गीताशास्त्र में भगवान् ने चार प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया है।चतुर्थ अध्याय का नामकरण ज्ञान-कर्म-सन्यास किया गया है, जिसमें आत्मसंयम रूपी यज्ञ को बताते हुए इसके अन्तर्गत चार यज्ञ वर्णित हैं-
द्रव्य-यज्ञास्तपो यज्ञा:
योगयज्ञा:तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञा: च
यतयः संशितव्रताः।।
अर्थात्-कितने लोग द्रव्य सबन्धी यज्ञ करनेवाले होते हैं।और कितने ही तपस्या रुपीयज्ञ करनेवाले हैं।इसी प्रकार कितने लोग योगरूप यज्ञ करनेवाले और कितने कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त संयमी जन स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करनेवाले होते हैं।
द्रव्ययज्ञ – न्याय से द्रव्य को अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ त्याग करके यथायोग्य लोकसेवा में लगाना द्रव्य यज्ञ है।जैसे कि-बुभुक्षित को भोजनादि,अनाथ,रोगी, दुखी, असमर्थ को यथायोग्य अन्न,वस्त्र, जल,औषधि, पुस्तकादि द्वारा सेवा तथा विद्वान्, सदाचारी महात्माओं की गौ,भूमि,ग्रन्थ, वस्त्र आदि से यथाशक्ति सहायता करना।इसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी बिना किसी फल की इच्छा किए सुख पहुंचाने के उद्देश्य से सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य व्यय करना “द्रव्ययज्ञ” है।
तपोयज्ञ-परमात्मा की प्रति के उद्देश्य से अन्तरिन्द्रियों को पवित्र करने के लिए निष्काम निर्लिप्त भाव से व्रतोपवास,स्वधर्म पालन हेतु कष्ट सहना।मौन व्रत धारण करना।एक या दो वस्त्रों से ही जीवन व्यतीत करना।शरीर निर्वाह हेतु सात्विक भोजन और शास्त्र निर्देशानुसार तितिक्षा सम्बन्धी क्रियाओं का पालन करना, ये सभी तपोयज्ञ हैं।
योगयज्ञ-इस पद का अभिप्राय चित्तवृत्ति निरोधरूप आठों प्रकार के योगों के अनुष्ठान से है।ये आठ योग इस प्रकार हैं-यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ-जिन शास्त्रों में भगवान् के तत्व का तथा उनके साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण स्वरूप का वर्णन है -ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना।भगवन्नाम जप स्तुति और उनकी लीला-गुणोंका कीर्तन करना।वेद वेदांग का नियम पूर्वक अध्ययन करना स्वाध्याय है।ऐसा स्वाध्याय अर्थ ज्ञान के सहित होने से तथा ममता, आसक्ति और फलेच्छा के अभाव पूर्वक किए जाने से ‘स्वाध्याय यज्ञ” है।
इस प्रकार के यज्ञ कार्य में लगा हुआ साधक निश्चय ही जीवन्मुक्त है।
।।हरिश्शरणम्।।
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त्रिगुणातीत
गीता के चतुर्दश अध्याय मे भगवान् ने चार श्लोकों मे प्रकृति के तीनों गुणों का तात्विक विवेचन किया।इसमें सारतः उन्होंने, स्पष्ट रूप से, आप्तकाम, मुक्तकाम,जीवन्मुक्त अथवा गुणातीत ब्राह्मी स्थिति को परिभाषित किया-
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च
मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि
न निवृत्तानि कांक्षति।।
उदासीनवदासीनो
गुणै:यो न विचाल्यते।
गुणा:वर्तन्त इत्येव
योवतिष्ठति नेंगते।।
समदु:खसुख: स्वस्थ:
समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:।।
मानापमानयोः तुल्य:
तुल्यो मित्रारिपक्षयो:
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत:स उच्यते।।
भगवान् बोले-हे अर्जुन!(जो मनुष्य) (सत्वगुण के कार्य रुप)
प्रकाश (ज्ञान)को और (रजोगुण की कार्य रुप) प्रवृत्ति(अर्थात् कर्म करने की स्फुरणा) को
तथा (तमोगुण की कार्यरुप)
मोह-भ्रान्ति को भी न तो प्रवृत्त होने पर(यानी उनके प्राप्त होने पर)बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर(अर्थात् उनका अभाव हो जाने पर)(उनकी)कामना करता है।जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ, गुणों के द्वारा चलायमान नहीं होता(और) “गुण ही गुणों में बरतते हैं” ऐसा(समझता हुआ)जो(परमात्मा में एकीभाव से)स्थित रहता है(एवम्)(उस स्थिति से कभी)कम्पित विचलित नहीं होता है।जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दु:खसुख को समान समझने वाला, मिट्टी-पत्थर-
सोने में समान भाव वाला, प्रिय-अप्रिय को एक जैसा मानने वाला, धैर्यवान् तथा अपनी बुराई-बड़ाई में एक सा रहने वाला है, और जो मान-
अपमान में एक सा है।मित्र-शत्रु
पक्षों के प्रति समान है तथा सभी क्रियाओं में कर्तापने के
अभिमान से रहित है -(मनुष्य)
“गुणातीत” (गुणों से परे या
उनसे अप्रभावित कहा जाता है।
यही गुणातीत ब्राह्मी स्थिति है।
।। हरिश्शरणम् ।।
योगी भवार्जुन
गीता के षष्ठ अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को योगी बनने का निर्देश दिया।योगी की महत्ता समझाते हुए कहते हैं-
तपस्विभ्योधिको योगी
ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी
तस्माद् योगी भवार्जुन।।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है।वह शास्त्र ज्ञाताओं से भी बड़ा माना गया है।और सकाम कर्म करने वाले लोगों से भी योगी बढ़कर है।इसलिए हे अर्जुन!
तू योगी बन।
योगी से तात्पर्य ऐसे पुरूष से है, जो कर्म, भक्ति और ज्ञान आदि सभी साधनों की पराकाष्ठा रूप समत्व योग प्राप्त हुआ हो।इसी तरह तपस्वी का मतलब विषयभोगों को त्याग कर मन,इन्द्रिय और शरीर सम्बन्धी सभी कष्टों को सहने वाला साधक।
यहां वस्तुतः ज्ञानी से तात्पर्य शास्त्रझ और कर्मी से तात्पर्य शास्त्र विहित यज्ञ, दानादि शुभ कर्मी,स्वर्गादि सकामी से है।
यह भी ध्यातव्य है कि कर्मी में तपस्वी तथा ज्ञानी का अन्तर्भाव नहीं है।क्योंकि इन तीनों की अपनी अपनी विलक्षणता है।यथा-कर्मी में
क्रिया की प्रधानता है, तपस्वी
में मन और इन्द्रियों के संयम की तथा ज्ञानी में शास्त्रीय बौद्धिक आलोचना की।
इस क्रम में आगे सभी योगियों में श्रद्धालु योगी को सर्वोत्तम की संज्ञा दी गई है-श्रद्धावान् भजते
यो मां स मे युक्ततमो मत:।
।।हरिश्शरणम्।।
गीता माँ
गीता माँ
“भक्तिरसायनकार”
आचार्य मधुसूदन सरस्वती ,जिन्होंने भक्तसमुदाय का “गीतागूढार्थदीपिका”लिखकर महदुपकार किया था, अपने एक लघु कलेवर ग्रन्थ”गीता-
ध्यानम्” से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।आपने अपने इस ध्यानम् में प्रथम पद्य में गीता को माँ कहा है-पार्थाय प्रतिबोधितां,भगवता नारायणेन स्वयं, व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभरतम्।अद्वैतामृत-
वर्षिणीं भगवतीमष्टा-
दशाध्यायिनीम् अम्ब त्वाम्
अनुसन्दधामि भगवद्-
गीते भव-द्वेषिणीम्।।
साक्षान्नारायण ने जिसका अर्जुन को उपदेश दिया है, जिसे पुरातन मुनि व्यास ने महाभारत के मध्य गूँथा है, जो अद्वैत ज्ञान रुपी अमृत की वर्षा करनेवाली है, जो दिव्य गुणों से सम्पन्न है, जो अठारह अध्यायों वाली है और जो (जन्म)भव की शत्रु है, ऐसी तुझको, हे माँ !
भगवद्गीते ! मैं सतत ध्यान
करता हूँ।
अस्तु ,इसमें “गीता”के लिए
“अम्ब” का सम्बोधन सार-
गर्भित है।सारे नाते छोड़ कर
गीता को माँ कहना बड़ा अर्थ
छोड़ जाता है। संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार, कम या अधिक, छल-कपट,राग-द्वेष
और स्वार्थ प्रेरित होता है, किन्तु माँ का अपनी सन्तान के साथ बर्ताव नि:शेष निरपवाद
रूप से स्नेह ,त्याग, बलिदान, ममता एवं अगाध सहिष्णुता से
परिपूर्ण होता है।सभी व्यक्ति, हमारी दो-चार त्रुटियों के बाद ,जहाँ हमें दण्डित करने लगते हैं, लेकिन माँ, हमारे जघन्य दोषों और नृशंस दुष्कर्मों की अनदेखी कर हमारे सुख स्वास्थ्य के लिए आजीवन कामना करती है।वह औरों को क्षति पहुंचा दे ,स्वयं भी कष्ट उठा ले ,किन्तु अपने बालक पर फूल की चोट भी सहन नहीं करती।माता का हृदय ममता का बना होता है।”पूत कपूत हो,पर माता कुमाता नहीं बन सकती” विषय-विलास-वासना
के विषम पथ पर जन्म-जन्म से भटकते हुए ,अपनी सन्तान को,
कर्म-भक्ति-ज्ञान की संजीवनी से,वह गीता माँ, अवश्य ही
मुक्ति द्वार तक ले जायेगी।
।।हरिश्शरणम्।।
गीता माँ
गीता माँ
“भक्तिरसायनकार”
आचार्य मधुसूदन सरस्वती ,जिन्होंने भक्तसमुदाय का “गीतागूढार्थदीपिका”लिखकर महदुपकार किया था, अपने एक लघु कलेवर ग्रन्थ”गीता-
ध्यानम्” से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।आपने अपने इस ध्यानम् में प्रथम पद्य में गीता को माँ कहा है-पार्थाय प्रतिबोधितां,भगवता नारायणेन स्वयं, व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभरतम्।अद्वैतामृत-
वर्षिणीं भगवतीमष्टा-
दशाध्यायिनीम् अम्ब त्वाम्
अनुसन्दधामि भगवद्-
गीते भव-द्वेषिणीम्।।
साक्षान्नारायण ने जिसका अर्जुन को उपदेश दिया है, जिसे पुरातन मुनि व्यास ने महाभारत के मध्य गूँथा है, जो अद्वैत ज्ञान रुपी अमृत की वर्षा करनेवाली है, जो दिव्य गुणों से सम्पन्न है, जो अठारह अध्यायों वाली है और जो (जन्म)भव की शत्रु है, ऐसी तुझको, हे माँ !
भगवद्गीते ! मैं सतत ध्यान
करता हूँ।
अस्तु ,इसमें “गीता”के लिए
“अम्ब” का सम्बोधन सार-
गर्भित है।सारे नाते छोड़ कर
गीता को माँ कहना बड़ा अर्थ
छोड़ जाता है। संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार, कम या अधिक, छल-कपट,राग-द्वेष
और स्वार्थ प्रेरित होता है, किन्तु माँ का अपनी सन्तान के साथ बर्ताव नि:शेष निरपवाद
रूप से स्नेह ,त्याग, बलिदान, ममता एवं अगाध सहिष्णुता से
परिपूर्ण होता है।सभी व्यक्ति, हमारी दो-चार त्रुटियों के बाद ,जहाँ हमें दण्डित करने लगते हैं, लेकिन माँ, हमारे जघन्य दोषों और नृशंस दुष्कर्मों की अनदेखी कर हमारे सुख स्वास्थ्य के लिए आजीवन कामना करती है।वह औरों को क्षति पहुंचा दे ,स्वयं भी कष्ट उठा ले ,किन्तु अपने बालक पर फूल की चोट भी सहन नहीं करती।माता का हृदय ममता का बना होता है।”पूत कपूत हो,पर माता कुमाता नहीं बन सकती” विषय-विलास-वासना
के विषम पथ पर जन्म-जन्म से भटकते हुए ,अपनी सन्तान को,
कर्म-भक्ति-ज्ञान की संजीवनी से,वह गीता माँ, अवश्य ही
मुक्ति द्वार तक ले जायेगी।
।।हरिश्शरणम्।।
प्रणव (ओम्)
प्र-प्रकृष्ट रूप से या आत्यन्तिक अन्तिम रुप से,
नव -नवीनतम ,जो है, उसे प्रणव कहते हैं। इसे ही ओम् भी,कहकर सर्वादि सिद्ध किया गया है। यह ओम् या प्रणव पवित्र घोष का अभिव्यंजक है।”शब्दो वै ब्रह्म “की अवधारणा मे यह ब्रह्म है।सृष्टि का आद्यक्षर भी।
वर्णों की दृष्टि से इसमें तीन अक्षरों का समावेश है-अ ,उ तथा म ।इन्हीं का सन्धिगत समष्टिगत रुप ओम् है ।निर्गुण निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के साथ साथ यह सगुण ब्रह्म का भी बोधक है।
अकार विष्णु का प्रतिनिधि(अक्षराणामकारोस्मि)
उकार शिव उन्नति परमोन्नति का प्रतिनिधि और मकार ब्रह्मा का बोधक है ,जिसके द्वारा काल गणना होती है। इस तरह त्रिदेवों के तीनों कार्यों-सृजन, पालन और संहार को भी ओम् सूचित करता है।
इस तरह यह नाम रूपात्मक विश्व का बोधक बन जाता है।संसार के सभी पदार्थों की अभिव्यक्ति वर्णों/अक्षरों से होती है।संस्कृत.ही नहीं सभी भाषाओं के सभी वर्णों और ध्वनियों का उच्चारण स्थान या तो मुख का सबसे भीतरी भाग-कण्ठ – है अथवा सबसे बाहरी भाग ओष्ठ, नासिका।
इसतरह विचार करने पर “अ”का उच्चारण स्थान कण्ठतथा “उ”का ओष्ठ माना गया है। “म” भी ओष्ठ और नासिका से उच्चरित होता है।इस प्रकार समूहालम्बनात्मक दृष्टि से ओम् मे बाहरी/भीतरी दोनों ध्वनियों का समावेश है।
दूसरे शब्दों में ओम् मे सभी के समाहित होने से, उसी मे सभी सांसारिक अभिव्यक्त विषयों, पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की समष्टि दृष्टिगत होती है।
वस्तुतः “ओम्’ और ब्रह्म (सगुण, निर्गुण)एक ही हैं।
।।हरिश्शरणम्।।
गृहस्थ-सन्यास
विश्व के सामने गीता ने बड़ा क्रान्तिकारी विचार रखा है।वह विचार है, “गृहस्थ-सन्यास” ।जहाँ अन्य विचारधाराओं ,मतमतान्तरों ने सन्यासी के लिए घर बार छोडकर वन-पर्वतादि निर्जन स्थानों में चले जाना, उचित माना है, वहीं गीता ने जगत् के धार्मिक-दार्शनिक इतिहास में प्रथम बार,यह चरमोद्घोष किया है कि यह सब नितान्त आवश्यक नहीं है।
साधक का इन्द्रियों को वश में कर ,मन को बुद्धि के अंकुश तले लाकर और पुनः स्थिरधी बनकर अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्ति हेतु केन्द्रित कर देना ही, “सन्यास ” है।यह तो चित्तस्थ एक आन्तर प्रक्रिया है, जिसके साथ जिज्ञासु के देश, वेश,प्रदेश, परिवेश का दूरत: सम्बन्ध नहीं है।
पग पग पर गीता अपने भक्त को स्मरण कराती है कि भय से भागना भीरुता है और प्रबल प्रतिरोध करना, वीरता ।एक सच्चा सन्यासी वह है, जो गृहस्थ कर्मों का पालन करता हुआ कुटिल, कुमति, कृतघ्न कुटुम्बियों के क्रूर कर्म-चक्रवात में भी हिमाचलवत् अचल खड़ा रहे।
कामन-कामिनी-कांचन के करालानल में फंसा हुआ भी ,प्रह्लाद सदृश स्वयं को आंच न लगने दे।
मद-मोह-मात्सर्य के महामकरों से समावृत होकर भी स्वयं ध्रुव धैर्य धारण किए रहे।
विषय-वासना-विलास की वारिधि में वास होने पर भी कमलवत् अप्रभावित रहे।इस प्रकार वानप्रस्थी ही नहीं, गृहस्थी भी असाधारण रूप से, ” सन्यासी ” बनने का अधिकारी है।
समाज के किसी भी क्षेत्र में अपने सांसारिक कर्तव्य का निर्वाह करता हुआ कोई भी व्यक्ति-धनी-निर्धन,स्त्री-पुरूष, ब्राह्मण-शूद्र, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सन्यास ग्रहण कर सकता है।नि:सन्देह, गीता का ” गृहस्थ-सन्यास ” सभी के लिये अनुपम वरदान स्वरूप है ।
।।हरिश्शरणम्।।
पूर्ण -योग
मानव कल्याण की दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता मे योग को “पूर्णयोग” बनाकर समन्वित स्वरूप मे प्रतिष्ठित किया गया है।वैदिक साहित्य की तरह इसमें भी मुक्ति(मोक्ष)के त्रिविध मार्गों -कर्म, भक्ति और ज्ञान का अनुमोदन किया गया है।किन्तु
पूर्ववर्तियों ने जहाँ तीनों को पृथक्-पृथक् मार्ग मानकर इनमें से किसी एक को भी स्वतन्त्र रूप से लक्ष्य सिद्धि का क्षम साधन मानते हैं, वहां “गीता” किसी एक मार्ग को अलग न मानकर तीनों को एक मार्ग (महामार्ग) के अभिन्न अंग के रूप में देखती है, और यही”पूर्णयोग”है।
कहना न होगा कि एक मार्ग का आश्रयण साधक को अपने निश्चित निर्धारित लक्ष्य से विच्युत कर देगा।समन्वित और पूर्णयोग की यह अवधारणा शुद्ध रूप से जीवन तथ्य पर अवलम्बित है।इस समग्रता के तीन स्तम्भ हैं, जो मानव जीवन की लीला कथा के तीन तत्व हैं-
1-इन्द्रिय (कर्मजनक )
2- मन (भक्तिजनक)
3-बुद्धि (ज्ञानजनक )
वस्तुतः इन तीनों के समुचित और सामूहिक विकास से ही व्यक्तित्व का सम्पूर्ण व सर्वांगीण उत्कर्ष सम्भव है, जिससे कोई व्यक्ति बन सकता है, नहीं तो व्यक्तित्व के बिना कोई व्यक्ति कैसे है,मनुष्यत्व के विना कोई मनुष्य कैसे? इनमेंसे किसी एक की अवहेलना से उसका व्यक्तत्व अधूरा रह जायेगा।
अतः इस इन्द्रिय, मन और बुद्धि की त्रिवेणी के संगम मे पवित्र भावपूर्ण सद्गुरू कृपाधारित “स्नान”मनुष्य को मनुष्य बनाएगा, यही”पूर्णयोग” की त्रिवेणी है।यही ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद् का अनुपम सन्देश है।
।।हरिश्शरणम्।।
निष्काम कर्म
वेदों का अंकुरित” ज्ञान” ब्राह्मण ग्रन्थों मे पल्लवित, आरण्यकों मे प्रफुल्लित और उपनिषदों मे
प्रबलित हुआ।किन्तु अनेकानेक ऋषियों, आचार्यों, दार्शनिकों एवं धर्मगुरुओं के बहुसंख्य परस्पर विरोधी मतों से आक्रान्त होकर यह विषय सामान्य जिज्ञासु के लिए”चक्रव्यूह”बन गया।ऐसी स्थिति मे, उन सभी पन्थों का
उपसंहार करनेवाली “गीता”
मानव कल्याण का मेरूदण्ड बनी।श्री मधुसूदन सरस्वती जी ने इस प्रक्रिया का बहुत सुन्दर चित्र खींचा,जिसमें सारी उपनिषदें गाय बनी हैं।दूहने वाले “गोपाल” “श्रीकृष्ण” हैं।पृथापुत्र (अर्जुन) बछड़े के रूप मे हैं, तथा गीतामृत ही दुग्ध है।इस प्रकार के मंथन से नव्य मार्ग ने जन्म लिया- सर्वोपनिषदो गावो ,दोग्धा गोपालनन्दन:।पार्थो वत्स:सुधी:भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्।।
नया पथ प्रशस्त करनेवाली
“गीता”ने एक नवीन शब्द दिया
“निष्काम”।इसमे परम्परागत यज्ञ अनुष्ठान आदि सकाम कर्मों से फलित स्वर्गादि अनित्य सुखों की अपेक्षा नित्य (मुक्ति प्रद)कर्मों का समुद्घोष हुआ।जिसके लिए”निष्काम कर्म”शब्द प्रयुक्त किया गया।
तार्किक दृष्टि से कोई कर्म यदि फलाकांक्ष होकर न करें, तो वह कोई फल या वासना उत्पन्न नहीं कर सकता।क्योंकि जैसा कारण वैसा कार्य।
मतलब जब वासनाएं पैदा होना बन्द हो जायेंगी ,तो उन्हें तृप्त करने के लिए नये जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता।और नये जन्म न लेने का तात्पर्य मुक्ति ही है।इस प्रकार जन्म जन्मान्तर के विषयेन्द्रिय जन्य वासनाओं के अनवरत, प्रबल झंझावात से बचकर शान्तिप्राप्ति हेतु “निष्काम कर्म” एक अमोघ दिव्यास्त्र है।
।।हरिश्शरणम्।।
हरि भक्ति ही मुक्ति का मूल
एक जगह बाबा तुलसीदास ने बड़े साफ शब्दों में कह डाला है- बारि मथे घृत होय बरु ,
सिकता ते बरु तेल
बिनु हरिभजन न भव तरिअ
यह सिद्धांत अपेल।।
मतलब जल को मथने पर घी की प्राप्ति हो सकती है, और बालू को पेरने पर तेल भी
निकल सकता है, किन्तु बिना भगवान का भजन (स्व मे तत् स्वरूपानुसन्धान)किए और किसी भी तरह भवसागर से पार होना असंभव है ।
फिर एक जगह वे कहते हैं-
अब प्रभु कृपा करहुँ एहि भांती
सब तजि भजन करहुँ दिनराती
हे नाथ आप केवल और केवल इतनी कृपा करें कि मैं सब कुछ त्याग कर आपको भजता रहूं अर्थात् आपका विस्मरण क्षणमात्र के लिए भी नहीं हो।
पुनः एक प्रसंग मे बालि से कहवाते हैं-अचल करौं तन राखहुं प्राना ।बालि कहा सुनु
कृपा निधाना।जनम जनम
मुनि जतन कराहीं।अन्त राम
कहि आवत नाहीं।।
तात्पर्य यह है कि भगवान की कृपादृष्टि किसी भी यत्न प्रयत्न के अधीन नहीं है।अन्त काल में भी ,सारे जन्म मे अनेकानेक जन्म मे भी उनकी कृपा यत्नों के अधीन नहीं, वह तो क्षणमात्र मे प्राप्त है,जीव की अन्त:पुकार पर बिना यत्न सुलभ है।
फर्क यही है कि मनसा, वाचा ,कर्मणा निश्छल भाव से सारी चतुराई भूलकर शरणागत होना होगा-
मन क्रम वचन छाड़ि चतुराई
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।