मैं सेवक रघुपति पति मोरे

1 – भक्त का तात्पर्य ही “सेवक” है ।

क्योंकि भक्त शब्द सेवार्थक “भज् “
धातु से निर्मित है ।2- भक्त का तात्पर्य ही जगत् के "विनष्ट-राग-द्वेष-वाला" है।

क्योंकि भक्त शब्द नाशार्थक ” भञ्ज् “
धातु से भी निर्मित है ।

इसलिये भक्त अकिंचन है।
अकिंचन माने

नहीं है किंचन कुछ भी। जैसे कि हमारी सेवा करती हमारी " रूमाल " रूमाल से हम अपनी देह

पोछें, शिर पर रखें या कमर में लपेटें
उसे अपनी सेवा में रखने वाले
मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं।

सोचिये, नारायण!
ऐसी अकिंचनता जहाँ
रहेगी क्या ऐसे भक्त में कोई
अभिमान रह सकता है?

कभी नहीं रहेगा कोई भी
अभिमान । और ऐसे ही भक्त के हृदय में

विराजेंगे अवधविहारी ।इसलिये भगवान् तो

” अकिञ्चन – जन – प्रियः ” हैं ।

और अकिञ्चन भक्त ही वस्तुतः भक्त कहलाने का पात्र है ।

इस प्रकार के भक्त में ही वास्तविक भक्ति और ज्ञान रहेंगे भक्त सेवक और अकिंचन है। उसके सेव्य भगवान् हैं। शरीर और संसार सभी कुछ- सेवा(उपासना) की सामग्री है। इस भक्त को संसार भूल जाता है ।

और किसी भी वस्तु व्यक्ति पदार्थ का कोई अभिमान नहीं रहता। इसलिये सेव्य प्रभु राम और उनसे अभिन्न सीता राधा विन्ध्यवासिनी ही सतत याद रहती हैं। सेवक को तो अपनी भी विस्मृति हो जाती है । स्मृति रहती है तो केवल और केवल - युगल - श्यामा-श्याम की।

अभिमान भी उन्हीं काक्योंकि सब " उन्ही " का

सब नाते ” उन्ही ” के नाते।

” उन्ही” के नाते सब ताने बाने है ।
कोई माने न माने सन्तों ने माने हैं।। "उन्ही" को मान देता है "उन्हीं" पर मान करता है ।

इसलिये –

यह अभिमान जाय जनि भोरे ।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे ।।

गुरुः शरणम् ।
हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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