जगद् ही हरि , हरि ही जगत्

क्या कहें,भगवान् और सन्त से बड़ा शिक्षक कौन हुआ है नारायण! सभी जीव स्वयं की करमकुण्डली के कारण शरीर धरते हैं।किसी भी माता पिता पुत्र सगे सम्बन्धी का किसी से कुछ भी लेना देना नहीं। सभी एक दूसरे तीसरे से स्वतन्त्र हैं
सद्गुरु भगवान् का चरणाश्रय मिलने पर ही भव बन्ध की फाँस कटेगी।
संसार में हमारा किसके साथ क्या क्या व्यवहार होना चाहिए शास्त्रसन्तप्रमाण हैं
“तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ “सामान्यतः और परिस्थिति विशेष में क्या करें,क्या न करें
शास्त्र और सन्त ही प्रमाण हैं।आश्रयेद् सन्तशास्त्राणि।
भगवान् ने अपने रामकृष्णादि मानवलीलावतारों में सभी मातापितागुरुभातृपत्नीकुटुम्बसमाजदेश परिवारीजनों के प्रति आचरणीय आचरण की आचरण द्वारा शिक्षा दे करके ही क्या नहीं सिखाया।
विप्रधेनुसुरसन्तहित लीन्ह मनुज अवतार का मतलब ही यही था। पहली शिक्षा आचरण के द्वारा ही मानी जाती है। अतः सब कुछ भगवान् द्वारा आचरित कर्म करने पर वह कर्म नहीं, बल्कि उपासना साधना बन जाती है।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं जानि प्रीति रस एतनेहिं माहीं।ऐसा भगवान् का वचन और नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट,भगवती की वाणी से शक्ति शक्तिमान् समर्पित पारस्परिक दाम्पत्य तो “तात्विक वास्तविक प्रेम” का उदाहरण है अतः हम सभी शेषकर्मभोग के कारण शरीर धरने वाले मलिनचित्त के जीवों को विशुद्ध प्रेम के लिए प्रेम करना होगा।
बिना विशुद्ध प्रेम के माया जायेगी नहीं और मनोमालिन्य दूर नहीं होगा। कठिनाई ये है कि संसार त्रिगुणात्मक शरीर भी त्रिगुणात्मक अतः मन इसी में विचरता है।
संसार सदा स्मरण में, भगवान् अविस्मरण में। और –
नाम जपस्मरण से ही यह अविस्मरण का रोग नष्ट होगा होगा।संसार व्याधि ही विनष्ट हो जायेगी। सर्वत्र समदर्शन का दर्शन होने लगेगा। निष्काम काम सिद्ध हो जायेगा,निष्प्रयास ही।तब तो नानाशरीर
सम्बन्धों की क्रिया प्रतिक्रिया से कोई समस्या ही नहीं होगी ।अविचलितभाव से नामपर दृढ रहने पर सही दृष्टि मिल जायेगी। जगत्कारण कार्य एक दीखेंगे।
सुमिरि पवन सुत पावन नामू अपने बस करि राखे रामू ।जगद् ही हरि और हरि ही जगद् दीखने लगेंगे। चंचल मन को तो अचंचल नाम ही स्थिर करेगा।सब सियामय और राममय दिखेगा प्रचुर रूप में। ( प्राचुर्ये मयट्) की पाणिनीय शक्ति समुदित हो जायेगी।और-
हरिरेव जगद् जगदेव हरिः हरितो जगतो नहिं भिन्नतनुः। अन्तः वाह्य सिद्ध दृष्ट।


“जगद् ही हरि, हरि ही जगद्”

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्

भरत महा महिमा जलरासी

भरत, महामहिमा की अपार जलराशि हैं

नारायण! भगवान् की रामलीला में
जो चारु चारित्र्य का गाम्भीर्य दीखा है
भरत का,वैसी अथाह गहराई किसी में
कहाँ? और गहराई दीख जाय तो कैसी
गहराई, और फिर समुद्र कैसा?

राजाराम के वनगमन और दशरथजी की
लीला पूरी होने पर ननिहाल से अयोध्या
लौट कर इस अयोध्या की विपरीत दशा
” योध्या” दीख पड़ती है,उन्हें।
घर श्मशान जैसा और सभी परिजन
भूत-प्रेत सरीखे,और सगे सम्बन्धी मित्र
जन जमदूत जैसे।
” घर मसान परिजन जनु भूता
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता”
पिता के परलोक गमन से अधिक भारी
है, सीतारामलक्ष्मण का वनगमन।
भगवान् जिस मार्ग से जाते हैं, उसी
मार्ग की रज,शिर धरते, गिरते-पड़ते
अनुगमन करते आये हैं चित्रकूट,जहाँ
प्रभु ने पर्णकुटी बनाई है। और राम के
प्रत्यक्ष होते ही-
“भूतल परेउ लकुट की नाईं”

अचेतन “दण्ड”स्वामी के साथ जैसे रचा
बसा,स्वामी के साथ ,समर्पित भाव से
जहाँ स्वामी चलते हैं,साथ चलते जाना
उसका आत्मभाव है, वैसे ही भरत जी
अचेतन दण्डवत् स्वामीराम के समक्ष गिर
पड़ते हैं।नारायण! बात बड़ी गम्भीर है।

शङ्कराचार्य की बड़ी पंक्ति भगवती से
क्षमा याचना काल में कही गई है।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति

का अपवाद साक्ष्य ही जैसे उपस्थित है
कि मानो ब्रह्मा ने पति-द्रोही और वंश की
कलंक भूता माता ” कुमाता” रच दी है।
“कुल कलंक करि सृजेउ बिधाता
साइँदोह मोहि कीन्ह “कुमाता”
तब आचार्य शङ्कर की पंक्ति जो सभी
जगह सामान्यतया ठीक है ,लेकिन
यहाँ असाधारण घटना विशेष में
विपरीत गढ़ी पढ़ी जा सकती है।
” सुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमातापि भवति” ऐसा अपवाद भरत है।

इस प्रकार भरत अत्यंत विरह और राम
प्रेम में आकुलित दशा को प्राप्त हैं।अब
भगवान् और यथायोग्य सभी से सादर
मिलने के अनन्तर पुनः यह विचार
करते हैं,कि काल ने माता के बहाने से
बहुत बड़ा कुचक्र रचा है।जैसे अतिवृष्टि
आदि छः ईतियों के भय से धान जल्दी
परिपक्व होकर निर्भय होना चाहे और
यह काल तो पहले से ही निर्भय है।
” कीन्हि मातु मिस काल कुचाली
ईति भीति जस पाकत साली”

संशय कुतर्क के विचार-सागर में डूबते
उतराते हैं,भरत सोच केवल एक कि
कैसे श्रीराम का राज्याभिषेक हो।उपाय
समझ नहीं पड़ता। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा
से लौट सकते हैं, किन्तु वे भी पहुँचे हुए
गुरु हैं, राम की रुचि भाँपकर ही कहेंगे
“केहि बिधि होइ राम अभिषेकू
मोहि अवकलत उपाउ न एकू
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी”
मैं प्रभु का अनुचर सेवक और दास हूँ।
समय और विधाता हमारे प्रतिकूल है।
मेरा लौटने का हठ करना सेवक-धर्म
नहीं, प्रत्युत अधर्म/कुकर्म होगा।और
सेवक का धर्म तो शिव-सेवित कैलाश
से भी वजनदार बड़ा और श्रेष्ठ होता है।
” मोहि अनुचर कर केतिक बाता
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू “
कोई भी एक युक्ति निश्चित नहीं हो पाती
सोचते-सोचते रात बीती सुबह हो गई।
“एकउ जुगुति न मन ठहरानी
सोचत भरतहिं रैनि बिहानी “

प्रातः वशिष्ठजी ने सभी को बुलाया।
समयानुकूल बात बताई और श्रीराम को
धर्मधुरीण “स्वतन्त्रः कर्ता “सत्यसन्ध
पालनकर्त्ता,जगमंगल के एककारण
सूर्यवंश के सूर्य और वेदशास्त्र का सेतु भी
बताया।

” धरम धुरीन भानुकुल भानू
राजा राम स्वबस भगवानू
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू
राम जनमु जग मंगल हेतू”
राम,गुरुमातापिता आज्ञापरायण दुष्दमन
कर्ता और देवहितकर्ता हैं।इनके समान
नीति प्रीति परमार्थ स्वार्थ कोई नहीं जान
सकता।
” गुरु पितु मातु बचन अनुसारी
खल दलु दलन देव हितकारी
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ”

वशिष्ठ ने सभी मंगलों का मूल, राम का
अभिषेक बताया, जिसमें नीति,परमार्थ
स्वार्थ सब कुछ है,लेकिन उपस्थित सभी
को कोई उत्तर नहीं सूझा,भावविह्वल
दशा को जो प्राप्त थे।
भरत ने सिर चरणों में रख कर निवेदन
किया है।
” सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू
मंगल मोद मूल मग एकू
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ
कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
नय परमारथ स्वारथ सानी”
लोगों को कोई उत्तर सूझा।सभी लोग
भावसार में डूब चुके हैं।भरत बद्धांजलि
बोलते हैं-
“उतरु न आव लोग भए भोरे
तब सिरु नाइ भरत कर जोरे”
उन्होंने कहा कि सूर्य वंश में एक से एक
राजा हुए हैं, क्रम से सभी के माता-पिता
हैं, सभी के कर्मों का शुभाशुभ फल तो
विधाता देते हैं,किन्तु सभी के दुःखों का
आत्यंतिक नाश करनेवाले सर्वमंगल के
दाता हे गुरुदेव! आपके आशीष ही हैं।

अतः जिससे विधिगति और तन्निश्चित
व्यवस्था उलट पुलट जाय ऐसे आशीष
पर आप दृढ़ हो जायें तो भला कौन उसे
रोक सकता है।
” भानुबंस भए भूप घनेरे
अधिक एक ते एक बड़ेरे
जनम हेतु सब कहँ पितु माता
करम सुभासुभ देइ बिधाता
दलि दुख सजइ सकल कल्याना
अस असीस राउरि जगु जाना
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी
सकइ को टारि टेक जो टेकी”
तब गुरु बशिष्ठ ने कहा कि जो कुछ भी
अच्छा होगा, वह राम जी की कृपा से ही
होगा, इनके प्रतिकूल कोई भी सिद्धि तो
सम्भव नहीं।
” तात बात फुरि राम कृपाहीं
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं
लेकिन “इनका” अनुमोदन यदि हो तो हम
समझते हैं कि,शत्रुघ्नलाल जी के साथ
भरत बन चले जायँ और सीतासहित
रामलक्ष्मण यहाँ से वापस अयोध्या चलें,
यद्यपि यह कहते हुए भी संकोच हो रहा।

” सकुचहुँ तात कहत एक बाता
अरध तजहिं बुध सरबस जाता”
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः

” तुम कानन गवनेहु दोउ भाई
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई”
अब भरत शत्रुघ्नलाल जी के हर्ष का
ठिकाना नहीं।सारा शरीर प्रमोद से भर
गया,और ऐसा लगा कि अब तो राजा
राम जी हो ही गए।
” सुनि सुबचन हरष दोउ भ्राता
भे प्रमोद परिपूरन गाता
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा
जनु जिय राउ रामु भए राजा”
रानियाँ रो पड़ी,उनके लिए तो दोनों ही
बातें सुखदुख दोनों की कारक हैं।
” बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी”
भरत यह बात सुन आनन्द विभोर हैं।
कहते हैं कि, वे शत्रुघ्नलाल जी के साथ
आजन्म वनवास के लिये तैयार हैं, मानो
सारे जीवन का एकत्रित फल ही मिल
गया है उन्हे।इससे बड़ा सुख क्या होगा?
” कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे
फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे
कानन करउँ जनम भरि बासू
एहि तेअधिक न मोर सुपासू”
भरत ने कहा कि सीताराम जी तो सभी
जीवों की आत्मा ही हैं।इनसे अगम्य कुछ
भी नहीं।और गुरुदेव भी सर्वज्ञ साधुजन
हैं, अतः अब शीघ्रता से अपनी बात को
प्रमाणित करें।
“अंतरजामी रामु सिय
तुम सरबग्य सुजान
जौं फुर कहहु त नाथ
निज कीजिअ बचनु प्रमान”

भरतद्वारा सप्रेम आजन्म वनवास का
निश्चय करने पर सारी सभा सहित मुनि
भी अपनी देहदशा मानो भूल गए।
” भरत बचन सुनि देखि सनेहू
सभा सहित मुनि भए बिदेहू”

नारायण! अब श्रीरामलीला में भरत का
का चरित्र एक अरित्र (सुन्दर मार्ग)बन
गया है, जो उनके प्रेम और त्याग की
सर्वोच्च पराकाष्ठा है। देखिये-
गोस्वामी जी की झोली उपमालंकार से
तो भरी है, लेकिन उत्प्रेक्षा भी अद्वितीय,
क्योंकि इसके आलम्बन वशिष्ठभरत
जैसे उत्प्रेक्षणीय चरित्र हैं।दर्शनीय है यह
स्वरूप।

“भरत की महामहिमा अगाधसमुद्रवत् है”

” भरतमहिमा के अपारजलराशि के तट
पर गुरुवशिष्ठ की धीर बुद्धि ऐसी स्थिर
स्थित हो गई,जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ कोई
स्त्री,कि अब क्या करें क्या न करें”
अथवा-
“भरतमहिमा रूपी समुद्रतट पर अबला
स्त्री की बुद्धि भी अबला होकर अधीर
अस्थिर(चंचल) हो गई,कि अब क्या करें
क्या कहें”
इसीलिये गोस्वामी जी ने कहा।
” भरत महा महिमा जल रासी
मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी”

गुरु शरणम् ।। हरि शरणम् ।।

भरत महा महिमा जलरासी

भरत, महामहिमा की अपार जलराशि हैं

नारायण! भगवान् की रामलीला में
जो चारु चारित्र्य का गाम्भीर्य दीखा है
भरत का,वैसी अथाह गहराई किसी में
कहाँ? और गहराई दीख जाय तो कैसी
गहराई, और फिर समुद्र कैसा?

राजाराम के वनगमन और दशरथजी की
लीला पूरी होने पर ननिहाल से अयोध्या
लौट कर इस अयोध्या की विपरीत दशा
” योध्या” दीख पड़ती है,उन्हें।
घर श्मशान जैसा और सभी परिजन
भूत-प्रेत सरीखे,और सगे सम्बन्धी मित्र
जन जमदूत जैसे।
” घर मसान परिजन जनु भूता
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता”
पिता के परलोक गमन से अधिक भारी
है, सीतारामलक्ष्मण का वनगमन।
भगवान् जिस मार्ग से जाते हैं, उसी
मार्ग की रज,शिर धरते, गिरते-पड़ते
अनुगमन करते आये हैं चित्रकूट,जहाँ
प्रभु ने पर्णकुटी बनाई है। और राम के
प्रत्यक्ष होते ही-
“भूतल परेउ लकुट की नाईं”

अचेतन “दण्ड”स्वामी के साथ जैसे रचा
बसा,स्वामी के साथ ,समर्पित भाव से
जहाँ स्वामी चलते हैं,साथ चलते जाना
उसका आत्मभाव है, वैसे ही भरत जी
अचेतन दण्डवत् स्वामीराम के समक्ष गिर
पड़ते हैं।नारायण! बात बड़ी गम्भीर है।

शङ्कराचार्य की बड़ी पंक्ति भगवती से
क्षमा याचना काल में कही गई है।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति

का अपवाद साक्ष्य ही जैसे उपस्थित है
कि मानो ब्रह्मा ने पति-द्रोही और वंश की
कलंक भूता माता ” कुमाता” रच दी है।
“कुल कलंक करि सृजेउ बिधाता
साइँदोह मोहि कीन्ह “कुमाता”
तब आचार्य शङ्कर की पंक्ति जो सभी
जगह सामान्यतया ठीक है ,लेकिन
यहाँ असाधारण घटना विशेष में
विपरीत गढ़ी पढ़ी जा सकती है।
” सुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमातापि भवति” ऐसा अपवाद भरत है।

इस प्रकार भरत अत्यंत विरह और राम
प्रेम में आकुलित दशा को प्राप्त हैं।अब
भगवान् और यथायोग्य सभी से सादर
मिलने के अनन्तर पुनः यह विचार
करते हैं,कि काल ने माता के बहाने से
बहुत बड़ा कुचक्र रचा है।जैसे अतिवृष्टि
आदि छः ईतियों के भय से धान जल्दी
परिपक्व होकर निर्भय होना चाहे और
यह काल तो पहले से ही निर्भय है।
” कीन्हि मातु मिस काल कुचाली
ईति भीति जस पाकत साली”

संशय कुतर्क के विचार-सागर में डूबते
उतराते हैं,भरत सोच केवल एक कि
कैसे श्रीराम का राज्याभिषेक हो।उपाय
समझ नहीं पड़ता। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा
से लौट सकते हैं, किन्तु वे भी पहुँचे हुए
गुरु हैं, राम की रुचि भाँपकर ही कहेंगे
“केहि बिधि होइ राम अभिषेकू
मोहि अवकलत उपाउ न एकू
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी”
मैं प्रभु का अनुचर सेवक और दास हूँ।
समय और विधाता हमारे प्रतिकूल है।
मेरा लौटने का हठ करना सेवक-धर्म
नहीं, प्रत्युत अधर्म/कुकर्म होगा।और
सेवक का धर्म तो शिव-सेवित कैलाश
से भी वजनदार बड़ा और श्रेष्ठ होता है।
” मोहि अनुचर कर केतिक बाता
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू “
कोई भी एक युक्ति निश्चित नहीं हो पाती
सोचते-सोचते रात बीती सुबह हो गई।
“एकउ जुगुति न मन ठहरानी
सोचत भरतहिं रैनि बिहानी “

प्रातः वशिष्ठजी ने सभी को बुलाया।
समयानुकूल बात बताई और श्रीराम को
धर्मधुरीण “स्वतन्त्रः कर्ता “सत्यसन्ध
पालनकर्त्ता,जगमंगल के एककारण
सूर्यवंश के सूर्य और वेदशास्त्र का सेतु भी
बताया।

” धरम धुरीन भानुकुल भानू
राजा राम स्वबस भगवानू
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू
राम जनमु जग मंगल हेतू”
राम,गुरुमातापिता आज्ञापरायण दुष्दमन
कर्ता और देवहितकर्ता हैं।इनके समान
नीति प्रीति परमार्थ स्वार्थ कोई नहीं जान
सकता।
” गुरु पितु मातु बचन अनुसारी
खल दलु दलन देव हितकारी
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ”

वशिष्ठ ने सभी मंगलों का मूल, राम का
अभिषेक बताया, जिसमें नीति,परमार्थ
स्वार्थ सब कुछ है,लेकिन उपस्थित सभी
को कोई उत्तर नहीं सूझा,भावविह्वल
दशा को जो प्राप्त थे।
भरत ने सिर चरणों में रख कर निवेदन
किया है।
” सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू
मंगल मोद मूल मग एकू
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ
कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
नय परमारथ स्वारथ सानी”
लोगों को कोई उत्तर सूझा।सभी लोग
भावसार में डूब चुके हैं।भरत बद्धांजलि
बोलते हैं-
“उतरु न आव लोग भए भोरे
तब सिरु नाइ भरत कर जोरे”
उन्होंने कहा कि सूर्य वंश में एक से एक
राजा हुए हैं, क्रम से सभी के माता-पिता
हैं, सभी के कर्मों का शुभाशुभ फल तो
विधाता देते हैं,किन्तु सभी के दुःखों का
आत्यंतिक नाश करनेवाले सर्वमंगल के
दाता हे गुरुदेव! आपके आशीष ही हैं।

अतः जिससे विधिगति और तन्निश्चित
व्यवस्था उलट पुलट जाय ऐसे आशीष
पर आप दृढ़ हो जायें तो भला कौन उसे
रोक सकता है।
” भानुबंस भए भूप घनेरे
अधिक एक ते एक बड़ेरे
जनम हेतु सब कहँ पितु माता
करम सुभासुभ देइ बिधाता
दलि दुख सजइ सकल कल्याना
अस असीस राउरि जगु जाना
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी
सकइ को टारि टेक जो टेकी”
तब गुरु बशिष्ठ ने कहा कि जो कुछ भी
अच्छा होगा, वह राम जी की कृपा से ही
होगा, इनके प्रतिकूल कोई भी सिद्धि तो
सम्भव नहीं।
” तात बात फुरि राम कृपाहीं
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं
लेकिन “इनका” अनुमोदन यदि हो तो हम
समझते हैं कि,शत्रुघ्नलाल जी के साथ
भरत बन चले जायँ और सीतासहित
रामलक्ष्मण यहाँ से वापस अयोध्या चलें,
यद्यपि यह कहते हुए भी संकोच हो रहा।

” सकुचहुँ तात कहत एक बाता
अरध तजहिं बुध सरबस जाता”
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः

” तुम कानन गवनेहु दोउ भाई
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई”
अब भरत शत्रुघ्नलाल जी के हर्ष का
ठिकाना नहीं।सारा शरीर प्रमोद से भर
गया,और ऐसा लगा कि अब तो राजा
राम जी हो ही गए।
” सुनि सुबचन हरष दोउ भ्राता
भे प्रमोद परिपूरन गाता
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा
जनु जिय राउ रामु भए राजा”
रानियाँ रो पड़ी,उनके लिए तो दोनों ही
बातें सुखदुख दोनों की कारक हैं।
” बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी”
भरत यह बात सुन आनन्द विभोर हैं।
कहते हैं कि, वे शत्रुघ्नलाल जी के साथ
आजन्म वनवास के लिये तैयार हैं, मानो
सारे जीवन का एकत्रित फल ही मिल
गया है उन्हे।इससे बड़ा सुख क्या होगा?
” कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे
फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे
कानन करउँ जनम भरि बासू
एहि तेअधिक न मोर सुपासू”
भरत ने कहा कि सीताराम जी तो सभी
जीवों की आत्मा ही हैं।इनसे अगम्य कुछ
भी नहीं।और गुरुदेव भी सर्वज्ञ साधुजन
हैं, अतः अब शीघ्रता से अपनी बात को
प्रमाणित करें।
“अंतरजामी रामु सिय
तुम सरबग्य सुजान
जौं फुर कहहु त नाथ
निज कीजिअ बचनु प्रमान”

भरतद्वारा सप्रेम आजन्म वनवास का
निश्चय करने पर सारी सभा सहित मुनि
भी अपनी देहदशा मानो भूल गए।
” भरत बचन सुनि देखि सनेहू
सभा सहित मुनि भए बिदेहू”

नारायण! अब श्रीरामलीला में भरत का
का चरित्र एक अरित्र (सुन्दर मार्ग)बन
गया है, जो उनके प्रेम और त्याग की
सर्वोच्च पराकाष्ठा है। देखिये-
गोस्वामी जी की झोली उपमालंकार से
तो भरी है, लेकिन उत्प्रेक्षा भी अद्वितीय,
क्योंकि इसके आलम्बन वशिष्ठभरत
जैसे उत्प्रेक्षणीय चरित्र हैं।दर्शनीय है यह
स्वरूप।

भरत बिकल सुचि सोच


भरत को रामपद पाने की व्याकुलता है।
अतः राजपद मिलने की पीड़ा। क्योंकि
राजपद अनित्य भोगमय और रामपद
नित्य योगमय। नित्ययोगमय भगवान्
और केवल इन्हे छोड़कर और कुछ न
चाहने वाले हरिः ओ३म् तत्सत् भक्त
भक्तभरत अपूर्व प्रेम के विग्रह इसीलिये
हैं।

चित्रकूट की धरती पर रामभरतमिलन
अन्वर्थ सुयोग का सार्थक उदाहरण है।
चित्रकूट विचित्र और कूट (रहस्यमय)है।
भगवान्-भक्त के विचित्र चित्र का साक्षी
बना है।यह मिलन प्रेम-प्रेमी का है,जहाँ
प्रेमी प्रेम(भगवान्) को पाने का हठी एवं
आकांक्षी है।वह प्रेम के लिये ही प्रेम
करता है, वियोग की ज्वाला में जलकर
हृदय को परिशुद्ध बना डालता है
” देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ”
भक्त-भगवान् का प्रेम रहस्यमय(कूट) है
इसीलिये चित्र विचित्र चित्र है।
चित्रकूट का और भाव है।
इस भाव में”चित्तकूट “संज्ञा मान लें
तब कूट(रहस्यपूर्ण) चित्त वाला होने से
यह “चित्तकूट”अन्यार्थ वाची हो जाता है।
भगवान्-भक्त की चित्तदशा का रहस्य
उन दोनों के अतिरिक्त और किसी के भी
अत्यंत गूढ हो जाता है,जो इसी कोटि के
भक्त के द्वारा गम्य है।
अब सोचने वाली बात है कि ऐसे स्थल
का ऐसा महत्व,रहस्य और वैचित्र्य है कि
देवत्रितयी के मनबुद्धि के पहुँच के बाहर
कह दिया गोस्वामी जी ने।

“जहँ न जाइ मन बिधि हरि हर को”

और विनय की पराकाष्ठा देखिये उन्होंने
कहा कि मलिनचित्त मैं कैसे परिशुद्ध
चित्तवृत्ति वाले भगवान्-भक्त का वर्णन
कर सकता हूँ। सद्रजः तमस् का मायिक
शरीरवाला मैं नित्य , अनित्य का ही
चिन्तन करनेवाला हूँ। मैं कुबुद्धि हूँ।
भगवान्-भक्त त्रिगुणात्मक भी और
त्रिगुणातीत भी। यही तो रहस्य(कूट) है।

दुर्बुद्धि व्यक्ति गुणातीत दशा का बखान
कर नहीं सकता जैसे कि तन्त्री(तारवाद्य)
को बजाने के लिये गाँडर(तालाब की
कोमल घास) को ताँती (तार ) के रूप में
प्रयोग करने पर,वह टूट हि जायेगा,
सुन्दर रागध्वनि तो दूर की बात है।

” सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती
बाज सुराग कि गाँडर ताँती”
अब ऐसी चित्र विचित्र चित्रकूट की भूमि
पर शोचनीय सोच विचार शोक और
परम प्रेम भरतभगवान् का है तो उसे
जानना उन्हीं के जनाने से सम्भव है।
कथा प्रवाह आगे बढने बढ़ता जाता है।

सभी आपस में गुरजन,माताओं समेत
एक दूसरे से प्रेमपूर्वक सादर मिलते हैं।
भरतजी अनुज सहित प्रेमोत्कर्ष में सीता
जी के चरणकमलरज को सिर पर धरते
हुए प्रेमविह्वल हैं
” सानुज भरत उमगि अनुरागा
धरि सिर सिय पद पदुम परागा “
सीता जी आशीष देती हैं और प्रेममग्नता
में देह की सुध बुध समाप्त हो जाती है
” सीय असीस दीन्हि मन माहीं
मगन सनेह देह सुधि नाहीं “
भगवान् ने गुरु को दण्डवत् प्रणाम किया
है।मुनि ने हृदय से लगाया है।देवों ने पुष्प
वर्षा की है।भगवान् की आर्त दशा लोगों
ने देखी है।सीता जी ने सासुओं की सेवा
की है।एक भगवान् ही समझ रहे हैं कि
सभी माताएं साक्षात् माया सीता की
माया से ग्रस्त हैं
” लखा न मरमु राम बिनु काहूँ
माया सब सिय माया माहूँ “
सीता जी के साथ रामलक्ष्मण का सरल
स्वभाव देख कर कुटिल कैकेयी रानी को
पछतावा हो रहा है
“लखि सिय सहित सरल दोउ भाई
कुटिल रानि पछितानि अघाई “
धरती और यमराज से याचना करती हैं।
धरती फटती नहीं है कि उसमें समा जायँ
और विधाता मृत्यु भी नहीं दे रहा है।
कितना कठिन काल है।
“अवनि जमहि जाचति कैकेई
महि न बीचु बिधि मीचु न देई “
लोक और वेदविदित बात कविगण
कहते हैं कि राम से विमुख को धरती
क्या, नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा।
” लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं
राम बिमुख थलु नरक न लहहीं “
भरत जी को प्रेमविह्वल दशा में न नींद
आती है और न ही भूख लगती है।
कीचड़ के नीचे फँसी मछली अगाध जल
में विहार करने की लोभी होकर भी जैसे
संकुचित है।
वैसे ही भरत जी भी मायिक कीच में
फँसे लोगों बीच का संग त्याग कर पवित्र
रामप्रेमसलिल के संकोची हैं

नीच कीच बिच मगन जस
मीनहिं सलिल सँकोच
निसि न नींद नहिं भूख दिन

“भरतु बिकल सुचि सोच “


गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।

अगम सनेह भरत रघुबर को

भरत और भगवान् राम का एक दूसरे
के प्रति संक्रमित प्रेम किसी के लिए भी
शब्दों में व्यक्त करना सम्भव नहीं।
महाराज जनक इसको समझते हैं और
इसीलिये बरबस उनके मुख से यह
स्वीकारोक्ति हुई है
“भरत महामहिमा सुनु रानी
जानहिं राम न सकहिं बखानी”

यह महामहिमा और कुछ नहीं,वरन्
निष्काम और विशुद्ध स्नेह ही तो है।

बटवृक्ष की छाया में जहाँ पर्णकुटी बनी
है, इसके आसपास सघन झाड़ी है।
लक्ष्मण जी,भरत को निषाद के साथ
नहीं देख पाते ,किन्तु भरत जी मंगलमय
कुटीर देख लेते हैं
सखा समेत मनोहर जोटा
लखेउ न लखन सघन बन ओटा
भरत दीख प्रभु आश्रम पावन
सकल सुमंगल सदन सुहावन

सुखनिधानभगवान्सेवित प्रान्तर में
प्रवेश हुआ कि दुखदावानल शान्त हो
गया।मानो किसी योगी को परम तत्व
ही मिल गया।योगी का परम लक्ष्य प्राप्य
अर्थ सच्चिदानन्द सुखनिवास और
रमानिवासराम ही हैं
“करत प्रवेस मिटे दुख-दावा
जनु जोगी परमारथ पावा”
भरत ने सुरक्षा में आगे खड़े मुनिवेश में
लक्ष्मण को देखा ,जो कमर में बँधे हुए
वल्कल वस्त्र से तरकस कसे हाँथ में
वाण और धनुष को कन्धे पर रखे थे
“सीस जटा कटि मुनिपट बाँधे
तून कसे कर सरु धनु काँधे”
यज्ञवेदी पर नाना मुनिगण,साधुसन्त
और सीतासहित राम जी शोभायमान थे
“बेदी पर मुनि साधु समाजू
सीय सहित राजत रघुराजू”
जटिल वल्कल वस्त्र में सीताराम ऐसे कि
श्याम सुन्दर”रति-काम “ही मुनि वेश में
शोभा पा रहे हों
“बलकल बसन जटिल तनु श्यामा
जनु मुनि बेस कीन्ह रति कामा “
मुनिमण्डली के बीच श्रीसीतारामजी
की शोभा ऐसी थी कि ज्ञानसभा में मानो
भक्ति-सच्चिदानन्द विराजे हों
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु
ग्यान सभा जनुतनु धरे भगति सच्चिदानंदु

इधर भरत जी शत्रुघ्नलाल के साथ सुख
मग्न होकर दुख-शोक द्वन्द्व ही भूल गए
“सानुज सखा समेत मगन मन
बिसरे हरष सोक सुख दुख गन”
अगम प्रेम की विवश अवश अवस्था
ऐसी हो गई है कि वियोगाग्निज्वाला से
जलते हुए भरत जी ने “पाहि पाहि”
का आर्तनाद किया है।प्रभु चरणों में ऐसे
धड़ाम हुए मानो कोई डण्डा गिर पड़ा हो

नारायण!डण्डा अचेचन अचितवत् होता
है,और इसी गति को प्राप्त, भरतजी तो
लगता है,अचेत हो गए हैं
“पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं
भूतल परे लकुट की नाईं”

लक्ष्मण को विश्वास हुआ कि ऐसी प्रेम
विह्वलता में भरत ही हैं, जो दण्डवत्
प्रणाम कर रहे हैं
” बचन सप्रेम लखन पहिचाने
करत प्रनामु भरत जिय जाने “पृष्ठभाग
में भरत जैसे भाई का स्नेहभाव आगे की
ओर सेव्य प्रभु राम की सेवा का भाव
कि पहचानने पर भी न मिल पा रहे न ही
न मिलने का त्याग ही कर पा रहे हैं
” सुकवि लखन मन की गति भनई
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई “
फिर भी सेवा-भार भारी पड़ रहा जैसे
हवा में पतंग उड़ाता खिलाड़ी पतंग को
खींच रहा है, लेकिन वह बड़ी मन्द गति
से नीचे उतर रही हो
“रहे राखि सेवा पर भारू
चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू”
लक्ष्मण से रहा नहीं गया और श्रीरामजी
से कह दिया, यह भरत प्रणाम कर रहे हैं
” कहत सप्रेम नाइ महि माथा
भरत प्रनाम करत रघुनाथा “

अब श्रीराम जी भी प्रेमविह्वल दशा को
प्राप्त होकर उठ खड़े हुए भरत को उठाने
और ऐसी विकलता कि वस्त्र, धनुष, तीर
तूणीर सभी कुछ कोई किधर कोई किधर
गिर रहा, ज्ञान ही नहीं।
“समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव “
राम में प्रेम की अधीरता अद्भुत! आश्चर्य!
“उठे राम सुनि प्रेम अधीरा
कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा”

उपस्थित सभी लोग अपने को ही भुला
बैठे जब भरत को उठाकर भगवान्
ने गले से लगा लिया
“बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि
अपान “यह भक्त-भगवान् प्रेमी-प्रेम का
का मिलन किसी के लिये भी अवर्णनीय
हो गया-मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी
कविकुल अगम करम मन बानी।

ऐसी अकथ प्रेमपरिपूर्णता दोनों में है
कि दोनों मन-बुद्धि-चित्ताहंकार अन्तः
इन्द्रियों को भी भूल गये
“परम प्रेम पूरन दोउ भाई
मन बुधि चित अहमिति बिसराई”
और जब न मन न बुद्धि न चित्त और न
ही अहंकार शेष रहा, तभी विशेष और
“गुणातीत” अवस्था हो गई प्रेम की।
इसीलिए यह “प्रेम वर्णनातीत”

श्रीरामजी और भरत में कौन मूर्ति और
कौन उसकी छाया? निर्णय कर पाना
असम्भव।
कौन मूल-प्रति और नारायण! कौन
छायाप्रति/फोटोस्टेट, किसी भी कवि
विद्वान् की बुद्धि के बाहर
” कहहु सुप्रेम प्रकट को करई
केहि छाया कबि मति अनुसरई “
दोनों ही मूलप्रति।
कवि को अर्थ-शब्द और नट को ताल
लय का आधार होता है। लेकिन यहाँ
तो ऐसी स्थिति है कि राम-भरत जी के
प्रेम में कौन”आधार” और कौन “आधेय”
यह निर्णय करना असम्भव हो गया है।

जब दोनों में आधार का निर्णय न हो
तब निराधार होकर कवि कैसे वर्णन
करने में समर्थ हो बेचारा।
इसीलिये ऐसे भगवान् और भक्त का
प्रेमवर्णन किसी के लिये भी अगम।

यहाँ तक कि ऐसे अगम-अकथ प्रेम तक
ब्रह्मा-विष्णु-महेश का भी मन नहीं जा
सकता, औरों की बात ही और

” जहँ न जाइ मन बिधि हरि हर को
अगम सनेह भरत रघुबर को”

गुरः शरणम् हरिः शरणम् ।

भरत पयोधि गँभीर

नारायण! भरत के नेत्रों से अश्रु जल की
सरिता बह चली जब उन्होंने बहुत दूर
से ही प्रभुसेवित स्थल को देखा

साथ में निषादराज गुह का भाई मार्ग
दर्शन करते आगे चल रहा है।
चले भरत जहँ सिय रघुराई।
साथ निषादनाथु लधु भाई।।

प्रेम ऐसा प्रवहमान है कि माता की करनी
पर संकोच होता है, अनेक कुतर्क संशय
की लहरें प्रेमनदी-प्रवाह में पर्वताकार
होकर अवरोध जैसी हो जाती हैं।
सोचते हैं कि रामलक्ष्मण कहीं मेरे आने
का समाचार जान अन्यत्र तो नहीं चले
जायेंगे।
समुझि मातु करतब सकुचाहीं।
करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
रामलखन सिय सुनि मम नाऊँ।
उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाउँ।।

लेकिन संशय का समाधान भी स्वयं ही
सोचते हैं कि यदि माता के निर्णय पक्ष
में मानकर भगवान् कुछ भला-बुरा ही
कहेंगे तो वह कम ही होगा।प्रभु सर्वज्ञ
अकारण करुणावरुणालय हैं मेरी गति
अपनी ओर देख कर पापों,अवगुणों को
क्षमा कर देंगे।
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं
सो थोर।अघ अवगुन छमि आदरहिं
समुझि आपनी ओर।

करुणासागर के प्रति ऐसा समर्पण है कि
जान जाते हैं कि सेवक जान मेरे दोषों
का परिहार करेंगे प्रभु। दास के दोष मान
सुस्वामी क्षमा करेंगे। उनकी तो बात ही
छोड़िये मैं तो उनके चरणस्पर्शसुख पाने
वाली अचेतन “पनही “के शरणागत हूँ
मोरें सरन रामहि की पनहीं।
राम सुस्वामि दोसु सब जनहीं।
भरत प्रेम का चरम सुख ले रहे हैं
राम का कृपालु स्वभाव जान प्रेम से
ऐसे सराबोर हैं कि जैसे प्रेममदिरा पीकर
प्रेममदमत्त होने से पैर कहीं के कहीं पड़
रहे हैं -प्रेममद छाके पग परत कहाँ के
कहाँ। ” जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ
तब पथ परत उताइल पाऊँ।”

और प्रेम ऐसी पराकाष्ठा पर कि भरत
को एकटक निहारता हुआ निषाद लघु
भ्राता भी प्रेममग्न विस्मृत शरीरसंसार हो
मानो अपनी देहदशा ही भूल गया
देखि भरत कर सोचु सनेहू।
भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।

उधर भगवान् चित्रकूट में जहाँ बिराजे हैं
उस पर्वत को देख कर भरत की दशा
ऐसी कि जैसे भूखे को अन्न मिल गया
” भरत दीख बन सैल समाजू।
मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।

श्रीराम ही जहाँ विराज जायें उस बन
की शोभा गोस्वामीजी की दृष्टि में कुछ
अद्भुत है।
छः प्रकार की ईतियों अतिवृष्टि ,अनावृष्टि
शलभ(टिड्डीदल),मूषक,पक्षी और शत्रु
राजा का नगर घेरना ,इत्यादि संकटों से
वनप्रान्तर मुक्त हो गया।
“अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः खगाः
अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः मताः”

कहीं किसी प्रकार का कोई भी भय नहीं
दैहिक-दैविक-भौतिक ताप और ग्रहों का
प्रतिकूल प्रभाव भी विनष्ट हो गया।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी।
त्रिविध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
भरत की प्रेमविह्वलता देख वन, सुन्दर
सुराज्य में बदल गया सभी सुखी हो गये
” जाइ सुराज सुदेस सुखारी
होहिं भरत गति तेहिं अनुहारी”
उधर भगवान् द्वारा पर्णकुटी बना कर
रहने का फल है कि सुराज्य पाकर वन्य
जीवरूपी प्रजा भी सुखी है।
राम बास बन संपति भ्राजा।
सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
सुन्दर सुहावने और अत्यन्त पवित्र
वन-राज्य के राजा “विवेक “और मन्त्री
“वैराग्य “बन बैठे हैं, क्योंकि राजा रूप में
स्वतः अभिषिक्त श्रीराम जो बैठे हैं।
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू।
बिपिन सुहावन पावन देसू।।

अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
आदि पाँच “यम” तथा शौच,सन्तोष,तप
स्वाध्याय,ईश्वर-प्रणिधान आदि पाँच
नियम मिलकर भट(योद्धा) बन गए हैं।

“पर्वत” राजधानी है।शान्ति-सुमति नाम
की दो रानियाँ भी शोभायमान हो गईं हैं
भट जम नियम सैल रजधानी।
सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
मोहरूपी राजा को सदलबल जीत कर
बिबेक रूपी राजा निष्कंटक राज्य कर
रहा है। सुन्दर सम्पदा सुखसंपति पूर्ण
काल आया, क्योंकि कालहुँ कर काला
सर्वकारणकारण भगवान् जो विराजे हैं।
“जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक
भुआलु।करत अकंटक राज पुँर सुख
संपदा सुकालु “
सभी परस्पर प्रतिद्वन्द्वी जीव-जन्तु बैर
भाव छोड़कर भगवान् की चतुरंगिणी
सेना बने हैं-
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा।
जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।
झरनों की आवाज मतवाले हाथियो की
तरह है, मानों अनेक प्रकार के नगाड़े
बज रहे हैं-
झरनि झरहिं मत्त गज गाजहिं।
मनहुँ निसान बिबिध बिधि बाजहिं।
चकई चक चातक शुक कोकिल अपनी
बोली से वन प्रान्तर को गुंजायमान किये
हैं, और मराल मुदित हो गए हैं।
चक चकोर चातक सुक पिक गन।
कूजत मंजु मराल मुदित मन।
भौरों का गुंजार जैसे मधुर गीत गा रहा
मोर नाच रहे हैं, मानो कि सुराज्य पाकर
ये भी सानन्द हैं।
अलिगन गावत नाचत मोरा।
जनु सुराज मंगल चहुँ ओरा।।
वृक्ष लता पता पुष्पित पल्लवित हैं।
क्योंकि सर्वत्र मंगल के मूल श्रीराम
बिराज गये हैं -“बेलि बिटप तृन सफल
सफूला।सब समाजु मुद मंगल मूला”
पाकर जामुन आम और तमाल वृक्षों के
मध्य एक “वटवृक्ष” शोभित है,जैसे कि
तिमिर में सूर्यमय ज्योति है, जिसे
ब्रह्मा ने सारा सौंदर्य जुटाकर बनाया हो
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।
पाकरि जंबु रसाल तमाला।।
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा।
मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी।
बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी। नीचे
यहीं प्रभुराम ने पर्णकुटी बनाई है , जो
मन्दाकिनी के तट पर है।
ए तरु सरित समीप गोसाईं।
रघुबर परनकुटी जहँ छाई।
तुलसी के पौधे भी लक्ष्मण और सीताजी
ने लगा रखे हैं।
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए।
कहुँ कहुँ सिय कहुँ लखन लगाए।।

बट की छाया में यज्ञवेदी बनी है, जिसे
जगदम्बा जानकी ने अपने करकमल से
सुन्दर रूप दिया है।
बटछाया बेदिका बनाई।
सिय निज पानि सरोज सुहाई।।

सनातन धर्म संस्कृति सदाचार की कैसी
मर्यादा है कि ,जाकी सहज साँस स्रुति
चारी ,वेद अनुगत पुराणों की कथा को
स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम सीता जी और
मुनियों सहित सुन रहे हैं
“जहाँ बैठि मुनिगन सहित
नित सिय राम सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब
आगम निगम पुरान।”
अब निषाद द्वारा इंगित वह वटवृक्ष देख
कर प्रेममूर्ति भरत अश्रुपात करने लगते
हैं -“सखा बचन सुनि बिटप निहारी
उमगे भरत बिलोचन बारी”

शत्रुघ्नलाल के साथ हाथ जोड़े दौड़ पड़े
हैं , जिनका प्रेम कहने में सरस्वती लजा
गईं। “करत प्रनाम चले दोउ भाई।
कहत प्रीति सारद सकुचाई “रामपद देख
ऐसे प्रसन्न हैं जैसै दरिद्र को पारस मणि
ही मिल गई-
हरषहिं निरखि राम पद अंका।
मानहुँ पारसु पायउ रंका।

प्रेम की ऐसी विस्मयपूर्ण दशा की प्रेमी
भरत सिर को धूलि में रखकर नेत्रों में
लगा लेते हैं जैसे कि वह धूल नहीं बल्कि
रघुनाथ जी ही मिले हों –
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं।
रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।

जड़ हो गए हैं जीवजन्तु भरत कीअकथ
कहानीक्ष देखकर।आकाश से पुष्पवर्षा
हुई है।सभी लोग ऐसे “प्रेमीप्रेम “और
“प्रेमास्पद “को देख प्रेम की सराहने लगे
हैं।भरत का ” विरह” मन्दराचल है।और
भरत जी स्वयं गंभीर समुद्र। मानो कि
कृपासिन्धु रघुनाथ जी ने मंथन करके
प्रेमनीर की अमृत-नदी बहा दी है और
जिसमें देवता और साधु स्नान कर रहे हैं

प्रेम अमिअ मन्दर बिरहु
” भरत पयोधि गँभीर “
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित
कृपासिन्धु रघुबीर।

।।गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।

अचर सचर चर अचर करत को

भगवान् और केवल भगवान् को ही
चाहने वाले भक्त एकाकार एकरस
अनन्तरूप आनन्दैकघन चिन्मय परम
प्रेमास्पद अमृतस्वरूप सर्वसुखकारी
और सीमातीत होते हैं।आत्माराम और
आत्मक्रीड भी हो जाते हैं
” मत्तः भवति स्तब्धः भवति आत्मरामः
भवति”
तात्पर्य यह कि जिन सन्तो भक्तों सेवकों
भगवदनुरागी जनों का अन्तःकरण ही
भगवान् स्वाकृष्ट कर लें अथवा चुरा लें
उनकी जगद् गति अवसित हो जायेगी।
“जगद् गति नष्ट तो भगवद् गति उदित”

नहि स्वात्मरामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति
इसीलिए ऐसे भरतादि सरीखे भक्त तो
नारद जी के मत में ऐसी भक्ति पा जाते
जो “परमप्रेमरूपा अमृतस्वरूपा च”
की सीमातीत श्रेणी है।सोचिये ,भरत
का मन-बुद्धि-चित्ताहंकार भगवान् में
चला गया और भगवद् रसैकघन होकर
ऐसी विस्मय दशा को प्राप्त हैं कि उन्हें
जो देखता है वह जड़वृक्षादि चेतन प्राणी
की तरह आनंद पा रहा और चेतन तो
भरत को जड़वत् निहारता है।

मुनि सिद्ध देवगण तक भरत की दशा
सिहाते हैं। राम नाम लेकर जब भरत
लम्बी साँस लेते हैं,तब वातावरण में प्रेम
ही प्रेम उमड़ पड़ता है।
वज्र और कठोर पत्थर जैसे जड़ का
हृदय चेतन की तरह द्रवित हो जाता है

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं।
दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।
जबहिं राम कहि लेहिं उसासा।
उमगत प्रेमु मनहुँ चहुँ पासा।

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पसाना।
पुरजन प्रेम न जाइ बखाना।।

स्रक् चन्दन बनितादिक भोगा।
देखि सरस विसमय सब लोगा।।

जितने जड़ वृक्षादि और जीव जन्तु रास्ते
में पड़े, वे परमप्रेमी अमृतवत् भरत को
देखकर सद्यः जीवन् मुक्ति पाकर मनुष्य
की तरह ही ” परम पद वैकुण्ठ” के ही
अधिकारी हो गये
जड़ चेतन मग जीव घनेरे ।
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ।
ते सब भए परम पद जोगू ।
भरत दरस मेटा भव रोगू ।।

और यहाँ बड़ी बात ये कि भक्त भरत
राममय तथा श्रीराम जी भरतमय हो
गए हैं । परस्पर भगवान् और भक्त एक
दूसरे का स्मरण कर रहे हैं।
यदि भक्त भगवान् मय हो गया तो उसमें
और भगवान् में अन्तर क्या?
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं।
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं।।
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता।
कस न होइ मगु मंगलदाता।।
सबसे बड़ी बात यह भी कि भक्त और
भगवान् का नाम स्मरण जो एक बार
कर ले तो वह भाग्यशाली जन भी तद्
वत् होकर किसी दूसरे को भी भवसिन्धु
से पार करा देने में समर्थ हो जाय –
बारक राम कहत जग जेऊ।
होत तरन तारन नर तेऊ।।
भरत जैसे भक्त की अवर्णनीय अवस्था
देख कर जड़वृक्षादि पशु-पक्षी भी प्रेम
से सराबोर हो गये।
देखि भरत गति अकथ अतीवा।
प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

आकाश से फूल बरसने लगते हैं।सिद्धों
साधकों में अनुराग उमड़ आता है।
सभी भरत के अद्वितीय परम प्रेम को
सराहने लगते हैं। क्योंकि यह तो कोई
ऐसा असाधारण अनन्य प्रेम है कि
जड़ जीव चेतन की तरह आनन्द की
अभिव्यक्ति करते हैं। और चेतन सिद्ध
मुनि गन्धर्वादि प्रेममूर्ति भरत को एकटक
देखते हुए वृक्ष की तरह जड़ बन गए।
भगवान् भरतादि सरीखे प्रेमी को अपना
कर ऐसी कृपा कर देते हैं कि कृपाप्राप्त
भक्त भी कृपालु बन जाता है।
राम कृपा नहिं करहिं तसि।
जसि निष्केवल प्रेम।
इसलिये गोस्वामी जी ने कहा कि यदि
भरत जैसा प्रेमी पैदा न होता तो प्रभु
को छोड़ कर कौन जड़ को चेतन एवं
चेतन को जड़ बना सकता था।
भरतदर्शन भी कृपालु प्रभु की तरह बन
गया।भगवान् जैसे ही इन्हे देखकर
चराचरात्मक जगत् उलट-पुलट
जा रहा है।

होत न भूतल भाउ भाउ भरत को
“अचर सचर चर अचर करत को”


गुरुः शरणम् हरिः शरणम् ।

भरत हृदय अति प्रेमु

राम-प्रेम-विरह-व्याकुल भरत जैसे-जैसे
चित्रकूट के समीप आते जा रहे हैं, अति
आनन्द उमगि अनुरागा होते जा रहे हैं।

“अति” प्रेम अनुराग आनन्द, केवल
भगवान् और भक्त के लिये ही प्रयोग हो
सकता है । इनके अतिरिक्त किसी दूसरे
के लिए नहीं । इसलिये कि इसमें किसी
अन्य का प्रवेश नहीं।
रावण वध के बाद जब प्रभु अयोध्या आकर विराजते हैं,तब सभी उपस्थित
लोकों से अनेक रामरूप धर कर एक
साथ सबके गले लगे हैं।
सर्वशक्तिमान सर्वकारणकारण जो हैं।
अति शब्द तो भगवान्-भक्त के मध्य ही
संगत है। क्योंकि “अति” अतीन्द्रिय शक्ति
वालों का विपरिणाम है।
लंका में माँ सीता द्वारा हनुमानजी को
रामप्रिय जानने पर, करहुँ बहुत रघुनायक
छोहू काआशीष मिलते ही पवनपुत्रप्रेम में
डूब कर “अति”आनन्दानुभूति करते हैं
” करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना” वानरराज
सुग्रीव भी इसी”अति” प्रेमदशा के शिकार
“मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा”
हनुमानजी महाराज भगवान् के चरणों
में प्रेममग्न ऐसे पड़े हैं, कि प्रभुचरणों को
छोड़ना ही नहीं चाहते। रुद्रावतार हैं जो
उमाशंकर तो इस स्वरूप को देख कर
इसी “अति” प्रेम में डूबे।
“रुद्र देह तजि नेह बस बानर भे हनुमान्”
प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा

इसके पहले की घटना भी “अतिप्रेम”की
साक्षी है, जब
लंका में हनुमान् जी द्वारा रघुनाथ जी का
सन्देश सुनकर जगदम्बा जानकी ऐसी
ही “अति” प्रेम मग्न (प्रेम में डूबी) दशा
को प्राप्त हैं,कि शरीर तक की सुध नहीं
प्रभु सन्देसु सुनत बैदही
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही

नारायण !क्या कहें रावण का भेजा दूत
बेचारा “शुक” कपटकौटिल्य भूल गया।
प्रेममूर्ति श्रीरामलक्ष्मण के दर्शन मात्र से
प्रेमी बन गया।प्रभुगुणों का कायल और
विक्षिप्त होकर प्राकृतिक देव-दुराव ही
विस्मृत कर बैठा-
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ

इधर चित्रकूट में अतिप्रेमी भगवान्,भरत
के शील-गुण-स्वभाव को कहते हुए इसी
तरह प्रेमसमुद्र में मग्न(डूबे)हैं –
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

देवताओं द्वारा भरत को धर्मधुरीण और
और कविसमूहों द्वारा अवर्णनीय चरित्र
वाला कहा गया।राम ही जान सकते हैं
अतिप्रेमी भरत को।देवताओं की इस
बात पर सीतारामलक्ष्मण “अति” सुखी
अवस्था को प्राप्त हैं-
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी
अति सुख लहेउ न जाइ बखानी

भगवद् भक्त नारद जी फिरत सनेह मगन
सुख अपने नामप्रताप सोच नहिं सपने
होकर भावभक्तिविभोर हो जाते हैं और
अपने “भक्तिसूत्र “मे वे भी इस
“अतिप्रेम” दशाको भगवान् भक्त के
मध्य ही संगत मानते हैं,क्योंकि भक्त
अपने किसी भी कार्य से भगवान् के
सुख में ही सुखानुभूति करता है
तदतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं।
” अंशी-अंश ” तभी तक अलग जब तक
नारद से भेंट न हो।
“तत्-सुख-सुखित्वम् “
संसार-सुख-सुखित्वम् नहीं

चित्रकूट की जिस धरती पर धरतीपुत्री
सहित श्री रामजी बिराजे हैं,वहाँ पर्वत
की शोभा का कहना ही क्या

ऐसा लगता है कि तपस्वीजनों ने अपनी
सारी तपस्याऔर नियम धर्म के पालन
का सम्पूर्ण फल ही पा लिया है।
भरत जी का हृदय “अतिप्रेम ” में डूब
जाता है। गोस्वामी जी बोल पड़ते हैं
तापस तप फलु पाइ जिमि
सुखी सिराने नेमु
राम सैल सोभा निरखि
“भरत हृदय अति प्रेमु”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

कबि-कुल अगम भरत-गुन-गाथा

श्रीरामलीला के अद्वितीय पात्र और
त्रपा(लज्जा) की मूर्ति श्रीभरत के
गुणों का वर्णन अनेकानेक सहृदय
धुरीणों काव्य-कला-शिल्प-प्रवीणों
रस-सिद्ध-कवि-वृद्धों के लिए अत्यंत
कठिन है।

भरत अयोध्या का राजपद मिलने
की बात से व्यथित हैं।अत्यंत-अत्यंत
लज्जालु हैं ,क्योंकि कि यह राजपद
तो श्रीराम का है।
जो वस्तु-पद-पदार्थ अपने नहीं वे
निश्चित रूप से सपने भी नहीं।
भरत तो श्रीराम-पद के अधिकारी हैं।
उन्हे मद है तो श्रीरामपदों (चरणों)का।
वह अपने को श्रीराम का सेवक मानते
हैं।अभिमानशून्य उन्हें अभिमान भी है
तो राम के सेवक होने का –
यह अभिमान जाय जनि भोरे
मैं सेवक रघुपति पति मोरे
अब एक विशेष बात यह है कि
जब राजपद श्रीराम का तब त्याग कैसा
लेकिन यह रहा सूक्ष्म विचार।

यदि लौकिक रीति से सोचें तो राम और
लक्ष्मण के वन जाने पर भरत जी को
राजपदसँभालना चाहिए।
लेकिन भरत तो रामपद के अनुरागी हैं
रामचरणों के लिये मतवाले भरत को
श्रीराम के एक नहीं दो-दो पद(चरण)
मिलने हैं, तब एक पद अच्छा कि दो
पद? कहते हैं भरत –
समुझि मोरि करतूति कुलु
प्रभु महिमा जिय जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद
जग बिधि बंचित होइ।
और भी कहते हैं कि ऐसी संपत्ति
सुखपूर्ण भवन मित्र पिता-माता सब
आग में जल कर भस्मसात् हो जाय
जो “रामपद”के सामने राजपद की इच्छा
करै –
जरउ सो संपति सदन सुख
सुहृद मातु पितु भाइ
सनमुख होत जो रामपद
करै न सहस सहाइ
और इसलिये कहा गया कि भरत जी के
गुणों को जानना और वर्णन करने का
सामर्थ्य केवल रामजी में है। कोई भी
कवि-कुल-निकर कर नहीं सकता भरत
के गुणों का वर्णन –

को जानइ तुम बिनु रघुनाथा
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्

भरत सरिस को राम सनेही

भरत के समान सेवक भक्त यदि कोई
नहीं तो भगवान् के समान कोई सेव्य भी
नहीं। और बड़ी बात ये है कि प्रपन्न भक्त
यदि सेव्य भगवान् के अधीन है तो भक्त
सेवक भी उसी तरह।
राम अपने भक्त सेवक साधु सन्त हित
हेतु ही अवतरित हैं
विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निरमित तनु माया
गुन गो पार। देखिए –

गोरूप धरती के उद्धार हेतु वाराह,तो
“सर्वं खलु इदं ब्रह्म” सर्वत्र भगवत् सत्ता
सिद्धि के लिए खम्भे से वरानुकूल और
वधानुकूल नरसिंह रूप धारे ।

द्वापर में शक्ति-शक्तिमान् अभेद और
और “रसो वै सः” तथा अनन्यशरणागति
के गहरे-प्रेम-पीयूष में उतारने के लिये
कृष्णावतार धारा

त्रेता में पुत्र पिता माता भ्राता राजा-प्रजा
की मर्यादा स्थापना हेतु और सतत नाम
स्मरण की महिमा से ऊँच नीच जाति
वर्ग भेद भ्रान्ति मिटते ही सर्वोद्धार के
स्वकीय संकल्प की पूर्णता सिद्ध की।

यदि भक्त पर रीझ कर लौटे
तो इन्द्रादि देवों पर विपत्ति पड़ेगी
अधीर इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति से राम
भरत मिलन में बाधा डालने का आग्रह
होने पर, गुरु ने इन्द्र को समझाया है

बेटा! इन्द्र किसी को भी भक्त-भगवान्
के बीच नहीं पड़ना चाहिए।क्योंकि इससे
तुम्हारी समस्या सुलझेगी नहीं बल्कि
उलझ सकती है।
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भरत
अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन
दिन सोक समाज।।

सेवक से बैर का भाव सेव्य के प्रति
विरोध होगा-मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैरु बैरु अधिकाई।

यद्यपि भगवान् तो सदा एकसमान एक
रस सच्चिदानन्द घन हैं, उनका किसी के
प्रति राग-रोष रखने और पाप-पुण्य को
ग्रहण करने का स्वभाव ही नहीं है।
फिर भी संसार अपने भावरुचि के
अनुसार कर्म-स्वातन्त्र्य के अधीन है।
कर्मानुकूल परिणाम भी सिद्ध है-

जद्यपि सम नहिं राग न रोसू
गहहिं न पाप पूनु गुन दोसू
करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फल चाखा

फिर भी लोग रसना नेत्र कर्णादि इन्द्रियों
से शुद्ध-अशुद्ध आहार लेते हैं,क्योंकि
सभी के हृदय , भक्त-अभक्तरूप हैंं।
दो तरह के प्राणी सृष्ट कराये प्रभु ने।
एक देव और असुर –
द्वौ इमौ भूतसर्गौ लोकस्मिन्
दैवः आसुर एवच।।
गोस्वामीजी ने समर्थन किया है
“तदपि करहिं सम बिसम अहारा
भक्त अभक्त हृदय अनुसारा”

ऐसे, भगवान् भक्त के प्रेमबस निर्गुण
होकर सगुण बन जाते हैं। जबकि वे
निर्लेप अमानी और सदैकरस ही हैं –

अगुन अलेप अमान एकरस
राम सगुन भए भगत प्रेमबस

वे तो सेवक अभिलाष पूर्ति के लिये
प्रसिद्ध हैं। “प्रभु का मान भले टल जाये
भक्त का मान न टलते देखा”
अर्जुन के लिये अपना संकल्प तोड़ना
इन्हीं भक्तप्रिय भगवान् का कार्य था।

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी
प्रतिज्ञा क्या?
नारायण ! ये तो परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम् ,धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे है।

जब जब होइ धरम कै हानी
बाढ़हि अधम असुर अभिमानी
तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा
हरहिं सकल सज्जन भव-पीरा

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।तदा तदावतीर्याहं करिष्यामि
अरिसंक्षयम्। ही इनकी संकल्पलीला।

ऐसा संकल्प और वह भी “उनका”
संकल्प वस्तुतः “उन्ही” का पूर्ण होता है
इसलिये कि नानात्मक जगत् में “वही”
सभी रूपों में भासते हैं।

मायापति के साथ माया मलिन बुद्धि का
संकेत है।इन्द्र जो ठहरा “भोगी”
भक्त इसके ठीक विपरीत “योगी”
परदुःखकातर भक्त-भगवान् सभी के
लिये मंगल ही करनेवाले हैं।
दोनों से डरना ठीक नही –
अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई
राम भगत पर हित निरत
परदुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल।।

अब भरत और राम स्वभाव जानकर कि
ये तो सभी के कल्याण कर्ता प्रसिद्ध हैं
इन्द्र का दुख समाप्त हुआ।फूलों की वर्षा
और भरत की सराहना होने लगी –

सुनि सुरबर सुरगुरु बरबानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ
लगे सराहन भरत सुभाऊ

और देखिये, श्रीराम-भरत मिलन होने
पर लौट चलने का आग्रह अवश्य
भरत द्वारा होता है। किन्तु
भगवान् अपने भक्त की प्रसन्नता चाहते
हैं, तो भक्त भगवान् की।
क्योंकि दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक
हैं। “प्रभु” होने से सर्वत्र व्याप्त-सत्ता
और सार्वत्रिक दृष्टि वाले भगवान् ही
उचित निर्णय ले सकते हैं।अतः वह भक्त

जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुणासागर कीजिअ सोई।।
कहकर अयोध्या का “एकपद” राजपद
त्याग कर सर्वसमर्थ श्रीराम के दो-दो
पदों में अनुरक्ति व्यक्त करता है। और
देवगुरु बृहस्पति ने भरत
जैसे विरागी और केवल रामानुरागी के
प्रति अपराध करने पर रामक्रोध में जल
कर नष्ट होने का भी संकेत किया है
जो अपराधु भगत कर करई ।
राम रोष पावक सो जरई ।। अनन्तर
इन्द्र को भरत का रामस्नेह और राम का
भरतस्नेह समझाया गया

जगु जप राम राम जपु जेही

“भरत सरिस को राम सनेही”
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।