मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई

मिला मानव का तन चाहना ना गई।

मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई।।



व्यासदेव भगवान् ने किया नहीं है भेद।
नारायण गुरु एक हैं तत्व अभेद अभेद।।

नारायण गुरु एक हैं जान सको जो जान।
नहीं जान पाए अगर पा न सके कुछ मान।।

गुरू एक हरि एक हैं मत देखो तुम भेद।
भेद देखते हो पुनः परौ धरनि कै छेद।।


सीख मिली संस्कृत भये गुरू कृपा ते जान।

जौ रहस्य यह ना खुला जान न पाए जान।।


गुरु आचरण गुरू चरण पकड़ सकौ जो पकड़।

नहीं पकड़ पाए अगर जा न सकैगी अकड़।।


जा न सकैगी अकड़ और होगा वर्तित संसार।

मिला मनुज तन गिर पड़ो गुरु चरणों में सार।।

“अष्टावक्र” गुरू भयौ चौबिस गुरू बनाय।
लख चौरासी “निगुरु” पड़ जागै सोवै खाय।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।।
https://shishirchandrablog.in

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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