सुखनिधान भगवान् हैं।दुखनिधान संसार।

भगवद् स्मरण में चित्त लगाना। जैसे भी हो भगवद् गुण गाना।

राजा राम अवध रजधानी।
जब प्रभु अपने सभी परिकर सहित हमारे शरीर राज्य को राजधानी बना लिये। तब उनके साथ जगदम्बा जानकी सभी राजकुमार और श्रीहनूमान् जी भी अपने अनुचरों सहित विराजते ही हैं।
भगवान् की राजा राम की राजधानी बना यह शरीर विकार रहित होकर अवध ही
बनेगा।
“अवध” का मतलब पुनः काल बाधित होकर जन्म ही नहीं लेगा ।
और सार्थक हो जायेगा।
यह मानव तन।

।। हरिः शरणम् ।।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनम्तेषां सिद्धिः प्रजायते।।

हे प्रभु! हम आपको और आपकी मातृ शक्ति का स्मरण करते।
जिससे सभी लौकिक अलौकिक कामनाओं की सिद्धि होती है।
अब मामला भक्ति पूर्वक स्मरण करने का है।
किमेषा भक्ति:?
आपकी सम्पूर्ण सृष्टि को आपका स्वरूप मानकर इसका भजन(सेवन) भक्ति है।

जाति विद्या पद रूप यौवन का अभिमान छोड़ कर व्यवहार करना भक्ति है।

शास्त्रों सन्तों द्वारा निर्धारित विधान का
पालन भी भक्ति है।

आपके नाम रूप लीला धाम का सेवन
भक्ति है।

सब प्रकार से मर्यादा का पालन करते हुए
भक्त भगवत् चरित्रों का सुनना भी भक्ति
है।

जब सब की आत्मा में विराजित आप हमारे हैं, हम आपके। तब हमें वह शक्ति दीजिये, कि हम अपने अन्तःकरण में आपका स्मरण कर सकें।
आप कृपा करें, गुरू कृपा हो।
यही कामना सब जीवों की सतत।
भोग दृष्टि मेटें ,पथ और न शरणागत।

।। हरिः शरणम् ।।


आश्रयेद् सन्तशास्त्राणि

परब्रह्म तो अन्तःकरण में और सर्वत्र सदा सर्वदा से विराजते हैं।
अन्तःकरण को मलिन करने वाले कामक्रोधादि जब तक रोज- रोज हरिकथा के अमृत जल से धुले नहीं जायेंगे, और प्रभु के किसी नाम का खाते पीते ,उठते, बैठते हर कार्य करते हुए ,स्मरण नहीं होगा ,चित्त मलिन होता रहेगा। मनुष्य तो बन नहीं पायेंगे और की तो बात ही और है।
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इसलिये वेदों ने कहा-
” मनुर्भव “
हरिगुरुसन्तों का आश्रय लें।
गीता रामायण भागवत ही गुरु हैं।
प्रयास तो करना होगा भवसागर
के पार जाने के लिए।
नहीं तो दोषी कौन?
सूखा और अकाल है
गुरुओं का।
अतः
शास्त्र और सन्त
कहीं गये नहीं
वाणी में विराजे हैं
हरिः ओ3म् तत्
सत्

।। हरिःशरणम् ।।


जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई, विषय चिन्तन – आसक्ति – काम/कामना

  • क्रोध – सम्मोह(अविवेक) – स्मृति भ्रंश- बुद्धिनाश – प्रणश्यति (अधःपतन)।
    शूकर-कूकर शरीरों में जा पड़ना। वही भोग दृष्टि और पतन।
    भक्तिरसामृतसिन्धुकार पूज्य श्री रूप
    गोस्वामी, विषयप्रपंच से बुद्धि हटाने के आग्रही हैं, क्योंकि इसके विना इस जन्म में भी ,वैराग्य की कल्पना व्यर्थ है और पुनः भोग्य कर्मवशात्,अन्य शरीर की प्राप्ति ध्रुव है-

प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागः
वैराग्यं फल्गु कथ्यते।। 1/2/258
अहन्ता ममता जन्य अविवेक से संसार के वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ समूह को पाने की
दुरभिलाषा जब जन्मी तो इसको ही साधूपदिष्ट , स्वयं में साकार मूर्तिमान्
” लोभ ” मानिये।


“लोभ” तो शास्त्र और आचार्य श्रुति
के उपदेश से जनित संस्कार (कार्याकार्य)
की विस्मृति करा देता है फलतः ,बिगड़ी हुई बुद्धि की अशुभ वासना पतन ही कराती है ,इसमें संशय नहीं।
भैया!
यह आसुरी सम्पत् है, कामक्रोधलोभादि
के कारण,नीचे के अधःपतन शील नरक आदि लोकों में ढकेल देता है।अपना सर्वनाश भी कराता है-

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधः तथा लोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्।।
इन रजोगुणी, तमोगुणी वृत्तियों से बचने का उपाय नामजप पूर्वक भगवद् भजन ही है।और कोई उपाय नहीं-
चहुँ जुग जहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि बिसेस नहिं आन उपाऊ।।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।इन परिहरि रघुबीरहिं भजहु भजहिं जेहि सन्त।।
कबीर भी चटक चोट करते हैं-
काम क्रोध मद लोभ की तब लगि घट में खान।क्या मूरख क्या पंडिता दोनों एक समान।
इसलिये भगवान् शिव ने भगवद् उन्मुख मनुष्यों की सराहना की है,जिन्हे
पहले स्वयं में और पश्चात् सभी में प्रभु ही
दीखते हैं।क्योंकि उस भक्त की वृत्ति तो
तदाकाराकारित, जित देखूँ तित श्याम मयी है-
उमा जे रामचरन रत,विगत काम मद क्रोध।निज प्रभु मय देखहिं जगत, केहि सन करहिं बिरोध।।
अब,बात तो ये है कि ,श्रीगुरुचरन सरोजरज मिले तब निज मन मुकुर की शुद्धि हो। जो जल्दी मिलती नहीं।और-
कहते हैं कि भगवान् की माया बड़ी ही प्रचण्ड है।जब हरिगुरुसन्त की दया हो तभी इससे पिण्ड छूटेगा।
नहीं तो वानर राज सुग्रीव की अनुभूति देखिये, जो सुर, नर और मुनियों को भी विषय वश और स्वयं के बानर शरीर को अत्यंत कामी कहते हुए, इससे बचने का निर्देश करते हैं-
अतिसय प्रबल देव तव माया।
छूटै राम करहु जो दाया।।
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी।
मैं पामर पसु कपि अति कामी।।
अब संसार के विस्मरण और आपके स्मरण,भजन-सेवन से, जिसे सुन्दर मृगनयनी नारी के नयन वाण नहीं बेध पाते हैं, वही सौभाग्यशाली घनघोर क्रोध और “लोभ” की अँधेरी रात में जागृत चैतन्य होकर, परमानन्द में रह सकता है।
नयन नारि सर जाहि न लागा।
घोर क्रोध तम निशि जो जागा।।
हे प्रभु! ” लोभ ” की रस्सी की फाँसी, जिस साधु पुरुष के गले में नहीं फँसी, तो पक्का मानना पड़ेगा कि वह व्यक्ति ही ,वस्तुतः आपका ” अंश ” कहलाने का अधिकारी और आपके ही जैसा है-
लोभ पास जेहिं गर न बँधाया।
सो नर तुम समान रघुराया।।
देखिये, ” लंकाकांड ” में अति संसारी,अति अहंकारी दशमुख रावण का सिर, भगवान् श्रीराम काटे जा रहे हैं,किन्तु वह काटने पर भी बार-बार बढ़ता ही जा रहा है, जैसे कि “लोभ” की रस्सी तनती ही जाती है।
तब भगवान् अपने भक्त “विभीषण” की ओर देखते हैं। उसमें सज्जन का लक्षण
घटित है – राम राम तेहि सुमिरन कीन्हा।
हृदय हरषि कपि सज्जन चीन्हा।
निष्कलुष भक्त तो स्वयं की सहज सरल
भक्तिमती बुद्धि से इसके विनाश का उपाय बताने में समर्थ है-

काटत बढ़हिं सीस समुदाई।
जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
मरइ न रिपु श्रम भयउ विसेषा।
राम विभीसन तन तब देखा ।।


और इसलिये, इस संसार के द्वैतभूत भय,लोभ,मोह,काम को छोड़कर, श्रीराम कृष्ण नारायण सदृश “कामतरु” की छाँव बैठना श्रेयस्कर है,जहाँ कोई डर नहीं-
भय,लोभ,मोह ,कोह,काम को। जब-
बैठे नाम-काम-तरु -तर ,डर कौन घोर घन घाम को।
यह लाभ-लोभ तो जन्म ही व्यर्थ कर देगा। इस “लोभ” पर बाबा की पैनी दृष्टि है, इसीलिये-
“जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई”
यही पंक्ति, गोस्वामीजी एक जगह दूसरे प्रसंग में भी दुहराते हैं।
जब “रावण” की शक्ति ,परिवार और संपत्ति बढ़ती जाती है, और “धनपति”
कुबेर का “पुष्पक” विमान भी छीन लेता है, तब उसके “लोभ” का जल तो मानो तट बन्ध ही तोड़ देता है –

सुख संपति सुत सेन सहाई।
जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
नित नूतन सब बाढ़त जाई।
“जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।”

।। हरिः शरणम् ।।

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

रूप रसादि विषयों की सरस रसवर्षा से ,हरे-भरे शरीर संसार में जब मन,हरित भूमि तृणसंकुलित हुआ। तब आसंग -आसक्ति ने घेरा।काम/कामना जागी और उसके अपूर्ण रहने पर उसका बेटा जन्मा ” क्रोध “।अब इसकी सन्तान परम्परा चली और इससे”सम्मोह “नामक” पुत्र” पैदा हुआ।
कामात् क्रोधः अभिजायते।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः ।।

कोयं सम्मोहः कीदृशं चरित्रम्?

श्रीमदाद्य भगवत् पाद शङ्कर ने इसका चरित्र चित्रण किया- कार्याकार्यविषयः अविवेकः सम्मोहः।सम्मूढः सन् गुरुम् अपि आक्रोशति।
क्या करें, क्या न करें, यह मोह तो अत्यन्त ही अविवेकी आचरण चरित्र
वाला है।सम्मूढ होकर भगवत् स्वरूप गुरजनों के साथ भी ,अपने पितामहश्री”क्रोध” के भयंकर अनार्य और दूषित पापिष्ठ आचरण का
आचरण करने में, इसे संकोच नहीं –
मानहिं मातु पिता नहिं देवा।
साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिनके यह आचरन भवानी।
तेहि जानहु निशिचर सम प्रानी।।

श्री मधुसुदन सरस्वती पाद ने भी इसे इसी रूप वाला अभिव्यक्त किया- ,“कार्याकार्याविवेकाभावरूपः”
और मन् मध्वाचार्य ने “अधर्मेच्छु” कहते हुए ” अधर्मलक्षणं च पापकर्मसु नियतम् “
मानकर, “पापी” भी कह डाला।
विनयपत्रिका में-
मोहजनित मल लाग।
विविध विधि कोटिहु जतन न भाग।
कहते हुए गोस्वामी जी इस अविवेकी मोह को “रावण” भी कह देते हैं-
“मोह दशमौलि”
क्या कहें, यह सघन काली “मोह रात्रि “ सबको सुला कर,नाना विषयों का सपना
भी दिखाने से बाज नहीं आती-
मोह निशा सब सोवन हारा।
देखहिं सपन अनेक प्रकारा।।
और
यह मोह तो म्लेच्छयवन जैसा है-
मोह निशि निबिडयवनान्धकारम् ।
अब जब अज्ञानी म्लेच्छ जन अन्धकार मूर्ति ही हैं , तब ज्ञानी का क्या? तत् संसर्ग वश,वह इसके चंगुल में फँस जाते हैं।”बाबा” का मन “मानस” बोल देता है-
जो ज्ञानिन कर चित अपहरई।
बरिआईं विमोह वश करई ।।

पौराणिक ऋषियों ने तो म्लेच्छ राक्षसादि
वध-प्रसंगों में पहले ही कहा था कि, यह अविद्या माया विषयविवश , बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी मोह में डालने वाली है, तब सामान्यों जनों की क्या-

ज्ञानिनाम् अपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।
और इसीलिये संस्कृत के ” गम्भीर” कवि भारवि ने “शास्त्र ” और “गुरु” के आश्रयपूर्वक इस मोह/अविवेक से बचने और सुविचारित कार्य करने की प्रेरणा दी है –

सहसा विदधीत न क्रियाम् ,
अविवेकः परमापदां पदम्।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं ,
गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।।

अविवेकी सम्मोहभ्रान्त मनुष्य बड़ा विचित्र है, उसका दिग्भ्रान्त मन, उसे चित्र विचित्र संसार में आकृष्ट करके, विषय सेवन से विरत नहीं होने देता।वह बेचारा बैचैन और लाचार, शरीर-संसार की सेवा करते,स्वयं को धन्य मानता हुआ,
भाग्यहीन, सर्वकारणकारण श्रीसीताराचन्द्र को भूल जाता है।क्योंकि उसे “जीवाचार्य” शेषावतार श्रीलक्ष्मण जी जैसे आचार्य गुरु का चरण ,आचरण और संरक्षण जो नहीं मिला-

सेवत लखन सिया-रघुबीरहिं।
जिमि अविवेकी पुरुष सरीरहिं।।

रामहिं भजहिं ते चतुर नर, जैसी बुद्ध दशा के चतुर कृषक ,जैसे सन्तसद् गुरु के मिलने पर , उनके निरीक्षण परीक्षण में दिव्य कुण्ठाहीन,अलौकिक और चिर प्रतीक्ष्य सर्वाभिलषित स्वयं विलसित
” वैकुण्ठ” की फसल मिल जाती है। जहाँ मोह न वरन् “मोहन” ही रमते हैं-

कृषी निरावहिं चतुर किसाना।
जिमि बुध तजहिं “मोह” मद माना।।

प्रभु श्रीराम की लीला में प्रवेश करें ,तो वहाँ भी एक मोह/अविवेक का प्रसंग बड़ा ही विलक्षण है।प्रेमी भक्त इसे नारद ” मोह” कहते हैं।
भगवान् की अविद्या माया ने एक नाट्य किया जिसमें “विश्वमोहिनी” नामक एक राजपुत्री का स्वयवंर होता है।
स्वयवंर के पूर्व ही उसका गुण- दोष विचारने नारद जी पधारते हैं।उसे देखते ही,उनका वैराग्य भ्रष्ट हो गया-
देखि रूप मुनि विरति बिसारी।
बड़ी बार लगि रहे निहारी ।।

उसका भाग्य ऐसा दीखा,कि नारद ने कहा -जो एहि बरै अमर सोइ होई।
समर भूमि तेहि जीत न कोई।।
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी।
जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।

स्वयवंर में जाने के पहले नारद जी भगवान् से उनका रूप माँगते हैं,जिससे वह राजकुमारी उन्हें वरण करे-
आपन रूप देहु प्रभु मोहीं।
आन भाँती नहिं पावहुँ ओही।।
जेहि विधि नाथ होइ हित मोरा।
करौं सो बेगि दास मैं तोरा।।

भगवान् नारद जी को” हरि”(बानर)
रूप देकर कहते हैं-
जेहि बिधि होइ परम हित,
नारद सुनहु तुम्हार ।
सोइ हम करब न आन कहु,
बचन न मृषा हमार ।।

कुपथ माँग रुज व्याकुल रोगी।
बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।

अब यहाँ देवर्षि नारद जी
तो मायावश “मूढ़” हो गए-
“माया बिवस भए मुनि मूढा़ ।” और
स्वयवंर मेंअन्य राजकुमारों के साथ जा
बैठे।भगवान् ने तो उन्हीं के हित के कारण उन्हें हरि(बानर) रूप दे दिया था –
मुनि हित कारन कृपानिधाना।
दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।

वहीं बैठे रुद्र के गण द्वि अर्थी संवाद में बोले-
रीझहिं राजकुँवरि छवि देखी।
इन्हहिं बरै ” हरि ” जानि विशेषी।

मुनि का मोह देख रुद्र गण हँसे। और बाबा ने कहा- मुनिहिं ” मोह”मन हाथ पराएँ।
हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।
नारद का वानर(हरि)रूप देख कर राजकुमारी क्रुद्ध होकर अन्य राजाओं की ओर चली गई-
मर्कट बदन भयंकर देही।
देखत हृदय क्रोध भा तेही।।

इधर भगवान् सुन्दर राजकुमार वेश में विराजे थे।सुन्दरी उन्हीं लक्ष्मीनिवास को वर माला डालती देती है-
धरि नृप तनु तहँ गयउ कृपाला।
कुँवरि हरषि मेलेउ जय माला।।

मोह(अविवेक)वश नारद की बुद्धि नष्ट हो गई थी-
मुनि अति बिकल मोह मति नाठी।
विवाह वंचित नारद ने क्रोध में भगवान् को शाप दे दिया। मेरी चाही सुन्दरी स्त्री से आपने छल करके मेरा वियोग कराया, मुझे वानर रूप दे दिया। इसलिए आप भी स्त्री विरह में दुखी होंगे।और वानर ही सहायक होकर आपको उबारेंगे-
कपि आकृति तुम कीन्हि हमारी।
करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।

भगवान् ने नारद जी के शाप को शीश पर धारण कर लिया। और उनसे विनती की।वे अपनी प्रचण्ड माया को वापस खींच लें-

शाप शीश धरि हरषि हिय प्रभु बहु विनती कीन्हि।निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।
अविद्या माया के हटते ही न वहाँ लक्ष्मी जी थीं और न ही कोई राजकुमारी-
जब हरि माया दूरि निवारी ।
नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
तब मुनि अति सभीत हरिचरना।
गहे पाहि प्रनतारति हरना।।

नारदजी लज्जित होकर अपना शाप झूठा होने की बात करने लगे ।भगवान् उन्हें शिवनाम जपने का आदेश करते हैं-
जपहु जाहु संकर सतनामा।
होइहि हृदय तुरत विश्रामा।।

नारद जी “नामजप” से पापमुक्त होते हैं। और भगवान् शिव भवानी से बलवती माया की विचित्रता कहते हैं-
यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरि माया मोहहिं मुनि ज्ञानी।।

सुर नर मुनि कोउ नाहिं, जेहि न मोह माया प्रबल।अस बिचारि मन माँहिं ,भजिअ महामाया पतिहि।
अब इस नारदमोह प्रसंग से यह समझने की बात है कि, नारदजी को वस्तुतः किसी अविवेक/मोह ने ग्रस्त नहीं किया था।वरन् यह तो भक्त और भगवान् की अद्भुत लीला(नाट्य/अभिनय) है।
यह लीला ,उन लोगों को सन्देश देती है जो मानव का विवेकी शरीर पाकर भी विषयवासनाग्रस्त होकर काम/कामना की पूर्ति न होने पर, क्रुद्ध होकर विवेक ही खो बैठते हैं।
इसीलिये भगवान् गीता में अत्यंत मोहग्रस्त भयंकर दुराचारी को भी भगवद् भजन संकल्प कर ,मोह त्याग कर शरण में आने पर साधु और भक्त बना देने का निश्चय व्यक्त करते हैं-

अपि चेत् सुदुराचारो भजते माम् अनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग् व्यवसितो हि सः।।
इसलिये सबसे पहले मनुष्यमात्र को , विवेकी सज्जनों का संग कर नामजपादि से अपना क्रियमाण कर्म पवित्र करना चाहिए और ऐसी दशा में, संचित कर्म बनेगा ही नहीं तथा प्रारब्ध भी इसी शरीर से भोग कर पूरा हो जायेगा।अब देखिये-
भगवान् राक्षस निग्रह कर जब अयोध्या में ,राज्य कार्य सँभालते हैं, तब सारी प्रजा में हर्ष ही हर्ष व्याप्त हो जाता है।
इस अवसर पर आने वाली श्रीरामचरित
मानस की चौपाई का एक स्वोद्भावित शिष्ट विशिष्ट अर्थ भी मेरे मन में बरबस आ जाता है-
राम राज बैठे त्रैलोका।
हर्षित भये गये सब सोका।।
बयरु न करु काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।

मतलब कि ,जब –
भगवान् मन में, जिह्वा पर और निर्मल हृदय के आसन पर ,राज कर बैठ गए, तब कोई शोक ,मोह नहीं, प्रत्युत आनन्द ही आनन्द है।और इसीलिये उन्होंने “सुन्दरकाण्ड” में वचन दिया है, कि सांसारिक- झंझावात से विपद्ग्रस्त मनुष्य को हम शरणागत होने पर सन्तत साधु जीवन देकर नित्य मुक्त कर देंगे –

तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

।। हरिः शरणम् ।।

क्रोध पाप कर मूल

संसार शब्द ही चलायमानता बोधक है।
” सृ ” धातु गमनार्थक होने से, संसरति इति संसारः, गच्छति इति जगत् ऐसा निर्धारित होता है। अब जब यह चल रहा है, तो कोई संचालन कर्ता है, जो इसे चला रहा है, वह सर्वसाक्षी भी है।
इसी तरह शरीर भी है।यह भी चल रहा है।मातृगर्भ में आने, आकार लेने और गर्भ से बाहर निकलने तक, यह जीव निरन्तर चल ही रहा है।शैशव से वार्धक्य और मृत्यु तक ,सब संचरणशीलता,इसे संसार से अभिन्न सिद्ध करती है।
अब शरीर भी परिवर्तन शील और उसी तरह संसार भी परिवर्तन शील।
इस परिवर्तन शीलता को अनवस्थानता भी कहते हैं। जब दोनों अस्थिर हैं, तब दोनों एक दूसरे को देखने में असमर्थ भी।
जो देख रहा है, वह निर्लेप जीवात्मा है
जो कि तद् वत् परमात्मा का अंश भाग है। यह परमात्मा स्वतन्त्र है ,लेकिन यह जीवात्मा कर्मो से परतन्त्र है-
परवश जीव स्ववश भगवन्ता ।
परमात्मा में अविद्या, अस्मिता, राग,द्वेष और अभिनिवेश जैसे पंचक्लेश नहीं होते। इसमें भी नहीं होने चाहिए, लेकिन यह बेचारा जीवात्मा रूपरसगन्धादि विषयों के आकर्षण से आकृष्ट होकर, अपना मूल स्वरूप ही विस्मृत कर बैठा।
विषयों के चिन्तन से पंचक्लेश में फँस कर,माया बस स्वरूप बिसरायोऔर बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं, हो गया है।
विषयों में ऐसा गहरा अनुराग है कि, किसी इच्छित की ,जब पूर्ति नहीं होती, तब,इसमें क्रोध उपजता है।
विषयों का भोग न कर पाने पर धैर्य नहीं रहता, और काम का पुत्र ,क्रोध पैदा हो जाता है –
कामात् क्रोधोभिजायते।

यह शरीर के हर तन्त्र को झकझोर देता है।रक्तचाप बढ़ा देता है, और यहाँ तक कि आत्म/ पर हनन तक का घोर क्रूर कार्य भी करा देता है। जो कि मनुष्य के लिए गर्हणीय है।
भगवान् श्री रामानुजाचार्य ने ,कामस्य अपूर्ण -दशायां क्रोधः अभिजायते तो श्री मधुसूदन सरस्वती ने , विच्छिन्नेच्छया
अभिज्वलनात्मा क्रोधः भवति कहकर ,मानव मात्र के लिए हेय और अनुपादेय कहा।
गीता में भगवान् इसे आसुरी सम्पत् कहते हुए रजोगुण से उत्पन्न मानते हैं।यह मनुष्य की मनुष्यता लील जाने वाला बड़ा पापी और परम शत्रु है-

काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।

अतः –
सद्गुरु कृपा से जिसका विषय निवृत हो जाय, वही स्वरूपनिष्ठ,विदितात्मा,इस परिवर्तन शील शरीर-संसार से मुक्त हो सकता है-

कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसां।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।

गीता-5/26
अब यह तो हुआ काम के पुत्र क्रोध का मनुष्यता विरोधी एक पक्ष,जो इस जीव से अनर्थ कराकर इससे जधन्य अपराध भी कराता है। इस दृष्टि से इससे बचने और मनुष्य बने रहने का उपाय हर जीव को करना चाहिए।
अब इसका एक दूसरा पक्ष भी है, जहाँ यह “क्रोध”, गर्हणीय न होकर ग्रहणीय और धारणीय भी है।
आखिर इसको धारण करने का आग्रह क्यों?
महाभारत के युद्ध में जुए में पराजित पाण्डवों को द्रौपदी ने ” क्रोध ” जागृत करने का उपदेश दिया है।और कहा है कि ,इसके बिना आप सभी की दुरवस्था दूर नहीं होगी ,राज्यलाभ नहीं होगा और कोई आपका सम्मान भी नहीं करेगा।
जिसका किया हुआ क्रोध कभी व्यर्थ नहीं हो, युद्ध में विजयश्री दिला दे,ऐसे सफल व्यक्ति के , सभी लोग वशवर्ती हो जाते हैं-

अवन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदां,
भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः।

अब विचारने पर यहाँ,क्रोध करना तो आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य प्रतीत होता है। और यह दुर्गुण नहीं बल्कि सद्गुण दीखता है।
ऊपर ,जो वासना वासित विषयशायी क्रोध अनुचित था ,वही क्षत्रिय की विजय का मूल बनकर उत्साह और” वीर” भाव हेतु ,रौद्र रूप दिखाने के लिए,स्थाई
” क्रोध ” बनता है। फलस्वरुप यह क्रोध
आदरणीय भी बन जाता है।
स्मरण करें ” श्रीराम ” कथा का वह यज्ञरक्षण प्रकरण, जहाँ मुनि विश्वामित्र अयोध्या जाकर अपने यज्ञ की सुरक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को माँग कर ले आते हैं। क्या विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा मेंं असमर्थ थे? इसलिये वह महाराज दशरथ से राजकुमारों को माँगते हैं। नहीं-
ऐसा नहीं है, वास्तविकता तो यह है कि मुनि स्वयं यज्ञरक्षण में पूर्ण समर्थ हैं।
किन्तु यदि वह स्वयं रक्षाभार उठाते तो ऐसी दशा में उन्हें ” क्रोध ” भी करना होता। और यह” क्रोध”अनुचित होता। पवित्र यज्ञविधि को भी असफल करता। क्योंकि सामान्य दशा में किया गया ऐसा अनुचित, क्रोध किसी भी पुण्यशाली के पूर्व में संरक्षित “पुण्य” को ही भस्मीभूत कर देता है।
अब इसीलिए विश्वामित्र याचना करके श्रीराम लक्ष्मण को यज्ञसाफल्य हेतु लेकर आते हैं। यज्ञ सफल होता है। इधर-
जगदम्बा” जानकी ” के जनक महाराज ” जनक ” पुत्री के विवाह हेतु स्वयंवर आयोजित करते हैं, जिसे देखने की इच्छा से विश्वामित्र श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस स्वयंवर सभा में पधारते हैं।
नाना देशों के नरेश “सीता” से विवाह के लिए सभा में साकांक्ष सज्जीभूत विराजते हैं। जिस धनुष को उठाने पर,वर माला उनके गले में विराजती और “सीता” से उनका विवाह होता,उसे वह हिला भी न सके। वह धनुष अणुमात्र भी ऐसे नहीं डिगा (स्थान च्युत) नहीं हुआ, जैसे कामी के वचनों से ” सती” नारी का व्रती “मन”-
डिगै न संभु सरासन कैसे
कामी बचन सती मन जैसे।।

अब मुनि विश्वामित्र का आदेश होता है-

उठहु राम भंजहु भवचापा।
मेटहु तात जनक परितापा।।

धनुर्भंग अर्थ में ही यह चौपाई निश्चित रूप से आती है। लेकिन एक और दूसरा आध्यात्मिक अर्थ भी अपने मन में उपजता है-
गुरु कृपा से जब राम नाम जिह्वा पर ऊठ गया, तो निश्चित मानिये कि, भव(संसार)का चाप (धनुष) जो मुभे मार कर विदीर्ण करने को उद्यत है,वह भंजित हो गया ,टूट गया। और ऐसे नाम धारक/जापक जन(जनक) का संताप ताप सदा सदा के लिए विनष्ट भी हो गया।
अब मूल कथार्थ मेंं प्रवेश करें। यहाँ भी अनवसर एक क्रोध का अवसर आता है।
” परशुराम” जैसे पराक्रमी पधारते हैं।
अपने गुरु ” भगवान् शिव” का अमोघ और अटूट धनुष टूटा देख कर “क्रोध ” से लाल हो उठते हैं। लक्ष्मण और उनका संवाद-विवाद होता है। अपने पक्ष से युद्घ के लिए उद्यत “परशुरामजी” को देख, सभी अन्य राजाओं को बड़ा सन्तोष और सुख की अनुभूति होती है।
” शेषावतार” लक्ष्मण जी परशुराम और श्रीरामजी सभी एक दूसरे को जानते हैं। किन्तु यह सच मानिए कि लक्ष्मण जी और परशुराम जी ,दोनों ने ऐसे विषम अवसर पर, परस्पर मौलिक ” क्रोध ” नहीं किया है।
बल्कि भैया! यह ” क्रोध ” तो असली क्रोध ही नहीं है।यह तो क्रोध का अभिनय किया गया है। यदि ऐसा न होता तो सभी राजागण मिलकर संगठित होकर, भयंकर ” क्रोध” वश युद्ध करते।रक्त की नदी बहती,और आयोजित स्वयंवर का उद्देश्य, जो ” श्रीसीताराम विवाह” था,वही नष्ट हो जाता।
अतः अन्य राजा परशुराम को अपने पक्ष में वाग् युद्ध करते देख युद्ध विरत ही रहे, और मूल लक्ष्य विवाह की पूर्णता हुई।
फिर भी लक्ष्य पूर्ति के लिए “क्रोध” के अभिनय में ही “शेषावतार” लक्ष्मण जी, एक स्वाभाविक” क्रोध” की अभिव्यक्ति की तरह, कामना पूर्ति की अपूर्ति से पैदा हुए “क्रोध” को पाप कहते हैं ,जो कि वस्तुतः पाप तो है ही।हमें ऐसे” कामज” क्रोध से बचना ही होगा-

लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि,
क्रोध पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं,
चरहिं विश्व प्रतिकूल।।

।। हरिः शरणम् ।।

काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।

जब माँ के गर्भ में था,तब संकल्प लिया था, अब जनि (जन्म) जाउँ भजहुँ चक्रपानी। मुझे सैकडों जन्मों की याद थी। मैंने निश्चय किया था कि ,अब कोई ऐसा काम मुझसे नहीं बनेगा, जिससे किसी अन्य माँ के शरीर में जाकर ,गर्भ वास और संसार दुख की पीड़ा सहनी पड़े।
क्योंकि संसार तो दुःखालयम् अशाश्वतम् है। ऋषि प्रणीत मर्यादा का बोध कराने वाले सद्गुरु भी नहीं मिले कि जैसे वे बन्धमुक्त हैं, मैं भी हो जाउँ।
ऋषि शब्द ही ” ऋष् गतौ” इस गमन अर्थ वाली धातु से बना है। रहनी-सहनी
तो सनातन ही समझाता न ।” सनातन” मिला नहीं, अविद्या माया और ऐन्द्रिक
भोगों ने जकड़ लिया।
यह जगत् जिस पंच तत्व से विनिर्मित है, उन्ही से बना यह शरीर भी है। दोनों की बड़ी दोस्ती है।इनमें प्रत्येक आकाश, वायु,अग्नि, जल और पृथ्वी में क्रमशःप्रत्येक अपने पूर्व-पूर्व से जन्मा है।
एक के बाद अन्यों में दूसरे तीसरे का गुण स्वतः अन्तरित है।
क्रमशः आकाशादि के शब्द,स्पर्श, रूप ,रस और गन्ध गुण निश्चित हैं।जब
आकाश का गुण शब्द मात्र है, तो आकाश से जन्मे वायु में शब्द और उसका मौलिक गुण स्पर्श भी है।
वायु से अग्नि तत्व की उत्पत्ति है और
अग्नि का मूल गुण, रूप है। इसमें रूप के अतिरिक्त उसके पिता वायु का गुण स्पर्श भी है, तो पितामह का शब्द भी।
अब अग्नि से जल तत्व पैदा हुआ, जिसका स्वयं का गुण रस है। इसके अलावा इसके पिता का रूप गुण, पितामह वायु का स्पर्श और प्रपितामह आकाश का शब्द गुण भी है।
अन्तिम पंचम तत्व पृथ्वी है, जिसका अपना गुण “गन्ध” है।यह “जल”तत्व से पैदा हुई है।इसमें इसके पिता जल के रस गुण से लेकर इसके पूर्वजों का रूप,स्पर्श और शब्द भी है।
पृथ्वी से लेकर आकाश तक सभी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हैं।हम अपने कान, त्वचा,नेत्र, जिह्वा और नासिका जैसी ज्ञान की इन्द्रियों से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप,
रस और गन्ध जैसे विषयों का उपभोग करते हैं।
इस उपभोग में पाँच कर्मेन्द्रियों – हाथ,पैर ,मुख,पायु,उपस्थ(जननेन्द्रिय)) का भी योग-प्रयोग है। इस उपभोग में
अब सबसे महत्वपूर्ण चार अन्तः इन्द्रियाँ हैं, जिनके बिना उक्त पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रिय अपना काम में असमर्थ हैं।
वे हैं- मन,बुध्दि, चित्त और अहंकार।
क्रमशः इनमें एक के बाद एक सूक्ष्मतर है। सूक्ष्म होने से श्रेष्ठ भी है।लेकिन यहाँ
सबसे पहले मन, सबसे महत्वपूर्ण है।इस तरह कुल 14 इन्द्रियाँ परिगणित हुईं।
भगवान् सभी चौदह इन्द्रियों में अपने को “मन”घोषित करते हैं-
इन्द्रियाणां च मनः चास्मि।
बिना मन की सहायता के हम किसी इन्द्रिय के विषय का उपभोग नहीं कर सकते। यदि मन नेत्र के साथ संयुक्त न हो तो सामने से कौन गया आया ,हमारी दृष्टि का विषय नहीं बन पाता।
अब यह मन है तो शुद्ध भगवत् तत्व,
लेकिन अनादि जन्मों की अनादि वासना से निरन्तर विषयों में रमण करने से, नाना शरीरों में विचरने से अपनी मौलिक अस्थिरता चंचलता को छोड़ नहीं पा रहा।
यही अस्थिरता इस जीव को निरन्तर संसार-चक्र में घुमा रही है।
विषयों में विचरने और उन्ही में सावधानी पूर्वक बसने से बेचारा बेबस है।
इसी विवशता ने इस शरीर को विषयों का आसंगी बना दिया है।
ऐसी आसक्ति है कि हम कामनाओं के दास ही बन गए हैं।

विषयान् ध्यायतो पुंसः,
सङ्गः तेषूपजायते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः। कामात् …..

संसार के रूप रस स्पर्शादि विषयों का लगातार ध्यान करते-करते इस शरीर का इन विषयों में गहरा लगाव हो गया है।
यह लगाव ही आसक्ति है।
इसी आसक्ति(विषयासंग) से काम पैदा हुआ है। इस ” काम ” के दो अर्थ हैं-
पहला काम स्त्री उपभोग है। सनातन व्यवस्था और मर्यादा में इसे सन्तुलित करने के लिए चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यस्त का उपन्यास किया गया है। यह पहला “काम” गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर, सृष्टि के विकास और पितृ ऋण से मुक्ति के लिए कामवासना का धर्मपूर्वक उपभोग कर परिपूर्ण होता है।
इसी काम के लिए “गृहस्थ आश्रम” की विधि में “विवाह” यज्ञ है।और सन्तति प्राप्ति के लिए ,स्त्री के साथ ” काम “का सेवन एक संस्कार विधि है।
इस विवाह यज्ञ और गृहस्थ आश्रम में, पुत्र पाने के लिए,यह काम सेवन एक पवित्र संस्कार ” गर्भाधान संस्कार” है।
इसीलिये संस्कृत के सुकुमार कवि कालिदास , रघुवंशी राजाओं को इसी मर्यादा का पालक पोषक बताते हैं –
शैशवे अभ्यस्तविद्यानां,
यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां,
योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।
रघूणाम् अन्वयं वक्ष्ये।।

अब देखिये, इस मर्यादित “काम” का , मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्व पुरुष, पूर्वानुक्रम से पालन करते थे।यदि काम को इस अर्थ में लेते हैं, तो हमारी आर्ष संस्कृति ने कैसे-कैसे मनुष्य को दुःखप्रद संसार से छूटने और परमानन्द को पाने में काम का विनियोग नियमित किया था।
यही मर्यादित काम,अमर्यादित काम और विषयभोग को स्वतः तिरस्कृत कर देता है।
काम का दूसरा अर्थ कामना से है।
यही इच्छा अभिलाषा और एषणा कही गई है। आपात सुन्दर और रमणीय इस संसार में पद,पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, रूपया पैसा,मान,बडा़ई के लिए हम पूरा, जीवन ही खपा देते हैं। लेकिन भैय्या! समझ नहीं उपजती,समय बीत जाता है, एक के बाद इसी संसार में ,इन्हीं कामनाओं का दास बनकर चक्कर काटते,नाना शूकर कूकर से लेकर इन्द्रादि के वैषयिक भोगों और कामनाओं में अपना सर्वनाश करते रहते हैं।
मन पछितैहैं अवसर बीते।
अन्त चले उठि रीते।
मिटै न काम अगिनि तुलसी कहुँ
विषय भोग बहु घी ते।

नहीं बोध होता जल्दी-
यह संसार कागद की पुड़िया बूँद परे गल जाना है।
यह संसार ऐसे ही बदलता रहा है। लेकिन यह दुर्लभ मानव देह क्यों मिली?
जब तुलसी सूर कबीर मीरा दादू नानक मलूक रैदास जैसे गुरुओं की वाणी को ही सद् गुरु मान कर उनका चरणाश्रय लेते हुए ,उनकी वाणी का प्रसाद लेंगे, तब सब संसार ,उसमें आसक्ति और ” काम ” तो तिरोहित हो ही जायेगा।संसृति का चक्र टूट जायेगा।
हमारे वैदिक चरित्र नचिकेता ने यही तो शिक्षा दी है। प्रसिद्ध संवाद है ” यम ” और ” नचिकेता” का।
नचिकेता के पिता महर्षि उद्दालक श्वेतकेतु हैं। पिता ने एक ऐसा यज्ञ किया, जिसमें सब कुछ दान करना था। बूढ़ी और अशक्त गायों को भी दान देते, पिता को जब पुत्र नचिकेता देखते हैं,तब पूछते हैं कि हे पिता जी! आप मुझे किसको दान करेंगे। पहले तो उद्दालक ध्यान नहीं देते।लेकिन बार-बार वही कहने पर रुष्ट होकर कह देते हैं कि, तुझे “यम ” को प्रदान करता हूँ।
नचिकेता पिता की आज्ञा मान यम के यहाँ जाते हैं।यम के नहीं रहने पर तीन दिनरात भूखे प्यासे ही रह जाते हैं।
यमराज यात्रा से लौटते हैं।सूचना मिलती है। व्यग्र हो उठते हैं।और बालक को उन तीन दिन और रात्रि के लिए तीन वर देने की इच्छा करते हैं। नचिकेता वर के रुप में पितृपरितोष,अग्निविद्या का ज्ञान माँगते हैं। और अन्तिम वर के रूप में आत्म विद्या का ज्ञान माँगे जाने पर नाना प्रलोभन देकर यम उस, गुह्यतम आत्मविद्या से विरत करने का प्रयास करते हैं-

ये ये कामाः दुर्लभाः मर्त्यलोके,
सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्थयस्व।
इमा रामाः सरथाः सतूर्याः,
न हीदृशा लम्भनीयाः मनुष्यैः।
आभिः मत् प्रत्ताभिः परिचारयस्व।
नचिकेतः मरणं मा अनुप्राक्षीः।।

लेकिन नचिकेता ,न वित्तेन तर्पणीयो
मनुष्यः।
और ,तवैव वाहाः तव नृत्यगीते, कहकर, इन कामनाओं से विरति में ही
अपना संकल्प व्यक्त करते हैं।और अन्त में विवश होकर यम ने उस अनन्त की प्राप्ति के लिए ,अनन्त कामनाओं के अन्त के लिए और संसृतिचक्र के भी अन्त के लिए “आत्म -विद्या ” का उपदेश किया है।और आज इस कराल कलि काल में
यदि ऊपर ऊक्त सन्त सद्गुरु की वाणियों का आर्ष-उच्छिष्ट प्रसाद किसी पुण्यशाली को मिले, तो वही इन कामनाओं की मार से बीमार नहीं होगा।
ऐसे जीव का मनुष्य जीवन सार्थक होगा ,जो ऐसे रैदास-तुलसी-प्रसाद को पाकर भगवच्चरणाश्रय पा जायेगा।
और ऐसे उपर्युक्त सन्तों का जिस दुर्भाग्यशाली को आधार नहीं मिला तो विषयानुराग ही रहेगा।ओर तब भगवान् उमामहेश्वर की उक्ति सार्थक होगी-

सुनहु उमा ते लोग अभागी ।
हरि तजि होंहिं बिषय अनुरागी।।

इसलिए बाबा ने हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ,कहते हुए भगवद् भजन कीर्तन कथा श्रवण को ही सन्तोष की जड़ कहा-
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।
बिनु सन्तोष कि मिटै कि कामा
थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

।। हरिः शरणम् ।।

नवम सरल सब सन छलहीनामम भरोस हिय हरष न दीना।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का साधन भक्ति का अन्तिम सोपान मूलतः विश्वास है। जिसके बिना कौन सी भक्ति?
क्योंकि – बिनु बिश्वास भगति नहिं।
किसी भी लौकिक या अलौकिक कार्य की भी सफलता, बिना विश्वास के सम्भव नहीं। तब विश्वास मूर्ति भगवान् पर अविश्वास रहने पर,क्या भक्ति मिलेगी और भवभय भागेगा? कदापि नहीं।
इसलिए श्रद्धा-विश्वास-विग्रह सीताराम पर दृढ़ भरोसा होना, नवीं भक्ति का प्राण है। विश्वास के साथ श्रद्धा तो स्वयं बद्धा है। इसलिये इसके बिना जीवन ही निष्फल है-
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई।
बिनु महि गन्ध कि पावै कोई।।
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिश्वासा।
बिनु हरिभजन न भवभय नासा।।

जब श्रद्धा-विश्वास-रूप श्रीसीताराम हृद्देश में नित्य विराजित हैं, तो उनका नाम स्मरण करते हुए किसी भाँति दीनता( दुख) का अनुभव कदापि नहीं होना चाहिए।अविनाशी ईश्वर राज रहे,जब हृदय देश क्यों दुःख लेश। और इसीलिये बाबा भी स्मरण कराते हैं-
अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल लोक जन दीन दुखारी।। अतः
तजि शोक धाम।
विश्राम राम।
सब सिद्ध काम।
कह राम राम।

हमारे अंशी वे भगवान् जब, चेतन ,निर्मल और सहज स्वाभाविक नित्य प्रकर्ष हर्ष सुख की राशि हैं, तब उन्हीं के अंशभूत हम जीव भी,आनंद राशि ही हैं।
जब परम श्रद्धा-विश्वास में विश्वास भरोसा है, तब हृदय में हर्ष ही रहेगा, दीनता (दुखरूपता) आ ही नहीं सकती।

शास्त्रों में भी हम इसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होकर निवेदन करते हैं, कि एक मनुष्य की पूर्णायु शतायुष्य पर्यन्त कोई दीनता दरिद्रता न हो-
शतम् अदीनाः स्याम शरदः शतम्।

नवम सरल सब सन छल हीना।
तो ऐसा समझें कि स-सीता, र-राम और ल- लक्ष्मण(सरल), जब मनोमन्दिर में आ विराजे हैं,तो कैसे कपट(छल) छू पायेगा।
श्रीरामनाम जप स्मरण करते-करते ये सभी साधन स्वतः उपलब्ध होंगे।
भगवान् ने तो भक्ति का लक्षण ही दे दिया है-सरल स्वभाव, निष्कपट(निर्मल)
मन,यथालाभ सन्तोष,दयावान् होना-
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न जप तप मख उपवासा।।
सरल स्वभाव न मन कुटिलाई।
यथालाभ सन्तोष सदाई।।
मेरे चित चढ़ि नव-नवा भगति।
नहिं होइ अगति सब भाँति प्रगति।।

श्रीसन्त संग, हरि-कथा रंग।
निर्मान गुरूपद -कमल प्रेम।
निष्कपट होइ हरि जनन गान।
विश्वास राम-जप भजन मान।
इन्द्रिय निग्रह हित विरत राग।
सुन्दर स्वभाव धर्मानुराग।।
सम्पूर्ण जगत ईश्वर वितान।
सब सन्त प्रभू ते अधिक जान।
प्रारब्ध प्राप्त सन्तोष धार ।
परदोस स्वप्न दर्शन न धार।
निश्छल स्वभाव श्रीकृष्ण आस।
हिय हरष दीन नहिं आस पास।

प्रेमियों! ऐसी साधन भक्ति में से कोई भी एक मिले ,तो शरणागति भक्ति मिले।
और ऐसी भक्ति का भाजन बन जाने वाली शबरी तो धन्यातिधन्य है ही,हम भी भगवान् और भक्त का स्मरण कर धन्य हो रहे हैं –
राम भजत बिटिया भली,
राम बिमुख नहिं पूत।।
शबरी तो बैकुण्ठ गई।
धुन्धुकारि भयो भूत।।

अब प्रभु कृपा से प्रभु स्मरण करते हुए,
प्रभु चरण शरण ग्रहण।

।। हरिः शरणम् ।।

आठम यथालाभ सन्तोषासपनेहुँ नहिं देखै पर दोषा।

आठवीं भक्ति नदी भगवद् मुख से मुखरित होती है।
केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि तत्वतः मनुष्य बनने और पुनरपि जननं पुनरपि मरणम् ,पुनरपि जननीजठरेशयनम् ,को रोककर ,सुखी मीन जहँ नीर अगाधा,
जिमि हरिशरण न एकौ बाधा
वाली भक्ति और परम आत्यंतिक सुखप्राप्ति के लिये, यथा लाभ सन्तोष अनिवार्य है।इसलिये-
तुल्यनिन्दास्तुतिः मौनी ,
सन्तुष्टः येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिः ,
भक्तिमान् यो स मे प्रियः।12/19 गीता

लीलापुरुषोत्तम ने निन्दा या स्तुति होने पर भक्त को समान भावस्थ रहने वाला कहा। आखिर ऐसी समान अवस्था किसी भक्त में उपजी कैसे? सन्तोष कैसे हुआ?
इसलिये कि उसकी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों को छोड़िये ,जब अन्तःकरण यानि कि मन, बुद्धि, चित्त
और अहंकार ही संसार में नहीं होता तब
मानिये कि वह स्वरूपतः इन चतुरिन्द्रियों को भी भगवान् में लगा दिया है,जिससे संसार और विषयों से विरत होकर, वह भगवद् रत ही
हो जाता है।तब समस्त जगत् ,वासुदेवः
सर्वम् ,प्रतीत होने से सभी वस्तु,व्यक्ति, पदार्थ, देश,काल में भगवान् ही अनुभव में आते हैं।
अतः उसके ऊपर निन्दा और स्तुति का प्रभाव नहीं होता, क्यों कि वह भावग्राही जनार्दनः के भाव में जो आ गया। मैं और मैं पन मिटने से भगवद् बोध ही होता है, और किसी का ज्ञान ही नहीं रहता।तभी परम सन्तोष आता है- और-
जब मैं था तब हरि नहीं ,
अब हरि हैं मैं नाहिं
की दशा हो जाती है।
अनिकेतः अर्थात् उसकी वासना गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यस्त आदि अवस्थाओं में किसी भी घर या कुटीर में नहीं रह जाती संसारोच्छेद होने से गृहादि के प्रतिकोई अनुराग नहीं रहता।अब एकमात्र
“अचल “भगवान् में निश्चल बुद्धि हो जाने से ,भक्त को स्थिर -मतिः कहा।
क्योंकि भगवदनुरक्ति से सन्तोष गुण आ ही जाने से, यथालाभ सन्तोषः स्वतः सिद्ध।
इसीलिये बाबा ने कहा कि बिना सन्तोष के कामनाओं का नाश नहीं होगा।सुख तो दिवा स्वप्न ही है।भगवद् भजन या भगवान् के -नाम,रूप,लीला,गुण सेवन के बिना कामना जायेगी नहीं।और चले जाने से फिर आयेगी कैसे, क्योंकि शरणागत रक्षक और वात्सल्यगुण सागर भगवान् जो आश्रय बन गये।बाबा यही भाव “मानस”में मनन करते हैं-
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।
रामभजन बिनु मिटहिं कि कामा।
थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

कोउ विश्राम कि पाव,तात सहज सन्तोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव ,कोटि जतन पचि-पचि मरिअ।।
“उसकी “अनुभूति “वही “जान सकता है
दूसरा कौन जाने भैया!
बाबा ने बरबस परवश उसकी दशा का वर्णन किया-
मम गुन ग्राम नाम रत,
गत ममता मद मोह।
ता कर सुख सोइ जानै,
परानन्द सन्दोह ।।

निश्चित रूप से सन्तोषी भक्त का काम भगवान् ही बन जाते हैं।परिजन पुरजन मान बड़ाई में,उसकी वृत्ति रहती नहीं।
वह तो वस्तुतः अकाम है।
संसार के प्रति उसकी कोई क्रिया होती नहीं, जो -जो करता है, वह तो परम काम के प्रति आकृष्ट चित्त है-
अकामस्य क्रिया काचित्,
दृश्यते नेह कर्हिचित् ।
यद् यद् हि कुरुते किञ्चित् ,
तत् तत् ” कामस्य ” चेष्टितम्।।

अब आठवीं भक्ति का दूसरा भाग है कि
स्वप्न में भी परदोष न देखना।
जब संसार राग वासुदेवः सर्वम् से मिट गया, तब दोष कैसे?
कोई निन्दनीय दोषी दिखेगा ही नहीं।
और यदि संसार भाव है और उसे हटाना चाहते हैं, तब भी दोषदर्शन जैसे अपराध से बचना ही होगा। इसीलिये बाबा ने कुछ छोड़ा नहीं और ऐसा करने वालों को सावधान किया-
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।
पर निन्दा सम अघ न गरीसा।
हर गुरु निन्दक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।
सब के निन्दा जे जड़ करहीं।।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।

और वस्तुतः दूसरे के दोष से विरत होने के लिए इसलिए कहा कि, दोषी के दोष, दोष द्रष्टा के मन में उतर कर उसे भी दोषपूर्ण कर देते हैं। दोषी का पाप तो कम होता है, लेकिन दोषी के तत् तत् दोष ,दोषद्रष्टा को भी भोगने पड़ जाते हैं।
इस तरह साधन भक्ति के निर्देश क्रम में आठवीं भक्ति की पूर्ति में श्रीसीतारामचन्द्र
भगवान् ने कहा-
आठम यथा लाभ सन्तोषा।
सपनेहुँ नहिं देखै परदोषा।।

।। हरिः शरणम् ।।

सातम सम मोहिमय जग देखामोते अधिक सन्त करि लेखा।।

सातवीं साधन भक्ति में दो बातें कही जा रही हैं। एक यह कि सम्पूर्ण जगत् मात्र को मोहि(भगवान्) मय देखना।और दूसरी यह कि, निष्कामी साधु सन्तों को मुझ(भगवान्)से अधिक समझना ।
अब देखिये, यह दो मिलकर एक ही हैं।
दोनों देखने में अलग-अलग अवश्य हैं, लेकिन हैं, एक,क्यों?
बाबा ने विनयपत्रिका के57 वें पद में उत्तर दे दिया था-सन्त भगवन्त अन्तर निरन्तर नहीं। जब दोनों में रंचमात्र अन्तर नहीं है,तब सारी सृष्टि हरिः ओ3म् तत् सत् मय होने से,सभी में भगवद् दर्शन करना चाहिए। भगवत् तत्व और सन्त भक्त तत्व को पृथक् मानें तो-
यह भी तत्वतः ध्रुव है, कि चूंकि भक्तों की दृष्टि में स्वपर भेद नहीं है।अतः वे सभी में भगवान् को देखकर व्यवहार करते हैं।इसलिये कि उनका कोई शत्रु मित्र नहीं, वे तो तुलसी ममता राम सों समता सब संसार वाले हैं-
उमा जे रामचरनरत विगतकाममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।

वे तो जड़ चेतनात्मक पशु,पक्षी,कीट,
पतंग, लता, वृक्षादि में भी भगवद् दृष्टि रखकर सभी का पादरज सेवन करते हैं।नीम हो,पीपल हो,तुलसी हो,आम्र हो सभी में भगवद् स्वरूप देखने दिखाने वाले हैं-
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बन्दौं सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।
और सभी के रामकृष्ण मय होने से सबको युगल हाथ जोड़कर प्रणाम भी करते हैं, क्यों की एक हाथ से प्रणाम करना शास्त्र निषिद्ध है,यह हमारी
प्रणाली नहीं –
सियाराम मय सब जग जानी ।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

और भैया! देखना, चलना, फिरना उन्हीं का सार्थक है, जो विनाशशील संसार में अविनाशी को देख परमानंद उमगि अनुरागा हो जाते हैं। इसीलिये ब्रह्माण्ड गुरु की वाणी निकली –
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्सु अविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।13/27

और इसीलिये ऐसे ज्ञानी भक्त को भगवान् ने अत्यन्त दुर्लभ कहा।भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।। जो ज्ञानी है, वह भक्त होगा और जो भक्त है, वह ज्ञानी भी। और बहुत सारे जन्मों के अन्त में ज्ञानी मुझे या मेरी भक्ति पायेगा, इसका यह भी तात्पर्य है कि, इसी मनुष्य जन्म में, भगवत् प्राप्त सन्त साधु , दूसरा जन्म ही मानो दे देंगे,
जिससे सारा भेद मिटकर ,एक अभिन्न सच्चिदानंद घन का दर्शन होने लगेगा-
बहूनां जन्मनाम् अन्ते,
ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वम् इति ,
स महात्मा अतिदुर्लभः।। 7/19

और जिन महात्माओं ने गुरु अनुग्रह से देवानुग्रह प्राप्त किया और एक के बाद
दूसरे तक शृंखला की तरह यह भगवद् भक्ति अनुक्रमित हो रही है, वे तो धन्य धन्य हैं।
ऐसे ही सन्तों को बाबा चलता फिरता तीर्थराज प्रयाग कहते हैं। जिनकी महिमा का वर्णन स्वयं ब्रह्माविष्णुमहेश, व्यास वाल्मीकि की वाणी नहीं कर पा रही है।
वह तो तुलसी दास के लिये वैसे ही होगा जैसे सागभाजी को बेचने वाला बनिया हीरे मोती का क्या मोल बतायेगा?
विधि हरिहर कविकोविद बानी कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मो सन कहि जात न कैसे ,साक बनिक मनिगुन गन जैसे।।

सन्त महिमा को नारद जी के द्वारा प्रश्न करनेपर स्वयं भगवान् अरण्य काण्ड में कहते हैं-
सुनु मुनि सन्तन के गुन कहहूँ।
जिन्ह ते मैं उनके बस रहहूँ।।

वे भक्तजन मेरी लीला कथा गाते फिरते हैं और परमार्थी हैं।शास्त्र और स्वयं सरस्वती भी उन साधुगुणों को नहीं गा पाती-
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला।
हेतुरहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते।
कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।

वे कामक्रोधादि षड् विकारों से विहीन ,
अव्यर्थ वाणी वाले,निष्कामी, स्थिरमति,
अकिंचन, पवित्र और मेरे जैसे सुख के आश्रयस्थल हैं, सदा दिवाली सन्त घर।
असीमित बोधवाले, इच्छाहीन, सीमित भोग वाले, सत्य सार बोलने वाले अग्रणी वक्ता और योगी हैं-
षट् विकार जित अनघ अकामा।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मित भोगी।
सत्यसार कवि कोविद जोगी।।

संसारविषयविष से सावधान, दूसरों को सम्मान देने वाले, अभिमान रहित, धैर्यवान्,धर्मरत और परम कुशल हैं।गुणों के आश्रय, दुखातीत, सन्देह रहित वे सन्त जन भगवच्चरण कमल के ही प्रेमी हैं, देहगेह के नहीं-
सावधान मानद मदहीना।
धीर धरमगति परम प्रवीना।।
गुनागार संसार दुख ,
रहित विगत सन्देह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय,
तिन्ह कहु देह न गेह।।

ऐसे सन्त सारे जगत् को भगवान् मय जान मान कर ,ऐसी रहनी सहनी से
रहते हैं कि, मैं तो उनके आधीन हो गया हूँ।साधुओं ने मेरे हृदय को ग्रस ही लिया है। जैसे मैं उनका प्रिय तथा वे मेरे प्रिय हैं- अहं भक्तपराधीनः हि,
अस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिः ग्रस्तहृदयः
भक्तैः भक्तजनप्रियः।।

और हे दुर्वासा जी! संसार से कुछ भी अपेक्षा न करनेवाले, शान्त,मौनी और सभी में समान दृष्टि से मुझे ही देखनेवाले सन्तों के पीछे-पीछे मैं ऐसे चलता हूँ, कि उनके चरणों से उड़ी धूल मेरे शिर पर पड़े और मैं पवित्र हो जाऊँ-
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शिनम्।
अनुव्रजामि अहं नित्यं पूययेद् अङ्घ्रिरेणुभिः।।

और इसीलिये साधन भक्ति के क्रम में स्वयं को चिन्मय रूप जगत् के कण-कण में देखने वाले सन्तों को अपने से अधिक श्रेष्ठ कहते हैं, जिनके अनुगमन से शरणागति भक्ति मिलती है-

सातम सम मोहिमय जग देखा।
मो ते अधिक सन्त करि लेखा।

।। हरिः शरणम् ।।