सातवीं साधन भक्ति में दो बातें कही जा रही हैं। एक यह कि सम्पूर्ण जगत् मात्र को मोहि(भगवान्) मय देखना।और दूसरी यह कि, निष्कामी साधु सन्तों को मुझ(भगवान्)से अधिक समझना ।
अब देखिये, यह दो मिलकर एक ही हैं।
दोनों देखने में अलग-अलग अवश्य हैं, लेकिन हैं, एक,क्यों?
बाबा ने विनयपत्रिका के57 वें पद में उत्तर दे दिया था-सन्त भगवन्त अन्तर निरन्तर नहीं। जब दोनों में रंचमात्र अन्तर नहीं है,तब सारी सृष्टि हरिः ओ3म् तत् सत् मय होने से,सभी में भगवद् दर्शन करना चाहिए। भगवत् तत्व और सन्त भक्त तत्व को पृथक् मानें तो-
यह भी तत्वतः ध्रुव है, कि चूंकि भक्तों की दृष्टि में स्वपर भेद नहीं है।अतः वे सभी में भगवान् को देखकर व्यवहार करते हैं।इसलिये कि उनका कोई शत्रु मित्र नहीं, वे तो तुलसी ममता राम सों समता सब संसार वाले हैं-
उमा जे रामचरनरत विगतकाममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।
वे तो जड़ चेतनात्मक पशु,पक्षी,कीट,
पतंग, लता, वृक्षादि में भी भगवद् दृष्टि रखकर सभी का पादरज सेवन करते हैं।नीम हो,पीपल हो,तुलसी हो,आम्र हो सभी में भगवद् स्वरूप देखने दिखाने वाले हैं-
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बन्दौं सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि।। और सभी के रामकृष्ण मय होने से सबको युगल हाथ जोड़कर प्रणाम भी करते हैं, क्यों की एक हाथ से प्रणाम करना शास्त्र निषिद्ध है,यह हमारी
प्रणाली नहीं –
सियाराम मय सब जग जानी ।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।
और भैया! देखना, चलना, फिरना उन्हीं का सार्थक है, जो विनाशशील संसार में अविनाशी को देख परमानंद उमगि अनुरागा हो जाते हैं। इसीलिये ब्रह्माण्ड गुरु की वाणी निकली –
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्सु अविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।13/27
और इसीलिये ऐसे ज्ञानी भक्त को भगवान् ने अत्यन्त दुर्लभ कहा।भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।। जो ज्ञानी है, वह भक्त होगा और जो भक्त है, वह ज्ञानी भी। और बहुत सारे जन्मों के अन्त में ज्ञानी मुझे या मेरी भक्ति पायेगा, इसका यह भी तात्पर्य है कि, इसी मनुष्य जन्म में, भगवत् प्राप्त सन्त साधु , दूसरा जन्म ही मानो दे देंगे,
जिससे सारा भेद मिटकर ,एक अभिन्न सच्चिदानंद घन का दर्शन होने लगेगा-
बहूनां जन्मनाम् अन्ते,
ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वम् इति ,
स महात्मा अतिदुर्लभः।। 7/19
और जिन महात्माओं ने गुरु अनुग्रह से देवानुग्रह प्राप्त किया और एक के बाद
दूसरे तक शृंखला की तरह यह भगवद् भक्ति अनुक्रमित हो रही है, वे तो धन्य धन्य हैं।
ऐसे ही सन्तों को बाबा चलता फिरता तीर्थराज प्रयाग कहते हैं। जिनकी महिमा का वर्णन स्वयं ब्रह्माविष्णुमहेश, व्यास वाल्मीकि की वाणी नहीं कर पा रही है।
वह तो तुलसी दास के लिये वैसे ही होगा जैसे सागभाजी को बेचने वाला बनिया हीरे मोती का क्या मोल बतायेगा?
विधि हरिहर कविकोविद बानी कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मो सन कहि जात न कैसे ,साक बनिक मनिगुन गन जैसे।।
सन्त महिमा को नारद जी के द्वारा प्रश्न करनेपर स्वयं भगवान् अरण्य काण्ड में कहते हैं-
सुनु मुनि सन्तन के गुन कहहूँ।
जिन्ह ते मैं उनके बस रहहूँ।।
वे भक्तजन मेरी लीला कथा गाते फिरते हैं और परमार्थी हैं।शास्त्र और स्वयं सरस्वती भी उन साधुगुणों को नहीं गा पाती-
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला।
हेतुरहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते।
कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
वे कामक्रोधादि षड् विकारों से विहीन ,
अव्यर्थ वाणी वाले,निष्कामी, स्थिरमति,
अकिंचन, पवित्र और मेरे जैसे सुख के आश्रयस्थल हैं, सदा दिवाली सन्त घर।
असीमित बोधवाले, इच्छाहीन, सीमित भोग वाले, सत्य सार बोलने वाले अग्रणी वक्ता और योगी हैं-
षट् विकार जित अनघ अकामा।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मित भोगी।
सत्यसार कवि कोविद जोगी।।
संसारविषयविष से सावधान, दूसरों को सम्मान देने वाले, अभिमान रहित, धैर्यवान्,धर्मरत और परम कुशल हैं।गुणों के आश्रय, दुखातीत, सन्देह रहित वे सन्त जन भगवच्चरण कमल के ही प्रेमी हैं, देहगेह के नहीं-
सावधान मानद मदहीना।
धीर धरमगति परम प्रवीना।।
गुनागार संसार दुख ,
रहित विगत सन्देह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय,
तिन्ह कहु देह न गेह।।
ऐसे सन्त सारे जगत् को भगवान् मय जान मान कर ,ऐसी रहनी सहनी से
रहते हैं कि, मैं तो उनके आधीन हो गया हूँ।साधुओं ने मेरे हृदय को ग्रस ही लिया है। जैसे मैं उनका प्रिय तथा वे मेरे प्रिय हैं- अहं भक्तपराधीनः हि,
अस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिः ग्रस्तहृदयः
भक्तैः भक्तजनप्रियः।।
और हे दुर्वासा जी! संसार से कुछ भी अपेक्षा न करनेवाले, शान्त,मौनी और सभी में समान दृष्टि से मुझे ही देखनेवाले सन्तों के पीछे-पीछे मैं ऐसे चलता हूँ, कि उनके चरणों से उड़ी धूल मेरे शिर पर पड़े और मैं पवित्र हो जाऊँ-
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शिनम्।
अनुव्रजामि अहं नित्यं पूययेद् अङ्घ्रिरेणुभिः।।
और इसीलिये साधन भक्ति के क्रम में स्वयं को चिन्मय रूप जगत् के कण-कण में देखने वाले सन्तों को अपने से अधिक श्रेष्ठ कहते हैं, जिनके अनुगमन से शरणागति भक्ति मिलती है-
सातम सम मोहिमय जग देखा।
मो ते अधिक सन्त करि लेखा।
।। हरिः शरणम् ।।