लोक सेवक वास्तविक जन सेवक बने

“सुत वित लोक ईषणा तीनी ,केहि कर मति एहि कृत न मलीनी “एषणा त्रयत्याग:संन्यास:”धन,सन्ततिऔर लोकप्रतिष्ठा की प्रबलेच्छा सभी मे सामान्य है,जो मानवीय मनोमालिन्य की परिणति को प्राप्त होती है।देश की आजादी से लेकर आज तक राजनीतिज्ञ शासक और लोक सेवा आयोग से चयनित लोक सेवक जन (Public Servent)इसी भ्रम के वशीभूत रहे है।ऐसे लोगों ने पैसे को ही सर्वोपरि मान मूल लक्ष्य सेवा कार्य से भटक गये।जिससे समाज सेवा व्यक्ति सेवा मे केन्द्रित हो गई।लेकिन भगवत् कृपा से साधु भावी और सेवा भावी सज्जनो के पास सत्ता संचालन का दायित्व आ पडा है।भगवान कृपा करें ऐसे साधु लोग पैसों के लोभ मे न पडे।क्यों कि -“पैसा पापी साधु को परसि लगावै पाप ।परसि लगावै पाप ज्ञान वैराग्य बिगारै।काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर शृंगारै।सब द्रोहिन सो बडो सन्त द्रोही नहि ऐसा।भगवत रसिक अनन्य भूलि परसो जनि पैसा।”इसलिये शासन के सूत्रधार साधु अत्यंत सावधानी बरतें।

||हरि:शरणम्||

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राम और गान्धी का रामराज्य

“स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि ।आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।”स्नेह,दया, सुख और यहाँ तक कि अपनी प्रियतमा जानकी भी क्यों न हो मुझे लोक(प्रजा)के अनुरंजन के लिये कुछ भी त्यागने मे कठिनाई नहीं है।”यह है राजा राम के लोक मंगल का संकल्प, यही है गान्धी के सपनों का रामराज्य ,जिसे अपनों ने सपना ही बना रहने दिया।सौभाग्य से भगवत् कृ पा से देश के किसी कोने से राम राज्य के स्वर्णिम सूर्योदय की  आभा दीख रही है।भगवान राम कृष्ण रक्षा करें।

||हरि:शरणम्||

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शुभदात्री और अशुभहन्त्री माँ भगवती

हे भगवती! यह कोई बताये कि ऋषियों का कौन सा कथन तुम्हारी स्तुति नहीं है।यह बात निर्विवाद रूप से सनातन सत्य है कि सम्पूर्ण शब्द राशि तुम्हारा ही शरीर है।तुम्ही अनुच्चरित अर्थ रूपस्थ ,अनुच्चार्य अर्ध मात्रास्थ तथा प्रकटीकृत शब्द स्वरूप भी हो।संसार की समस्त मूर्तियों(शरीरों )मे तुम्हीं विद्यमान हो चाहे वह बाहर दृश्य हो अथवा अन्त:दृश्य मानस मात्र।शुभदात्री और अशुभहन्त्री भी तुम्हीं हो।आपकी कृपा करूणा पूर्ण दृष्टि मात्र से अतिशय स्नेहवशात् यह मानव जन्म प्राप्त है।अतः मेरे लिये आपके द्वारा प्रदत्त समय का अंशमात्र भी आपकी स्तुति, जप,अर्चन,चिन्तन से विहीन नहीं है।आपकी करूणार्द्र दृष्टि ऐसी बनी रहे कि मैं आपका भजन(आप द्वारा सृजित सृष्टि की सेवा )करता रहूँ-“तव च का किल न स्तुतिरम्बिके ,सकलशब्दमयी किल ते तनु:।निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहि:प्रसरासु च।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे जगति जातमयत्नवशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन कालकलास्ति मे।”

||शिव:शरणम्||

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मन रुपी दर्पण

जो अज्ञानी, मूर्ख, अन्धे और भाग्यहीन है तथा जिनके मन रुपी दर्पण पर विषय की काई जमी हुई है, जो लंपट ,कपटी और कुटिल स्वभाव वाले है, जिन्होंने सन्त समाज के दर्शन नहीं किए है ,उन्हें भगवान श्री राम का रूप भी नहीं दिखाई देगा।ऐसे लोग उन्माद ग्रस्त होकर, भूतों की तरह बिना विचारे बोलते है ।इस प्रकार के लोगों ने महामोह रूपी मदिरा पी रखी है ,जिनके कहने पर भारत की धर्म प्राण जनता अब ध्यान नहीं देती।ऐसे अप्रासंगिक और विषयासंगिक लोगों को आगे भी जनता जबाब देगी-“अग्य अकोबिद अन्ध अभागी ,काई विषय मुकुर मन लागी ।लंपट कपटी कुटिल विशेषी ।सपनेहु सन्त सभा नहिं देखी।बातुल भूत विवश मतवारे ,ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।जिन्ह कृत महामोह मद पाना।तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ।”

||हरि:शरणम्||

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भक्ति, भक्त, भगवान और गुरु

भक्ति, भक्त, भगवान और गुरु ये चारों नाम अलग अलग है ।किन्तु इनका विग्रह मिलकर एक ही है। इनके चरण वन्दन या इनके चरण का आचरण करने पर सारी बाधायें स्वतः निर्मूल हो जाती है -“भक्ति भक्त भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक इनके पद वन्दन किए नाशैं विघ्न अनेक।”

||हरि:शरणम्||

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तीसरी आँख

कहते हैं परमात्मप्राप्ति किसी सम्प्रदाय द्वारा अथवा प्रवचनादि द्वारा भी सम्भव नहीं।वस्तुतः परमात्मा तो आत्मा(नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन)
द्वारा हृदय देश मे स्वयं के अनुसन्धान का विषय है।बालकाण्ड मे –
उघरहिं विमल विलोचन ही के।
मिटहिं दोष दुख भवरजनी के।।
यहाँ “ही ” शब्द का प्रयोग हृदय देश हेतु किया गया
प्रतीत होता है।वही तीसरा नेत्र है।जो स्वयं प्रकाश परमात्मा बुद्धि को प्रकाशित करता है,वही हृदयस्थ है।
“बुद्धेरात्मा महान् पर: “यही बुद्धि से श्रेष्ठ
आत्मा वर्णित है।इसका तात्पर्य है कि आत्मा से अविकल तादात्म्य केवल बुद्धि का है,जो बुद्धि चैतन्य होकर कण्ठ मे स्वप्न का कार्य तथा नेत्र पर आकर जगत् को देखने, सुनने, सूँघने व स्पर्श करने का कार्य करती है।वुद्धि के साथ जो “मैं” पन है, वही बन्धन है और जन्म-मृत्यु और अविद्या का
स्वरूप है।जब तक बुद्धि के अन्दर उससे विलक्षण और इसके प्रकाशक “चैतन्य”की अनुभूति नहीं होगी, तब तक (अहंकार)मैं पन की निवृत्ति भी नहीं होगी।चैतन्य,बुद्धि का प्रकाश स्वरूप स्वयमेवानुभव गम्य है।वाणी का विषय कदापि
नहीं।गोस्वामी जी ने कहा-
सन्मुख जीव होहिं मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं।।
अर्थात् जब तक बुद्धीन्द्रिय निर्मल नहीं होगी
तब तक तीसरी आँख नहीं खुल सकती और जीवात्मा साधक आवागमन से मुक्त भी नहीं हो सकता।यही सनातन धर्म का सार है।।

|| हरिश्शरणम् ||

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विज्ञान और निर्गुण ब्रह्म

भौतिक संसाधनों से “नासा”के विज्ञान वेत्ता, इस प्रकृति मे और समग्र ब्रह्माण्ड मे,जब “ओ3म्”की ध्वनि(गूंज और अनुगूँज)का नैरन्तर्य सुनते हैं, तब वे वैज्ञानिक-गण हमारी ऋषि परम्परा का स्पर्श करते हुए प्रतित होते हैं।यह ओंकार वेदों मे”प्रणव”भी कहा गया है, जो कि ब्रह्माण्डीय प्रकृति के श्वास-प्रश्वास मे प्रतिक्षण प्रवहमान है।”प्रणव”ब्रह्मवत् निराकार, निर्गुण होकर भी अपने तीनों अक्षरों से सगुण”राम-नाथ”का संवाहक हो जाता है।सगुण से निर्गुण और निर्गुण से सगुण की निरन्तर इस महायात्रा मे ब्रह्मवत्”प्रणब”अदृश्य, निराकार, वायुस्वरूप अनन्त आकाश मे ही परा चेतना और अपनी योगावगत योग्यता से स्वस्वरूपानुभूति द्वारा श्रूयमाण है।इसको जानने और स्वस्थ सानन्द रहने की अनुपम विधि इसी शरीर-पिण्ड मे”योग”के माध्यम से वर्णित है।वस्तुतः यह (अष्टांग)योग,(मानव)व्यष्टि से(ब्रह्माण्ड)समष्टि की अद्भुत प्रविधि है ,जिसमें भारतीय मनीषा का शाश्वत वैश्विक शान्ति का मनोहर सन्देश छिपा हुआ है।और आज तो ऐसा लगता है कि इन्हीं कारणों से”भारत”विश्व गुरु रहा है और रहेगा, क्योंकि अनेक परम्पराओं, संस्कृतियों को जानने मानने वाले अनेक लोग 21जून के प्रति आकृष्ट होकर, योगध्यान करते हुए अदृष्ट शान्तानन्द की कामना मे तल्लीन ,मन्त्रमुग्ध हैं।आज21जून2017को तृतीय”अन्ताराष्ट्रिय योग दिवस”मनाये जाने के सूत्रधार, ऋषि परम्परा के धारावाहिक, सहयोग-सह-अस्तित्व के अनुपम पुरोधा भारत के (प्रधान सेवक)प्रधानमन्त्री और उनकी प्रेरणा स्रोत अदृश्य ऋषि सत्ता को अनन्त कोटिक नमन करता हूँ।यह “योग”का”प्रयोग”वैश्विक स्तर पर ,समस्त द्वन्द्वों पर विजय करते हुए, आतंकवाद और अन्याय को मिटाकर, सानन्द-जीवन की साधन-कला है।

हरिश्शरणम्।ओ3म्।

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सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्

सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्।चिदाकाशावतंसं ,तं सद्गुरूं प्रणमाम्यहम्।।दिक्-कालादि-अनवच्छिन्न-अनन्त-चिन्मात्र-मूर्तये,स्वानुभूति-एक-मानाय नमः शान्ताय तेजसे। अर्थात्-सारी आशाओं(दिशाओं)मे व्याप्त ध्वान्त(अन्धकार)से निर्मुक्त ,समस्त दिशाओं को अपने (ज्ञान के) आलोक से प्रकाशित करनेवाले, चित्(चेतन )मात्र आकाश(ब्रह्म)मे अधिष्ठान ग्रहण करनेवाले, सद्गुरू भगवान को बारम्बार प्रमाण है।।दिशा, काल आदि से अपरिच्छिन्न अर्थात् जिसे दिशा कालादि व्याप्त नहीं कर सकते, वह उन्हें अवश्य अभिव्याप्त करके रहता है।अनन्त चेतन मात्र मूर्ति स्वरूप वाले तथा स्व(अपनी आत्मा)मे ही जिनकी अनुभूति ही एकमात्र मान(प्रमाण) है, ऐसे शान्तहृदयाकाशविराजित शान्त केवल तेज:स्वरूप परमात्मा को अनन्त प्रणाम है।

हरि:शरणम्।

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अहिंसा से बढ़कर कोई पुण्य नहीं

परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा।
परनिंदा सम अघ न गरीसा।।
अर्थात्-अहिंसा से बढ़कर कोई पुण्य नहीं।परनिंदा से बढ़कर कोई पाप नहीं।
परनिंदा से सप्रयास बचना चाहिए, क्योंकि उसके कुफल बड़े कष्ट प्रद हैं-
हर गुरु निन्दक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।
द्विजनिन्दक बहुनरक भोगकरि।
जग जनमै बायस शरीर धरि।।
सुरश्रुति निन्दक जे अभिमानी।
रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
होहिं उलूक सन्त निन्दा रत।
मोह निशाप्रिय ज्ञान भानुगत।।
सब कै निन्दा जे जड़ करहीं।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
हरिश्शरणम्।

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ज्ञान और भक्ति

घण्टा, घडियाल, तिलक एवं माला मात्र से ही भक्ति नहीं होती है, ये सभी साधन हो सकते हैं।ज्ञान और भक्ति मे भी अन्तर है।भगवान् भाष्यकार कहते हैं-“स्वस्वपानुसन्धानं
भक्तिरित्यभिधीयते “अर्थात्
स्वस्वरूप अपने आत्मा के
अनुसन्धान वाली वृत्ति उत्पन्न
करना ही भक्ति का मूल है।
ज्ञान क्या है-“ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् “अर्थात्-
आत्मा और परमात्मा के एकत्व दर्शन का नाम ज्ञान है।
वस्तुतः जब तक आत्मानुसंधान वृत्ति नहीं उत्पन्न होगी, तब तक सौ जन्मो तक ज्ञान नहीं होगा और मुक्ति भी नहीं होगी।भगवान ने अध्यात्म रामायण मे हनुमानजी
कहा था-“मद्भक्तिविमुखानां
हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।न
ज्ञानं न च मोक्ष:स्यात् तेषां
जन्मशतैरपि।” अर्थात्-शास्त्र रूपी गड्ढे मे मोहित लोगों को
मेरी भक्ति भी नहीं प्राप्त होगी और ज्ञान भी नहीं होगा।
भक्ति से ही ज्ञान विज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है,और वस्तुतः भक्ति(माता)के दो
पुत्र हैं-ज्ञान और विज्ञान।
“जा ते वेगि द्रवौं मैं भाई।सो मम भक्ति भक्त सुखदाई।।सो स्वतंत्र अवलम्ब न आना।
जेहि आधीन ज्ञान विज्ञाना ।।
अर्थात्-जिससे मैं शीघ्र द्रवित होता हूँ, वह क्या है-मेरी भक्ति है।और भक्ति स्वतंत्र है ज्ञान विज्ञान उसके पुत्र हैं।इसलिए माता के बिना पुत्र का जन्म नहीं हो सकता और यह भक्ति ही
सुख का मूल है -“तात भगति
अनुपम सुख मूला।मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।”अनुकूलवेदनीयत्वं सुखं”अनुकूलता सुख का अपर पर्याय है।और यह अनुकूलता समग्र सृष्टि के प्रति हो तभी सन्त, भगवन्त भी मिलेंगे, जोकि सुख का मूलाधार है।
हरिश्शरणम्।।

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