त्यागहु तम अभिमान

बिना अभिमान छोड़े भक्ति नहीं।
ज्ञान भी नहीं ।
वैराग्य तो असम्भव है ही।

“भक्तराज” अनन्त बलवन्त
श्रीहनुमन्त में कोई अभिमान नहीं

अतुलितबल के धाम हैं। और बल कैसा,कितना?

दसहजार हाथियों का बल एक
ऐरावत में।

दस हजार ऐरावतों का बल एक
इन्द्र में।

दस हजार इन्द्रों का बल हनुमन्त के
एक रोएँ में।

शरीर के रोओं की गणना संभव नहीं
हनुमान् जी महराज का बल
इसीलिए अतुलनीय।

सुरक्षा में लगी लंकिनी, मसक समान
रूप धरने वाले हनुमान् जी को “चोर”
कह देती है-
मोर अहार जहाँ लगि चोरा। सबसे बड़ा चोर "रावण" इसी लंका का अधिपति है। उसी "चोर " कामदूत की सुरक्षाकर्मी

का “श्रीरामदूत” को चोर कहना
बड़ा भारी दुःसाहस "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" क्रोध में ही सही "भक्तराज " के मुष्टि-प्रहार का स्पर्श पाकर -

रूधिर बमत धरणी ढनमनी

हो जाती है , और सँभल कर उठती है
ब्रह्माजी द्वारा रावण को वरप्राप्ति
का स्मरण करके, समस्त राक्षस कुल
के संहार का उपस्थित काल
सुनाती है-

जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहिं चीन्हा ।।
बिकल होसि जब कपि कै मारे ।
तब जानेहु निसिचर संघारे ।।

अपने पुण्य भाग्य से साधु/सन्त
सज्जन रक्षक ” श्रीरामदूत” को
पाकर एक राक्षसी गद्गद है।
कृतकृत्य है-

तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।

स्वर्ग और मोक्ष का सुख भी तुच्छ है,

“राम ते अधिक राम कर दासा” के
हस्तप्रहार क्षणिकस्पर्श से।
कह उठती है-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख
धरिअ तुला इक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि
जौं सुख लव सतसंग।

आशीर्वाद भी देती है-

प्रविसि नगर कीजै सब काजा
हृदय राखि कोशलपुर-राजा।।

भैया! भगवान् जिनके हृदय में
सर्वदा अधिष्ठित हैं, ऐसे रामदूत
का प्रहार भी तार देता है ।

ऐसे श्री हनुमान् जी महराज ही भक्त कहलाने के सर्वथा योग्य हैं क्योंकि इनमें अभिमान का लेश नहीं लंका विध्वंस कर, राक्षसों का संहार करके जब प्रभु श्रीराम से आकर "भक्तराज" मिलते हैं।

तब भगवान् को प्रसन्न जानकर
लंकादहन के दुर्गम कार्य का श्रेय
“श्रीराम” को ही देतेहैं ।कैसी अभिमान शून्यता है-

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना ।
बोले बिगत बचन अभिमाना।

समुद्र लंघन , लंका – दहन
अक्षकुमारादि-हनन
अशोक-वाटिका-विदारन इत्यादि समग्र कार्य का मूल प्रभु श्रीराम का "प्रताप" संताप "रामरोषपावक सो जरई" बताते हैं

शाखा मृग कै बड़ि मनुसाई ।
शाखा तैं शाखा पर जाई ।।

नाघि सिन्धु हाटकपुर जारा ।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।।

सो सब तव प्रताप रघुराई ।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।

इसीलिये हनुमान् जी महाराज
अतुलितबल बल धाम
और भक्तिधाम ” भक्तराज” हैं

क्योंकि अभिमान – शून्य हैं

और इसीलिये श्रीरामभक्ति पाने
के लिये “अभिमान मूर्ति”
रावण को अभिमान छोड़ने की
“शिक्षा” दी जा रही है।

और शिक्षक कौन? “भक्तराज” ही

अनन्त बलवन्त श्रीमन्त हनुमन्त

मोह मूल बहु सूलप्रद

“त्यागहु तम अभिमान”

“भजहु” राम रघुनायक कृपासिन्धु भगवान्।।

हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।

जसि निष्केवल प्रेम

भक्त को सन्त को भगवान् से
कुछ नहीं चाहिए।
उसे केवल और केवल
“हरिभक्ति” ही चाहिए।

भक्त तो “अंश ” है ।और
भगवान् उसके ” अंशी” भगवान् " प्रेम-मूर्ति" हैं। और भक्त तो उस प्रेम प्रसाद का आकांक्षी।

भक्त की आसक्ति,रति, स्पृहा
अपने “प्रेमास्पद” में है।नारद जी ने कहा -

” सा तु अस्मिन् परम-प्रेम-रूपा “यह परम प्रेममयी भक्ति, भक्तों और

साधुओं में है, जिससे ये जगद् वरेण्य
हो चुके हैं। नारायण!

जामवन्त जी और श्रीहनूमान् जी
महाराज को अपने वेश आकृति की
चिन्ता नहीं।

वह तो परमात्मा को साध देने
वाले “साधु” हैं –

कियें कुबेस साधु सनमानू
जिमि जग जामवन्त हनुमानू।।

इन भक्तों की भक्ति “अमर” है। "अमृत-स्वरूपा च"

भगवान् में ही प्रेम वस्तुतः ” अमृत” है।

इस प्रेम की माधुरी मे रचा बसा
ही बस सब कुछ है।

क्योंकि लोक की वासना तो मृत्यु है।

भगवद् वासना मात्र ही ” अमृत “

भगवान् का सयाना भक्त “भोग “
और ” मोक्ष ” का लोभी नहीं।

असि बिचारि हरि भगत सयाने।
मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।

वह तो हरि से हरि भक्ति ही माँगता है।

क्योंकि मोक्ष और भोग तो –

“हरि-भक्ति” की दासियाँ हैं –

हरिभक्तिमहादेव्याः सर्वाः
मुक्त्यादि – सिद्धयः।
भुक्तयःच अद्भुताः तस्याः ,
चेटिकावद् अनुव्रताः ।। - श्रीनारद पांचरात्र

भक्त तो भगवान् का प्रेम पाकर
पूर्णकाम और कृतकृत्य है।और यदि प्रेमविवश कृतकृत्य नहीं तो "पतन" निश्चित है।

मोक्ष भी ऐसा कि भगवत्
चरणाश्रय पाकर पृथक् सत्ता
स्वरूप वह भक्त/ साधु भगवान्
की लीला रस माधुरी का पान
करता रहे।
जल की ऐसी बूँद जो समुद्र मेंं
विलीन हो जाये तो उसे क्या कोई
अनुभूति होगी? नहीं होगी क्योंकि उसकी पृथक् सत्ता ही नहीं। इसलिये भगवान् उमाशंकर ने कहा

कि, योग-यज्ञ-दान-तप-व्रत-नियम
आदि का पालन भगवान् की वैसी –कृपा नहीं दे सकते जितना कि " प्रेम "

मतलब कि केवल प्रेम के लिये प्रेम – उमा जोग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम। राम कृपा नहिं करसि तसि, जसि निष्केवलप्रेम ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

सो सुख उमा जाइ नहिं बरना

“अचितवत् पारतन्त्र्यम् एव प्रपत्तिः”

जैसे कि संसार की स्वयं न चलने

हिलने डुलने वाली वस्तुएं, पर-तन्त्र हैं।

वैसे ही “भक्त” की दशा हो जाती है।

हमारे प्रयोग आने वाला हमारा “वस्त्र”

सर्वथा हमारे आधीन है।
हम इसे स्वयं प्रयोग करें,दूसरे
को दे दें, इसे कोई आपत्ति नहीं होती।

उसी तरह “भक्त” “साधु” “सन्त”
“प्रेमी” “महात्मा” होते हैं ।अचेतन और "जड़ वस्तु" की तरह। भक्त कहता है- जहाँ भेजो वहीं जायेंगे। किष्किंन्धा पर्वत पर वह निहार रहा है, राह। "रुद्र" रूप छोड़ कर "प्रेममूर्ति" "प्रभु" के वशीभूत है।

विह्वल है व्याकुल है।विरही है आतुर है। सुग्रीव द्वारा भेजा जाता है।

भयग्रस्त है सुग्रीव नहीं पहचानता

प्रभु श्री राम को लेकिन

भेजता है उसी आतुर कातर भक्त को

अचितवत् अचेतन जैसी परतन्त्रता
दीखती है भक्त में यही तो "उत्तमोत्तम" भक्त है ।

नाम है ” हनूमान् “जान लेता है , फिर भी पुष्टि के लिये पूछता है -

की तुम तीनि देव महँ कोऊ।
नर नारायन की तुम्ह दोऊ ।।

जग कारन तारन ,
भव भंजन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल भुवन पति,
लीन्ह मनुज अवतार ।।

भगवान् तत्क्षण परिचय देते हैं –

कोसलेस दशरथ के जाये ।
हम पितु बचन मानि बन आये।

नाम राम लछिमन दोउ भाई।
संग नारि सुकुमारि सुहाई ।। और जिस प्रभुदर्शन के लिये

अतृप्त मन हैं, हनुमान् जी जैसे भक्त

गिर पड़ते हैं,इन्ही भगवान् के
युगल चरणों में, अचेतन वस्तुवत्
और तब –

भगवान् उमाशंकर ने कहा, ऐसे

“अविभक्त” “भक्त-भगवान्” का

मिलन-सुख तो अवर्णनीय और

अविस्मरणीय है-

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना ।।

हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे

1 – भक्त का तात्पर्य ही “सेवक” है ।

क्योंकि भक्त शब्द सेवार्थक “भज् “
धातु से निर्मित है ।2- भक्त का तात्पर्य ही जगत् के "विनष्ट-राग-द्वेष-वाला" है।

क्योंकि भक्त शब्द नाशार्थक ” भञ्ज् “
धातु से भी निर्मित है ।

इसलिये भक्त अकिंचन है।
अकिंचन माने

नहीं है किंचन कुछ भी। जैसे कि हमारी सेवा करती हमारी " रूमाल " रूमाल से हम अपनी देह

पोछें, शिर पर रखें या कमर में लपेटें
उसे अपनी सेवा में रखने वाले
मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं।

सोचिये, नारायण!
ऐसी अकिंचनता जहाँ
रहेगी क्या ऐसे भक्त में कोई
अभिमान रह सकता है?

कभी नहीं रहेगा कोई भी
अभिमान । और ऐसे ही भक्त के हृदय में

विराजेंगे अवधविहारी ।इसलिये भगवान् तो

” अकिञ्चन – जन – प्रियः ” हैं ।

और अकिञ्चन भक्त ही वस्तुतः भक्त कहलाने का पात्र है ।

इस प्रकार के भक्त में ही वास्तविक भक्ति और ज्ञान रहेंगे भक्त सेवक और अकिंचन है। उसके सेव्य भगवान् हैं। शरीर और संसार सभी कुछ- सेवा(उपासना) की सामग्री है। इस भक्त को संसार भूल जाता है ।

और किसी भी वस्तु व्यक्ति पदार्थ का कोई अभिमान नहीं रहता। इसलिये सेव्य प्रभु राम और उनसे अभिन्न सीता राधा विन्ध्यवासिनी ही सतत याद रहती हैं। सेवक को तो अपनी भी विस्मृति हो जाती है । स्मृति रहती है तो केवल और केवल - युगल - श्यामा-श्याम की।

अभिमान भी उन्हीं काक्योंकि सब " उन्ही " का

सब नाते ” उन्ही ” के नाते।

” उन्ही” के नाते सब ताने बाने है ।
कोई माने न माने सन्तों ने माने हैं।। "उन्ही" को मान देता है "उन्हीं" पर मान करता है ।

इसलिये –

यह अभिमान जाय जनि भोरे ।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे ।।

गुरुः शरणम् ।
हरिः शरणम् ।

बिनु बिस्वास भगति नहिं

जब इस मुक्तसाधिनी काया में
श्वास वायु “वि” अर्थात् “विशेष” हो।

वह “विशेष” ओर कोई नहीं है।
वह श्रीसीतारामजी ही हैं।

जिसमें कोई शेष बचता ही नहीं
वही ” विशेष “
इस तरह जब विशेष श्वास होगी तब, यह काया अपनी सार्थकता सिद्ध करेगी ।

सार्थकता क्या है? भक्ति की प्राप्ति । और भक्ति का अर्थ क्या ?

भक्ति शब्द संस्कृत व्याकरण की

दृष्टि से अनेकार्थी है। इस शब्द का
निर्माण दो धातुओं से है।
एक है भंग और दूसरा है सेवा –

1- भञ्ज् ( मर्दन,खण्डन )धातु से
अर्थ मानें तो, इसका अर्थ , है – संसार के प्रति मोह-भंगता

संसार प्रिय न लगना

2- दूसरा है, सेवा भज् सेवायाम् धातु भी संस्कृत

धातु-पाठ में पढ़ी गई है।

अतः भक्ति माने “सेवा-भावना”

अब , इसमें दूसरा “सेवा भावना”
वाला अर्थ प्रायः ज्ञात है ।

तब इसका मतलब है, भगवद्
भागवद् भाव से संसार की सेवा

तात्पर्य कि संसार, तो भगवत् स्वरूप
वाला ही है ।अतः सभी को भगवद्
दृ्ष्टि से देख कर व्यवहार

जड़ चेतन जग जीव जत,
सकल राममय जानि।
बन्दउँ तिनके पदकमल,
सदा जोरि जुग पानि।।

सियाराममय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।

संसार का सेवन सर्वत्र
सब को श्रीराममय मानकर
करो।

और जब यह संसार हमारे “सेव्य”
श्रीराम से ओत-प्रोत है, तब

तब हम इसके सेवक(भक्त) हैं।

पहला वाला अर्थ, संसार के
वस्तु व्यक्ति पदार्थ से मोहभंग तो स्वतः ही सिद्ध हो जायेगा क्योंकि -

“जो मोहिं राम लागते मीठे”
विनयपत्रिका

संसार ही भंग हो जायेगा राम ही संग हो जायेगा। इसलिये कि हमारी श्वास का प्रत्येक अनुक्रम राम ही निकालेगा यह श्वास - प्रश्वास में बहने वाली राम-हवा, तो

नारायण ! सभी पतनों दुःखों

की हवा ही निकाल कर रख देगी ।

राम ही विश्वास, विशिष्ट श्वास हैं ।

इन्ही की भक्ति कल्याण करी है ।
श्वास से प्रश्वास से अन्दर -बाहर
होता यह सतत प्रवहणशील राम तो हनुमान का आकर्षण करके आकर्षक-संसार-लंका अवश्य जलायेगा।

यह राम ही कल्याण करेगा ।

इसलिये कहा – "बिनु बिश्वास भगति नहिं," तेहिं बिनु द्रवै न राम।

रामकृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह विश्राम।।

गुरुः शरणम् ।। हरिः शरणम्

कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम्

नाना नाम रूपारूपात्मक जगद्
के सर्जक पालक और शामक

लसल्लीलाललाम सर्वकामकाम
कोटिकन्दर्प-दर्पदलन
सन्तसाधुसर्वैकप्राण
आरतार्तिभक्ततारण
जगन्मायाविस्तारण
प्रपञ्चपाथोधिदुस्तरोत्तारण
मोह-मद-क्रोध-रिपुमारण
वसुदेव-सुत-स्वयंभव-स्वीकारण
कंस- चाणूर – गर्व – खर्वीकृत -रण
देवकी-परमानन्द-पूर-कारण
जगदन्धकार-प्रकाश-विस्ताण

अर्जुन -मनोमालिन्य -मल -निवारण

एकतान-सन्तानित-भक्ति-विस्तारण

संसार-प्रियत्व-कुंजर-विदारण

मायावश-विवशीभूत-मायापहारण

उन्मुक्त -मन -मीन -स्वकीयचरण –
जल – उत्ताल -जलधि –
विहार -विहारण समस्त -भक्त -सर्वदा -नन्दकारण

गोपिका-शान्ति-कल-कान्ति-सारण छलितगोपि-राधा-रूप-ग्रहण

रस-रास-रसेस-रासेस-सार-सारण

सच्चिदानन्द-सर्वकारण-कारण

नमामि सततं सराधिकम् त्वाम्

गुरुमखण्डा -नन्त -ब्रह्माण्ड -नायकम्

वासुदेव-सुतं देवं,
कंस-चाणूर-मर्दनम् ।

देवकी-परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

जरइ नगर अनाथ कर जैसा

सन्तो साधुओं की अवज्ञा अनर्थ ही
उपस्थित कर देगी।

इसलिये कि इनका आदेश तो
मूर्तिमती मर्यादा है।

छल कपट और अभिमान वश
सन्त आज्ञा की अवहेलना होती है।

और रावण तो इन सभी विग्रह ही है।श्रीहनूमान् जी महाराज तो जैसे साधुसन्त के अपर शरीर हैं।

जगदम्बा जानकी मूर्तिमती बुद्धि हैं।

ऐसी अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका
से अजर अमर गुननिधि सुत होने
का वरदान पा चुके,
वानर रूप धरे सुर कोई,
देवाधिदेव महादेव के अवतार,
परमपरमसन्तरूप इनके वेदानुशासन को ठुकराने

का दुःसाहस करने वाले,
मायावी रावण की लंका
जल कर नष्ट भ्रष्ट हो जाती है।

और जो अपराध भगत कै करई।
राम रोष पावक सों जरई ।।

माँ सीता को सादर श्रीरामजी के
पास नहीं भेजने की अवज्ञा,

करने वाला रावण, तो भक्त नहीं,बल्कि
भक्तराज और ज्ञानिनामग्रगण्य
या कहिये भक्तशिरोमणि हनूमान् जी
के प्रति अपराध का दोषी है।

और नारायण! जलती है लंका तो
अग्निकाण्ड का कोई दोष नहीं
वह श्रीरामजी के रोष(क्रोध)से
जलती है।

जलती है तो जैसे इस बेचारी लंका
का कोई नाथ( स्वामी)नहीं।

इसलिये कि विश्वनाथ इसके
“जलने” और “जलाने” के मूल
में जो हैं।एक ऐसा भी स्थल है जो इस

अग्नि क्रिया से अबाध्य है।

और अबाध्य है तो अबध्य है वह
नाम है, राक्षसकुलभूषण
विभीषण
और उसकी कुटी

पलक झपकने के समय मात्र में
जली लंका।

जारा नगर निमिष एक माहीं।
एक विभीषण कै गृह नाहीं।।

और ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा
जरा सो तेहिं कारन गिरिजा।।

भगवान् उमाशंकर ने कहा कि वह
इसलिये नहीं जरा कि अग्नि के
उत्पत्ति कर्ता नारायण का ही वह
दूत जो है । अब सोचिये सर्वकारणकारण " सर्वशिक्षक" स्वयं "परमात्मा" के लीलावतार श्रीसीताराम की आज्ञा से पहुंचे रघुपति प्रिय भक्त भक्तशिरोमणि

जो इसके पहले सुरसा -लंकिनी
आदि को, शिक्षित करके अभी -अभी आये हैं , उनकी

शिक्षा न मानना दुष्फल ही देगा –

साधु अवज्ञा कर फल ऐसा ।

जरइ नगर अनाथ कर जैसा।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।
शिक्षकः शरणम् ।

सन्त हंस गुन गहहिं

सन्त हंस हैं।
साधना क्षेत्र में यह हंस तो
जीव है। हंस का अन्यार्थ जीव है।

और जीव कैसा कि विशुद्धान्तःकरण।

सन्त का मन, इनकी बुद्धि, चित्त और
अहं, ये चारों निर्मल होते हैं।सन्त स्वयं निर्मल होते हैं।

निर्मलता सर्वप्रथम मन की होती है।क्योंकि "सा विद्या या विमुक्तये"

इनमें प्रविष्ट है।
ये भी भगवान् की तरह करुणा
करके किसी भी योनि में पड़े जीव
को सद्यः मुक्ति दे देते हैं।

अत्यन्त विनय, धैर्य, और प्रेम की
प्रतिमूर्ति हैं सन्त।

ज्ञान विज्ञान सम्पन्न और वह
ज्ञान विज्ञान इनमें प्रविष्ट होने से
मुक्ति दाता हैं सन्त।

भगवान् ने अपने अवतरण का
कारण इन सन्तों को बताया-

विप्र धेनु सुर सन्त हित
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।। सन्तो का स्मरण, प्रभु सभी के अन्त

में करते हैं।
ऐसा लगता है कि, ये अपने पूर्व
के विप्र धेनु और सुर( देवता) सभी
के आधार हैं। सुन्दर काण्ड में प्रभुश्रीराम ने इन

सन्तों को अपना अत्यंत प्रीतिपात्र
कह दिया है।
भगवान् के “प्रेयान्” इन्हीं सन्त
जनों के लिये सविशेष, उनका
अवतार होता है।

विभीषण के लिये प्रभु ने कहा-

तुम सारिखे सन्त प्रिय मोरे।
धरौं देह नहिं आन निहोरे।।बालकाण्ड के प्रारंभ में बाबा इन सन्तों को हंस की उपमा देते हैं। संसार और शरीर तो जड़ प्रकृति का

अंश होने जड़ ही है।

प्रकृति सद् रजः तमः त्रिगुणमयी
होने गुण -दोष का कोष है।

लेकिन भगवान् के प्राणप्रिय ये सन्त
निर्मल हैं।

और बड़ी बात कि ये दूध को दूध और
पानी को पानी करने वाले हैं।
जो गुण “परमगुरु” ने “हंस” पक्षी
को दिया है।वह इनमें भी है।ये सन्त गोस्वामी जी की मति में हंस हैं तो इनके ऊपर विद्या की अधिष्ठात्री " सरस्वती"

तो विराजेगी ही। सरस्वती इन पर
हमेशा सवार है।और सारस्वत कृपातः ये अत्यंत

विनयी, विवेकी, और गुण-दोष का
पार्थक्य करने वाले हैं-

जड़ चेतन गुण दोषमय,
विश्व कीन्ह करतार।
सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्

रूप स्वामि भगवन्त

अरे,नाना शरीरों में अनेक युगों से
मलमूत्र का बर्तन ही तो ढो रहे हैं।

मेरी भवबाधा प्रभु! आप ही हर सकते हैं अथवा आपके प्राणप्यारे सन्त-

मेरी भव बाधा हरो राधानागरि सोय

सन्त इसलिये कि परम करुणा के
विग्रह हैं,वे।

“भक्तमाल” ग्रन्थ के अनुसार
सन्तों ने हाथी,ऊँट,सर्प, श्वान
आदि भोग योनियों में पड़े जीवों
को भी रामनाम सुनाकर मोक्ष दिया ।

तो हम परमार्थी जीवों पर कृपा करुणा
क्यों नहीं करेंगे।

अवश्य किया है करते हैं और करते ही
रहेंगे।

पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाऊ सहज खगराया।।

इन मुक्त सन्तो के अपने जीवन का
कोई स्वार्थ नहीं।

कारुणिक श्रीरामकृष्ण नारायण

की तरह इनमें भी करुणा हैं।

भगवान् करुणा वशीभूत हैं।किसी
अपने को दुखी देख नहीं सकते।

जिसने भी कह दिया मैं आपका हूँ।
आप तो रीझ ही जाते हैं।

आपका ही संकल्प है-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये।

जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न

आपके सेवक सन्त साधु भक्त भी
आपसे अन्य नहीं हैं।

इसीलिये यह सन्त साधु अनन्य
कहे गए हैं।और इसी अनन्यता से
ये मुक्तात्मा आपकी तरह ही मुक्ति भी
बाँटते हैं।
ये मुक्त सन्त तुलसी कबीर
तो भगवदाज्ञा से धरती पर आये थे।
और आकर अपनी अमृत वाणी से
जीवों को अमरता दी।और दे भी रहे।
ये सभी –

बिना कारण कृपा करने वाले हैं-

हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।

हे प्रभु! आपने गीता में गाया है-

सद् असद् च अहम्- 09
न सद् नासद् उच्यते-13

गुत्थी सुलझती नहीं।लेकिन लगता है,

“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”

संसार आपका कार्य है।और,
आप, तो सर्वकारणकारण

यह संसार आपकी भृकुटी के विलास
से जन्मता, विलीन होता है-

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई।

नारायण!

अनन्य भाव से भजने (सेवा जप
स्मरणादि करने)वाले महात्मा
अप्राप्त की प्राप्ति(योग) और
प्राप्त की सुरक्षा(क्षेम) आपके द्वारा
ही सहज पा जाते हैं।

प्रभु! आपका ही उक्त संकल्प है-

अनन्याः चिन्तयन्तो मां,
ये जनाः परि उपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहामि अहम्।।

अपने ही पूर्व श्रीरामावतार में भी आप
ऐसा ही उद्गार व्यक्त करते हैं।

जिसकी बुद्धि निर्मल है और विवेक
पूर्वक,
तस्य निःश्वसिता वेदाः

आपकी श्वास से जन्मे वेदों और
उसके आचारक सन्तों पर विश्वास
करते हुए, सियाराम मय सब जग जानी
का स्वरूप, जिन्हे दिखता है, वही
आपके,
अनन्य सेवक हैं।और
आप सर्वसेव्य।

अतुलितबल धाम श्रीहनूमान् जी
महाराज से आप बोल पड़े थे।

यह सचराचर जगत् मेरा(प्रभु का )
रूप मानने वाले और ऐसा मानकर
तदनुकूल आचरण करनेवाले,

अनन्य सेवक सन्त भक्त हैं,जिनकी

बुद्धि इसी बिचार पर दृढ है-

सो अनन्य असि जाकी,
मति न टरै हनुमन्त।
मैं सेवक सचराचर,

रूप स्वामि भगवन्त।।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम् ।

सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ

आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी और ज्ञानी

ये सभी भगवान् के अनन्य भक्त हैं।

   हम जैसे विषयी मलिन जीव तो 

केवल श्रीहनुमान् जी नारद शुक
सनकादि जैसे अनन्य भक्तों का
ही स्मरण कर कृतार्थ हो सकते हैं।

लेकिन अन्तःकरण तो मलिन है।
भगवान् और उनके
प्राणप्यारे भक्त कैसे हृदय में बसें?

आँखे जगद् को ही देखती हैं।
अँखियाँ हरिदर्शन को प्यासी
कब होंगी?
संसार का रूप बसा है बरबस

 बस,अब बहुत हो चुका प्रभु! 

कानों में संसारी बातें प्रवेश कर
चित्त को मोहती हैं।

हटा दो , मिटा दो ,यह
संसारप्रियता

हे भगवद् भक्त अनन्य शरण!

    किसी और नाम रूप को 

कभी ध्यान में नहीं लाने वाले
रूद्रावतार प्रभु! भक्तराज!
अंजनीगर्भ-अम्भोधि-सम्भूत!
केसरीचारुलोचनचकोर!
चण्डकर-मण्डल- ग्रासकर्ता!

ऐसे अनन्य भक्त और साधु
सन्त के रखवारे
कृपा करो, कराओ अपने ही
हृदेश में राजाराम का दर्शन

किष्किंधा काण्ड में आपने
प्रभुश्रीराम को पहचान कर कहा था
कि आपके बिना आपकी दुस्तर
माया के पार कोई जा नहीं सकता-

नाथ जीव कर माया मोहा।
सो निस्तरै तुम्हारेहि छोहा।।

आप तो भगवान् के प्रियतम हैं।

   ऐसे भक्त कि रामनाम स्मरण 

करते करते “उन्हें” वश में कर लिया-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस करि राखे रामू।।

किष्किंधा पर्वत पर, तो भगवान् को 

पहचान लेने पर आप प्रभुचरणशरण
हो गये थे-

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।।

आप रोमांचित होकर कुछ बोल
नहीं पाए।

जिसकी रचना इतनी सुन्दर
वह कितना सुन्दर होगा।

आप देखते ही रह गये थे ।
“रहेउ ठटुकि एकटक पल रोके”
ऐसे विभीषण की तरह-

पुलकित तनु मुख आव न बचना।
देखत रुचिर बेस कै रचना।।

भगवान् ने आपको लक्ष्मण से भी
अधिक प्रिय कहा था-

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना ।
तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ।।

        भगवती 

जगदम्बा जानकी आशीष जो था-

आसिष दीन्ह रामप्रिय जाना।
होहुँ तात बलशील निधाना ।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू।।

बाबा ने कहा-

सेवक( भक्तसन्त) तो आपके नाम के
भरोसे रामभरोसे ।

जैसे कि माता के भरोसे पुत्र।

माता कभी भी अपने पुत्र को
विष का लड्डू देखकर उससे
छीन कर फेंक ही देती है, क्योंकि

वह पुत्र तो उस माता के भरोसे है।

  आप भी संसारविषयविष को,

विषवत् हटाइये।आखिर मुझे इतनी
प्रीति क्यों?

हम आपके, आप हमारे
आप सेव्य हम सेवक ।

अब बाबा की बानी कुछ काम बनाती
दीखती है। हमारा संसार शोक
आपकी सेवा से मिटेगा-

सेवक सुत पति मातु भरोसे।
रहै असोच बनै प्रभु पोसे।।

मैं किसी अन्य देवादि की शरण
नहीं जाउंगा ।

समदर्शी हैं, सभी शरणागतों पर
अनुग्रह आपका स्वभाव है-

समदरसी मोहि कह सब कोऊ।

सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ।।

हरिः शरणम् ।।   गुरुः  शरणम् ।।