साधक स्वतन्त्र नहीं, स्वतन्त्र साधक नहीं

यद् यद् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरो जनः।
सः यत् प्रमाणं कुरुते लोकः तद् अनुवर्तते।


जिन जिन श्रेष्ठ लोगों रामकृष्ण आदि ने आचरण किया,वही वही इतर(अन्य)जन भी,यदि व्यवहार करते हैं,तो वही धर्म का मानदण्ड(प्रमाण)है अतः मनुष्य लोक(लोग) वही अनुवर्तन करें।
भगवान् श्रीराम ने जो मानव शरीर धर कर मानव बनने की मर्यादा(सीमा) बताई, वह धर्म है। आचरण की शिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षा है।
वेद शास्त्र सन्त सम्मत मत स्वीकार करके आचरण(धर्म) में लाकर ही,मनुष्य बना जा सकता है। मनमाना स्वच्छन्द आचरण करके कदापि नहीं। अन्यथा यह मानव शरीर असाधन होगा, साधना साधन नहीं। और वेदशास्त्र सन्त साधु प्रतिपादित मार्ग पर चलने की, हम सभी जीवों की परतन्त्रता है।
भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य ही साधन साधना और धर्म मार्ग है।स्वतन्त्र स्वच्छन्द विषय भोग में जाने पर इस भगवत्प्रदत्त मानव शरीर का प्रयोजन नष्ट हो जायेगा।
इसलिये, वेद गुरु सन्त मत में असन्देह विश्वास(श्रद्धा) करते हुए भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य में रहकर ही धर्म(साधन) बनेगा।अन्यथा इससे इतर- शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध जैसे विषयों की लालसा और मान पूजा बड़ाई ने तो हमें अपने मानवीय- करुणा दया त्याग सौशील्य वात्सल्य सन्तोष आदि विभिन्न मानव गुणों से बहुत दूर कर दिया है।
अतः नारायण!साधक(धर्मपथ प्रवृत्त) स्वतन्त्र नहीं होता है।और स्वतन्त्र, साधक नहीं होता।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई

मिला मानव का तन चाहना ना गई।

मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई।।



व्यासदेव भगवान् ने किया नहीं है भेद।
नारायण गुरु एक हैं तत्व अभेद अभेद।।

नारायण गुरु एक हैं जान सको जो जान।
नहीं जान पाए अगर पा न सके कुछ मान।।

गुरू एक हरि एक हैं मत देखो तुम भेद।
भेद देखते हो पुनः परौ धरनि कै छेद।।


सीख मिली संस्कृत भये गुरू कृपा ते जान।

जौ रहस्य यह ना खुला जान न पाए जान।।


गुरु आचरण गुरू चरण पकड़ सकौ जो पकड़।

नहीं पकड़ पाए अगर जा न सकैगी अकड़।।


जा न सकैगी अकड़ और होगा वर्तित संसार।

मिला मनुज तन गिर पड़ो गुरु चरणों में सार।।

“अष्टावक्र” गुरू भयौ चौबिस गुरू बनाय।
लख चौरासी “निगुरु” पड़ जागै सोवै खाय।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।।
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चले रहै अभिचार 

सारे भौतिक जगत् का आधार ही आध्यात्मिक है।
भौतिक संगत तभी तक है, जब तक आत्मिक। संगत
असंगत विसंगत सुसंगत कुसंगत/गति सभी में गमन या संसार चलनशीलता है,इसी को हमारी तुच्छ बुद्धि , भौतिकता माया अविद्या मानती है।
इस माया अविद्या संसार के आकर्षण से प्रभावित होकर नाना कल्प बीत चुके हैं।अनुभव तब होगा,जब कोई इसका अनुभोक्ता अनुभव करा दे। परिवर्तन संसारासक्ति पूर्वक नाना शरीर धारण करना इस शरीर का लक्ष्य ही नहीं है।
नाना ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के अनुकूलतम संघात इस देह से पृथक् आत्म तत्व है, इसी बात को जाने समझे लोगों और उनकी परा वाणियों से स्वयं में आत्मत्व का अनुभव ऐदं प्राथम्येन इस पिण्ड में रहने का प्रयोजन है।
दूसरा भी परम चरम प्रयोजन है, पुनः कर्म वासनाजनित शरीर न धारण करना।
अतः भौतिक और आध्यात्मिक जगत् को आधार आधेय समझ कर एक साथ समझ कर आगे चलना होगा।नहीं तो-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्रावित् ,में संगति नहीं बनेगी। संगत गति सत्संग में,रहो भले दिन चार।या पाले संसार के चले रहै अभिचार।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जीव अविनाशी

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
जब जानै तो प्रकटे काशी।।

जीवन मुक्त सदा सन्यासी।
फिरै न फेरा करम विनाशी।।

गुरू कृपा कर मुक्तिप्रकाशी।
आनँद मग्न सदा सुखराशी।।

मातृ शरीर फिरत माया सी।
देखि रहै मन मनहिं उदासी।।

मानै जब सब अपनी मा सी।
मोह अविद्या तबहिं तरासी।।

साधु सन्त चरणन गिरि जासी।
होवै तब सुख शिवगिरिजासी।।

ऐसी दृष्टि देत गुरु काशी।
अविगत गति गत माया नासी।।

जय करुणाविग्रह की राशी।
गुरुपदकमल दिव्य प्रतिभासी।।

मनहिं ध्यानरत गुरु गंगा सी।
देवि सरस्वति युति यमुना सी।।

गुरु पद अम्बुज रति सुखराशी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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