मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वासा।पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।

सत्संग, कथारति,विगतमान गुरुपद सेवा, निष्कपट प्रभुगुनगन गान के रूप में चार प्रकार की साधन भक्ति की उद्भावना के बाद भगवान् पंचम भक्ति कहते हैं-

मम(राम नाम) मन्त्र जप पर अत्यंत विश्वास रखते हुए,गुरुप्रणीत रीति से भजन करना चाहिए।
राम रामेति रामेति कर्णे कर्णे जपन् जनाः
इत्यादि स्वरूप की स्थिति में आ जाना-
“जप व्यक्तायां वाचि मानसे च” मतलब कि संस्कृत की “जप” धातु का अर्थ स्पष्ट वाणी से नामोच्चारण या मानसिक स्मरण भी होता है।अतः इसकेअनुसार श्रीराम नाम मन्त्र को मन में सतत स्मरण करें अथवा स्पष्ट रूप से व्यक्त वाणी के माध्यम से कहते हुए भजन( सेवन) करें, दोनों रीतियाँ भक्ति को पाने में सरल सरणि हैं।और सबसे बड़ी बात इसमें ये है कि ,इस क्रिया के तारतम्य में विश्वास भी हो।
और क्रमिक साधन भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं, तो विश्वास अर्थात् श्वास प्रश्वास के प्रत्येक आगमन-निर्गमन में विशेषता होनी चाहिये। आसनादि पर बैठ कर वाचिक रूप से अथवा चलते-फिरते,किसी भी दशा में मानसिक रूप से, यह नाम जप का अभ्यास होना चाहिये।
इसमें वेदगुरुवाक्यों में विश्वास पूर्वक श्रद्धा की भी,प्रधानता है,क्योंकि विश्वास ही श्रद्धा और श्रद्धा ही विश्वास है।
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ,कहकर भगवान् नामजप को श्रेष्ठतम कहते हैं।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ, की स्वाभाविक
चित्त की एकतानता, तन्मयता से सीताराम, राधेश्याम, उमाशंकर आदि नामों का किसी रूप में वाचिक या मानसिक जप ,भगवत् शरणागति भक्ति की प्राप्ति करा देता है।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। बन्दौ सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न। इत्यादि भाव से सानुराग नाम जप हो।
और इसीलिये विनयवाणी है-
राम जपु राम जपु राम जपु बावरे।
घोर भवनीरनीधि नाम निज नाव रे।
नाम जपो नहीं तो संसार सागर है, डुबा ही देगा। यदि जपे,तो नामसन्ताप से कलि जलने के भय से छिपे। और जपते जपते नाव ही बन जायेगा तथा मानव जन्म सफल हो जायेगा।
एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साध रे।ग्रसे कलि रोग ,जोग संजम समाधि रे।
राम नाम ही सो अन्त सब ही को काम रे।
यह रामनाम जप-भजनसेवन ही इस जन्म-मृत्यु का अन्त कराने वाला है।
इसलिये राम नाम जप कर,संसार का उच्छेद कर डालो।
यह नाम जप स्वतंत्र रूप से शरणागति भक्ति को प्राप्त करायेगा।
इसलिये भगवत् कृपा पाने के लिये और परम आत्यंतिक विश्राम वाली शरणागति गति हेतु श्रद्धा विश्वास से नाम जप में लगना चाहिए, क्योंकि-
बिनु बिश्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।रामकृपा बिनु सपनेहु जीव न लह विश्राम।
असि बिचारि मति धीर,तजि कुतर्क संशय सकल,भजहु राम रनधीर करुनाकर सुन्दर सुखद।।
भगवती जगदम्बा जानकी “नाम पाहरू दिवस निसि,ध्यान तुम्हार कपाट” ही सर्वसाधनसाधन मानती हुई जप में ही जागृत हैं।और अनन्य नामजापक श्रीहनूमान् जी महाराज इसी रूप में दर्शन करते हैं-
कृसतनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी।।
जगन्माता पार्वती भी, भगवान् चन्द्रमौलि को श्रीरामनाम जप लीन रूप में अवस्थित देखती हैं-
तुम पुनि राम -राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग अराती।।
इस जप को भगवान् शिव, भगवती शिवा से भजन का सर्वस्व ही बताते हैं-
उमा रामस्वभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
और शङ्करावतार श्रीमत् शङ्कराचार्य
भी “नाममहाराज” को कलिभेषज मानते हुए, भजते हैं-
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते।।
इसीलिये शबरी के लिये प्रदत्त साधन भक्ति के लिए भगवान् ने कहा-

मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वासा।
पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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