सकल धरम धुर धरनि धरत को

भरत तो सम्पूर्ण धर्म रूपी रथ-चक्र की धुरी हैं। मातृ-पितृ  गुरु अतिथि गृह-कुटुम्ब  समाज राज्य तथा स्वयं के मानवीय धर्म का शास्त्र-सन्त-दर्शित मार्ग पर चल कर कौन आचरण-शिक्षक  बनता?

  यदि श्रीरामलीला में “भरत-उद्भव” नहीं होता? अयोध्या से  प्रस्थान  करने वाले भरत को विरोधी मान, भरत पर शर-सन्धान करने वाले, श्रीलक्ष्मण को आकाश में स्थित आकाशवाणी द्वारा ऐसा नहीं सोचने के लिये समझाया गया है ।आकाश में रह कर श्रीरामलीला को पल-पल देख रहे, देवताओं के  अनुरोध को सुनकर श्रीलक्ष्मण जी संकुचित होते हैं । सीता जी एवं राम जी का खूब आदर सम्मान करते हैं-

   “सुनि सुर बचन लखन सकुचाने , सीयँ राम सादर   सनमाने” 

और संकुचित होने पर भी सहसा कोई निर्णय नहीं लेने की “नीति” की सराहना तो की,लेकिन यह भी   स्वीकारा कि राजमद बड़ा कठिन है ।

कही तात तुम्ह नीति सुहाई सबसे कठिन  राज-मदु  भाई

जिन सौभाग्यवन्तों को सन्तों की सभा की सन्निधि और सेवा नहीं मिली वे तो “राजमद” की “मदिरा” का  “आचमन” करके “मद-मत्त” होंगे ही 

जो अचवँत नृप मातहिं तेई नाहिन साधुसभा जेहिं  सेई ”

नारायण ! ब्रह्मा की पांचभौतिक सृष्टि  में “भरत” जैसा भला कोई सुनाई  और  दिखाई   पड़ा ?

सुनहु लखन भल भरत  सरीसा विधि प्रपंच महँ सुना न दीसा”

प्रातः काल का तरुण “अरुण” तो हो सकता है तिमिर (अन्धकार)में मिलकर गल जाये आकाश मन करे मगन होकर मेघों में समा जाये गाय के खुर समान गड्ढे के जल में  ” अगस्त्य ऋषि ” चाहे डूब ही जायें प्राकृतिक क्षमा गुण को धरती माँ छोड़ दे मच्छर  के मुँह से निकली एक फूँक से सोने का पर्वत “सुमेरु” भी हो सकता कि आकाश में उड़ जाये।

    “तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई, गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी, सहज छमा बरु छाँड़ै  छोनी

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई, होइ न नृपमदु भरतहिं  भाई  

“भरत को राज सत्ता का मद नहीं हो सकता”  पिता दशरथ और लक्ष्मण दोनों की एक साथ सौगन्ध है कि भरत जैसा पवित्र भ्राता हो नहीं सकता

    “लखन तुम्हार सपथ पितु आना, सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना”

गुण रूपी क्षीर(दूध) और अवगुण रूपी जल एक  साथ जैसै मिले हैं उसी तरह पंच तत्वों को परस्पर  मिला कर ब्रह्मा ने सारे संसार के पद-पदार्थ बना डाले हैं ।   

     ” सगुनु खीरु अवगुन जल ताता, मिलइ रचइ  परपंचु बिधाता”

लेकिन भरत सूर्यवंशतालाब के “हंस” हैं, जिसकी प्रकृति ही दूध-पानी को  पृथक् करने वाली है    

   “भरत हंस रबिबंस तड़ागा, जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा”

    नारायण ! समुद्र के क्षारीय जल को मेघ ग्रहण करके, जब बरसाता है तब धरती पर पड़ा जल गन्दा हो जाता है, जैसे “जीव” से “माया” मिल जाती है। लेकिन साधुसन्त महात्मा की प्रकृति है कि वह जीव की “माया-माटी” को  “जीव” से अलग कर उसे “अमायिक” बना कर निर्मल-जल के समान निर्विकार-मन  वाला बना देते हैं-

    भूमि परत भा ढाबर पानी, जिमि जीवहिं माया लिपटानी  

भगवदीय गुणों वाले साधु भगवदीय प्रकृति वाले हैं । वे जड़ को चैतन्य करनेवाले हैं –

    जड़हिं करइ चैतन्य जो”

फलतः जीवात्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप पा लेता है।भरत भी ऐसे ही हंसवत् सन्त हैं, जो मायिक विकारों  का अपहरण (परिहरण) कर लेते हैं –   सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार”

भरत का हंसत्व और सन्तत्व सिद्ध है क्योंकि इन्होंने अपने यश से एक अद्भुत प्रकाश बिखेरा है,जिससे सारा जगद् प्रकाशमय है-  गहि  गुन पय तजि अवगुन बारी, निज जस जगत कीन्ह उजियारी”

भरत  के गुण-शील-स्वभाव को कहते नारायण! नारायण प्रेम-पयोधि में डूब ही गये – 

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ, प्रेम-पयोधि मगन   रघुराऊ

 भगवान्  की दशा देख कर और उनकी भरत के प्रति प्रीति समझ कर ऋषि-मुनि  देवगणों सहित सभी ने भरत के परहेतु ( जैसे साधु पर कार्य साधन) हित उत्पति को सराहा है । करुणासिन्धु  कृपायतन भगवान् भी सभी भक्तों द्वारा सराहे गये-

   सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु, सकल सराहत राम सो प्रभु को  कृपानिकेत

  इसीलिये भरत को समस्त धर्मों का धुरन्धर कहा गया –

  जौं होत जग जनम भरत को, सकल धरम धुरि धरनि धरत को”

  गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

छीरसिन्धु बिनसाइ

भले क्षीरसागर अपना मूल स्वभाव
बदल कर विशेष रुप से नष्ट ही क्यों
नहो जाये, भरत की रामभक्ति तो
अविनष्ट ही रहेगी।

भरत को राजसिंहासन का मद नहीं
हो सकता।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश जैसा पद भी मिले
तब भी भरत को अभिमान होना
असम्भव है।

खट्टे दही मट्ठे की एकबूँद से समुद्र
का खारा जल खट्टा हो सके तो हो
जाय, किन्तु भरत को राजमद नहीं
हो सकता।

भरत जी श्रीराम सेवित मार्ग से अत्यंत
व्याकुल होकर चले जा रहे हैं,लेकिन
उनका दर्शन कितना पवित्र है

जैसे इन्हें देखकर सभी का सौभाग्य
खुल गया है, मानो यह भरत नहीं बल्कि
चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग ही
जा रहा है –
भरत दरसु देखत खुलेउ
मग लोगन्ह कर भाग
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ
बिधि बस सुलभ ” प्रयाग”

प्रत्येक गाँव में ऐसा आनंद छा जाता
जेसे मरुस्थल में कल्पवृक्ष ही आगया-

अस अनंदु अचिरजु प्रति ग्रामा।
जनु मरूभूमि कलपतरु जामा।।

भरत की विह्वलता देख कर रास्ते में
माताएं परस्पर कहती हैं कि अति
रागानुरागिणी कैकेयी जैसी माता,

अत्यंत वैराग्यशाली भरत की माता
होने योग्य नहीं हैं-

सुनि गुनि दसा देखि पछिताहीं।
कैकई जननि जोगु सुतु नाहीं।।

मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक तीर्थ
मुनियों के आश्रम,देवस्थानों में
स्नानशुचि होकर, प्रणाम निवेदित
करते हुए प्रभु को सुमिरते,

मन ही मन श्रीसीताराम
पद-प्रेम की याचना करते और
सभीसे श्रीराम-गुण-श्रवण करते
चल रहे हैं –

निज गुन सहित राम गुन गाथा।
सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा।
निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनाम।।

मन ही मन माँहहिं बरु एहू
सीय-राम पद पदुम सनेहू।।

आसपास के ग्रामवासी उमड़ पड़ते हैं
प्रभु राम का समाचार सुनाते हैं।
भरत को देख कर सारे जन्म के
प्राप्तव्य धर्मार्थकाममोक्ष को मानो

एक साथ पा जाते है-

करि प्रनामु पूछहिं जेहि जेहीं।
केहि बन राम लखनु बैदेही।।
ते प्रभु समाचार सब कहहीं।
भरतहिं देख जनम फलु लहहीं।।

और सबसे बड़ी बात इस यात्रा की
नारायण!कि जो लोग यह कहते कि

हम लोगों ने अनुज लक्ष्मण के साथ
श्रीराम को देखा है, वे सभी नर-नारी

श्रीभरत जी को सीता-राम-लक्ष्मण
के समान दिखाई पड़ते हैं-

“जे जन कहहिं कुसल हम देखे
ते सिय राम लखन सम लेखे”

नारायण !भरत जी का रामप्रेम ऐसा है
कि हजार मुखों वाले शेषनाग भी इस
प्रेम का वर्णन करने में असमर्थ हैं।

अहन्ता ममता से मलिन मन वाले
अभागे लोग क्या कहेंगे, ब्रह्मसुख तो
इन्हें सम्भव नहीं, नारायण!

भरत जी का प्रेम क्रान्तदर्शी कविगणों
के लिए भी अप्राप्य-अगम्य है-

भरत प्रेमु तेहि समय जस
तस कहि सकइ न सेषु
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु
अह मम मलिन जनेषु

उधर श्रीसीता जी को स्वप्न हुआ है कि
परिकरों सहित भरत जी हमारे मार्ग
का अनुसरण करते हम सभी के पास
आरहे हैं।
सीता जी के सपने को सोच कर
सभी के सोच-विमोचन राम जी भी
सोचवश हो गयेहैं।
“नरलीलानाटक ” का खेल
जो खेल रहे हैं।

लक्ष्मण से इस स्वप्न को किसी
अनचाही समस्या के रूप में बताते हैं

लखन सपन यह नीक न होई।
कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।

बहुरि सोचबस भे सिय-रवनू।
कारन कवन भरत आगवनू।।

किसी ने उनके साथ चतुरंगिणी सेना
होने की बात कह दी।

एक आइ अस कहा बहोरी।
सेन संग चतुरंग न थोरी।।

राम जी को सोच है तो समाधान भी
हो जाता है।सबके सोचविमोचन हैं। "भरत साधु-शिरोमणि हैं "

“और साधुमात्र तो स्वयं में कोई
समस्या नहीं बल्कि समाधान है “

समाधान तब भा यह जाने
भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।

लक्ष्मण जी ने कहा भैया! आप तो
ऐसे हैं कि, सभी को अपने जैसा
समझ बैठते हैं।

सब पर प्रीति प्रतीति जियँ।
जानिअ आपु समान।।

भरत साधु सज्जन तो हैं, लेकिन
राम-राज्य पाकर धर्म-मर्यादा को
विस्मृत कर बैठे हैं –

भरत नीतिरत साधु सुजाना।
प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना।।

तेऊ आजु राम पदु पाई।
चले धरम मरजाद मेटाई।।

लगता है निष्कंटक राज्य पाने हेतु
मन में अनुचित विचार कर
आरहे हैं –

कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी।
जानि राम बन बास एकाकी।।
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू।
आए करै अकंटक राजू।।

लक्ष्मण जी सरोष होकर तीर-धनुष
सँभालते हुए दोनों भाईयों
श्रीभरत जीऔरशत्रुघ्नलाल को
समर-भूमि में एक साथ सुला देने
का आदेश माँगते हैं-

आजु राम सेवक जसु लेऊँ।
भरतहिं समर सिखावनु देऊँ।।
राम निरादर कर फलु पाई।
सोवहुँ समर सिखावनु देऊँ।।

शिव भी उनके साथ सहयोग करें
तो भी श्रीराम की दोहाई है,
रण में उन्हें मार ही डालूँगा –

जौं सहाय कर संकरु आई।
तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
अब इस प्रकार की

लक्ष्मण की भ्रम-लीला के विभ्रम
वश देवताओं ने आकाशवाणी की है।
समझाया है देवों ने

“अनुचित उचित काजु किछु होऊ
समुझि करिअ भल कह सब कोऊ “

वेदों ने ऐसे बोध-वाले लोगों को
प्रबोधवान् नहीं कहा है, जो सहसा
कोई अविचारित काम करके
पाछे पछताते हैं-

” सहसा करि पाछे पछिताहीं
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं”

“सहसा विदधीत न क्रियाम्
अविवेकः परमापदाम् पदम्” इत्यादि महाभारत कथाधारित भारवि रचित

“किरातार्जुनीय” में पाण्डवों को
द्रौपदी नेभी यही समझाया था।

और इसीलिये, लक्ष्मण जी को भी
भरत का शील-स्वभाव बताया जाता है

कि भरत को राजसत्ता का अभिमान
नहीं हो सकता।

चाहे “देवत्रितयी” जैसा पद ही क्योंन
दे दिया जाय।

खारे समुद्र के गाम्भीर्य का परीक्षण
करने के लिए उसमें अति खट्टी दही
मट्ठे की बूँदें(काँजी )डालकर

कभी भी “उसको” खट्टे स्वाद में बदला
नहीं जा सकता।

“भरत भी भक्ति के अथाह गम्भीर
सागर हैं”

अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड के सुख
साम्राज्य वैभव को देकर भी भरत
के मन में क्षण भर के लिए भी कोई
विक्षोभ-हलचल नहीं पैदा की
जा सकती है –

” भरतहिं होइ न राजमदु”

विधि-हरि-हर सन पाइ कबहुँ की काँजी सीकरनि छीर सिन्धु बिनसाइ

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

शुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना

“भरत जैसा मन वचन कर्म से पवित्र
कोई अन्य नहीं हो सकता
यह बात लक्ष्मण और पिताश्री
दशरथ की “शपथ” खाकर मैं राम
कह रहा हूँ”

नारायण ! भगवान् श्रीराम सौगन्ध
खाकर भरत की पवित्रता का
प्रमाण-पत्र देते हैं।

अब देखिये, गोपियों ने भगवान् से
कहा था, कि मेरे( जीवों के )प्रिय!
आप सभी के हृदय में राजते हैं।

शरीरान्तर्वर्ती आप हैं इसलिये सारी
इन्द्रियाँ क्रियाशील हैं।

किसी का कैसा भी कोई भी शरीर
हो आप के रहने से ही परस्पर

पति-पत्नी, पिता-माता-पुत्रादि के
संसार के सारे सम्बन्ध रहते हैं।

और आपके शरीर से हटते ही
सारी चेतना लुप्त हो जाती है

शरीर केवल पार्थिव (मिट्टी) रूप में
अवशिष्ट बचता है।

फिर ऐसे शरीरों से किसी को प्रेम
नहीं होता।

वस्तुतः सभी आपसे ही प्रेम करते हैं
प्रेम मानते हैं,बस आपको जानते नहीं

इसलिये आप ही सभी शरीरों के प्रिय
नहीं बल्कि अतिप्रिय(प्रियतम) हैं।

” प्रेष्ठो भवान् तनुभृतां
किल बन्धुरात्मा “

भगवान् के शरीर में विराजते रहते
प्रत्येक का परस्पर सांसारिक
सम्बन्ध अक्षुण्ण है।इसलिए हर एक व्यक्ति आपस में परम प्रभु! प्रियतम! आपसे ही वस्तुतः व्यवहार करता है।

“हाँ यह अवश्य है कि हम आपकी ही
माया से ग्रस्त मलिन अन्तःकरण
के कारण और संसार ही प्रिय
लगने के कारण सभी शरीरों में
अन्दर से व्यवहार करनेवाले आपको
पहचान नहीं पाते”"हमारा अन्तः करण अर्थात् मन बुद्धि चित्त और अहंकार अशुद्ध रहने से आपको नहीं पहचानने का भयंकर संकट है" "लेकिन भक्त ,सेवक और साधु के जीवन का यह संकट कभी नहीं " संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बल बीरा भक्तिमूर्ति सीता , अनन्त बलवन्त हनुमन्त और श्रीभरत जी के जीवन का यह संकट कदापि नहीं है

बल्कि इन सभी का स्मरण इस
मलिन अन्तःकरण को पवित्र
कर देने वाला है।

श्रीभरत तो ऐसे पवित्र अन्तःकरण
के हैं कि राज्य भार धारण का
प्रस्ताव सुनकर व्यथित हो जाते हैं

“सानी सरल रस मातु बानी सुनि
भरत व्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत
विरह उर अंकुर नए”

श्रीराम का वनगमन जान कर
पिता की मृत्यु विस्मृत हो उठती है

” भरतहिं बिसरेउ पितु मरन
सुनत राम बन गौनु”

और विकलता ऐसी कि तत्क्षण
अविस्मृत अविरल स्मृत श्रीराम
के चरणों लिए दीन-हीन हो जाते हैं

सबको प्रणाम करते हुये बताते हैं कि
बिना श्रीरघुनाथ जी को देखे हृदय
की जलन शान्त नहीं होगी-

आपुनि दारुन दीनता
कहउँ सबहि सिरु नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

“ऐसा है ज्ञान स्वरुप श्रीराम का ज्ञान
श्रीभरत जी को, क्योंकि उनका तो
मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार श्रीराम
रामाकारकाराकारित है”इसलिये भगवान् ने लक्ष्मण से कहा था कि भरत की आँखों में संसार बसा ही नहीं है। उसके रोम-रोम में मैं(राम) बसा हूँ।

और इसीलिए भरत
मन-वचन-कर्म से इतना निर्मल है कि

पिता श्रीदशरथ और
लक्ष्मण का शपथ लेकर भी
यह बात कहने में
मुझे कोई संकोच नहीं –

लखन तुम्हार सपथ पितु आना

“सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

भरत हंस रबिबंस तड़ागा

सूर्यवंश में जनमे भरत जी “हंस” के
समान हैं।
यह सूर्यवंश मानो सुन्दर तालाब है
जिसमें विचरणशील भरत एक हंस
के समान हैं।हंस पर तो वाग्देवी सरस्वती विराजती है, जो बुद्धि की अधिष्ठात्री है। अतः भरत का राज्य पद ठुकराना और श्रीराम को लौटाने चलना सुविचारित बुद्धि-विवेकमय निर्णय है।

तीन बजे दिन में तीर्थराज प्रयाग में
प्रवेश करते हैं, जब भरत, तब प्रभु
सेवित स्थान पर सेवक की दशा
गम्भीर हो जाती है।

सीतारामप्रेम-पीयूष रूपाकार होकर
शब्दरूप में आकाश में विकीर्ण हो
जाता है ” शब्दगुणकम् आकाशम्”

भरत तीसरे पहर कहँ
कीन्ह प्रबेसु प्रयाग
कहत राम सिय राम सिय
उमगि उमगि अनुराग

सारा समाज दुखी है पैदल भरत
के चलने से उत्पन्न पैरों में पड़े छाले
को देखकर।
कमलवत् इन चरणों में पड़ चुका
“झलका” ऐसा लगता है मानों
कमल पंखुड़ी पर पड़ा ओस-कण

झलका झलकत पायन्ह कैसे
पंकज कोस ओस कन जैसे

त्रिवेणी स्नान कर भरद्वाज को सादर
दण्डवत् प्रणाम किया है। और मुनि
को ऐसा लगा कि यह भरत तो मेरा

मूर्तिमान् सौभाग्य है-

दंड प्रनामु करत मुनि देखे।
मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

ऋषि ने कहा कि यह विधि का विधान
था, जिस पर किसी का वश नहीं होता

सुनहु भरत हम सब सुधि पाई।
बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

देखिय यही भाव गुरु वशिष्ठ जी का है।

जब श्रीरामराज्याभिषेक शुभ लग्न
विचार पूर्वक आयोजित था, तब
राजा राम का वनगमन क्यों उपस्थित
हुआ?
भरत के प्रश्न पर “विधि” को ही वन
“प्राप्तिरूप हानि” का कारण कहा गया

सुनहु भरत भावी प्रबल
बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभ जीवन मरण
जस अपजस बिधि हाथ

इसीलिये भरद्वाज जी ने रानी के
द्वारा कुचाल रचकर और विधि वश
हुआ समझ में आने पर पछताने
का उल्लेख किया –

सो भावी बस रानि अयानी।
करि कुचालि अन्तहुँ पछितानी।।

और ऐसे में तुम्हारा स्वल्प भी अपराध
समझने वाला व्यक्ति बड़ा अधम
और दुर्जन है-

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू।
कहै सो अधम अयान असाधू।।

भरत ने उचित और ठीक रास्ता चुना
है , राम को लौटा लाने का, क्योंकि
श्रीरघुनाथ जी के चरणों में प्रीति ही
समस्त मंगल की जड़ है –

अब अति कीन्हेउ भरत भल
तुम्हहि उचित मत एहु
सकल सुमंगल मूल जग
रघुबर चरन सनेहु

और सभी ऋषियों का यह भी मत है
कि भरत की दृष्टि में जो कलंक
उनपर लगा है वह कलंक नहीं,बल्कि

“भरत जी की भक्ति-रस की सिद्धि
के लिए यह श्रीगणेशाय नमः है”तुम्ह कहँ भरत कलंक यह सम सब कहँ उपदेसु राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु

इन्द्र को सोच हुआ कि प्रभु वन से
लौट आयेंगे तो हमारी दशा शोचनीय
हो जायेगी
देवगुरु से कोई उपाय करने
की प्रार्थना हुई है। देवगुरु ने ऐसी सोच
रखने से मना किया है।

वैश्विक कर्म-फल प्राप्ति का अटल
सिद्धान्त समझाया गया है

करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा

और श्रीराम-भरत के प्रति कपट
व्यवहार को निषिद्ध किया है, क्योंकि
उसका परिणाम दुःखद बताया है

राम -भरत से डरने की आवश्यकता
नहीं, क्योंकि भगवान्भक्त से अधिक
परहित करनेवाला दूसरा नहीं।

भगवान्भक्त अभिन्न हैं। इनका धरती
पर आना ही परमार्थ के लिए है।
इनका अपना कोई स्वार्थ नहीं।
ये सभी से निष्कारण प्रेम करनेवाले हैं

हेतुरहित जग जुग उपकारी
तुम तुम्हार सेवक असुरारी

और इसलिए निष्केवल प्रेमी
सेव्य-सेवक भगवान्-भक्त अनन्य
हैं, वह सभी पर कृपा ही करेंगे

राम भगत परहित निरत
पर दुख दुखी दयाल
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल

और इसीलिये श्रीभरत जी के विषय
में, उचित अवधारणा यही है कि
जैसे जल और दुग्ध रूप दोष-गुण को
अलग करनेवाला हंस होता है , वैसे ही

श्रीभरत जी भी सूर्यवंश रूपी तालाब
के हंस हैं जो गुन-दोष विभाग में

सिद्धहस्त होता है-

जनमि कीन्ह गुन दोस बिभागा

” भरत हंस रबिबंस तड़ागा “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

सबसे सेवक धरम कठोरा

सेव्य भगवान्
सेवक यह पंचभूत पिण्ड शरीर
और तद् गत “जीवात्मा”।

शरीर भगवान् द्वारा निर्मित है
और मिला है कर्म शेष यानी कि
प्रारब्ध( पूर्व शरीर कृतकर्म) के कारण

“प्रारब्ध कारण और शरीर कार्य”

प्रारब्धवश मिले शरीर को
सुखदुःखादि भोगना ही पड़ता है

मतलब कि भोग भोगने के लिए परतन्त्र
है यह शरीर और शरीर को मिली
संसार की सारी सामग्री

भोगने के लिये मिला शरीर
शरीर से जुड़े पद पदार्थ
वस्तु व्यक्ति । तब सोचिये

स्वयं में स्वतन्त्र नहीं है यह
शरीर और इससे जुड़ा संसार
क्योंकि
जब शरीर भगवान् का है तब
नाना वस्तु पद पदार्थ भी “उनका”

अब यह सेवा के लिये मिला है
किसकी सेवा के लिए ?

तो “जिसका” है “उसी” की सेवा हेतु

यही यथार्थ सत्य है

श्रीरामकथा के असाधारण पात्र
श्री भरत जी उपर्युक्त
वास्तविकता से अवगत हैं ।

वे अपने स्वयं के शरीर को
श्रीराम जी के सेवार्थ मिला जान कर

जब ननिहाल से लौट कर अयोध्या
आने पर नहीं पाते हैं पिता और भ्राता
दशरथ-राम को तब
हो जाते हैं व्यथित।

व्याकुलता और बढ़ती है जब
पिता का शरीर पूर्ण होने का वृत्त
जानते हैं।

श्री राम का वन गमन सुनकर तो
व्यथा तीव्र हो जाती है।

और निश्चेष्ट जड़वत् हो जाते हैं
जब अयोध्या का सिंहासन देने

की पुरजोर चेष्टा की जाती है

एक ओर पिता के न रहने पर
पितृतुल्य अतुल्य भाई राम की सेवा
से वंचित हैं
और दूसरे सिंहासन पर बैठ
शासन और प्रशासन का गुरुतर
सेवा का कार्य पुनः पतन की ओर
ले जा सकता है , इसलिये भयग्रस्त

जिस-जिस मार्ग से प्रभु राम
वन की ओर प्रस्थान किये
उसी-उसी मार्ग से “उन्हे” लौटा
लाने के लिये सपरिकर चल पड़ते हैं।

निषाद द्वारा उन रास्तों और
सीतारामलक्ष्मण द्वारा सेवित स्थानों
को दिखाये जाने पर दुखी हैं।

पूछत सखहिं सो ठाउँ देखाऊ
नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊँ

जहँ सिय राम लखन निसि सोए
कहत भरे जल लोचन कोए

जिस सिंसुपा वृक्ष के नीचे प्रभु ने
विश्राम किया था, उसे भी सादर
सस्नेह दण्डवत् प्रणाम करते हैं जहँ सिंसुपा पुनीत तरु रघुबर किय विश्रामु अति सनेह सादर भरत कीन्हेउ दण्ड प्रनामु

“अब देखिये “सेवक” का
कर्तव्य कि वह अपने
“सेव्य” की सेवा करने वाले वृक्ष
को भूमि पर लेट कर लोट कर
दण्डवत् प्रणाम करता है “

“नहीं मिलता कोई ऐसा समर्पित
सेवक भरत जैसा जो अपने सेव्य
की सेवा करने वाले के प्रति भी
अतिशय अनुराग व्यक्त करे”

“और नारायण ! वह भी जड़ वृक्ष”

भगवान् के सेवित चरण-रज को
अत्यंत सुकोमल अपने आँखों में
लगाते हैं
कुश का बिछौना बना कर प्रभु
जिस पर सोए थे उसकी प्रेमपूर्वक
परिक्रमा करते हैं

“रज भी जड़ और कुश आसन भी”

कुस साँथरी निहारि सुहाई
कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई
बनै न कहत प्रीति अधिकाई "लेकिन भरत ऐसा प्रेमी कि जड़ रज और कुश में भी चेतना का संचार मानता है" "नारायण ! वृक्ष कुश और धूलि में भी चेतना संचरित है, क्यों कि श्रीमन्नारायण के चरण जो वहाँ संचरित हैं " "ऐसा भरत का आचरित चरित है"

माताओं गुरुजनों को पालकी में
बैठा देते हैं –कियउ निषादनाथु अगुआई मातु पालकी सकल चलाई लघुभ्राता श्रीशत्रुघ्नलाल को बुलाकर सपरिकर गंगा को प्रणाम करते हैं श्रीसीताराम लक्ष्मण के पैदल जाने का स्मरण करके पैदल ही चलते जाते हैं।

“गवने भरत पयादेहिं पाएँ”

अयोध्या से साथ-साथ चलने वाले
सेवक बार-बार घोड़े पर बैठ जाने
आग्रह करते हैं-

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा
होइअ नाथ अस्व असवारा

लेकिन और लेकिन

“अखिल विश्व कारन करन” का
“निरभिमान भक्त सेवक” घोड़े पर
नहीं बैठता।

कहता है सेवक का धर्म तो यह है कि

मेरे “सेव्य प्रभु राम” पैरों से चलकर
इन्हीं रास्तों से चले हैं।

इसलिये मेरे जैसे किसी भी सेवक
का सेव्य के प्रति यह आचरण होना
चाहिए कि
“जहाँ सेव्य का चरण पड़ा हो
वहाँ सेवक का सिर ही पड़े”

इसीलिये सेवक का धर्म अत्यंत
कठोर है कुलिशवत्

और बोल पड़ता है –

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा

“सब तें सेवक धरमु कठोरा”

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

चले भरत दोउ भाइ

कौन होगा भरत जैसा ?अयोध्या आने पर, पिता का परलोक गमन और सीताराम का वनगमन जान करभरत अत्यंत दुखी हैं।

पितृ-कृत्य परिपूर्ण करते हैं।
सभी माताओं श्रीशत्रुघ्नलाल जी
और कुलगुरु वशिष्ठ जी द्वारा राज्य
भार ग्रहण का अनुरोध होता है कहते हैं भरत जी कि

वह तो गुरु ,सचिव, प्रजा और
समस्त माताओं का आदेश पालना
चाहते हैं। यह मेरे लिये शिरोधार्य है

मोहिं उपदेश दीन्ह गुरु नीका
प्रजा सचिव सम्मत सबहीका
मातु उचित धरु आयसु दीन्हा
अवसि सीस धरि चाहउँ नीका किन्तु मेरा मन असन्तुष्ट है। सभी लोग "साधु-स्वभाव" ही हैं। हमारे लिए साध्य कार्य बता रहे हैं

अब देखिये – सब अपराध मेरा है। मुझे क्षमा करें।

दुखी आदमी के दोष गुण पर आप सभी जैसे "साधुजन" विचार कर बतायें - उत्तरु देउँ छमब अपराधू दुखित दोष गुन गनहिं न साधू हम प्रभु राम के सेवक ठहरे हमारी अनुपस्थिति में माता की कुटिल बुद्धि ने मुझसे यह सेवाकार्य छीन लिया है- हित हमार सियपति सेवकाई सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई

“बिनु हरि भगति जायँ जप जोगा”

हरिभक्ति के बिना किसी जीवमात्र
का कष्ट कभी नहीं जा सकता
चाहे कितना हू जग्य जोग कर ले।

“देखे बिनु रघुनाथ के जिय की
जरनि न जाय”

हृदय में भरत के लगी है भयंकर आग
श्रीरघुनाथ चरण जल से जायगी भाग

कहते हैं कि मेरा हित श्रीरामचरण
आज्ञा दें सब करें मेरा दुख निवारण

यदि आप सभी हठ पूर्वक मुझे राज्य
भार सौंपेंगे तो यह धरती मेरे ही

दुःखभार से पाताल चली जायेगी

मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं
रसा रसातल जाइहि तबहीं

अरे! मेरे समान कौन पापग्रस्त
और अतिशय भार भरा है ?

मोहि समान को पापनिवासू
जेहि लगि सीय राम बनबासू

अन्त में सभी लोगों ने भरत के
राज्य नहीं लेने और वन जाकर
श्रीराम को लौटा लाने के निर्णय
की सराहना की है

अवसि चलिअ बन रामु जहँ
भरत मन्त्र भलि कीन्ह
सोक सिन्धु बूड़त सबहिं
तुम अवलम्बन दीन्ह सभी माताओं गुरु वशिष्ठ जी और अन्यान्य लोगों सहित भरत शत्रुघ्न वन के लिए प्रस्थान करते हैं।

भला कौन होगा भरत जी जैसा
त्यागी
जो यह जानता है कि राज्य त्याग
में भला है श्रीसीताराम के चरण ही अशरण के अनन्य शरण हैं- सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ सुमिरि राम सिय चरन तब चले " भरत दोउ भाइ "

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

प्रभु पद प्रेम सकल जग जाना

भरत जी को भगवत् चरणों की
प्रीति है।

श्रीरामवनगमन और दशरथप्राणप्रयाण
के अनन्तर भरत जी ननिहाल से
अयोध्या लौटते हैं ।

पिता के परलोक गमन और
सीतासहित श्रीरामलक्ष्मण के वन
चले जाने से अत्यन्त दुःखी हैं

और ऐसा दुःखद समचार सुन कर
मानो ऐसे सहम उठते हैं कि जैसे
सिंह की दहाड़ सुनकर हाथी
घबड़ा जाये

सुनत भरत भये बिबस बिसादा
जनु सहमेउ करि केहरि नादा

सहमते इसलिये हैं कि उन्हे
“अहम् ” का वहम नहीं और

इसीलिये परम रामभक्त और
विरक्त साधु हैं।भरद्वाज जी ने कहा था

तात भरत तुम सब बिधि साधू
रामचरन अनुराग अगाधू

राम बिना राज्य कैसे चलेगा?
राम बिना यह मार ही डालेगा राज्यभार

सभी परिवार परिकर सहित
अयोध्या को दुर्भाग्यशाली कहते हैं

ऐसे भरत को

श्रीराम जैसे “साधु” मानो सबका “सब “
साधने वाले सर्वगत आत्मा
परमात्मा का वियोग तो ऐसा है कि

सभी का “भाग्य” ही भाग गया हो
दुःखी अवस्था में तत्व उपदेशते हैं

जे नहिं साधु संग अनुरागे
परमारथ पथ बिमुख अभागे

माँ कौशल्या भरत की दशा देख
गोद में बैठा कर सान्त्वना देती हैं भरत के लिए राम तो प्राणों के प्राण हैं। और उधर इसी तरह श्री राम के लिये भी भरत जी प्राणों से अधिक प्रिय हैं - "राम प्रानहु ते प्रान तुम्हारे तुम रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे" इधर श्रीराम के वन में आने पर वाल्मीकि ऋषि ने श्रीराम से

राम बिना कुछ भी नहीं चाहने वाले
भरत सरीखे “साधु” का स्मरण कर

संसार की असारता कही थी और
जैसे कि अयोध्या की धनधरती
तो श्रीराम की है, भरत के लिये
यह विषवत् –जननी सम जानहिं पर नारी धन पराव विष ते विष भारी भरत ऐसे "साधु" हैं जो परसंपत्ति को देख हर्षित तो होते हैं, किन्तु पर ( मानो समस्त अयोध्या की ) की विपत्ति देख विशेष दुखी जे हरषहिं पर संपति देखी दुखी होहिं पर विपति विसेषी

जिन भरत के लिये श्रीराम प्राणो
से भी अधिक प्रिय हैं उनका “मन”
तो “श्रीरामायण ” है

जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे

श्रीराम भक्ति ही जिनका काम
बन जाये। सभी गुणों को राम का
मान कर “मानापमान” से परे हो।

भगवान् के भक्त ( श्रीसीतालक्ष्मणादि)
जिन्हे प्रियप्रतीत हों, ऐसे भाग्यशाली
के हृदय में आपका अचल आसन है

गुन तुम्हार समुझै निज दोसा
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं
तेहि उर बसहु सहित वैदेही

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु
तुम्ह सन सहज सनेह
बसहु निरन्तर तासु मन
सो राउर निज गेह

ऐसे विगताभिमान सत्याचरणचारी
परमविचारी साधुमूर्तशरीरधारी

श्रीभरत जी महाराज सभी से विनय
पूर्वक श्रीरघुनाथ जी के दर्शन विना

हृदय – दाह-दाहकता की शान्ति
असम्भव मानते हैं-

आपनि दारुन दीनता
कहउँ सबहिं सिर नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

और नारायण! यह समझिये कि

श्रीभरत जैसे त्यागी रामानुरागी
का आचरण और चरम धरम
सभी जीव (मनुष्य) मात्र
के लिये तत्वोपदेश है कि

यदि इस देश में आने का लक्ष्य नहीं
तो यह भरताचरण आचरणीय है

वस्तुतः मानव जीवन का यही
एकमात्र उद्देश्य है कि

भगवद् दर्शन के बिना संसार दर्शन
में अटके रहने पर भटकना ही
पड़ेगा

इसलिये परम पुनीत प्रयाग की
धरती पर भरत के राम प्रेम को

देखकर भरद्वाज जी ने ,इसे
अनुकरणीय आचरणीय कहा था

भरत नीतिरत साधु सुजाना

“प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना”

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

तुम सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

त्रिवेणी जल ने भरत जी को
आशीर्वाद में श्रीराम की अनन्यप्रियता
प्रदान की है।

उधर भरत के विषय में जीवाचार्य
लक्ष्मण की लीला द्रष्टव्य है

जब अयोध्या से प्रस्थान किये
सपरिकर श्रीभरत जी का
आगमन जान कर, श्रीरामसीता
सहित लक्ष्मण पर, आक्रमण करने
के लिए वे भरत जी आरहे हैं
ऐसी “विमतिलीला” का नाटक
करते हैं, लक्ष्मण जी

भगवान् श्रीराम श्रीलक्ष्मण जी को
पहले ही समझा चुके हैं कि
अतिभार विस्तार विस्तीर्ण
समेरु तो मच्छर की एक फूँक से
हो सकता है उड़ जाय, किन्तु

भरत जैसा निर्मान निर्मोह
जगद् हितैषी त्यागी साधु सन्तस्वरूप
महात्मा को राज्य सत्ता का मद नहीं
छू सकता

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई

आगे भगवान्, तो भरत को सूर्यवंश
रूपी तालाब का हंस ही कह देते हैं ,

जो जल विकार को दूर कर
दूध का दूध और पानी का पानी
कर डालने के लिये प्रसिद्ध है

भरत हंस रविबंस तड़ागा
जनमि कीन्ह गुनदोष विभागा

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
निज जस कीन्ह जगत उजियारी

भैया! ऐसा भरत और ऐसी दुर्मति
कि वह हम पर आक्रुष्ट हो आक्रमण
करे, यह तो असम्भव है हंस है यदि भरत तो साक्षात् सरस्वती का वाहन है।

सरस्वती स्वयं ज्ञानमूर्ति जिसके
ऊपर विराजे, उसके द्वारा अज्ञान
मूलक -कार्य ?असम्भव असम्भव असम्भव

भैया ! भरत तो ऐसा हंस है कि
वह “जड़जल ” के मायिक गुणों त्रिविध सद् रजस् तमस् के त्रिविध क्रमिक कार्यरूप दुर्गुणों सुख दुःख और मोह से भी सर्वथा परे है और परे कर देने वाला साधु है

नारायण! “जल” तो मायिक है जड़ है

गगन समीर अनल जल धरनी
इन्ह कै नाथ सहज जड़ करनी

भरत के गुणों का स्मरण भी
भगवान् को दुखी कर दे रहा है

शरणागत वत्सल परमकरुणामय
प्रभु श्रीराम तो लक्ष्मण से
श्रीभरत जी के गुण-शील-स्वभाव
का वर्णन करते हुए प्रेम के समुद्र में
डूब ही गये

कहत मगन गुन सील सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

भैया! भरत जैसा निर्लोभी
निरभिमानी तो ब्रह्मा के द्वारा
रचा ही नहीं गया है

सुनहु लखन भल भरत सरीसा
विधि प्रपंच महु सुना न दीसा

और यह सब भरत जी के विषय
में प्रभु श्रीराम इसलिये कह रहे हैं

मानो त्रिवेणी जल ने भरत को
दुःखातीत होने और भगवान्
का अनन्य प्रेमी होने का आशीष

जो दे दिया था

बादि गलानि करौ मन माही

तुम्ह सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्