अन्त राम कहि आवत नाही

मानसकार के मन में यह बात कैसे आकर शब्दाकार हो गई, समझ में नहीं आती।

अब देखिए ,वे कितनी उँचाई से कहते हैं-
जनम जनम मुनि जतन कराहीं।
अन्त राम कहि आवत नाहीं ।।
बारम्बार यत्न-प्रयत्न करते रहने पर भी जीवन के अन्त समय में भगवन्नाम और स्वरूप की स्मृति नहीं हो पाती, और यह कार्य अनेकानेक जन्मों में ऐसे ही चलता रहता है। आखिर इसका कारण क्या है?
अब इस पर विचार करने से पूर्व एक दाक्षिणात्य कवि का भावस्मरण होता है, जिसमें वह भगवान् के चरण-कमलों को पिंजरा और और स्वयं के मन को राजहंस का स्वरूप मानते हैं। इस मन रूपी हंस को भगवत्कृपा प्राप्त हो जाये,कि वह आज ही तत्क्षण चरण कमल के पिंजर में प्रवेश कर ले,क्योंकि अन्त का क्या ठिकाना ? वात-पित्त-कफों से घिरे कण्ठ से नामोच्चारण ही न हो पाये।
इसी सन्दर्भ में अपने मलूक-पीठ वाले महराजश्री ने एक स्मरण बार -बार अपनी वाणी से व्यक्त किया है। वे अपने कथा-प्रसंगों में बताते हैं कि एक बात पूज्य-भगवत्पाद शङ्कराचार्य श्री निश्चलानन्द तीर्थ जी ने स्वयं उनसे कही थी-
प्रसंग यों है कि एक वणिक्-सज्जन ,जो कि अनन्तश्रीविभूषित करपात्रीजी के शिष्य थे, जब उनका महाप्रयाण काल आया ,उसी समय परिव्रजन में टहलते -टहलते आचार्य शङ्कर वहाँ पधारे।
उनके पुत्रों ने उन्हें रोक लिया और कहा – महाराज ! मेरे पिताजी ने कभी कोकाकोला का सेवन हमारी जानकारी में नही किया, जीवन भर भवच्चर्चा और नाम जप में गुरु-कृपा से लगे रहे,किन्तु अब अन्त समय में ये ” कोकाकोला ” क्यों बोल रहे हैं?
आचार्य शङ्कर ने तत्काल शालग्राम शिला-स्पृष्ट जल उनके मुँह में क्या डलवाया कि ,वे तत्क्षण भगवन्नाम का उच्चारण करने लगे।
अब सोचिये क्या प्रतिबन्ध रह होगा कि अन्त ” राम ” कहि आवत नाहीं।
इसके बाद यह बात चर्चा में आई कि मनुष्य-मात्र को भगवदपराध और भक्तापराध से अवश्य बचना चाहिए। इसके साथ ही भगवत्प्रेमी जनों को भगवान् के लीला-रूप धाम में चिन्तन करते हुए अहं की निवृत्ति पर विशेष ध्यान रखना होगा। यदि इन दो बातों का ख्याल रखा जाय तो ,सम्भव है अन्त समय में भी भगवत्स्मृति और नामोच्चारण हो सके।
इसमें अहंकार बड़ा अहम् है। क्योंकि इसी को भगवत्स्मृति का बड़ा अवरोधक मानते हैं। इसे पाँच प्रकार का कह गया है-
जाति, विद्या, पद ,रूप और यौवन। भक्त को इन पाँचों से अनिवार्यतः मुक्त होना ही होगा,क्योंकि नान्यः पन्था विद्यतेयनाय-
जातिः विद्या महत्वं च,
रूप-यौवन-मेव च।
एते वै यत्नतः त्यज्याः,
पञ्चैते भक्ति-कङ्टकाः।।
तो अब इस बात में कोई सन्देह नहीं कि भगवद्भक्त यदि भगवान् को ही जगत् का
निमित्तोपादान कारण मानते हुए उक्त अभिमान से मुक्त हो पाये तो भगवान् और उनके प्यारे-प्यारे भक्तोंकी कृपा से अवश्य ही परम -प्रयाण काल में नाम- लीला का स्मरण हो पायेगा, जैसा कि सन्त-सङ्कल्प से ” अजामिल” को भी मिला।

।। हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/01/20/अन्त-राम-कहि-आवत-नाही/

प्रेम ही भक्ति है

संस्कृत भाषा में एक धातु है – ” प्रीञ् ” इसका अर्थ होता है- तृप्ति , इसी धातु में ” मनिन् ” प्रत्यय जोड़कर “प्रेम ” शब्द बनता है। तब प्रेम का अर्थ हुआ परम तृप्ति, क्योंकि धातु अतिशय अर्थ में है।
इधर भक्ति शब्द की निष्पत्ति पहले ” भज् ” धातु से मानने पर इसका अर्थ तो ” सेवा ” है,क्योंकि सेवार्थक धातु है।
अब सेवा किसकी? तो इस पिण्ड शरीर में भिन्न-प्रभिन्न इन्द्रियों से शरीर-सुखार्थ की गई स्वयं की ही सेवा सबसे पहले है।क्योंकि इसके बिना तो शरीर-गति सम्भव नहीं। अब आती है ,इस पिण्ड-शरीर से संसार के अन्यान्य जीव-जगत् की सेवा का कार्य, जो साधु-कार्य है।
इस तरह स्वशरीर एवं पर शरीर की सेवा का कार्य ही भक्ति है। भक्ति से तृप्ति प्राप्त होती है। और अतिशय तृप्ति या आत्यन्तिक तृप्ति को यदि “प्रेम” यह अन्य नाम दे दें ,तो बात समझ में आती है कि इसी प्रेम-दशा में सेवा या भक्ति का अंकुर फूटता है।
वस्तुतः प्रेम से भी तृप्ति होती है और (भक्ति) सेवा से भी। प्रेम हो या सेवा ,दोनों केवल प्रेम या सेवा के लिए ही होने चाहिए।इसमें और कुछ दूसरा नहीं।
तुलसी का “मानस ” याद आता है, जब तमोभार से व्यथित “पृथ्वी” भगवान् श्रीविष्णु का शरण लेकर प्रार्थना करती है।
देवता भी साथ रहते हैं, महादेव भी।
देवाधिदेव ने यह बात भगवती पार्वती से अपने अनुभव की कही। उन्होने कहा कि भगवान् श्रीहरि तो अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में सभी जगह व्यापक हैं। किन्तु मैं यह जानता हूँ कि, निश्छल प्रेम पूर्वक स्मरण किये जाने पर वे इस विपत्ति से अवश्य छुटकारा दिलायेंगे।वह अकारण कारुणा-वरुणालय और स्वयं प्रेम स्वरूप ही हैं-

तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ वचन एक कहेऊँ ।।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना ।।

तो भगवान् तो स्वयं प्रेम स्वरूप हैं।उनके समान अपने भक्तों के प्रति प्रेम या सेवा और किसी में सम्भव नहीं।
भगवान् भक्त के हैं और भक्त भगवान् के।
यही भाक्त (प्रेम) सम्बन्ध सतत और अटूट है। देवर्षि नारद अपने भक्ति-सूत्र में “भक्ति” को परम प्रेम स्वरूप ही कहते हैं।
भगवान् के प्रेमी और उनके भक्तों का यह प्रेम अनश्वर है।इसी प्रेमाविष्ट दशा में वह कर्म-बन्ध को तोड़कर तज्जन्य जन्म से विरहित होकर निश्चिन्त हो जाता है।
इसीलिए वह ” शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ” श्रुति वाक्यतः अमृतमय दीखता है।
इस परम प्रेममय भक्ति से भक्त , अमृत और तृप्त होता है-

सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धः भवति।
अमृतः भवति तृप्तः भवति।

वस्तुतः परम के प्रति प्रेम ही भक्ति पद वाच्य है।वह भक्ति ही प्रेम है या प्रेम ही भक्ति है।
अनन्यशरणागत बाबा तुलसी एक अवसर पर भक्ति की दृढ़ता प्रेम द्वारा मानते हैं, तो दूसरे क्षण परम प्रेम स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति को जोग,जप,ज्ञान और वैराग्य से न मानकर एकमेव प्रेम द्वारा ही मानते हैं।और एक मार्मिक प्रसंग में उत्तर काण्ड में गुरु वशिष्ठ द्वारा जन्म-जन्मान्तर से विषयासक्त जीव की वैषयिक-मलिनता का आत्यन्तिक विनाशीकरण एकमात्र प्रेम-भक्ति के जल से होता है।क्योंकि मल की शुद्धि मल से नहीं, बल्कि अत्यन्त शुद्ध जल से ही सम्भव है-

छूटहिं मल कि मलहिं के धोए।
घृत कि पाव कोइ बारि बिलोए।
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभयन्तर मल कबहुँ न जाई।।

अतः निष्काम प्रेमी और भगवद् भक्त श्रीभरत जी महाराज एवं भगवान् के अत्यन्तात्यन्त प्रिय हनुमान् जी महाराज
हम जैसे विषयासक्त जीवों पर करुणा भरी निगाह फेर दें तो उनके प्रेम और भक्ति का लवमात्र हममें आ जाये, जिससे यह मानव-जन्म सार्थक हो सके।

।। हरिश्शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/01/01/प्रेम-ही-भक्ति-है/