त्याग में अनुभव करो आनन्द की सीमा नहीं।
संसार की सब पद प्रतिष्ठा है हमारी मां नहीं।।
जब छोड़ सब उन्मुक्त हो ऐसी कहीं गरिमा नहीं।
यह आत्म अनुभव भव पराभव करैं गुरु किरपा यहीं।।
यह जीव जीवन चले सत्पथ जब मिले श्रीगुरू वही।
है परम परमानन्द सच्चित् करुण करुणा कण सही।।
हैं “उन्ही” के भेजे हुए सब दिव्य अवतारी पुरुष।
यदि हम करें स्वीकार उनको तुरत जाये सब करुष।।
इस आत्म विस्मृति का स्मरण हम कौन हैं क्या हो गये।
करने कराने यही अनुभव सद्गुरू नूतन नये।।
छूटें असद् व्याहार औ व्यवहार सत् पथ हम चले।
वह एक आलक्षित चरम पाकर विषय वसना जले।।
यह तब हुआ जब मुक्त परमारथ रथी छाया मिले।
कट,बन्ध बन्धन धन धरा,आत्मिक कली ज्योतित खिले।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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