हानि -लाभ, जीवन-मरण,
यश-अपयश विधि-हाथ। इसी तरह-सुत वित लोक ईषणा तीनी।इत्यादि बातों पर विचार
करने पर स्पष्ट होता है कि-किसी भी कार्य का परिणाम अपने मन मे बसाकर कार्य करना ठीक नहीं है “मा फलेषु कदाचन”इसको ध्रुव कर देता है।दूसरी बात-जन्म-मृत्यु प्राकृतिक नियम है, हम प्रकृति(माया) के अधीन हैं, उसके बाहर नहीं(जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:,ध्रुवं जन्म मृतस्य च)इसमें परिवर्तन केवल और केवल मायाधीश की शरणागति से ही सम्भव है(मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते)
तीसरी बात-यश अथवा लोकप्रतिष्ठा, तो यह भी विधिक व्यवस्था के कारण प्रकृति के ही आधीन है।
अतः जब उक्त लाभालाभादि
हमारे हाथ मे नहीं हैं, तो हम कोई भी कार्य कामनाओं को पाल क्यों करें। यह कामना परक कर्म ही सारे कष्टों का मूल है।इस तथ्य को जानकर कामना परक कर्म से सावधान रहे। अरे भाई “देनदार कोइ और है देत रहत दिन रैन”देने वाला जब देता है, तो छप्पर फाड़ के देता है। हरिश्शरणम्।।
Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay
I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.