रूप रसादि विषयों की सरस रसवर्षा से ,हरे-भरे शरीर संसार में जब मन,हरित भूमि तृणसंकुलित हुआ। तब आसंग -आसक्ति ने घेरा।काम/कामना जागी और उसके अपूर्ण रहने पर उसका बेटा जन्मा ” क्रोध “।अब इसकी सन्तान परम्परा चली और इससे”सम्मोह “नामक” पुत्र” पैदा हुआ।
कामात् क्रोधः अभिजायते।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः ।।
कोयं सम्मोहः कीदृशं चरित्रम्?
श्रीमदाद्य भगवत् पाद शङ्कर ने इसका चरित्र चित्रण किया- कार्याकार्यविषयः अविवेकः सम्मोहः।सम्मूढः सन् गुरुम् अपि आक्रोशति।
क्या करें, क्या न करें, यह मोह तो अत्यन्त ही अविवेकी आचरण चरित्र
वाला है।सम्मूढ होकर भगवत् स्वरूप गुरजनों के साथ भी ,अपने पितामहश्री”क्रोध” के भयंकर अनार्य और दूषित पापिष्ठ आचरण का
आचरण करने में, इसे संकोच नहीं –
मानहिं मातु पिता नहिं देवा।
साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिनके यह आचरन भवानी।
तेहि जानहु निशिचर सम प्रानी।।
श्री मधुसुदन सरस्वती पाद ने भी इसे इसी रूप वाला अभिव्यक्त किया- ,“कार्याकार्याविवेकाभावरूपः”
और मन् मध्वाचार्य ने “अधर्मेच्छु” कहते हुए ” अधर्मलक्षणं च पापकर्मसु नियतम् “
मानकर, “पापी” भी कह डाला।
विनयपत्रिका में-
मोहजनित मल लाग।
विविध विधि कोटिहु जतन न भाग।
कहते हुए गोस्वामी जी इस अविवेकी मोह को “रावण” भी कह देते हैं-
“मोह दशमौलि”
क्या कहें, यह सघन काली “मोह रात्रि “ सबको सुला कर,नाना विषयों का सपना
भी दिखाने से बाज नहीं आती-
मोह निशा सब सोवन हारा।
देखहिं सपन अनेक प्रकारा।। और
यह मोह तो म्लेच्छयवन जैसा है-
मोह निशि निबिडयवनान्धकारम् ।
अब जब अज्ञानी म्लेच्छ जन अन्धकार मूर्ति ही हैं , तब ज्ञानी का क्या? तत् संसर्ग वश,वह इसके चंगुल में फँस जाते हैं।”बाबा” का मन “मानस” बोल देता है-
जो ज्ञानिन कर चित अपहरई।
बरिआईं विमोह वश करई ।।
पौराणिक ऋषियों ने तो म्लेच्छ राक्षसादि
वध-प्रसंगों में पहले ही कहा था कि, यह अविद्या माया विषयविवश , बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी मोह में डालने वाली है, तब सामान्यों जनों की क्या-
ज्ञानिनाम् अपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।
और इसीलिये संस्कृत के ” गम्भीर” कवि भारवि ने “शास्त्र ” और “गुरु” के आश्रयपूर्वक इस मोह/अविवेक से बचने और सुविचारित कार्य करने की प्रेरणा दी है –
सहसा विदधीत न क्रियाम् ,
अविवेकः परमापदां पदम्।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं ,
गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।।
अविवेकी सम्मोहभ्रान्त मनुष्य बड़ा विचित्र है, उसका दिग्भ्रान्त मन, उसे चित्र विचित्र संसार में आकृष्ट करके, विषय सेवन से विरत नहीं होने देता।वह बेचारा बैचैन और लाचार, शरीर-संसार की सेवा करते,स्वयं को धन्य मानता हुआ,
भाग्यहीन, सर्वकारणकारण श्रीसीताराचन्द्र को भूल जाता है।क्योंकि उसे “जीवाचार्य” शेषावतार श्रीलक्ष्मण जी जैसे आचार्य गुरु का चरण ,आचरण और संरक्षण जो नहीं मिला-
सेवत लखन सिया-रघुबीरहिं।
जिमि अविवेकी पुरुष सरीरहिं।।
रामहिं भजहिं ते चतुर नर, जैसी बुद्ध दशा के चतुर कृषक ,जैसे सन्तसद् गुरु के मिलने पर , उनके निरीक्षण परीक्षण में दिव्य कुण्ठाहीन,अलौकिक और चिर प्रतीक्ष्य सर्वाभिलषित स्वयं विलसित
” वैकुण्ठ” की फसल मिल जाती है। जहाँ मोह न वरन् “मोहन” ही रमते हैं-
कृषी निरावहिं चतुर किसाना।
जिमि बुध तजहिं “मोह” मद माना।।
प्रभु श्रीराम की लीला में प्रवेश करें ,तो वहाँ भी एक मोह/अविवेक का प्रसंग बड़ा ही विलक्षण है।प्रेमी भक्त इसे नारद ” मोह” कहते हैं।
भगवान् की अविद्या माया ने एक नाट्य किया जिसमें “विश्वमोहिनी” नामक एक राजपुत्री का स्वयवंर होता है।
स्वयवंर के पूर्व ही उसका गुण- दोष विचारने नारद जी पधारते हैं।उसे देखते ही,उनका वैराग्य भ्रष्ट हो गया-
देखि रूप मुनि विरति बिसारी।
बड़ी बार लगि रहे निहारी ।।
उसका भाग्य ऐसा दीखा,कि नारद ने कहा -जो एहि बरै अमर सोइ होई।
समर भूमि तेहि जीत न कोई।।
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी।
जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।
स्वयवंर में जाने के पहले नारद जी भगवान् से उनका रूप माँगते हैं,जिससे वह राजकुमारी उन्हें वरण करे-
आपन रूप देहु प्रभु मोहीं।
आन भाँती नहिं पावहुँ ओही।।
जेहि विधि नाथ होइ हित मोरा।
करौं सो बेगि दास मैं तोरा।।
भगवान् नारद जी को” हरि”(बानर)
रूप देकर कहते हैं-
जेहि बिधि होइ परम हित,
नारद सुनहु तुम्हार ।
सोइ हम करब न आन कहु,
बचन न मृषा हमार ।।
कुपथ माँग रुज व्याकुल रोगी।
बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।
अब यहाँ देवर्षि नारद जी
तो मायावश “मूढ़” हो गए-
“माया बिवस भए मुनि मूढा़ ।” और
स्वयवंर मेंअन्य राजकुमारों के साथ जा
बैठे।भगवान् ने तो उन्हीं के हित के कारण उन्हें हरि(बानर) रूप दे दिया था –
मुनि हित कारन कृपानिधाना।
दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।
वहीं बैठे रुद्र के गण द्वि अर्थी संवाद में बोले-
रीझहिं राजकुँवरि छवि देखी।
इन्हहिं बरै ” हरि ” जानि विशेषी।
मुनि का मोह देख रुद्र गण हँसे। और बाबा ने कहा- मुनिहिं ” मोह”मन हाथ पराएँ।
हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।
नारद का वानर(हरि)रूप देख कर राजकुमारी क्रुद्ध होकर अन्य राजाओं की ओर चली गई-
मर्कट बदन भयंकर देही।
देखत हृदय क्रोध भा तेही।।
इधर भगवान् सुन्दर राजकुमार वेश में विराजे थे।सुन्दरी उन्हीं लक्ष्मीनिवास को वर माला डालती देती है-
धरि नृप तनु तहँ गयउ कृपाला।
कुँवरि हरषि मेलेउ जय माला।।
मोह(अविवेक)वश नारद की बुद्धि नष्ट हो गई थी-
मुनि अति बिकल मोह मति नाठी।
विवाह वंचित नारद ने क्रोध में भगवान् को शाप दे दिया। मेरी चाही सुन्दरी स्त्री से आपने छल करके मेरा वियोग कराया, मुझे वानर रूप दे दिया। इसलिए आप भी स्त्री विरह में दुखी होंगे।और वानर ही सहायक होकर आपको उबारेंगे-
कपि आकृति तुम कीन्हि हमारी।
करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।
भगवान् ने नारद जी के शाप को शीश पर धारण कर लिया। और उनसे विनती की।वे अपनी प्रचण्ड माया को वापस खींच लें-
शाप शीश धरि हरषि हिय प्रभु बहु विनती कीन्हि।निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।
अविद्या माया के हटते ही न वहाँ लक्ष्मी जी थीं और न ही कोई राजकुमारी-
जब हरि माया दूरि निवारी ।
नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
तब मुनि अति सभीत हरिचरना।
गहे पाहि प्रनतारति हरना।।
नारदजी लज्जित होकर अपना शाप झूठा होने की बात करने लगे ।भगवान् उन्हें शिवनाम जपने का आदेश करते हैं-
जपहु जाहु संकर सतनामा।
होइहि हृदय तुरत विश्रामा।।
नारद जी “नामजप” से पापमुक्त होते हैं। और भगवान् शिव भवानी से बलवती माया की विचित्रता कहते हैं-
यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरि माया मोहहिं मुनि ज्ञानी।।
सुर नर मुनि कोउ नाहिं, जेहि न मोह माया प्रबल।अस बिचारि मन माँहिं ,भजिअ महामाया पतिहि।
अब इस नारदमोह प्रसंग से यह समझने की बात है कि, नारदजी को वस्तुतः किसी अविवेक/मोह ने ग्रस्त नहीं किया था।वरन् यह तो भक्त और भगवान् की अद्भुत लीला(नाट्य/अभिनय) है।
यह लीला ,उन लोगों को सन्देश देती है जो मानव का विवेकी शरीर पाकर भी विषयवासनाग्रस्त होकर काम/कामना की पूर्ति न होने पर, क्रुद्ध होकर विवेक ही खो बैठते हैं।
इसीलिये भगवान् गीता में अत्यंत मोहग्रस्त भयंकर दुराचारी को भी भगवद् भजन संकल्प कर ,मोह त्याग कर शरण में आने पर साधु और भक्त बना देने का निश्चय व्यक्त करते हैं-
अपि चेत् सुदुराचारो भजते माम् अनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग् व्यवसितो हि सः।।
इसलिये सबसे पहले मनुष्यमात्र को , विवेकी सज्जनों का संग कर नामजपादि से अपना क्रियमाण कर्म पवित्र करना चाहिए और ऐसी दशा में, संचित कर्म बनेगा ही नहीं तथा प्रारब्ध भी इसी शरीर से भोग कर पूरा हो जायेगा।अब देखिये-
भगवान् राक्षस निग्रह कर जब अयोध्या में ,राज्य कार्य सँभालते हैं, तब सारी प्रजा में हर्ष ही हर्ष व्याप्त हो जाता है।
इस अवसर पर आने वाली श्रीरामचरित
मानस की चौपाई का एक स्वोद्भावित शिष्ट विशिष्ट अर्थ भी मेरे मन में बरबस आ जाता है-
राम राज बैठे त्रैलोका।
हर्षित भये गये सब सोका।।
बयरु न करु काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
मतलब कि ,जब –
भगवान् मन में, जिह्वा पर और निर्मल हृदय के आसन पर ,राज कर बैठ गए, तब कोई शोक ,मोह नहीं, प्रत्युत आनन्द ही आनन्द है।और इसीलिये उन्होंने “सुन्दरकाण्ड” में वचन दिया है, कि सांसारिक- झंझावात से विपद्ग्रस्त मनुष्य को हम शरणागत होने पर सन्तत साधु जीवन देकर नित्य मुक्त कर देंगे –
तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
।। हरिः शरणम् ।।