दिव्य काल अब दृश्य श्रव्य।
हैं वीर शिवाजी दिव्य भव्य।
यह अतीत का काल मनोहर,
हर हर नगरी हर हर हर।।
देखो समझो जानो मानो,
दृढ निश्चय कर्म, उठो ठानो।
काशी में मंचन शिवाचरण,
मानवविरोधिता के प्रति रण।
जब म्लेच्छत्रस्त भारतमाता,
प्रतिकूल वेद उनका नाता।।
तब वीर शिवा थे उदित हुए,
बर्बर आक्रान्ता गए मुए।।
इतिहास कहानी कहता है,
हिन्दू न दुष्टता सहता है।।
विक्रम संवत द्विसहस्र बीस।
दशमी कार्तिक गुरु शुक्ल शीष।।
जाणता राजा उद्दाम नाट्य,
सुन्दर अभिनय है यह अकाट्य।।
मीरजा पुरी वासी हर्षित,
शिववीरवीरता आकर्षित।।
आनन्दमग्न रसपूर प्रकट,
सब दृश्य श्रव्य आमोद निकट।।
इतिहास जानता कहता है,
क्या वीर अनाचर सहता है।।
वह अमर शिवा राजा प्रति पल,
हर हिन्दु हृदय कहता अविरल।।
काशी हिन्दू विद्या धरती,
जाणता राजा अभिनय करती।
अमर कथा यह वीर शिवा की,
है अतीत की अनुपम झाँकी।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Month: November 2023
मौनं सर्वार्थसाधनम्
सामान्य सी बात है, पोथी का पण्डित और पण्डिताः समदर्शिनः वाले पण्डित में बड़ा भेद है।
शास्त्र और सन्तों की मानें तो,उनके ही शब्दों में एक मायिक है तो दूसरा है पूर्ण अमायिक,गुणातीत।
काशी में शरीर धरे और शास्त्रभाषा को सरल साधुवाणी में कहने वाले,श्रीमद् जगद्गुरु आद्यरामानन्दाचार्य भगवान् के एक सच्छिष्य हुए महात्मा कबीरदासजी।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पण्डित भया न कोय,कहकर पण्डित की तो अपर परिभाषा ही गढ़ दी,आपश्री ने। बिरले महात्मा थे।देखिए तो-
उनके शब्द, कैसे त्रिगुणा माया से पार नहीं हो पाने का संकेत करते हैं-
माया मरी न मन मरा मरि मरि गया शरीर आशा तृष्णा ना मरी कहते दास कबीर।
अरे,नारायण ध्यान देने योग्य है,कि माया
की आवरण,विक् षेप शक्तियों को पढ़ने पढ़ाने से दुर्धर्ष माया का आवरण नहीं हटेगा। माया जल्दी हटती भी नहीं।
कबीर की ही मानें तो उन्होंने गुरुप्रदत्त श्रीराम जय राम जय जय राम नाम पकड़ कर विक्षिप्त मन और माया जीत ली थी।एक जगह वे कहते हैं-
रमैया की दुलहन ने लूटल बजार,
ब्रह्मा को लूटल शिव को भी लूटल।
लूटल सकल संसार।कबिरा बच गया साहिब कृपा से शबद डोर गहि उतरा पार।यह शबदडोर रामनाम ही है। अब देखिये-
परिवर्तन परिवर्धन पतन उत्थान सृष्टि का नियम है। मन जब संसार राग रागी होकर भ्रमणशील रहता है,टिकना रुकना सम्भव ही नहीं है।चलेगा चलायेगा घूमेगा और घुमायेगा।नाना शरीरों और योनियों भी में भटकायेगा। बारम्बार भवाटवी भ्रमण
की प्राप्ति रोक देना और इसी मानव शरीर से जन्ममृत्युबन्ध को रोक देना,तो अत्यंत सरल है।वह सरल है केवल नाम जप की निरन्तर आवृत्ति की ऊर्जा से,जो कि हृद्गतज्योति परारूप है।
समझ की बात है, इस मानवीय जीवन में
लोक और लोकान्तर पदार्थ की प्राप्ति के प्रयोजन की सिद्धि, श्रीराम जय राम जय जय राम से हुई है, हो रही और होगी।
नाम, हरिकृष्ण राम नारायण दुर्गा सीता राधा कोई भी हो, सभी शब्दरूप है।इसके चाररूप-परा,पश्यन्ती,मध्यमा और वैखरी होते हैं।आकाशमय शब्द वैखरी वाणी है, इन वैखरी आदि का क्रमशः विलय मध्यमा,पश्यन्ती और परा में होता है। जो वाणी का उत्स है, वह परा है। चलन गमन उच्छलन क्रमण का स्रोत यहीं से है। लेकिन वाह्य परिणति वैखरी में है। पश्यन्ती और मध्यमा स्मृति है,तो परा आत्मस्थ। लेकिन कैसे भी हो, वैखरी भी जरूरी है।सन्तों के वैखरीशब्दरूप श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थ नहीं होते और,वेदादिशास्त्रवैखरीवाणी न होती तो साधन क्या था।जीव का परम कल्याण हो या संसार ही की रहनी सहनी हो,कौन मार्ग बताता।संसार व्यवहार कैसे होता।अतः शब्द साधन अनिवार्य है।
भैया,वैखरी के विना तो हम जैसे सामान्य कलिमलग्रस्त जीव कुछ समझ भी नहीं सकते।जीव के आत्मकल्याण का साधन वैखरीशब्द भगवन्नाम जपरूप है।
जप व्यक्तायां वाचि और जप मानसे च, दो अर्थों में व्यवहृत है।इस प्रकार जप का अर्थ पश्यन्ती मध्यमा रूप मानसिक और वैखरी रूप स्फुट शब्द भी है।
चाहे नाम सङ्कीर्तन हो या स्मृतिरूप मनन श्रवण स्मरणादि हो,पहुँचेगा उस अनन्त परम परात्पर या तत् शक्ति परमा परात्परा तक,यहीं विश्रान्ति है। क्योंकि इसी से निकल कर, इसी की लीला से यह जीव अलग हुआ था।तब यहाँ पहुंचे बिना पायो परम विश्राम,कहां सम्भव है। अतः
शब्द से ही संसार और असंसार के सारे अर्थ का अवगम है,योगी,ज्ञानी भक्त की बात अलग है।परम योगी भर्तृहरि ने कहा था कि सभी को यह जानना चाहिए कि,
शब्द ज्योतिस्वरुप वैखरी विभाग में आने पर ही अर्थ का अर्थात् प्रयोजन का प्रकाश करता है।परा तो इसका मूल है।वाणी का शब्द का परम रस इसी परा तक जाकर परम शान्त हो जाता है।यही अन्तिम स्थिति लाभ है।
जगत् का सारा भान तो वैखरीशब्दानुगम से ही होता है।यह वैखरी ही अन्दर प्रवेश करके,इस शरीर पिण्डस्थ परमात्मरस का बोध कराती है, ऋषि ने इसे अनुभूत करके परम रस कहा था,जो परम प्रेम और आनन्द की अवस्था है,इसे शब्दादि साधनों से पाने के लिए ही,यह देह है।श्रुति उक्ति प्रमाण है-
रसो वै सः। रसं हि अयं लब्ध्वा आनन्दी भवति- तैत्तिरीयोपनिषद्- 2/7/2
परम योगी भर्तृहरि ने भी यही कहा-
प्राप्तरूपविभागायाः यो वाचः परमो रसः।
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिः तस्य मार्गः अयमञ्जसः। न सोस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भाषते।
वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड- 12-24
यह संसार और उसके सरकते दरकते व्यवहार व्यापार, बिना शब्दोच्चारण के कैसे सम्भव है। इसके विना कोई कैसे ज्ञान करायेगा।वैखरीशब्द से ही तो सभी,संसारक्रियाकलाप होता है। यह शब्द अनादिब्रह्म है। आकाश इसे धारण करता है। वाक्यपदीय में ही मङ्गलाशासन करते हुए, महायोगी भर्तृहरि इसी मत की पुष्टि करते हैं-
अनादिनिधनं ब्रह्म,शब्दतत्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेर्थभावस्य प्रक्रिया जगतः यतः।।
ब्रह्मकाण्ड-1
शब्दोङ्कार से उद्भूत संसार है, ऐसा शास्त्र और सन्त कहते हैं।
यह जीव जगत् अन्धकारमय ही तो रहता,यदि शब्दमयी ज्योति का स्फुरण शक्तिपात नहीं होता।महाकवि दण्डी ने भी इसी का समर्थन किया –
इदमन्धन्तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयं यदि शब्दाह्वयं ज्योतिः आसंसारं न दीप्यते।
काव्यादर्श-दण्डी -1/4
यह शब्द, अग्निप्रधान ज्योति स्वरूप है। यह शब्दज्योति परा रूप में सुषुप्त है।जब किसी अर्थ या प्रयोजन की प्राप्ति करनी होती है, तब सबका मूल अन्तः इन्द्रिय मन, विचलित होता है।और शरीर में विद्यमान अग्नि पर इसी मन का प्रहार होता है। ततः अग्नि, वायु को प्रेरित कर भेजता है,जो वायु आकाश में बिखर कर वैखरीशब्द बनता है। सृष्टि के क्रम में यह वायु ही अग्नि के पिता हैं।यह वायुदेव हृद्देश के मार्ग से चलकर,कण्ठगत होते हुए, मुखविवर से अपने पिताजी, आकाश जी में बिखर जाते हैं।यही है, वाणी का शब्द का अन्तिम चरम सोपान परिणाम, जिसे कहकर,सुनकर हम सभी अपने पराये अपराये सभी अर्थों को समझते बूझते हैं।
भगवान् पाणिनि ने अपने शिक् षा ग्रन्थ में इसका प्रकाश किया है,कि कैसे शाब्दी वाणी निकलती है-
आत्मा बुद्ध्या समेति अर्थान्,मनो युङ्ते विवक्षया।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्।मारुतः तु उरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम्। पाणिनीय शिक् षा- 2/6-7
आत्मा बुद्धि के साथ अर्थसिद्धि के लिये जब यत्न करता है, तब वह शरीरस्थ अग्नि पर प्रहार करता है। यह अग्नि, वायु को प्रेरित कर हृदय मार्ग से कण्ठमार्ग से,मुखद्वार से बाहर करके, वैखरी की सृष्टि कर देता है।
वैखरी वाणी रूप शब्द जैसे संसार का अर्थ सिद्ध करता है,वैसे ही असंसार का भी।अर्थानुसन्धान कभी भी, शब्दप्रयोग के बिना सम्भव नहीं है। इसलिए सर्वोच्च शरीर मानव का ग्रहण करके,अन्धेनैव नीयामानाः यथान्धाः की स्थिति न बने।इसका ध्यान करते हुए, प्रायः जब तक अनिवार्य न हो,न बोलने का अभ्यास और मन ही मन रामकृष्णनाराराण नामों के सतत मनन का अभ्यास ही कलिकाल में सारी उपलब्धियों का मूल है।
सुभाषितरत्नसमुच्चय में आई एक विचित्र परिहास परक गम्भीर बात सन्तों द्वारा कही सुनी जाती है-
मुख से निकलने वाणी को बन्ध मुक्ति कारक बताते हुए, पक्षी जैसी योनि का उदाहरण, दिया है। अपने मुख दोष से ही शुक और सारिकाएँ बन्धन में पड़ते हैं।बगुले नहीं बँधते,क्योंकि वे वस्तुतः अपने लक्ष्य शिकार पर ध्यान गड़ाए,मौन रह कर,लक्ष्य के समीप आ जाने पर झपट कर उसे पा लेते हैं।अतः मनुष्य को इसी वृत्ति से अपने इष्ट पर ध्यान गड़ा कर प्रायः मौन साधन करते हुए नाम जपादि अभ्यास में रहना चाहिए, जिससे जीवन लक्ष्य पाने में सरलता हो-
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः। बकाः तत्र न बध्यन्ते मौनं
सर्वार्थसाधनम्।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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स्वतन्त्र साधक नहीं होता
चर्म चक्षुओं से दृश्यमान दीप,जब सद्गुरु कृपालेशतः अतीन्द्रिय नेत्रगत हो तो संसार में खोया मैं प्रकाशित हो जाय।
मानव जीवन में भगवान् और शास्त्रसन्त ही अतीन्द्रिय नेत्र देते हैं। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्, कहकर भगवान् ने अर्जुन को अतीन्द्रिय नेत्र दिये थे।
और तब अर्जुन की मोहरात्रि विगत हो गई थी,और प्रकाश हुआ, अनुभूति हुई अन्तःकरण परिशुद्ध होकर बोल उठा,नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादान् मया अच्युत।
और नहीं तो जगत् जितना मिला है, उससे कहीं और अधिक कामिनी कांचन पद प्रतिष्ठा के लोभ मोह के अँधेरे को छोड़ता नहीं।
इसलिये सन्तशास्त्र का अवलम्ब लेकर करुणा दया क्षमा त्यागादि आनन्दमय स्वतः प्राप्त भगवदीय गुणों को जान पहचान कर आत्मसात् करना चाहिए।
भगवदीय गुण कहीं गए नहीं हैं,आत्म विस्मृति और संसार के चाकचिक्य चकाचौंध के दृष्टि भ्रम की सतत स्मृति में खो जैसे,गए हैं।
मनुष्य जीवन में आत्मप्रकाश ही त्रिगुणा माया का बन्ध तोड़ सकता है।
श्रीरामनामादि का कहीं भी किसी भी काल में देश में अपने हृद्देश में स्मरण श्रवण मात्र का साधन आत्मदीप के प्रकाशमान रूप को दिखा देगा।
जाकर नाम सुनत शुभ होई
मोरे गृह आवा प्रभु सोई।।
हम शारीर इन्द्रियों के तन्त्र में उलझ कर फिर एक बार भगवान् की कृपा करुणा को ठुकरा देंगे, यदि इनके परतन्त्र हो गए तो। अतः श्रुत शास्त्र सन्त का पारतन्त्र्य ग्रहण कर,आत्मदीप का दर्शन करना ही प्रकाश पर्व के आलोक का स्वारस्य है।
भैया, विषयी साधक सिद्ध सयाने में, साधक की अवस्था में तो जाना ही पड़ेगा, आगे की अवस्था तत् तन्मयता से स्वतः मिलेगी। लेकिन याद रहे, शास्त्र सन्त पारतन्त्र्य तो स्वीकारना ही होगा।
नारायण,स्मरण रहे संसाररण में-
साधक स्वतन्त्र नहीं होता और स्वतन्त्र साधक नहीं होता
हरिगुरुसन्तः शरणम्
नान्ये जानन्ति तत्वतः
प्रेम संसारी वस्तुओं से प्रायः होता है,जो कि सकाम पंकिल मलिन वासना का फलन है। किन्तु यही प्रेम यदि गुरुभगवत् भागवत कृपा से कामनातीत हो जाय,तब प्रेम रूप भगवान् ही दृष्ट होंगे।
वैष्णवी परम्परा में देवर्षि नारद ने प्रेम को इस जीवात्मगत ,भक्ति को ही परमप्रेमरूपा कहा है। प्रेम और आनन्द पृथक् नहीं, तत्वतः एक ही हैं। भक्ति का व्याख्यान करते हुए, कहते हैं कि-
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।
सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
मतलब कि वह भक्ति ही प्रेम और अमृत है,जो ईश्वर के लिए ईश्वर से ईश्वरप्राप्ति हेतु की जाय।
वस्तुतः लौकिकी वासना मृत्यु और ईशवासना अर्थात् प्रेम अमृत है।प्रेम प्रेमी और प्रेमास्पद की त्रिपुटी, नित्य सुयोग अमरत्व है।इस प्रेम में भोग नहीं, बल्कि निष्काम कामना का सुखद सुन्दर सुयोग है।
चाहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि सिधि बिपुल बड़ाई। हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ुअनुदिन अधिकाई।।
महाराज जनक ने श्रीरामलक्ष्मण को अति अनुराग कहते हुए, प्रेम ही कह डाला-
इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा।बरबस ब्रह्मसुखहिं मन त्यागा।
नारद जी ने इस प्रेम को वाणी से परे कहा-
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।
मूकास्वादनवत्।
भैया, प्रेम और आनन्द वस्तुतः समानार्थी हैं। इसलिये कि,प्रेम भी भगवान् और आनन्द भी भगवान्,जो आनन्द सिन्धु सुखराशी।
हनुमान् जी महाराज जब जगदम्बा जानकी को भगवान् का सन्देश सुनाते हैं, तब कहते हैं-
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं।
जानु प्रीति रस एतनेहिं माहीं।।
प्रेम की अनुभूति मन से होती है।और मन रहता है, प्रेमी के पास।तब मन जब प्रेमी में चला गया,तो कौन उस मन के अभाव में प्रेम का वर्णन करेगा। जब प्रेम रूप आनन्द रूप प्रभु ने मन को आकृष्ट कर लिया,तो ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै,की विचित्त दशा सृष्ट हो गई, और ऐसी सृष्टि हो जाने पर प्रेमी तो प्रेमानन्द में डूब ही गया समझो।
नारायण, हरिगुरुसन्त कृपा से ऐसे प्रेम और आनन्द में डूबने का अवसर मिलता है।
और जब कोई भाग्यशाली उस अनन्त परम प्रेम आनन्द में डूब गया,तो अनुभव तो करेगा,किन्तु मन के अभाव में परम प्रेम के प्रभाव में बोलना सम्भव नहीं है-
डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।गहरो प्रेम समुद्र कोउ,डूबै चतुर सुजान।
प्रेममूर्ति भरत जी ने,अरथ न धरम न काम रुचि,गति न चहौं निरबान।जनम जनम रति रामपद,यह बरदान न आन,
कहकर इसी प्रेमानन्द को रामचरनरति,कह डाला था,और मार्ग में त्रिवेणी से,इसी रामचरनरति प्रेम की ही याचना की।नारायण, प्रेममूर्ति भरत जी और तद्वत् ठीक उसी तरह श्रीराम जी का प्रेम तो ब्रह्माविष्णुमहेश भी,कह सकने में असमर्थ हैं।
अगम सनेह भरत रघुबर को।
जहँ न जाइ मन बिधि हरिहर को।।
भरत जी का प्रेमानन्द और गोपियों का भी,प्रेमी सन्तों की वाणी का आश्रय लेकर यत्किंचित् कहा जा सकता है,समग्र तो उस समग्र के वश में है।
गोपियों का भगवान् के प्रति यही प्रेमानन्द सिन्धु उमड़ आया था।जब उद्धव जी की बातें सुनकर उन्होंने कहा था –
ऊधो मन न भए दस बीस।एक हु तौं सो गयौ श्याम संग,को अवराधे ईश।
और भगवान् जो स्वयं परम प्रेमानन्द स्वरूप ही हैं, उन्होंने आत्मतत्व की तज्ञा,गोपियों को ही कह डाला-
भगवान् का माहात्म्य, पूजा और तत्प्रति श्रद्धा, मनोगत भाव को गोपियों के सिवा कोई नहीं जान पाया-
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतं।जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्वतः।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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किमाश्चर्यमतः परम्
हरिश्शरणम्
विषयाकर्षण का विकर्षण और किसी साधन से उतना सम्भव नहीं, जितना रामकृष्ण नारायण हरि नामों से हुआ, हो रहा और होगा।
विषयाकारवृत्ति नाना शरीर गत जन्म जन्मान्तर सिद्ध है।
अनेकजन्मार्जित जगद् वासनाक्षय का सरल साधन भगवन्नाम ही सन्त शास्त्र माने हैं। सन्त सबै गुरुदेव हैं, यह रसिकन की रीति।
दत्तात्रेय भगवान् ने तो सृष्टि के नाना उपादानों को गुरुरूप मान कर जो गुरूपसत्ति की गरिमा का उत्कर्ष दर्शन कराया,वह सनातन का निकष निदर्शन है। सोचिये जिन सन्तों की भगवदाकार चित्तवृत्ति है,वही तो विषयाकारवृत्ति को क्षणमात्र में हटा सकते हैं।
गुरुकृपावलम्बावलम्बन ही नेत्रों से निरन्तर प्रविशमान जगद् का बन्ध करेगा। कानों से श्रूयमाण वाग्वैखरीझरी के झर झर प्रपात का स्रोत ही सुखा देगा।
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां का प्रवर्तन तो सन्तसद्गुरु सज्जन संग ही साधेगा। संग्रहपरिग्रह से दूर सन्तों की कृपा करुणा का प्रवाह, बहा देगा संसारविषय विष की सरिता को।राम नाम
हरि नाम कृष्ण नाम नारायण नाम की बहती अजस्र निर्मल धारा जो देवर्षि की कलकल अजस्र वीणा के नाद को अनुसरती चली चल रही और अनन्त तक चलती रहने वाली है,वह तो किसी किसी भाग्यशाली को अवश्य ही, हृदयंगम होकर तारती जगदुद्धारती चल रही है,सभी को नहीं। अब देखिये कि क्यों नहीं होता विषयों से विराग।
इसलिये कि जगद् राग भोग भी उन्हीं भगवान् का लीला विलास है।
यह लीला विलास अनन्त काल से एक प्रहेलिकावत् बना हुआ है।
शास्त्रसन्त इस लीला को भगवान् की दुर्धर्ष माया का विस्तार मानें हैं।
समझ की बात महाकवि कालिदास ने इस सन्दर्भ में रखी,जब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति रघुवंश में रघुवंशी राजाओं
को यौवने विषयैषिणां कहा।
उन्होंने रघुवंशी राजाओं को शैशव में ही सर्वविद्याभ्यासी, यौवन में सृष्टि विस्तार मात्र के लिए विषमविषयसेवी,वृध्दावस्था में मुनिवृत्ति से रहनेवाले और अन्त में योगविधि से शरीरान्त करने वाले बता कर
सनातन धर्म की सनातन प्रवहमान मर्यादा प्रस्तुत की है।
शैशवेभ्यस्तविद्यानां,यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां,योगेनान्ते तनुत्यजाम्। एवम्भूतानां रघूणां वंशं वक्ष्ये।
अब देखिये, इस मायिक जगत् में सृजन परम्परा अक्षुण्ण रखने हेतु ही गृहस्थ धर्म स्वीकार कर विषयसेवन की बात कही गई,इसके पहले और बाद में भी नहीं।
यह खुला रहस्य आज सबके सामने है, किन्तु दुर्भाग्य हमारा जो मनुष्य शरीर पाकर, समझ कर भी समझे नहीं।
कबहुँक करि करुना नर देही देत ईश बिनु हेतु सनेही, की कृपाकरुणा को ठुकरा रहें हैं। तुलसी जैसे महापुरुषों का चरणाश्रय लेकर, आत्मोद्धार और कहिये कि अपने परम कल्याण के लिये रामनाम जपादि सरलतम साधनों से संसृतिचक्र से मुक्त होना जाना चाहिए।
भैया,भगवान् का नाम सर्वसुलभ है।
रसना हमारी वशवर्ती है।फिर भी जगद् बन्धक्षय सुलभ होकर भी दुर्लभ है।इससे बड़ा और कोई आश्चर्य नहीं।
सुलभं भगवन्नाम जिह्वा च वशवर्तिनी।
तथापि नरकं यान्ति किमाश्चर्यमतः परम्।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
काशते काशिका
यस्य मानं गतं यन्मनो निर्मलं
श्रीगुरोः श्रीहरेर्वै कृपाशक्तितः।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।
यस्य बुद्धिर्विवेके चरत्यनुदिनं
श्रीहरेर्हारिणी सा कृपालम्बिता।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।
यस्य चित्तं गतं श्रीगुरोर्नीरजे
गन्धमत्तं प्रमत्तं क्षणं प्रतिक्षणम्।
तस्य काश्यामयोध्यां गतं नागतम्।
यज्जगत्कारणं सद्रजस्तामसं
ईश्वरीशक्तिकां जातजातां पराम्।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।
कर्मजालानुबद्धा वयं जीवकाः
श्रीगुरोरम्बुजान् मे मतिर्मानिता।
तस्य काश्यामयोध्यां गतं नागतम्।
यद्यहङ्कारमूढं मतं मद्गतं
श्रीगुरोः श्रीहरेः तद्दयाशीलतः।
तस्य काशी पुरः काशते काशिका।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
सदा अनुरागो
देव प्रतिष्ठित मन्दिर माहीं।
अन्तःकरण शुद्ध करि जाहीं।।
मन्दिर जाकर करै याचना
कहो मनुज वह साँच साँच ना
हरि कर कृपा जाहि पर होती।
सन्तगुरू मिलते तब मोती।।
मन अशुद्ध संसार परक है।
दीखे जगत जगत नरक है।।
बुद्धि मलिन कुविचार परी है।
हृदय माहिं अविवेक भरी है।।
चित्त चेतता जगत पदारथ।
कैसे क्यों सोचै परमारथ।।
हरिगुरुसन्त जिन जगत न रागा। ते सब भै हरिहर अनुरागा।।
अहं बुद्धि ममता नहिं छूटै।
क्या संसार वासना टूटै।।
अपने हृदय बसत संसारा।
कानन प्रविशे देखु अपारा।।
राम राम जपु प्रतिपल माहीं।
शुद्ध मनः बुधि चित्त तदा हीं।।
और न कलि यहिं साधन देखो। जप करि राम हरीहर लेखो।
कैसे हो अपरोक्ष आत्मगत।
स्वयं स्वतः है परम आत्मरत।।
सुख दुख सब है मनः भ्रमागत। मन कर शुद्धि राम नामागत।।
अतः जाहु गुरु सबद विचारौ।
शबद टेकि संसारहु टारौ।।
तुलसी सूर कबीर गहो पद।
तब वैराग्य भगै सारा मद।
संगासक्ति सबहिं विध त्यागो।
संगति साधु सदा अनुरागो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
भक्तजनैरनुभूयते
यदि समस्तमिदं जगतीतलं
तव स्वरूपमहो प्रभु दृश्यते।
तदनु कारणमामनुते मनः
तव कृपाकरुणा परिसिद्ध्यति।।
यदि मयि प्रति ते द्रवते मनः,
तदिह चेतयते मम चेतना।
त्वमिह सिद्ध्यसि हेतुरवश्यता
जननि रामरमे शिववासने।।
यदि विनिश्तितबुद्धिरभून्मता
भवसि कालकलाकुलिता कले।
सकलसज्जनसज्जितधारणे,
धरणि धाम्नि धराधरिता कृपा।।
अधरधारितहास्यविशेषता,
सविधि ये परिभूय परिस्थिता।
परमपारपरे परितः स्थितिः,
तव विलोक्य जनाः विवशीकृताः।।
स्ववशहारविहारविचित्रता,
जनितमादनमोदमदा मता।
तव सुदर्शनदर्शनदिव्यता,
समनुभूय जगत् परिभाव्यते।।
यदि जने भविता करुणाकृपे
हृदि गतं रसनं स्रवते शुभे।
तव स्वभावविभावविभाव्यते,
सकलभक्तजनैरनुभूयते।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्