सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

सर्वधर्मान्परित्यज्य
अष्टादशमे अध्याय मे श्री मन्नारायण ने एक बात कही-
सर्वधर्मान्परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुच।।
“सभी धर्मों को त्याग कर मेरी शरण आओ, मैं तुझे सारे पापों से मुक्त कर दूंगा।”
इसे और स्पष्ट करने के लिए”अहम्”और “माम्”दोनों को समझना होगा।ये दोनों संस्कृत पद “अस्मद्”के प्रथमान्त,द्वितीयान्त एकवचन रूप हैं।अर्थात्-अहम्=मैं (परमात्मा) तथा त्वाम् =तुम (जीवात्मा) नित्य रूप से एकरूप स्थित हैं,क्योंकि मैं सर्वात्मा हूँ(अहमात्मा गुडाकेश)
वस्तुतः ऐन्द्रिक वृत्ति आत्मानुसन्धान योग्य नहीं है।संयम की दृढावस्था मे स्थिरबुद्धि की प्राप्ति संभव है।और इसी वृत्ति के कारण इन्द्रियों का विषय संयोग छूट जायेगा।और तब इन्द्रियाँ अपने अपने गोलकों मे स्थिर हो जायेंगी।शुभाशुभ व्यापार नहीं होगा। “सर्वधर्मान्परित्यज्य”का तात्पर्य धर्माधर्म, शुभाशुभ दोनों का त्याग हो जाने से है।यही निरूद्ध वृत्ति आत्मानुसन्धान कार्य करेगी।यही शरणागति भी होगी।
भगवान् के कहने का तात्पर्य है कि मुझ क्षेत्रज्ञ(सर्वात्मा)मे जो तुम्हारी निष्ठा होगी तो शोकमोह निवृत्ति होगी और अभय पदप्राप्ति भी स्वतः सिद्ध है। यही सर्वानन्दकरी स्थिति होगी।
।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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