“अचितवत् पारतन्त्र्यम् एव प्रपत्तिः”
जैसे कि संसार की स्वयं न चलने
हिलने डुलने वाली वस्तुएं, पर-तन्त्र हैं।
वैसे ही “भक्त” की दशा हो जाती है।
हमारे प्रयोग आने वाला हमारा “वस्त्र”
सर्वथा हमारे आधीन है।
हम इसे स्वयं प्रयोग करें,दूसरे
को दे दें, इसे कोई आपत्ति नहीं होती।
उसी तरह “भक्त” “साधु” “सन्त”
“प्रेमी” “महात्मा” होते हैं ।अचेतन और "जड़ वस्तु" की तरह। भक्त कहता है- जहाँ भेजो वहीं जायेंगे। किष्किंन्धा पर्वत पर वह निहार रहा है, राह। "रुद्र" रूप छोड़ कर "प्रेममूर्ति" "प्रभु" के वशीभूत है।
विह्वल है व्याकुल है।विरही है आतुर है। सुग्रीव द्वारा भेजा जाता है।
भयग्रस्त है सुग्रीव नहीं पहचानता
प्रभु श्री राम को लेकिन
भेजता है उसी आतुर कातर भक्त को
अचितवत् अचेतन जैसी परतन्त्रता
दीखती है भक्त में यही तो "उत्तमोत्तम" भक्त है ।
नाम है ” हनूमान् “जान लेता है , फिर भी पुष्टि के लिये पूछता है -
की तुम तीनि देव महँ कोऊ।
नर नारायन की तुम्ह दोऊ ।।
जग कारन तारन ,
भव भंजन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल भुवन पति,
लीन्ह मनुज अवतार ।।
भगवान् तत्क्षण परिचय देते हैं –
कोसलेस दशरथ के जाये ।
हम पितु बचन मानि बन आये।
नाम राम लछिमन दोउ भाई।
संग नारि सुकुमारि सुहाई ।। और जिस प्रभुदर्शन के लिये
अतृप्त मन हैं, हनुमान् जी जैसे भक्त
गिर पड़ते हैं,इन्ही भगवान् के
युगल चरणों में, अचेतन वस्तुवत्
और तब –
भगवान् उमाशंकर ने कहा, ऐसे
“अविभक्त” “भक्त-भगवान्” का
मिलन-सुख तो अवर्णनीय और
अविस्मरणीय है-
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना ।।
हरिः शरणम् ।
गुरुः शरणम् ।