हरी की

आत्मा का बोध हो क्या स्वतः प्रमाण्य से।
अथवा यह सम्भव है परतः प्रमाण्य से।

गुरुओं ने कहा यह सम्भव तभी है नाथ।
जब मिल अकिंचन नामदेव ज्ञानदेव का साथ।

इनकी बानी में डूब इनकी कृपा का याचन।
पाते हैं पाये हैं पावेंगे आरत मन।।

यही साधु सन्तजन इनकी चरनों की धूल।
धारण करें जो मन विषय विष जाये भूल।।

कहीं नहीं गये नामा ज्ञान सूर तुलसी कबीर।
मिलते हैं आज भी प्रत्यक्ष होवे हृदय पीर।।

आरत हो चाहे जो चाहना न और की कर।
सब कुछ समरपन सन्तन चरनन में धर।।

ऐसी ही मति बनी दास विन्ध्येश्वरी की।
नष्ट मोह कृपा मोहन गुरु नारायण हरी की।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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