मेरा यहां संसार में है कुछ नहीं मानूं अटल।
संसार प्रतिपल बदलता है जा रहा यह भी अटल।।
इसलिए बीते समय पर शोक करना मूर्खता।
किस कर्म की है अफलता या सफलता नहिं देखता।।
पूर्व जन्मों के करम वश दुःख सुख सब भोगता।
यह भी न है मद किया हमने या किया हमने खता।।
चलते हुए भोजन क्रिया सब शास्त्र करते हैं निषिध।
हंसते हुए कुछ बोलना संभव नहीं होता विविध।।
है श्रवण हित दो कान इनका है रहस्य यही प्रभो।
जब बोलना अनिवार्य हो तब ही अलप बोलूं विभो।।
ऋषि शास्त्र वेद पुराण पथ का चयन कर बढ़ते रहें।
है पाप क्या है पुण्य न विचार कर मानवता गहें।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
https://shishirchandrablog.in/