मेरा यहां संसार में है कुछ नहीं मानूं अटल।
संसार प्रतिपल बदलता है जा रहा यह भी अटल।।
इसलिए बीते समय पर शोक करना मूर्खता।
किस कर्म की है अफलता या सफलता नहिं देखता।।
पूर्व जन्मों के करम वश दुःख सुख सब भोगता।
यह भी न है मद किया हमने या किया हमने खता।।
चलते हुए भोजन क्रिया सब शास्त्र करते हैं निषिध।
हंसते हुए कुछ बोलना संभव नहीं होता विविध।।
है श्रवण हित दो कान इनका है रहस्य यही प्रभो।
जब बोलना अनिवार्य हो तब ही अलप बोलूं विभो।।
ऋषि शास्त्र वेद पुराण पथ का चयन कर बढ़ते रहें।
है पाप क्या है पुण्य न विचार कर मानवता गहें।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Month: January 2026
कली ज्योतित खिले
त्याग में अनुभव करो आनन्द की सीमा नहीं।
संसार की सब पद प्रतिष्ठा है हमारी मां नहीं।।
जब छोड़ सब उन्मुक्त हो ऐसी कहीं गरिमा नहीं।
यह आत्म अनुभव भव पराभव करैं गुरु किरपा यहीं।।
यह जीव जीवन चले सत्पथ जब मिले श्रीगुरू वही।
है परम परमानन्द सच्चित् करुण करुणा कण सही।।
हैं “उन्ही” के भेजे हुए सब दिव्य अवतारी पुरुष।
यदि हम करें स्वीकार उनको तुरत जाये सब करुष।।
इस आत्म विस्मृति का स्मरण हम कौन हैं क्या हो गये।
करने कराने यही अनुभव सद्गुरू नूतन नये।।
छूटें असद् व्याहार औ व्यवहार सत् पथ हम चले।
वह एक आलक्षित चरम पाकर विषय वसना जले।।
यह तब हुआ जब मुक्त परमारथ रथी छाया मिले।
कट,बन्ध बन्धन धन धरा,आत्मिक कली ज्योतित खिले।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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