त्यागहु तम अभिमान

बिना अभिमान छोड़े भक्ति नहीं।
ज्ञान भी नहीं ।
वैराग्य तो असम्भव है ही।

“भक्तराज” अनन्त बलवन्त
श्रीहनुमन्त में कोई अभिमान नहीं

अतुलितबल के धाम हैं। और बल कैसा,कितना?

दसहजार हाथियों का बल एक
ऐरावत में।

दस हजार ऐरावतों का बल एक
इन्द्र में।

दस हजार इन्द्रों का बल हनुमन्त के
एक रोएँ में।

शरीर के रोओं की गणना संभव नहीं
हनुमान् जी महराज का बल
इसीलिए अतुलनीय।

सुरक्षा में लगी लंकिनी, मसक समान
रूप धरने वाले हनुमान् जी को “चोर”
कह देती है-
मोर अहार जहाँ लगि चोरा। सबसे बड़ा चोर "रावण" इसी लंका का अधिपति है। उसी "चोर " कामदूत की सुरक्षाकर्मी

का “श्रीरामदूत” को चोर कहना
बड़ा भारी दुःसाहस "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" क्रोध में ही सही "भक्तराज " के मुष्टि-प्रहार का स्पर्श पाकर -

रूधिर बमत धरणी ढनमनी

हो जाती है , और सँभल कर उठती है
ब्रह्माजी द्वारा रावण को वरप्राप्ति
का स्मरण करके, समस्त राक्षस कुल
के संहार का उपस्थित काल
सुनाती है-

जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहिं चीन्हा ।।
बिकल होसि जब कपि कै मारे ।
तब जानेहु निसिचर संघारे ।।

अपने पुण्य भाग्य से साधु/सन्त
सज्जन रक्षक ” श्रीरामदूत” को
पाकर एक राक्षसी गद्गद है।
कृतकृत्य है-

तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।

स्वर्ग और मोक्ष का सुख भी तुच्छ है,

“राम ते अधिक राम कर दासा” के
हस्तप्रहार क्षणिकस्पर्श से।
कह उठती है-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख
धरिअ तुला इक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि
जौं सुख लव सतसंग।

आशीर्वाद भी देती है-

प्रविसि नगर कीजै सब काजा
हृदय राखि कोशलपुर-राजा।।

भैया! भगवान् जिनके हृदय में
सर्वदा अधिष्ठित हैं, ऐसे रामदूत
का प्रहार भी तार देता है ।

ऐसे श्री हनुमान् जी महराज ही भक्त कहलाने के सर्वथा योग्य हैं क्योंकि इनमें अभिमान का लेश नहीं लंका विध्वंस कर, राक्षसों का संहार करके जब प्रभु श्रीराम से आकर "भक्तराज" मिलते हैं।

तब भगवान् को प्रसन्न जानकर
लंकादहन के दुर्गम कार्य का श्रेय
“श्रीराम” को ही देतेहैं ।कैसी अभिमान शून्यता है-

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना ।
बोले बिगत बचन अभिमाना।

समुद्र लंघन , लंका – दहन
अक्षकुमारादि-हनन
अशोक-वाटिका-विदारन इत्यादि समग्र कार्य का मूल प्रभु श्रीराम का "प्रताप" संताप "रामरोषपावक सो जरई" बताते हैं

शाखा मृग कै बड़ि मनुसाई ।
शाखा तैं शाखा पर जाई ।।

नाघि सिन्धु हाटकपुर जारा ।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।।

सो सब तव प्रताप रघुराई ।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।

इसीलिये हनुमान् जी महाराज
अतुलितबल बल धाम
और भक्तिधाम ” भक्तराज” हैं

क्योंकि अभिमान – शून्य हैं

और इसीलिये श्रीरामभक्ति पाने
के लिये “अभिमान मूर्ति”
रावण को अभिमान छोड़ने की
“शिक्षा” दी जा रही है।

और शिक्षक कौन? “भक्तराज” ही

अनन्त बलवन्त श्रीमन्त हनुमन्त

मोह मूल बहु सूलप्रद

“त्यागहु तम अभिमान”

“भजहु” राम रघुनायक कृपासिन्धु भगवान्।।

हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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