहित, सुख दुःख में समान, क्षमाशील,सतत सन्तुष्ट, भगवद् ध्यान परायण, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में करनेवाला, वज्र संकल्प वाला, मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाला है, वही मेरा भक्त है।
आगे कहते हैं –
यस्मान्नोद्विजते लोक:
लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगै: मुक्त:
य: स च मे प्रिय:।।15।।
अनपेक्षः शुचिः दक्ष:
उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।16।।
अर्थात् जिससे कोई जीव क्षुब्ध नहीं होता तथा जो स्वयं भी किसी जीव से क्षुब्ध नहीं होता, जो हर्ष -ईर्ष्या, भय-क्षोभ आदि से सर्वथा रहित है, वह मुझे प्रिय है।
किसी की अपेक्षा-उपेक्षा से शून्य, वाह्याभ्यन्तर पवित्र, कुशल, तटस्थ ,व्यथा शून्य,सभी कर्मों में कर्तापने के अभिमान से रहित है, वह मेरा प्रिय है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि
न शोचति न कांक्षति।
शुभाशुभ-परित्यागी
भक्तिमान् य:स मे प्रिय:।।17।।
जो इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट आगमन से कभी प्रसन्न नहीं होता, किसी वस्तु-व्यक्ति द्वेष नहीं करता, अनिष्टानिष्ट की प्राप्ति-वियोग में शोक नहीं करता, अप्राप्त वस्तु-व्यक्ति की इच्छा भी नहीं करता, शुभाशुभ कर्मों के फलों का समग्र त्याग करनेवाला है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
अन्तिम दो श्लोकों में उपसंहार करते हैं-
सम:शत्रौ च मित्रे च
तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु
सम:संगविवर्जित:।।18।।
तुल्यनिन्दात्मस्तुतिर्मौनी
सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेत:स्थिरमति:
भक्तिमान्मे प्रियो नर:।।19।।
अर्थात् जो शत्रु-मित्र को समान आदर देना वाला, मानापमान में समान भाव वाला, शीतोष्णसुख
और दुखों में एक जैसा, सारे सांसारिक पदार्थों में अनासक्त, निन्दा-स्तुति काल में समान रहने वाला ,किसी भी वस्तुस्थिति में सन्तुष्ट रहनेवाला,निवास स्थान में ममता आकर्षण से शून्य, निश्चल बुद्धि से मेरा भजन करनेवाला, मनुष्य मुझे प्रिय है।
इस प्रकार हर परिस्थिति में सन्तुष्ट ,संसार में रहकर भी संसार भाव से असंग रहनेवाला,भगवान् की समस्त समष्टि में उन्हें देखकर व्यवहार करनेवाला मनुष्य भगवान् को प्रिय है।वही सच्चा भक्त है, क्योंकि उसका भजन-पूजन सांसारिक वस्तु-व्यक्ति के लिये नहीं होता।अभ्यास और भगवत् कृपा से ऐसी स्थिति प्राप्तव्य है।
।।हरिश्शरणम्।।
कर्तापने का अभिमान अनुचित
गीता के तृतीय अध्याय के सत्ताइसवें एवं त्रयोदश अध्याय के उन्तीसवें श्लोक में भगवान् ने ,कर्तापन के अभिमान से मुक्त होने का आदेश दिया है।
वे कहते हैं –
प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहंकार विमूढात्मा
कर्ता अहम् इति मन्यते।।3/27।।
अर्थात् सम्पूर्णता कर्म वास्तव में, प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किए जाते हैं।अहंकार से मोहित हुए अन्त:करण वाला अविद्या के प्रबल प्रभाव से अज्ञानी व्यक्ति “मैं करने वाला हूँ ” ऐसा
मानने लगता है।
यही बात उन्होंने त्रयोदश अध्याय में भी कही-
प्रकृत्यैव च कर्माणि
क्रियमाणानि सर्वश:।
य: पश्यति तथा आत्मानं
अकर्तारं स पश्यति।।13/29।।
जो मनुष्य समस्त कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हुए देखता है तथा आत्मा को कर्मों का अकर्ता रूप में देखता है, वही यथार्थ देखता है।
इस समग्र दृष्टिकोण में सारी समस्या ये है कि हम अपने को अपने शरीर से भिन्न नहीं मानते।जब हम अपने को, अपने शरीर से अलग मान कर चलना प्रारम्भ कर दें, तो इसका निदान सम्भव है।
हमें मानना पड़ेगा कि सत्व,रज और तम -ये तीनों प्रकृति के ही कार्य हैं।तथा इन्द्रियाँ, मन,बुद्धि आदि एवं इनके विषय भी गुणों के विस्तार हैं।यही ,”इन्द्रियों का इन्द्रियों के विषयों में बरतना है “इसे ही “गुणों का गुणों में बरतना” अथवा “प्रकृति द्वारा कर्मों का किया जाना” है ।
ह
सीधे शब्दों में निष्कर्ष निकला कि -“प्रकृति में ही कर्तापन है ,आत्मा में नहीं”
हम जन्म जन्मान्तर की अविद्या से ग्रस्त होने के कारण आत्मा, मन,बुद्धि, और शरीर को कर्ता-भोक्ता मान बैठे हैं।
नित्य,शुद्ध, बुद्ध, चैतन्यात्मा निर्विकारी होने से, कर्म करने के क्षेत्र में प्रकृति के साथ कोई भी सम्बन्ध न होने से ,कर्ता तो हो ही नहीं सकता।
वस्तुतः, असंग आत्मा न किसी कर्म का कर्ता है और न ही कर्म फलों का भोक्ता।हम जन्मान्तरीय संस्कार के अहंकार वश अपने(आत्मा)को कर्ता-भोक्ता मानते हैं।
यही अहंकार ही जन्मता-मरता है, शरीर धारण करके।
अतः भगवान् के कथन हैं कि
” प्रकृति को कर्मों का कर्ता तथा आत्मा को अकर्ता रूप से देखने वाला ही यथार्थ दृष्टिकोण वाला है”
साधना और अभ्यास से ऐसी सम्यग्दृष्टि ,भगवत् कृपा परायण होकर पाई जा सकती है भगवान् सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
तीनों गुणों के लक्षण
चतुर्दश अध्याय में ही भगवान् ने तीनों गुणों को बन्धनकारक बताने के बाद, इन सभी का क्रमशः लक्षण कहा है-
सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्
प्रकाश उपजायते
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्
विवृद्धं सत्वम् इति उत।।
अर्थात्- जिस समय इस शरीर में तथा इसके सभी द्वारों में, अन्त:करण और इन्द्रियों में चेतनता एवं विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्वगुण बढ़ा है, यानी सर्वाधिक है।
लोभ:प्रवृति:आरम्भ:
कर्मणाम् अशम: स्पृहा।
रजसि एतानि जायन्ते
विवृद्धे भरतर्षभ।।
अर्थात्-हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर, यानी अन्यों से अधिक हो जाने पर-लालच ,सांसारिक चेष्टा, सभी कार्यों को स्वार्थ बुद्धि या सकाम भाव से करने लगना, अशान्ति(मन की चंचलता)और विषय भोगों की लालसा आदि उत्पन्न होते हैं।
अप्रकाश: अप्रवृत्ति: च
प्रमादो मोह एव च
तमसि एतानि जायन्ते
विवृद्धे कुरुनन्दन।।
अर्थात्- हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर ,यानी तीनों गुणों में सर्वाधिक हो जाने पर, अन्त:करण तथा इन्द्रियों में अन्धकार(अज्ञान),कर्तव्य कर्मों में रूचि का अभाव और व्यर्थ चेष्टा तथा निद्रादि अन्त:करणकी मोहिनी वृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
इतना कहने के बाद भगवान् ने कहा कि सत्वगुण वृद्धि से दिव्य स्वर्गादि लोक,रजोगुण वृद्धि से पुनः मनुष्य लोक तथा तमोगुण की वृद्धि से कीट पतंगादि योनियों की प्राप्ति, शरीर छोड़ने पर, होती है, ऐसा जानना चाहिए –
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था
मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।
जघन्यगुणवृत्तिस्था
अधो गच्छन्ति तामसा:।।
इस प्रकार यदि मनुष्य को इन गुणों के पार जाना है, तो सारी कामनाओं को त्याग कर, कर्तापने के अभिमान से दूर होना पड़ेगा –
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत: स उच्यते।।
सारे संकल्पों को त्यागकर एक मात्र भगवत् शरणागति-
“सर्वधर्मान्परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज”
ही उपाय है।
।।हरिश्शरणम् ।।
तमोगुण भी बन्धन
सत्वगुण और रजोगुण तो बन्धन कारक है ही, तमोगुण इन सभी से अधिक बन्धन का कारण होता है। वृहदारण्यक उपनिषद् में इसीलिये ऋषि ने तम(अन्धकार) से निवृत्ति और प्रकाश की प्राप्ति की बात कही है -असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय
उक्त मन्त्र में परमात्मा से, असत्य से सत्य, तम से ज्योति एवं मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलने की प्रार्थना की गई है।और वस्तुतः मृत्यु से अमरत्व और कुछ नहीं ,वरन् विषयों से विनिवृत्त होकर ,जीवन्मुक्त हो जाना है।नहीं तो अनेक जन्मों के समूहालम्बीकृत गुण बन्ध के पाशविक पाश से पार पाना असम्भव है।
सर्वशास्त्र-मयी “गीता” के चतुर्दश अध्याय मे ही तमोगुण से जीवात्मा के बन्धन का स्वरुप बताया गया है।यह तमोगुण प्रमाद -आलस्य और निद्रादि के द्वारा जीवात्मा के मुक्ति-मार्ग में बाधक बनता है।और जन्म-मृत्यु रूप संसार में ही फंसाये रहता है, यही उसका”जीवात्मा को बांधना” है।
जिस प्रकार रजोगुण को कामना आसक्ति से उत्पन्न बताया था, उसी तरह अज्ञान और तमोगुण भी है।इसके मध्य भी बीजवृक्षवत् सम्बन्ध है।तात्पर्य ये है कि, अज्ञान से तमोगुण बढ़ता है और तमोगुण से अज्ञान।देह को आत्मा से पृथक् करके दृष्टि रखने में ही सारी समस्याओं का समाधान है, नहीं तो यह तमोगुण सभी देहाभिमानियों को अज्ञान से आवृत(विवेकरहित) करके प्रमादालस्य निद्रा(भ्रम , अनवधानता सुस्ती, नींद आदि)से जकड़ कर रखता है।और जिससे जीवात्मा इस जन्म में तो कष्ट पाता ही है, उसकाअन्य जन्म भी मूढ योनियों(कीट-पतंग,पशु-पक्षी, वृक्ष-लता प्रभृति)में होता है।
तम: च अज्ञानजं विद्धि
मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:
तन् निबध्नाति भारत।।
रजसि प्रलयं गत्वा
कर्मसंगिषु जायते।
तथा प्रलीन: तमसि
मूढयोनिषु जायते।।
इस प्रकार रजोगुण बढ़े होने की दशा में मृत्यु प्राप्त करके मनुष्य योनि में जन्म के बाद, तमोगुण के बढ़ने पर तिर्यगादि निम्न योनियों में उत्पन्न होता है।
भगवान् सहायक हों और हमें सद्बुद्धि दें, जिससे हम इन गुणों के बन्धन से मुक्त हो सकें।
।। हरिश्शरणम् ।।
रजोगुण भी बन्धन
गीता के चतुर्दश अध्याय में सत्वगुण को जिस तरह बन्धन बताया गया है, उसी तरह रजोगुण को भी संसार बन्धन कारक कहा गया।यदि साधक सत्व गुणाधीन है, तो उसे केवल ज्ञानाहंकार से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।धीरे धीरे वह उसके पार जा सकता है।
अब रजोगुण को देखें, तो यह बात स्पष्ट होती है कि यह तो कामना परक है ही।वस्तुतः इस रजोगुण की वृद्धि से ही काम और आसक्ति का उद्भव होता है। एक तरह से कहें ,तो इसमें कामनाओं की शृंखला बन जाती है।एक की पूर्ति होते ही, दूसरी-तीसरी और अनेकानेक कामनाओं से आवृत हो जाता है, साधक।नि:सन्देह इसे
बीज-वृक्ष न्याय कहें तो अधिक सटीक बात होगी।
जैसै, वृक्ष बीज से उत्पन्न होता है और पुनः उसी वृक्ष से अधिसंख्य नवीन बीज उत्पन्न हो जाते हैं।कालान्तर में अन्य नूतन वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं, और इस प्रकार, यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।कभी बीज कारण है, तो वृक्ष कार्य और कभी वृक्ष कारण है, तो बीज कार्य।यह अन्योन्य आश्रय से बीजवृक्षवत् ,रजोगुण एवं कामनासक्तिवत् चलता ही रहता है।अतः भगवान् ने कहा-
रजो रागात्मकं विद्धि
तृष्णासंगसमुद्भवम् ।
तन् निबध्नाति कौन्तेय
कर्म-संगेन देहिनम् ।।
अर्थात्- हे अर्जुन!अनुराग रूप रजोगुण को तू काम और आसक्ति से उत्पन्न जानो
(काम एष: क्रोध एष:रजोगुण समुद्भव:)यह रजोगुण जीव को कर्मों और उसके फलों के सम्बन्ध से दृढतापूर्वक बांध देता है।
सांसारिक विषयासक्ति को निरन्तर दृढतर करनेवाला होने से ही”तृष्णासंगसमुद्भवम्”कहा गया है।इसी तरह”कर्मसंग”का अभिप्राय है कि इन कर्मों और फलों की चक्की में पिसता हुआ, मनुष्य इनका कर्ता-भोक्ता, स्वयं को मानने की निर्बाध दृढ परम्परा में फंसा रहता है।यही कर्मसंग से जीव का जन्म-मृत्यु बन्धन है।
इससे मुक्ति का एकमात्र उपाय भगवत् शरणागति ही है।
।।हरिश्शरणम् ।।
सत्वगुण भी बन्धन
गीताशास्त्र में भगवान् ने प्रकृति के तीनों गुणों की चर्चा की है।उन्होंने स्वयं को बीज स्थापन करनेवाला पिता तथा, प्रकृति को माता(योनि)कहा है-
सर्वयोनिषु कौन्तेय
मूर्तय:सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं
बीजप्रद: पिता। ।। (गीता अध्याय 14, श्लोक 4)
तदनन्तर उन्होंने तीनों गुणों, सत्,रज और तम को शरीर धारी के शरीर को बांधने वाला कहा है-
सत्वं रजस्तम इति
गुणा:प्रकृतिसम्भवा:।
निबध्नन्ति महाबाहो
देहे देहिनमव्ययम्।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 5)
इनमें सत्वगुण यद्यपि निर्मल(शुद्ध स्वच्छ)होने से प्रकाशक है ।अनामय (नीरोगता) प्रदान करने वाला भी है।किन्तु सुख सम्बन्ध से बंधन कारक भी है। साथ ही साथ “मैं ज्ञानी हूँ “ऐसा अभिमान उत्पन्न करके ज्ञान सम्बन्ध के कारण बांधता है।और गुणातीत अवस्था के मार्ग पर जाने नहीं देता –
तत्र सत्वं निर्मलत्वात्
प्रकाशकम् अनामयम् ।
सुखसंगेन बध्नाति
ज्ञानसंगेन चानघ ।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 6)
।।हरिश्शरणम्।।
नशा से नाश
“बद्धो हि को यो विषयानुरागी ”
आचार्य भगवत् पाद शङ्कर ने
विषयवासनाओं में फंसे हुए लोगों को बद्ध कहा है। वासनाएं मनुष्य को आकृष्ट कर, बारम्बार के जन्म-मृत्यु पाश में जकड़े रहती हैं, उससे बाहर निकलने नहीं देती।इन्हीं वासनाओं के भ्रम जाल की सुन्दर, आकर्षक, लेकिन शरीर क्षय करने वाली एक विशेष वस्तु है, नशा।यह केवल और केवल मनुष्य के शरीर, स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर खराब ही करती है।हालांकि औषधि रूप में सेवन हो तो कोई बात नहीं किन्तु अनावश्यक यदि सेवन हो रहा है, तो वर्तमान ही भविष्यत् जन्म के लिये भी कष्टाय ही होगी।
एक स्वामी जी ने पद्मपुराण का एक श्लोक उद्धृत करते हुए, नशीली वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया था-
विजया कल्पमेकं च दश कल्पं च नागिनी।
मदिरा कल्पसहस्राणि धूमसंख्या न विद्यते ।।
अर्थात्- भांग खाने वाला एक कल्प ,संखिया खाने वाला दश कल्प,शराब पीने वाला हजारों कल्प तथा धूम्रपान करनेवाला कितने कल्पों तक नरक गामी होगा, इसकी संख्या नहीं है।
यदि हमें अपने शरीर को रोग मुक्त रखना है, तो इनके सेवन से बचना होगा, भगवान् सद्बुद्धि दें, और हमारी सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
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चतुर्विध यज्ञ
गीताशास्त्र में भगवान् ने चार प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया है।चतुर्थ अध्याय का नामकरण ज्ञान-कर्म-सन्यास किया गया है, जिसमें आत्मसंयम रूपी यज्ञ को बताते हुए इसके अन्तर्गत चार यज्ञ वर्णित हैं-
द्रव्य-यज्ञास्तपो यज्ञा:
योगयज्ञा:तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञा: च
यतयः संशितव्रताः।।
अर्थात्-कितने लोग द्रव्य सबन्धी यज्ञ करनेवाले होते हैं।और कितने ही तपस्या रुपीयज्ञ करनेवाले हैं।इसी प्रकार कितने लोग योगरूप यज्ञ करनेवाले और कितने कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त संयमी जन स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करनेवाले होते हैं।
द्रव्ययज्ञ – न्याय से द्रव्य को अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ त्याग करके यथायोग्य लोकसेवा में लगाना द्रव्य यज्ञ है।जैसे कि-बुभुक्षित को भोजनादि,अनाथ,रोगी, दुखी, असमर्थ को यथायोग्य अन्न,वस्त्र, जल,औषधि, पुस्तकादि द्वारा सेवा तथा विद्वान्, सदाचारी महात्माओं की गौ,भूमि,ग्रन्थ, वस्त्र आदि से यथाशक्ति सहायता करना।इसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी बिना किसी फल की इच्छा किए सुख पहुंचाने के उद्देश्य से सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य व्यय करना “द्रव्ययज्ञ” है।
तपोयज्ञ-परमात्मा की प्रति के उद्देश्य से अन्तरिन्द्रियों को पवित्र करने के लिए निष्काम निर्लिप्त भाव से व्रतोपवास,स्वधर्म पालन हेतु कष्ट सहना।मौन व्रत धारण करना।एक या दो वस्त्रों से ही जीवन व्यतीत करना।शरीर निर्वाह हेतु सात्विक भोजन और शास्त्र निर्देशानुसार तितिक्षा सम्बन्धी क्रियाओं का पालन करना, ये सभी तपोयज्ञ हैं।
योगयज्ञ-इस पद का अभिप्राय चित्तवृत्ति निरोधरूप आठों प्रकार के योगों के अनुष्ठान से है।ये आठ योग इस प्रकार हैं-यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ-जिन शास्त्रों में भगवान् के तत्व का तथा उनके साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण स्वरूप का वर्णन है -ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना।भगवन्नाम जप स्तुति और उनकी लीला-गुणोंका कीर्तन करना।वेद वेदांग का नियम पूर्वक अध्ययन करना स्वाध्याय है।ऐसा स्वाध्याय अर्थ ज्ञान के सहित होने से तथा ममता, आसक्ति और फलेच्छा के अभाव पूर्वक किए जाने से ‘स्वाध्याय यज्ञ” है।
इस प्रकार के यज्ञ कार्य में लगा हुआ साधक निश्चय ही जीवन्मुक्त है।
।।हरिश्शरणम्।।
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