गोविन्ददेव मन्दिर प्रांगण रस बरसत बरबस पान करो।
अग्रमलूक पीठ गुरू गावत भगतमाल गुण हृदय धरो।।
दो हजार इक्यासी संवत विजयादशमी विजयोत्सव।
अग्रपीठ अध्यक्ष प्रतिष्ठित सद्गुर हमरे कृपा-प्रसव।।
आय विराजे रैवासा महि महिमाधिष्ठित धन्य धरा।
धरती गुंजित वायु सुपुंजित नभमण्डल आकाश परा।।
श्रीभक्तमालमाला पहिरि प्रिया-लाल रस मगन भयो।
नाचत गावत मोद भरत भरि शब्द अर्थ करि नयो-नयो।।
जनम पाय रस,बहत जहाँ ते सो रस रासबिहारि-बिहारिन बिच।
भक्त अनन्द पान रस हरषैं डूबैं होय मार्ग महि किच।।
नाम रूप कौ जगत विसमरत श्रीगुरुकृपा पाय जबहीं।
नामरूप श्रीहरि नारायण रामकृष्ण सुमिरत तबहीं।।
भक्त भगति भगवान् भागवत गुरु गुन गान होन लागत।
कोटि जनम कृत करम कुण्डली जरत जीव जब शरणागत।
विधि निषेध करि अचर आचरन वेदविहित होतै तन तैं।
अन्तः शुद्धि जात तेहि छन छिन गुण अवगुण सब मन तैं।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
http://shishirchandrablog.in