ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
जब जानै तो प्रकटे काशी।।
जीवन मुक्त सदा सन्यासी।
फिरै न फेरा करम विनाशी।।
गुरू कृपा कर मुक्तिप्रकाशी।
आनँद मग्न सदा सुखराशी।।
मातृ शरीर फिरत माया सी।
देखि रहै मन मनहिं उदासी।।
मानै जब सब अपनी मा सी।
मोह अविद्या तबहिं तरासी।।
साधु सन्त चरणन गिरि जासी।
होवै तब सुख शिवगिरिजासी।।
ऐसी दृष्टि देत गुरु काशी।
अविगत गति गत माया नासी।।
जय करुणाविग्रह की राशी।
गुरुपदकमल दिव्य प्रतिभासी।।
मनहिं ध्यानरत गुरु गंगा सी।
देवि सरस्वति युति यमुना सी।।
गुरु पद अम्बुज रति सुखराशी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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