प्रेमानंद

जब तक संसार के लायक बने रहेगो, भगवान् के लायक नहीं बन सकते।

यह मानवजीवन भगवान् की प्राप्ति हेतु है,संसार की प्राप्ति हेतु नहीं।

संसार में मन बुद्धि चित्त अहं की वृत्ति तो संसार में बारम्बार डालेगी।

जिस क्षण यह सत् चित् आनन्द, शरीर से पृथक् होगा, तब मन आदि की वृत्ति संसार में रहने से कर्मजाल के कारण संसार पुनः मिलना ध्रुव है।

अविलम्ब लौट आ, चल रे मन! अपने शाश्वत प्रेमी की और।

संसार के राग भोग पद प्रतिष्ठा में जो नहीं रमा,
वही कालिदास भारवि भास तुलसी कबीर रैदास बन कर शाश्वत पदवी पाया।

विचारो बुद्ध की मनीषा, मीरा का समर्पण जिसने ज्ञान भक्ति से अनन्त को स्वीकारा।

संसार में मनोरमता बन्धन है,जबकि भगवान् के नामरूपलीलागुणों में मनोरमता मुक्ति है।

शरणागति मुक्ति का उपाय भी है और उपेय भी।

सुमिरो कि प्राक्तन शरीर के संस्कार वश वेदादिक शास्त्र सुनाने सुनने का अवसर मिला। इस अवसर को क्यों गंवायें।

तुलसी बाबा
मति कीरति गति भूति भलाई।जो जेहिं जतन जहां जेहिं पाई।सो जानौ सत्संग प्रभाऊ।लोकहुं वेद न आने उपाऊ।।

कालिदास
व्यतिषजति पदार्थानान्तर: कोपि हेतु:। न खलु वहिरुपाधीन् प्रीतय: संश्रयन्ते।

बाहर की ओढ़ी गई मायिक संसारी उपाधियां, वास्तव प्रेम का कारण नहीं। वह कोई अन्तर तत्व सत्व है जिससे समस्त पद पदार्थ प्रीति प्रेय हैं।

शाश्वत प्रेमी भरपूर कंद।
है जहां रहे वह प्रेमानंद।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
https://shishirchandrablog.in

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment