तीसरी आँख

कहते हैं परमात्मप्राप्ति किसी सम्प्रदाय द्वारा अथवा प्रवचनादि द्वारा भी सम्भव नहीं।वस्तुतः परमात्मा तो आत्मा(नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन)
द्वारा हृदय देश मे स्वयं के अनुसन्धान का विषय है।बालकाण्ड मे –
उघरहिं विमल विलोचन ही के।
मिटहिं दोष दुख भवरजनी के।।
यहाँ “ही ” शब्द का प्रयोग हृदय देश हेतु किया गया
प्रतीत होता है।वही तीसरा नेत्र है।जो स्वयं प्रकाश परमात्मा बुद्धि को प्रकाशित करता है,वही हृदयस्थ है।
“बुद्धेरात्मा महान् पर: “यही बुद्धि से श्रेष्ठ
आत्मा वर्णित है।इसका तात्पर्य है कि आत्मा से अविकल तादात्म्य केवल बुद्धि का है,जो बुद्धि चैतन्य होकर कण्ठ मे स्वप्न का कार्य तथा नेत्र पर आकर जगत् को देखने, सुनने, सूँघने व स्पर्श करने का कार्य करती है।वुद्धि के साथ जो “मैं” पन है, वही बन्धन है और जन्म-मृत्यु और अविद्या का
स्वरूप है।जब तक बुद्धि के अन्दर उससे विलक्षण और इसके प्रकाशक “चैतन्य”की अनुभूति नहीं होगी, तब तक (अहंकार)मैं पन की निवृत्ति भी नहीं होगी।चैतन्य,बुद्धि का प्रकाश स्वरूप स्वयमेवानुभव गम्य है।वाणी का विषय कदापि
नहीं।गोस्वामी जी ने कहा-
सन्मुख जीव होहिं मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं।।
अर्थात् जब तक बुद्धीन्द्रिय निर्मल नहीं होगी
तब तक तीसरी आँख नहीं खुल सकती और जीवात्मा साधक आवागमन से मुक्त भी नहीं हो सकता।यही सनातन धर्म का सार है।।

|| हरिश्शरणम् ||

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विज्ञान और निर्गुण ब्रह्म

भौतिक संसाधनों से “नासा”के विज्ञान वेत्ता, इस प्रकृति मे और समग्र ब्रह्माण्ड मे,जब “ओ3म्”की ध्वनि(गूंज और अनुगूँज)का नैरन्तर्य सुनते हैं, तब वे वैज्ञानिक-गण हमारी ऋषि परम्परा का स्पर्श करते हुए प्रतित होते हैं।यह ओंकार वेदों मे”प्रणव”भी कहा गया है, जो कि ब्रह्माण्डीय प्रकृति के श्वास-प्रश्वास मे प्रतिक्षण प्रवहमान है।”प्रणव”ब्रह्मवत् निराकार, निर्गुण होकर भी अपने तीनों अक्षरों से सगुण”राम-नाथ”का संवाहक हो जाता है।सगुण से निर्गुण और निर्गुण से सगुण की निरन्तर इस महायात्रा मे ब्रह्मवत्”प्रणब”अदृश्य, निराकार, वायुस्वरूप अनन्त आकाश मे ही परा चेतना और अपनी योगावगत योग्यता से स्वस्वरूपानुभूति द्वारा श्रूयमाण है।इसको जानने और स्वस्थ सानन्द रहने की अनुपम विधि इसी शरीर-पिण्ड मे”योग”के माध्यम से वर्णित है।वस्तुतः यह (अष्टांग)योग,(मानव)व्यष्टि से(ब्रह्माण्ड)समष्टि की अद्भुत प्रविधि है ,जिसमें भारतीय मनीषा का शाश्वत वैश्विक शान्ति का मनोहर सन्देश छिपा हुआ है।और आज तो ऐसा लगता है कि इन्हीं कारणों से”भारत”विश्व गुरु रहा है और रहेगा, क्योंकि अनेक परम्पराओं, संस्कृतियों को जानने मानने वाले अनेक लोग 21जून के प्रति आकृष्ट होकर, योगध्यान करते हुए अदृष्ट शान्तानन्द की कामना मे तल्लीन ,मन्त्रमुग्ध हैं।आज21जून2017को तृतीय”अन्ताराष्ट्रिय योग दिवस”मनाये जाने के सूत्रधार, ऋषि परम्परा के धारावाहिक, सहयोग-सह-अस्तित्व के अनुपम पुरोधा भारत के (प्रधान सेवक)प्रधानमन्त्री और उनकी प्रेरणा स्रोत अदृश्य ऋषि सत्ता को अनन्त कोटिक नमन करता हूँ।यह “योग”का”प्रयोग”वैश्विक स्तर पर ,समस्त द्वन्द्वों पर विजय करते हुए, आतंकवाद और अन्याय को मिटाकर, सानन्द-जीवन की साधन-कला है।

हरिश्शरणम्।ओ3म्।

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सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्

सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्।चिदाकाशावतंसं ,तं सद्गुरूं प्रणमाम्यहम्।।दिक्-कालादि-अनवच्छिन्न-अनन्त-चिन्मात्र-मूर्तये,स्वानुभूति-एक-मानाय नमः शान्ताय तेजसे। अर्थात्-सारी आशाओं(दिशाओं)मे व्याप्त ध्वान्त(अन्धकार)से निर्मुक्त ,समस्त दिशाओं को अपने (ज्ञान के) आलोक से प्रकाशित करनेवाले, चित्(चेतन )मात्र आकाश(ब्रह्म)मे अधिष्ठान ग्रहण करनेवाले, सद्गुरू भगवान को बारम्बार प्रमाण है।।दिशा, काल आदि से अपरिच्छिन्न अर्थात् जिसे दिशा कालादि व्याप्त नहीं कर सकते, वह उन्हें अवश्य अभिव्याप्त करके रहता है।अनन्त चेतन मात्र मूर्ति स्वरूप वाले तथा स्व(अपनी आत्मा)मे ही जिनकी अनुभूति ही एकमात्र मान(प्रमाण) है, ऐसे शान्तहृदयाकाशविराजित शान्त केवल तेज:स्वरूप परमात्मा को अनन्त प्रणाम है।

हरि:शरणम्।

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अहिंसा से बढ़कर कोई पुण्य नहीं

परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा।
परनिंदा सम अघ न गरीसा।।
अर्थात्-अहिंसा से बढ़कर कोई पुण्य नहीं।परनिंदा से बढ़कर कोई पाप नहीं।
परनिंदा से सप्रयास बचना चाहिए, क्योंकि उसके कुफल बड़े कष्ट प्रद हैं-
हर गुरु निन्दक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।
द्विजनिन्दक बहुनरक भोगकरि।
जग जनमै बायस शरीर धरि।।
सुरश्रुति निन्दक जे अभिमानी।
रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
होहिं उलूक सन्त निन्दा रत।
मोह निशाप्रिय ज्ञान भानुगत।।
सब कै निन्दा जे जड़ करहीं।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
हरिश्शरणम्।

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ज्ञान और भक्ति

घण्टा, घडियाल, तिलक एवं माला मात्र से ही भक्ति नहीं होती है, ये सभी साधन हो सकते हैं।ज्ञान और भक्ति मे भी अन्तर है।भगवान् भाष्यकार कहते हैं-“स्वस्वपानुसन्धानं
भक्तिरित्यभिधीयते “अर्थात्
स्वस्वरूप अपने आत्मा के
अनुसन्धान वाली वृत्ति उत्पन्न
करना ही भक्ति का मूल है।
ज्ञान क्या है-“ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् “अर्थात्-
आत्मा और परमात्मा के एकत्व दर्शन का नाम ज्ञान है।
वस्तुतः जब तक आत्मानुसंधान वृत्ति नहीं उत्पन्न होगी, तब तक सौ जन्मो तक ज्ञान नहीं होगा और मुक्ति भी नहीं होगी।भगवान ने अध्यात्म रामायण मे हनुमानजी
कहा था-“मद्भक्तिविमुखानां
हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।न
ज्ञानं न च मोक्ष:स्यात् तेषां
जन्मशतैरपि।” अर्थात्-शास्त्र रूपी गड्ढे मे मोहित लोगों को
मेरी भक्ति भी नहीं प्राप्त होगी और ज्ञान भी नहीं होगा।
भक्ति से ही ज्ञान विज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है,और वस्तुतः भक्ति(माता)के दो
पुत्र हैं-ज्ञान और विज्ञान।
“जा ते वेगि द्रवौं मैं भाई।सो मम भक्ति भक्त सुखदाई।।सो स्वतंत्र अवलम्ब न आना।
जेहि आधीन ज्ञान विज्ञाना ।।
अर्थात्-जिससे मैं शीघ्र द्रवित होता हूँ, वह क्या है-मेरी भक्ति है।और भक्ति स्वतंत्र है ज्ञान विज्ञान उसके पुत्र हैं।इसलिए माता के बिना पुत्र का जन्म नहीं हो सकता और यह भक्ति ही
सुख का मूल है -“तात भगति
अनुपम सुख मूला।मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।”अनुकूलवेदनीयत्वं सुखं”अनुकूलता सुख का अपर पर्याय है।और यह अनुकूलता समग्र सृष्टि के प्रति हो तभी सन्त, भगवन्त भी मिलेंगे, जोकि सुख का मूलाधार है।
हरिश्शरणम्।।

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राम के सगुण और निर्गुण रूप की जिज्ञासा

मानसकार ने श्री राम के सगुण और निर्गुण रूप की जिज्ञासा-
राम कवन पूछौं प्रभु तोहीं।कहहु
बुझाइ कृपानिधि मोहीं।” पर उत्तर दिया-राम अवध भूपति सुत सोई ।की अज अगुन अलख गति कोई।
इसी तरह और भी कहा-राम स्वरूप तुम्हार ,वचन अगोचर
बुद्धि पर।अविगत अलख अपार, नेति नेति नित निगम कह ।।अर्थात्-हे अवध भूपति के पुत्र आपका स्वरूप वाणी और बुद्धि के परे है, जिसको श्रुतियाँ नेति नेति करके निरुपित करतीं हैं।
और भी-चिदानन्द मय देह तुम्हारी ।विगत विकार जान
अधिकारी।राम ब्रह्म चिन्मय
अविनाशी।सर्वरहित सब उर पुर वासी।।राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।परमानन्द परेस पुराना।।राम ब्रह्म परमारथ रूपा।अविगत अलख अनादि अनूपा।।राम सच्चिदानन्द दिनेशा ।नहिं तह मोहनिशा लवलेशा।। अर्थात्-जो राम के स्वरुप के जिज्ञासु हैं उन्हें विकार रहित होना पड़ेगा।यही निर्गुण निराकार ब्रह्म भक्तों के वशीभूत सगुण रूप मे भक्तार्तिनाश करता है, और ऐसी माता धन्य है, जिसने भगवद्भक्त पुत्र को जन्म दिया।”भक्त हेतु भगवान प्रभु
राम धरेउ तनु रूप ।करत चरित अति पावन ,प्राकृत
नर अनुरूप।।”अगुन अरूप
अलख अज जोई।भक्तप्रेम वश
सगुनहिं सोई।।” पुत्रवती युवती
जग सोई ।रघुपति भक्त जासु सुत होई।।
यही बात स्कन्द पुराण मे भी
आई है-“कुलं पवित्रं जननी कृतार्था ,वसुन्धरा पुण्यवती
च तेन ।अपार संवित्सुखसागरे
-स्मिन्। लीनं परब्रह्मणि यस्य
चेत:।।”हरिश्शरणम्।।

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ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः सनातन:। ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः सनातन:। ईश्वर अंश जीव अविनाशी। इत्यादि गीतोक्त एवं मानस के वचनों से जीवात्मा मनुष्य कीअविनाशिता, सनातनता, चेतनता, निर्मलता और सुखरखशिता स्वतः सिद्ध होती है क्योंकि, वह ईश्वर का अंशभूत है। अब इस जीवात्मधारी मनुष्य की पाप-पुण्य परता और दु:खसंगता क्यों होती है, यह विचारणीय है-“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी, सकल जीव जग माहिं दुखारी।।” इसका उत्तर भगवान ने गीता मे-“काम एष:”
कहकर दिया।मतलब कि यह कामना ही(शरीर, संसार की)सारी विपत्तियों का मूल है।अतः कामनाओं का त्याग सर्वानन्द का द्वार है। मनसा, वचसा, कर्मणा इसी का परित्याग वेदान्त धर्म का सार है।इसी बात को और स्पष्ट करते हुए हमारे स्वामी विवेकानंद जी ने अपने अनेक व्याख्यानों मे कहा है-“जब तक कामिनी कांचन का त्याग नहीं होगा, आत्मोपलब्धि, स्वस्वरुपावगति(भक्ति)और आत्मैकत्व प्राप्ति,अथवा मुक्ति भी नहीं होगी।”हरिश्शरणम्।।

वाणी के चार स्वरुप

वाणी के चार स्वरुप शास्त्र मे गिनाए गये हैं-परा(तुरीयरूपा),पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी।इसके स्थान क्रमशः निर्धारित हैं-नाभि, हृदय, कण्ठ और मुख के बाहर का अविच्छिन्न आकाश।इस विवेचना से ऐसा लगता है कि-नाभि मे सुषुप्त अवस्था मे विद्यमान वाणी(परा) हृदय(आकाश)देश से(अर्थवत्ता को प्राप्त पश्यन्ती )होती हुई,कण्ठ मे (मध्यमा मे)आती है।और जो साधक इन इन वाणी के अवस्थानों की अनुभूति किए रहते हैं, वे आवश्यकता के अनुरूप उसे वहीं कण्ठगत रख लेते हैं अथवा बहुत आवश्यक होने पर, बाहर आकाश गत अभिव्यक्त कर देते हैं।यही रहस्य मितभाषी होने का है।योगप्रक्रिया मे साधक ,पूर्वतः मालादि साधनों और बाद मे उसे भी त्याग कर अपने मन्त्र देवता का मन मे ही स्मरण(जप)करते हैं।यह चित्त शुद्धि का प्राथमिक प्रयोग है।इसी प्रक्रिया को योगी-वाचं यच्छ मनो यच्छ ,कहकर विवेचित करते हैं।अतः आत्मोपलब्धि के साधक वाचिक भजनादि के अतिरिक्त,वाणी को मनोगत अर्थात् मन मे निलीन करके, मन की साधना मे लगें।यही मन सब कुछ बनाता बिगाड़ता है -“माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर, कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर “।
हरिश्शरणम्।।

राम कवन पूछौं प्रभु तोहीं।कहहु बुझाइ कृपानिधि मोहीं।

मानसकार ने श्री राम के सगुण और निर्गुण रूप की जिज्ञासा-
राम कवन पूछौं प्रभु तोहीं।कहहु
बुझाइ कृपानिधि मोहीं।” पर उत्तर दिया-राम अवध भूपति सुत सोई ।की अज अगुन अलख गति कोई।
इसी तरह और भी कहा-राम स्वरूप तुम्हार ,वचन अगोचर
बुद्धि पर।अविगत अलख अपार, नेति नेति नित निगम कह ।।अर्थात्-हे अवध भूपति के पुत्र आपका स्वरूप वाणी और बुद्धि के परे है, जिसको श्रुतियाँ नेति नेति करके निरुपित करतीं हैं।
और भी-चिदानन्द मय देह तुम्हारी ।विगत विकार जान
अधिकारी।राम ब्रह्म चिन्मय
अविनाशी।सर्वरहित सब उर पुर वासी।।राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।परमानन्द परेस पुराना।।राम ब्रह्म परमारथ रूपा।अविगत अलख अनादि अनूपा।।राम सच्चिदानन्द दिनेशा ।नहिं तह मोहनिशा लवलेशा।। अर्थात्-जो राम के स्वरुप के जिज्ञासु हैं उन्हें विकार रहित होना पड़ेगा।यही निर्गुण निराकार ब्रह्म भक्तों के वशीभूत सगुण रूप मे भक्तार्तिनाश करता है, और ऐसी माता धन्य है, जिसने भगवद्भक्त पुत्र को जन्म दिया।”भक्त हेतु भगवान प्रभु
राम धरेउ तनु रूप ।करत चरित अति पावन ,प्राकृत
नर अनुरूप।।”अगुन अरूप
अलख अज जोई।भक्तप्रेम वश
सगुनहिं सोई।।” पुत्रवती युवती
जग सोई ।रघुपति भक्त जासु सुत होई।।
यही बात स्कन्द पुराण मे भी
आई है-“कुलं पवित्रं जननी कृतार्था ,वसुन्धरा पुण्यवती
च तेन ।अपार संवित्सुखसागरे
-स्मिन्। लीनं परब्रह्मणि यस्य
चेत:।।”हरिश्शरणम्।।

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।
अर्थात्-आयु ,जीवन-वृत्ति, चलाचल संपत्ति, विद्याध्ययन और शरीरान्त का प्रकार ,ये सभी पांच चीजें प्रारब्ध(पूर्व शरीर से कृत संचित कर्म)
द्वारा निर्धारित हो जाती हैं।
ऐसी बातों पर मैं सुविचारित
दृष्टिपात करता हूँ, तो यह लगता है कि, ज्योतिष आदि का सटीक निर्देश लेकर विज्ञ लोग कार्य करें।वर्तमान जीवन के क्रियमाण और संचित होते रहने वाले कर्मों से उपर्युक्त पाँचों मे परिवर्तन सम्भव है।किन्तु इसके लिए सद्गुरूशरण अनिवार्य है।और इन सभी के लिये कामना परक स्थिति से ऊपर उठना होगा।तभी हरिगुरू कृपा से उक्त पाचों मे परिवर्तन सम्भव है।हरिश्शरणम्।