हरी की

आत्मा का बोध हो क्या स्वतः प्रमाण्य से।
अथवा यह सम्भव है परतः प्रमाण्य से।

गुरुओं ने कहा यह सम्भव तभी है नाथ।
जब मिल अकिंचन नामदेव ज्ञानदेव का साथ।

इनकी बानी में डूब इनकी कृपा का याचन।
पाते हैं पाये हैं पावेंगे आरत मन।।

यही साधु सन्तजन इनकी चरनों की धूल।
धारण करें जो मन विषय विष जाये भूल।।

कहीं नहीं गये नामा ज्ञान सूर तुलसी कबीर।
मिलते हैं आज भी प्रत्यक्ष होवे हृदय पीर।।

आरत हो चाहे जो चाहना न और की कर।
सब कुछ समरपन सन्तन चरनन में धर।।

ऐसी ही मति बनी दास विन्ध्येश्वरी की।
नष्ट मोह कृपा मोहन गुरु नारायण हरी की।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो

भाई जी, हमारी बड़ी समस्या है।

हम हम करि धन धाम संवारे बचे न काल बली ते।
मन पछितैहैं अवसर बीते-

पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी विनय पत्रिका में।
दास ने सभी पूज्य जनों से सुना है और भगवत्कृपा से पढ़ा भी है कि यह अहं जाता नहीं और बारम्बार भवबन्ध में जकड़े रहता है।
किसी अहंशून्य महत्पुरुष की कृपा बस हो जाय तो काम बन जाय।
मन बुद्धि चित्त और अहं में क्रमशः एक से आगे एक सूक्ष्मतर है।
इसी अहं से मम जुड़ा है।
देह भाव वही मेट सकें जिन सन्तन कौ मिट गयो है।
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
अब जब परम प्रिय राम जी हो जायें, हनुमानजी जी कृपा करैं।
सन्त भक्त जन दया का पात्र बना लें।

राम नाम के पटतरे देबे को कछु नाहिं।
क्या लै गुरु सन्तोसिये हौंस रहि मन माहिं।।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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