पश्चिम का भोग भोगी सर्प जब डंसता है।
भारत का योग आकर यहीं तो फंसता है।।
सहशिक्षा समानता ने कहीं का नहीं छोड़ा है।
भौतिकता की अन्धी दौड़ बड़ा भारी रोड़ा है।।
रही सही कमर तोड़ी मोबाइल का जमाना है।
हर अपराध फैलता है क्या कोई माना है।।
सारे सम्बन्ध टूटे भ्रान्त भोग काम ऊपर।
विषय भोग काम रोग मनुजीवन दूभर।।
कहां गयी सावित्री अनुसूया सीता है।
द्रौपदी न दीखती मेरी भी मति भीता है।।
आकर जगावो राम! देवसंस्कार जगे जागे।
भोग का कुयोग रोग अव्यवहित भागे।।
भेजो कबीर बीर उपनिषद् पुनः गाये।
साखी सबदी में सत्य गाकर सुनाये।।
चित्त प्रकृतिस्थ होवे अन्तर्हित चेतना में।
बुद्धि से विवेक होय राम नाम नामें।।
राजा राम रघुवंशी रावण को मारो।
सूर्पनखा सोनम से देश को उबारो।।
हरिगुरुसन्त: शरणम्
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