सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा

बिना भगवत् कृपा के सन्त साधु दर्शन नहीं हो सकता। और कृपा ऐसी कि, रामकाज सब करिहौं तुम बलबुद्धि निधान, की स्वतः स्थिति बन जाती है।

और पहले ही यह भी कह देते हैं कि-

अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।

सार सर्वस्व ये कि भगवदाज्ञप्त, शास्त्रों और सन्तों का आश्रय ,इस मनुष्य जीवन में अत्यंत दुर्लभ है, उसके लिए सतत प्रयास होना चाहिए।

तभी तो श्रीमदाद्य आचार्य शङ्कर ने अपने विवेकचूडामणि के तीसरे पद्य में जिन तीन चीजों को दुर्लभ बताया ,वे हैं-मनुष्यता, मुक्ति की कामना और सद्गुरु पादाश्रय।और वे यह भी कहते हैं कि इन सभी की उपलब्धि भी भगवान् कृपा पर ही निर्भर है।अतः ,सनातन साधन भगवान् के नामों स्मरण हर दशा में होना चाहिए।मनुष्य के चरम लक्ष्य श्रीभगवान् की प्राप्ति कृपा साध्य ही है-

दुर्लभं त्रयमेवेदं देवानुग्रहहेतुकम्।

मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं 

महापुरुषसंश्रयः।

मतलब कि भगवान् की कृपासे सन्त का दर्शन और तत् फलस्वरूप सर्वस्व प्राप्ति,जो श्रीराम कृपा से विभीषण को राज्यादि की प्राप्ति। क्यों? क्योंकि विभीषण भगवत् सम्मुख था और रावण रामविमुख ,तमोगुणी रजोगुणी।इसीलिये-

रामविमुख सम्पति प्रभुताई।

जाइ रही पाई,बिनु पाई।।

अतः

सतत नाम चिन्तन करते रहना चाहिए, जिससे सनातन मार्ग से सनातन सुख मिल जाय-

पर उपकार बचन मन काया।

सन्त सुभाव सहज खगराया।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं

सन्त मिलन सम सुख जग माहीं।।

सभी सन्त सद्गुरु के चरणों में प्रीति हो, ऐसी भगवत् कृपा हो जाय।

।। हरिः शरणम् ।।

कमठ अण्ड की नाईं

भगवान् और भक्त का अविच्छिन्न अविचल और अद्भुत सम्बन्ध होता है।

निरन्तर प्रभु स्मराणादि से यह आधाराधेय और तादात्म्य योग बनता है।

 इष्टदेवतासम्प्रयोगः योगः का तात्पर्य भी यही है।केवल प्राणायाम और आसन मुद्रा ही योग नहीं है, यह तो यमनियम से लेकर समाधि तक और भगवच्चरणाश्रय प्राप्ति तक चलने वाला प्रयोग विशिष्ट योग है, जिसमें मन बुद्धि चित्त और अहंकार की शुद्धि होकर भगवदाकारिता का परम चरम प्राप्त होता है।

  भगवान् और भक्त का तद्वत् सम्बन्ध चाहे तो श्रीसीताराम में ही अनुस्यूत रूप में जल और उसकी लहरों के रूप में द्रष्टव्य है, जिनहिं परम प्रिय खिन्न ।

  और नरलीला में तो सहज रूप से जगदम्बा को कहना पड़ता है- 

बचन न आव नयन भर बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।


यह मानवीय दृष्टिकोण से कही बातें हैं। क्या वे भिन्न हैं।

कदापि नहीं।

जब इस लौकिक जगत् का वासनावासित मलिन चित्त का प्राणी सतत स्मरण से प्रभु से अविच्छिन्नता का अनुभव कर सकता है, तब उनकी कौन जाने?

 इस जीव की प्रार्थना प्रभु से ऐसी होती कि जिसे अद्भुत ही कह सकते हैं।

 वह कहता है-

यह कछुआ स्त्री जैसे अपने अण्डे को बाहर बालुका में रखकर ,केवल उस अण्डे को ध्यान में रखती है और अण्डा उसी ध्यान मात्र से पोषित होकर अपना पूर्ण परिपक्व स्वरूप पा लेता है। नहीं यदि वह दिये हुये अण्डे को भूल   जाय तो वह अण्डा नष्ट हो हो जाता है।ऐसे ही प्रभु अपने प्राणप्यारे भक्तों को कभी भूलें न –

यह बिनती रघुबीर गोसाईं
और आस विश्वास भरोसो
हरो जीव जड़ताई
चहौं न सुगति सुमति संपति
कछु,रिधिसिधि बिपुल बड़ाई
हेतु रहित अनुराग रामपद बढ़ै
अनुदिन अधिकाई।
जहँ तहँ जनि ,छिन,छोह छाड़िहौ, कमठ-अण्ड की नाईं।।

।। हरिः शरणम् ।।

करुणासिन्धु कृपा कीजै

करुणासिन्धु कृपासिन्धु दयासिन्धु दीनबन्धु ही जब  सारे जगत् में भासने लगे,तब इस मानवजीव का जीवन कृतकृत्य हो जाय।

क्यों, क्योंकि प्रभुमूरति कृपामयी है।

होता नहीं, किन्तु होगा अवश्य होगा।

होता इसलिये नहीं कि पूर्व-पूर्व शरीरों की मलिन वासना छूटती नहीं।

यह वासना जिस दिन से ,प्रभु और उनके प्राणप्यारे भक्तों 

नारद, शुक,सनकादि, व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, दादू,मलूक की वाणियों में बस जायेगी, बस मस्ती और ऐसी मस्ती सदा -सदा के लिये आ जायेगी कि जैसे हम शरीर संसार विषयों में रमे हैं , राम में रम जायेंगे। 

और सबसे पहले इस शरीर पिण्ड और तब सारे ब्रह्माण्ड में एक ही दर्शन होगा-

हरिः ओ3म् तत्  सत्।

जगत् का प्रपंच बाधित हो जायेगा ,जीवन का लक्ष्य साधित हो जायेगा।

  ऐसे परम परम सन्तों के हृदय की बजती वीणा और मन का तार  ,सारे अणु परमाणु में उसी ईश्वर के स्वर के नाद का कर रहा है, झंकार  इनकी भगवद् दृष्ट वाणी का आश्रय मिले तो जगत् का सब आश्रम क्रान्त कर परम विश्राम राम में आराम मिले।

जब सब कुछ से हारे
तब केवल प्रभु के सहारे।
और जब तक जगत् से न हारे
तब तक रहेंगे बेसहारे।
जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित पावन जग
केहि अतिदीन पिआरे।
देव दनुज मुनि नाग मनुज 
सब मायाबिबस बेचारे।

हमारे गुरुदेव मलूक पीठ वाले महाराज श्री ,जिन्होंने व्रजधाम में परम साधु, योगी और भगवत् प्राप्त सन्तों की सन्निधि पाई थी, उनमें उनके सद्गुरुद्वय अद्वितीय थे।

 ऐसे ही एक सिद्ध सन्त परम पूज्य श्री हरेराम बाबा थे।

  भगवदुन्मुखी उनकी सारवती,सरस्वती ने अनेक पद भगवद् स्मृति में उच्चरित किया है-

 तव विमुख अनेकों जन्म गये 
स्थावर जंगम रूप धरे 
यह पुनरावृत्ति मिटा दीजै
हे करुणासिन्धु कृपा कीजै।

।। हरिः शरणम् ।।

रघुपतिपदकमल बसैहौं

जिस भगवती की अहैतुकी कृपा से श्रीधामविन्ध्याचल में निवास का निरतिशय सुख मिला हुआ है, और शरीर भी यहीं जन्मा है, उनके प्रति सतत चरणशरण की कामना बनी रहती है।
उनकी ही कृपालेश से वह सुखानुभूति भी होती रहती, जिन्होंने ” सेवक” को रोजीरोटी के लिए अपना चरण नहीं छुड़ाया।
अस्तु, यहाँ धाम में बसने के कारण नाना जागतिक शरीर सम्बन्धसम्बन्धी भी इसी धाम से हैं। अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक सम्बन्धी और मेरे मित्र ,जो प्रायः भारत भर के विभिन्न तीर्थों में जाते रहते हैं, एक यात्रा क्रम में, टिप्पणी की। उन्होंने लिखा ,न किसी भी अभाव में जिओ, ना किसी के प्रभाव में जिओ ,जिओ तो केवल अपने स्वभाव में जिओ।
मिलने पर मैंने पूछा , इस अभाव,प्रभाव और स्वभाव का भाव क्या है?
बहुत देर तक सोचकर उन्होंने कहा – मैं स्वतन्त्र जीवन जीना चाहता हूँ, यही ,उन पंक्तियों का अर्थ है।
मैने कह स्वतन्त्र का आपका आशय स्वछन्दता से है और उन्होंने स्वीकार भी किया।
हमने कहा आप अपने शत्रु हैं या मित्र। यह शरीर तो पूर्व कृत कर्मों के बन्धन के कारण मिला है।और अब किसी माता के गर्भ में न जाना पड़े ,यही इस मानव शरीर का सर्वस्व लक्ष्य है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए भगवान् ,उनके द्वारा निःसृत वेदवाणी, पुराण ,स्मृति, और व्यास,वाल्मीकि, तुलसी आदि के द्वारा निर्धारित नियमों का बन्धन तो मानना ही पड़ेगा। क्योंकि शास्त्र हमारे जैसे मलिन जीवों को मर्यादा सिखाते हैं, जिस मर्यादा के बन्धन में बँध कर ,हम अपने को जान पाते हैं, कि हम हैं कौन?
बिना अपने को जाने इस शरीर संसार क कोई रहस्य नहीं खुलेगा। त्यों त्यों उरझत जात ,की स्थिति आपकी है।
स्वतंत्र केवल और केवल परमात्मा ही हैं-
स्वतन्त्रः कर्ता यदि आप अपने को सन्त शास्त्र के बन्धन में नहीं रखते तो ,आप अपने शत्रु स्वयं हैं।
बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य
येन आत्मैव आत्मना जितः।
अनात्मनः तु शत्रुत्वे ,
वर्तेताम् आत्मैव शत्रुवत्।

अतः लखचौरासी से छूटना है ,तो सन्तशास्त्र और भगवान् के चरणोंकी रज (धूलि) में और उनके बन्धन में रहना होगा, स्वतंत्र स्वच्छंद कभी नहीं। तुलसी का लास्य लेश भी प्रवेश कर गया, तो बिगड़ी बन जायेगी-
अब लौं नसानी अब न नसैहौं
मनमधुकर पनकै तुलसी
रघुपतिपदकमल बसैहौं।

।। हरिः शरणम् ।।

शरणागति से माया मुक्ति

भगवान् की माया अत्यंत दुस्तर है।यह माया त्रिगुणमयी है। सद् रजः तम इसके तीन गुण हैं। इन तीनों से संसार के तीन कार्य क्रमशः सत्व से सुख, रजस् से दुःख और तमस् से मोह ,होते हैं।
इस तरह यह जीव और जगत् इन्हीं से विनिर्मित है।इन्हीं के कारण मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार की शुद्धि नहीं हो पाती है।और हम देह इन्द्रियों को मैं तथा भगवान् की सृष्टि में उत्पन्न वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ को अपना मान बैठे हैं।
फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।

तह संसार नश्वर है, आत्मज्ञ पुरष ही जान पाता है।हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीव इस माया चकित थकित हो रहे हैं-
वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं
पश्यन्ति चाध्यात्मविदः विपश्चितः।तथापि मुह्यन्ति तव अजमायया ,सुविस्मितं कृत्यम् अजं नतः अस्मि तम्।

अब प्रश्न ये है कि, इस श्वान शृगाल भक्ष्य शरीर में ऐसी अहंता क्यों और संसार में ममता क्यों।
तब लगता है कि ये अहंता ममता आदि इस मानव देह के नहीं बल्कि ये पूर्व पूर्व शरीरों से आयातित दुर्गुण हैं।
बिना भगवत् शरण ग्रहण किये, यह माया जायेगी नहीं।
और बात ये भी है कि सब मम प्रिय सब मम उपजाये ,कहने वाले निष्कारण कृपा करनेवाले केवल दो ही लोग हैं, एक स्वयं भगवान् और दूसरे भगवत्प्राप्त सन्त साधु।
हेतु रहित जग जुग उपकारी ।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।

जब हम इनकी कृपा करुणा को पाने का प्रयास करें, तो काम बने-


येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः, सर्वात्मना आश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तराम् अतितरन्ति च देवमायां, नैषां मम अहम् इति धीः श्वशृगालभक्ष्ये।।


भागवतोक्त यह शुकवाणी हो अथवा गीतोक्त भगवद् वाणी-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायाम् एतां तरन्ति ते।।

।। हरिः शरणम्।।

अनुग्रह (कृपा) कातर प्रभु

भगवान् की कृपा की वायु सर्वत्र बह रही है, हम नाम की नाव पर बैठ कर निरन्तर स्मरण की पाल फहरा कर उनके नित्य धाम को जा सकते हैं.
वे अनुग्रह करेंगे ही इसमें रंचमात्र संशय नहीं।
कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी तो सूनी ही रहती अदालत मुरारी/पुरारी।
जो रघुबीर अनुग्रह कीना।
तौ तुम मोहिं दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।


सन्त मिलन की आस है
तो हरिजन गुन गाव।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परितेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक सर्वेश्वर परात्पर परमात्मा अपने अंशभूत जीव की बाट जोह रहे ,कि कब देहेन्द्रिय के प्रति राग त्याग कर वह अपने अंशी की ओर उन्मुख होकर उन्मुक्त होगा?
थोड़े से जप स्मराणादि साधन से उन्मुख हो जाने पर,
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि वे प्रभु किसी हनुमानजी नारदादि सन्तों को भेजकर क्षण मात्र में अनुग्रह कर देते हैं और विभीषण ,ध्रुव आदि भक्त सब कुछ पा जाते हैं।
वे परम आनंद मूर्ति हैं। निष्काम भाव से भजने पर दीनानाथ तो कृपा करने के लिए तैयार ही हैं।
गाय जैसे अपने बछड़े को वात्सल्य भाव दुग्ध पान कराती हुई व्याघ्रादि से बचाती है, वैसे भक्तवत्सल भगवान् भी माया रूपी बाघिन से बचा ही लेते हैं।
और जीव सदा सर्वदा के लिए
भगवद् आश्रय का अधिकारी हो जाता है। शुकवाणी ऐसी ही है-


सत्याशिषो हि भगवन् तव पादपद्मम्। आशीः तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः।
अपि एवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् ।वाश्रेव वत्सकम् अनुग्रहकातरः
अस्मान् ।।

|| हरिः शरणम् ||

तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई

भगवान् की प्राप्ति, भगवद् दर्शन, भगवान् का चरणाश्रय
और उनकी अविचल,निष्काम प्रेमा भक्ति तो केवल कृपासाध्य ही है, चाहे वह कृपा करें अथवा उनके प्राणप्यारे सन्तसाधु भक्त। अच्छा, भक्त शब्द का एक दूसरा अर्थ है विभक्त विभाजित खण्डित टूटा हुआ। मतलब कि जो शरीर संसार से उसके भोगों से टूटा हुआ विखण्डित विरक्त और प्राप्य परमात्मा से जुड़ गया, वह भक्त है।
अनेकजन्मसंसिद्वः ततो याति, परां गतिम्। अर्थात् यह भगवच्चरणाश्रय वाली भगवान् की प्रेमा भक्ति नाना जन्मों में शनैः शनैः सिद्ध होती हुई यानी कि पकते-पकते ,तब जाकर परिपक्व होकर पूर्णमदः पूर्णमिदं ,पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय ,पूर्णम् एव अवशिष्यते पर पहुंच जाती है, और संसार से टूटा(भक्त) भगवान् से जुड़ जाता है।
जयन्त, देवर्षि नारद को नहीं देखता, नाना ब्रह्मशिव आदि लोकों से निराश उसको महामुनीन्द्र नारद जी देख लेते हैं और सन्त कृपा से वह भगवन्त कृपा का अधिकारी बन जाता है।
तद् विद्धि प्रणिपातेन,परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति तं ज्ञानं ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः।।

इत्यादि श्रीभगवान् के उक्त वचनों का सार भी यही है कि, उस परम आत्म तत्व को जिज्ञासा, गुरु के प्रति अत्यन्त आदर और सेवा(भक्ति) से पाया जा सकता है। तत्व दर्शी ज्ञानी ही उस तत्व का उपदेश करते हैं, जिन्हें वह हरिः ओ3म् तत् सत् प्राप्त है।
इसलिये संसार के लोभ, भोग को त्याग कर तत् साधु ,साधु-प्रीति ही करनी होगी। और कोई रास्ता नहीं, माया-मोह के पार जाने के लिए।नहीं तो नरकादि लोक और पुनः जन्म निश्चित है।
कामक्रोधमदलोभ सब नाथ नरक के पन्थ। इन्ह परिहरि रघुबीरहिं भजहु भजहिं जेहिं सन्त।।
और सद्गुरु बताते हैं कि बाबा तुलसी ने स्पष्ट ही कर दिया है कि भगवत् प्राप्ति में अपना किया हुआ यज्ञ योग जप दान आदि साधन तो अवश्य ही करना चाहिए, किन्तु संसार लोभ छोड़कर।
भगवत् प्राप्ति और प्रीति मात्र हेतु जपपूजादि साधन बनेंगे तो काम बनेगा यानी की ,कृपाप्राप्त सन्तो की कृपा

होगी और संसृति चक्र छूटेगा।
लोभ पास जेहि गर न बँधाया।
सो नर तुम समान रघुराया।।
यह गुन साधन ते नहिं होई।
तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।

।। हरिः शरणम् ।।

नृग उद्धरन

मानव जीवन का चरम प्राप्तव्य भगवान् के चरण ही हैं, क्योंकि इसके बिना तो न संसारमोह छूटेगा, और न ही दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति ही होगी।
उनके समान विपत्तियों को हरनेवाला और दुःसह भव सागर को पार कराने वाला दूसरा कोई नहीं।
क्योंकि जब गजराज अपना बल क्षीण हुआ समझ कर, कमल पुष्प लेकर आपके शरण हुआ, तब भगवान् उसकी दीनता पर द्रवित होकर, सुदर्शन चक्र लेकर, गरुड़ को छोड़ ,बिना पादुका ,पैदल ही आ जाते हैं।
इसी तरह द्रौपदी के वस्त्र हरण काल में भी आप ,स्वयं वस्त्रावतार लेकर उसकी रक्षा करते हैं।
वस्तुतः जब तक किसी को अपने बल पर भरोसा रहता है, तब तक उस सीमा तक ,भगवान् कुछ नहीं करते, लेकिन ज्यौं ही अपने शरीर संसार की अहंता-ममता टूटती है , ससीम जीव की ,असीम परमात्मा रक्षा के लिये आकर ,उसे निर्भय कर देते हैं।
अतः निज बुधि बल भरोस मैं नाहीं की समर्पित अवस्था में ही, प्रभु करुणा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं, माया मोह का बाध तत्क्षण ही हो जाता है।
और बात यह भी है कि, कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं, की साधु-अवधारणा और ,सर्वं खलु ब्रह्म की वैदिक दृष्टि भी विखण्डित होगी, यदि जगन्नाथ विपत् और प्रतिकूलता में सहायक न हों।
हाँ ,आवश्यक यह है कि, शरीर संसार में अहंता ममता त्याग कर, सब कुछ प्रभु का ही है, ऐसा मानकर, दानादि की क्रिया हो ,भगच्चरणों का सेवन हो , तो महादानी राजा नृग की तरह हम जीवों का भी उद्धार हो ही जायेगा-

इहै जानि सुर नर मुनि कोबिद
सेवत चरन।
तुलसिदास प्रभु! केहि न अभय कियो नृग-उद्धरन।

।। हरिः शरणम् ।।

श्रीरामचरणानुराग

जितने -जितने अधिक अंश में भगवच्चरणानुराग होता चलता है, उतने -उतने अंश में संसार के प्रति प्रीति घटती जाती है। भगवच्चरणों में अनुराग और भगवद् दर्शन हि जीव का चरम लक्ष्य है। इसके बिना तो यदि संसारी वस्तुओं में प्रेम बना रहा, तो उस अप्राप्त भोग को भोगने फिर आना ही होगा-
ऐसे ही जन्म समूह सिराने।
गोस्वामी जी कहते हैं कि हमारे अनेक जन्म इस तरह भोगों को भोगने के चक्कर में जा चुके हैं, फिर भी चक्कर चल ही रहा है।
नाना जन्मों में अनेक माता पिता बन्धु बान्धव रिश्ते नाते बन चुके हैं, लेकिन सच्चे प्रेम की अनुभूति के बिना सब बेकार गया, अनेक शरीरों की यात्रा निर्बाध जारी है।
जब तक अपने रिश्ते नाते से शुरू कर के, व्यक्ति-व्यक्ति में उस प्रेम तत्व साक्षात् राम कृष्ण नारायण की अनुभूति नहीं होगी ,बात बनेगी नहीं।
हमारे गुरुदेव कहते हैं, कि इस अनुभूति के लिए हम ऐसा समझें कि माता-पिता गुरु अतिथि तो वेदाज्ञप्त देवता ही हैं,( मातृदेवो पितृदेवो आचार्यदेवो भव)।
किन्तु अब बात इससे आगे की अनभूति की है, वह यह कि हमारे पुत्र हैं , तो भगवान् ही पुत्र के रूप में आए हैं।
बधू है ,तो भगवान् ही बधू के रूप में आए हैं। इस तरह अपने सगे सभी सम्बन्धों में भगवान् की अनुभूति होनी चाहिए।और उसके आगे भी यही अनभूति-दृष्टि बने ,तो काम बने ,लेकिन संसार के भोगों से थका हारा होकर भी ऐसी दृष्टि और अनुभूति क्यों नहीं?
तब गुरु देव समाधान देते हैं- शरीर की मलिनता की शुद्धि तो जल में स्नान से प्रतिदिन होती है, किन्तु आत्मा की रोज-रोज की और नाना शरीरों की जमी गन्दगी कैसे छूटेगी?
इसके लिये सत् शास्त्रों और सूर कबीर तुलसी की वाणियों के सरस रस में आत्मा का दिन-प्रतिदिन प्रक्षालन करना होगा। यहीं पुराणों शास्त्रों का निचोड़ा गया अमृत जल बहता है, जिनकी हरिकथा की अविरल धारा में आत्मा को रोज बिना नागा नहवाना होगा ,तब आत्मा की शुद्धि होकर सभी रूपों में हरिदर्शन होने लगेगा, और माया की भी नहीं लगेगी। इसलिए मानसकार ने कहा-


बिनु सतसंग न हरिकथा,
तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गए बिनु राम पद ,
होइ न दृढ़ अनुराग।।

जित देखूँ तित श्याममयी है।

।। हरिः शरणम् ।।

वे करैं आप समान

देखिये , सनातन काल से ,युगों-युगों से हमारी ऋषि परम्परा ने कृपा करुणा परवश होकर, मानव जीव को बार-बार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने का मार्ग दिखाया है।
शिवावतार श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कराचार्य ने बड़ा साहित्य रचकर मुमक्षुओं का पथ प्रशस्त किया है। अच्छा, हमारे गुरुओं की वाणी ने मानव शरीर ही नहीं ,प्रत्युत पशु शरीरों में भी पड़े बद्ध जीवों को हरिनाम सुनाकर, उसी शरीर से मुक्त कर दिया, जिसको साधक जन पवित्र ग्रन्थ “भक्तमाल” में देख सकते हैं।
आचार्य शङ्कर कहते हैं-
बद्धो हि को यो विषयानुरागी
मतलब कि, पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के-गन्धरसरूप और स्पर्श शब्दादि विषयों यानी कि स्त्री पुत्र धनादि में आसक्ति यदि बनी रही,तो चौरासी का चक्कर कहाँ छूटेगा?
तब आचार्य तत्काल उत्तर भी दे देते हैं-
मुक्तो हि को यो विषयाद् विमुक्तः।
अर्थात् उक्त पंचमहाभूतों के शब्दादि विषयों से ,जो विरक्त हो गया, वही मुक्त है।
अब सवाल उठता है कि, मुक्ति कैसे होगी?
तब यह गुन साधन ते नहिं होई, तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई , मानसकार समाधान करते हैं।
देखिये ,सन्त सद् गुरु ही ऐसे नित्य मुक्त भक्त हैं, जिनके माध्यम से भगवान् की कृपा आती है।और आती ही नहीं, बल्कि बरसती है।


हरै शिष्य धन सोक न हर ई।
सो गुरु घोर नरक महँ पर ई।।


ऐसे गुरुओं की भरमार है, कलियुग जो है न, वह तो काम बिगाड़ेगा ही।
इसलिये गुरु अपनाना हो तो ,पहले ऐसे लोगों की रहनी-सहनी को लम्बे समय तक ,निरखे और तब उनका पादाश्रय लेकर आगे बढ़े।


पानी पीवै छानकर।
गुरू करै जानकर।।


हमारे सद्गुरु तो कम से कम ऐसा ही कहते हैं, नहीं तो हरि नाम का आश्रय लें।
और यदि भगवान् से जुड़े, संसार के भौतिक पदपदार्थों से नहीं जुड़े रहनेवाले सन्त जन का चरणाश्रय मिल गया तो ,का बन गया।और वे सन्त तो ,जीव को अपने समान ही, साधु बनाकर अविगत गति दे देते हैं, इसीलिये तो-


पारस में अरु सन्त में ,
एकै अन्तर जान।
पारस तो सोना करै,
वे करैं आप समान।।

।।हरिः शरणम्।।