हरिश्शरणम्
विषयाकर्षण का विकर्षण और किसी साधन से उतना सम्भव नहीं, जितना रामकृष्ण नारायण हरि नामों से हुआ, हो रहा और होगा।
विषयाकारवृत्ति नाना शरीर गत जन्म जन्मान्तर सिद्ध है।
अनेकजन्मार्जित जगद् वासनाक्षय का सरल साधन भगवन्नाम ही सन्त शास्त्र माने हैं। सन्त सबै गुरुदेव हैं, यह रसिकन की रीति।
दत्तात्रेय भगवान् ने तो सृष्टि के नाना उपादानों को गुरुरूप मान कर जो गुरूपसत्ति की गरिमा का उत्कर्ष दर्शन कराया,वह सनातन का निकष निदर्शन है। सोचिये जिन सन्तों की भगवदाकार चित्तवृत्ति है,वही तो विषयाकारवृत्ति को क्षणमात्र में हटा सकते हैं।
गुरुकृपावलम्बावलम्बन ही नेत्रों से निरन्तर प्रविशमान जगद् का बन्ध करेगा। कानों से श्रूयमाण वाग्वैखरीझरी के झर झर प्रपात का स्रोत ही सुखा देगा।
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां का प्रवर्तन तो सन्तसद्गुरु सज्जन संग ही साधेगा। संग्रहपरिग्रह से दूर सन्तों की कृपा करुणा का प्रवाह, बहा देगा संसारविषय विष की सरिता को।राम नाम
हरि नाम कृष्ण नाम नारायण नाम की बहती अजस्र निर्मल धारा जो देवर्षि की कलकल अजस्र वीणा के नाद को अनुसरती चली चल रही और अनन्त तक चलती रहने वाली है,वह तो किसी किसी भाग्यशाली को अवश्य ही, हृदयंगम होकर तारती जगदुद्धारती चल रही है,सभी को नहीं। अब देखिये कि क्यों नहीं होता विषयों से विराग।
इसलिये कि जगद् राग भोग भी उन्हीं भगवान् का लीला विलास है।
यह लीला विलास अनन्त काल से एक प्रहेलिकावत् बना हुआ है।
शास्त्रसन्त इस लीला को भगवान् की दुर्धर्ष माया का विस्तार मानें हैं।
समझ की बात महाकवि कालिदास ने इस सन्दर्भ में रखी,जब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति रघुवंश में रघुवंशी राजाओं
को यौवने विषयैषिणां कहा।
उन्होंने रघुवंशी राजाओं को शैशव में ही सर्वविद्याभ्यासी, यौवन में सृष्टि विस्तार मात्र के लिए विषमविषयसेवी,वृध्दावस्था में मुनिवृत्ति से रहनेवाले और अन्त में योगविधि से शरीरान्त करने वाले बता कर
सनातन धर्म की सनातन प्रवहमान मर्यादा प्रस्तुत की है।
शैशवेभ्यस्तविद्यानां,यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां,योगेनान्ते तनुत्यजाम्। एवम्भूतानां रघूणां वंशं वक्ष्ये।
अब देखिये, इस मायिक जगत् में सृजन परम्परा अक्षुण्ण रखने हेतु ही गृहस्थ धर्म स्वीकार कर विषयसेवन की बात कही गई,इसके पहले और बाद में भी नहीं।
यह खुला रहस्य आज सबके सामने है, किन्तु दुर्भाग्य हमारा जो मनुष्य शरीर पाकर, समझ कर भी समझे नहीं।
कबहुँक करि करुना नर देही देत ईश बिनु हेतु सनेही, की कृपाकरुणा को ठुकरा रहें हैं। तुलसी जैसे महापुरुषों का चरणाश्रय लेकर, आत्मोद्धार और कहिये कि अपने परम कल्याण के लिये रामनाम जपादि सरलतम साधनों से संसृतिचक्र से मुक्त होना जाना चाहिए।
भैया,भगवान् का नाम सर्वसुलभ है।
रसना हमारी वशवर्ती है।फिर भी जगद् बन्धक्षय सुलभ होकर भी दुर्लभ है।इससे बड़ा और कोई आश्चर्य नहीं।
सुलभं भगवन्नाम जिह्वा च वशवर्तिनी।
तथापि नरकं यान्ति किमाश्चर्यमतः परम्।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।