स्वतन्त्र साधक नहीं होता



चर्म चक्षुओं से दृश्यमान दीप,जब सद्गुरु कृपालेशतः अतीन्द्रिय नेत्रगत हो तो संसार में खोया मैं प्रकाशित हो जाय।
मानव जीवन में भगवान् और शास्त्रसन्त ही अतीन्द्रिय नेत्र देते हैं। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्, कहकर भगवान् ने अर्जुन को अतीन्द्रिय नेत्र दिये थे।
और तब अर्जुन की मोहरात्रि विगत हो गई थी,और प्रकाश हुआ, अनुभूति हुई अन्तःकरण परिशुद्ध होकर बोल उठा,नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादान् मया अच्युत।
और नहीं तो जगत् जितना मिला है, उससे कहीं और अधिक कामिनी कांचन पद प्रतिष्ठा के लोभ मोह के अँधेरे को छोड़ता नहीं।
इसलिये सन्तशास्त्र का अवलम्ब लेकर करुणा दया क्षमा त्यागादि आनन्दमय स्वतः प्राप्त भगवदीय गुणों को जान पहचान कर आत्मसात् करना चाहिए।
भगवदीय गुण कहीं गए नहीं हैं,आत्म विस्मृति और संसार के चाकचिक्य चकाचौंध के दृष्टि भ्रम की सतत स्मृति में खो जैसे,गए हैं।
मनुष्य जीवन में आत्मप्रकाश ही त्रिगुणा माया का बन्ध तोड़ सकता है।
श्रीरामनामादि का कहीं भी किसी भी काल में देश में अपने हृद्देश में स्मरण श्रवण मात्र का साधन आत्मदीप के प्रकाशमान रूप को दिखा देगा।
जाकर नाम सुनत शुभ होई
मोरे गृह आवा प्रभु सोई।।

हम शारीर इन्द्रियों के तन्त्र में उलझ कर फिर एक बार भगवान् की कृपा करुणा को ठुकरा देंगे, यदि इनके परतन्त्र हो गए तो। अतः श्रुत शास्त्र सन्त का पारतन्त्र्य ग्रहण कर,आत्मदीप का दर्शन करना ही प्रकाश पर्व के आलोक का स्वारस्य है।
भैया, विषयी साधक सिद्ध सयाने में, साधक की अवस्था में तो जाना ही पड़ेगा, आगे की अवस्था तत् तन्मयता से स्वतः मिलेगी। लेकिन याद रहे, शास्त्र सन्त पारतन्त्र्य तो स्वीकारना ही होगा।
नारायण,स्मरण रहे संसाररण में-

साधक स्वतन्त्र नहीं होता और स्वतन्त्र साधक नहीं होता


हरिगुरुसन्तः शरणम्


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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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