अरे नारायण, ब्रह्माण्ड गुरु ने गीता में जो यह कहा कि कर्म करने में अधिकार मात्र है फल ग्राहिता में कदापि नहीं।
साधारण रूप से जो दास की समझ है उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को मनमानी कर्माधिकार प्राप्त नहीं है अपितु शास्त्र सन्त अनुमोदित कर्म में अधिकार है। क्योंकि यदि कोई मनुष्य है तो वह पहले किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले समझ ले कि उसके करिष्यमाण किसी कर्म से मानवता आहत तो नहीं होगी।
इस प्रकार सुविचारित शास्त्र सन्त अनुमोदित कर्म करे और उस कर्म के करने में अहंकार नहीं हो तो वही धर्म होगा।
रक्षितः धर्मः रक्षति।
धर्मो रक्षति रक्षितः।
जब हम प्रत्येक कर्म में धर्म की रक्षा करते हुए प्रवृत्त हों तो वह रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है और करणीय कर्तव्य कर्म को शास्त्र सन्त अनुमोदित करते हुए उस कृत कर्म में फलानुसन्धान नहीं करने से उसका उत्तम फल वही कर्मदेव/श्रीकृष्ण प्रदान करते हैं। अतः धर्मानुमोदित शास्त्र अनुमोदित और सन्त अनुमोदित कर्म करते फलाकांक्ष नहीं होना चाहिए, इसलिए कि वह सर्वनियामक सत्ता किस सत्कर्म के लिए क्या कितना फल देता है,यह तो वही जाने।
क्यों कि पात्रता परीक्षा के पश्चात् ही फल का नंबर है।
हरिः शरणम्
http://www.shishirchandrablog.in