सत्संग के विना विवेचना संभव नहीं है और यह सत्संग भी भगवान की कृपा के विना प्राप्य नहीं।सम्पूर्ण मोद आनंद का कोश तथा सारी सिद्धियों का मूल है सत्संग।दुर्जनो मे सुधार इसी से संभव है ,जैसे कि पारस के स्पर्श से कुधातु का भी स्वर्ण बन जाना ।”स्वर्ग और मोक्ष के समग्र सुख की तुलना सत्संग के एक पलमातत्र से भी नहीं की जा सकती।”तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला इक अंग ,तूल न ताहि सकल मिलि ज्यों सुख लव सतसंग।”
||हरिश्शरणम्||