शरणागति

मत् समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत् समा नहि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु।

कलिकाल में देवाधिदेव महादेव के अवतार भगवत् पाद आचार्य शङ्कर जीव को नाना पाप ताप परिताप पूर्ण मानते हुए, और स्वयं जीव की सीमा ,मायाबद्धता तथा अल्पज्ञता समझते हुए सविनय निवेदन करते हैं।
बाबा ‘तुलसी’ की विनय पत्रिका तो ऐसे भावों से भरे पदों का समग्र संग्रह है।
चाहे शिवावतार शङ्कर हों या गोस्वामी जी ,सूर ,मीरा ,नानक,दादू ,
मलूक
,सभी की वाणियों में ऐसी भावना की प्रेममयी रसधार बहती दीखती है।


“भक्तमाल”ग्रन्थ के रचनाकार परम सिद्ध भक्त नाभादास की भी ऐसी भावमयी आतुरता में रता वाणी बहती है –
बातन ही हौं पतित पावन
पतित-पावन बिरद तिहारो।
सोई करौ परमान
पाहन नाव पार करौ ‘नाभा’
कै हरि! पकरौ कान
मो ते काम परै जानहुगे
बिनु रन सूर कहावन
बातन ही हौं पतित-पावन।।

भाव ये कि मुझ जैसे पातकी को भवसागर पार करा दोगे ,तो बड़े सूरमा कहाओगे। और नहीं तो कान पकड़ कर कहो मैं असमर्थ हूँ। तब तुम्हारा सर्वसमर्थ नाम कहाँ रहेगा?
ऐसी शरणागति भक्ति !
धन्य नाभा-भारती की आरति
परिपूरिता विश्वासश्रद्धा, जो परमात्मा को को भी उद्धार के लिए विवश कर देती है।
सभी सन्तों भक्तों को प्रणाम।

|| हरिः शरणम् ||

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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